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Full text of "Shri Krishnay Namahsri Vrat Raja"

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नके शरणवरणतत्वका उपदेशामृतचुवाना एवम्‌ भारतके कोने कोनेमें सनातन ` 
धमकी दु दुन्दु | भ बजाना सिवा जापकं आज ओर फिसका काय्यं हो १ सष द क 2? 











` अखिल मानव समाजोपर दुष्टि डालकर देखलीजिए, आधृनिक ओौर प्राचीन सभ्यताओ- 
पर पूरा विचार कर लीजिए, भूमण्डकके किसीभी छोरेमे छोटे ओर बडेसे बडे खण्डको ले लीजिए चाहें 
असम्य केहृलानेवाक नरोकाही समूह्‌ क्यो न हो ? कोई भी समुदाय एवं संप्रदाय व्रतो भौर उत्सवोसे खाली 
नहीं है, अपने २ ढंगके सभी उत्सव मनाते है ओर त्रत करते हं ! ब्रतोकी महिमा वेदनेभी बडे ही आदरके 
साथ माहे त्रत करनेवाला सुयोग्य पुरुष जमदीकसे प्राथना करता ह कि-“ अम्ने व्रतपते व्रतं चरिः ` 
ह तच्छकेयम्‌, तन्मे राध्यताम्‌, इवमहमनुतात्सत्यम्‌पेभि हे त्रतेके अधिपते! ` 
सबसे बडे परमात्मन्‌ ! मेत्रत करूगा, एेसीमेरी इच्छा हैमे उस तव्रतको पूरा करसक्‌, यहु मु 
शक्ति दीजिए । यहं तो त्रतकर्ताकी वब्तारम्भसे पदिका बीत है कि, वह्‌ व्रतके पूरा करनेसे मेरा कल्याण 
होगा इस भावनासे प्रेरित होकर उसकी सफकताके किए परमाल्मासे प्राथेना करता है । जब वहं व्रतनिष्ठ 
होजाता है तो उस कालम सत्य मान्त है कि, में अपने जीवनके अमूल्य समयको वृथा ही नष्ट कर रहा था 
उससे अब्र विरतहोकर सच्चे उपयोगकी ओर जाता हूं । जितना में बरतमे समय कगाऊंगा कही सच्वा समय 
| है, बाकी तो अनृत यानी ज्जू उपयोग है । उससे जीचनक्ती कोई साथंकता नहीं होती । यह है ब्रतपर वदिं 
कोका विर्वास कि व्रत ही सच्च जीवन बनाता हे यही कारण हे कि, कितनीहि ऋग्वेदकी ऋचाओमे अत्यन्त, ` ( 1 
सम्मानके साथ व्रतं शब्दका उल्केख कि है- “ आद्त्य शिक्षत श्रतेन, ` वयमादित्य व्रते 
जन्मनि व्रते, प्रत्नो अभिर्श्चति व्रतम्‌, ८५ + । प ब्रते “ ये ऋर्वेदके मच्व्ोके ` 
. वैथोडेसे दिये सब्दक्ता प्रयोम परिस्युट दीख रहा है । व्रत शब्दके अथं का विचार ¦ 1 | 


























चिशेष ही है । वृत्र-धातुसे उपरादि अतन प्रत्यय होकर त्रत शब्द बनता है ! निर्क्त 
स्ण ˆ वृणोति ” पदसे किया है कि, जो कमं कर्ताको वृत्त करे वह्‌ व्रत है । दूसरा चिव . 
वारयति ” पदसे दिया है, कि जो अयनेमे प्रवृत्त हुए पुरुषको स्त्री आदि जपचारो से, 
वेषिद्ध कमसि रोकता है; जिन्हँं कि, परिमाषाप्रकरणरमे ब्रत- 
 राजने गिन २ कर समञ्ञाया है । यदि किरार ाः स्के देखा जाय तो निरूक्तकारके दोनों अथे व्रतराजके व्रत- क ८८ 
पर घटते है । यह एक तरहके सकृल्प विशेषके क्रत कहता है, (0 इस ब्र रः दृष्टिसिे ` 

` विचार करिया जाय तो दोनोकि अथेका स्वास्स्य एकही हेता है । महषि यास्कके अर्थ॑से उसका न मो ईमी वास्त | 

मेद नहीं रह॒जाता 1 का अथं क्के फदाथसे किसी भी अंगम बाहर नहीं जा सकता, व्रतियौ । 

धरमोमिं वरिस्तार्के साय बे पदाथं एिखे हए है; जो कि, उन्हे करने | 




















ष्टि देखनेवारे समदायमे उल्यवोको जन्मदैदैती 
हू । समय पर उत्सवके रूयमं उन्हे वे यादकरक्िया करते हे । किन्तु उसका जन्म थोडे समयकाहौनेके 
करण उन धटनाभकी संस्याके कम हौनसे उनके उत्सवे भौ कमह करतेहं ! यही कारणदै कि, चारं 


ॐ : हजार वधं सात्र कौ जनमी हुई जातियोके उत्सव इतने ही कम है कि, उनकी संख्या उंगलियोपर ही जिनी 
जा सकती है । अतएव उन जातियोको उनका जान अनायास ही है । उनके इतिहासका जान करनेके खि 


उन्हे कोई कष्ट नहीं उखाना पडता । उनके अबोध वालक आपी आप अपने बडे बृढोसे वातो बातोमही ` 
मनकर जान जाते है ¡ पर जिस जातिको संसारकौ सभी जातिया अपनेमे प्राचीन पानकर नतमस्तक 





पूणं घटनाओं मे ही होता है । वे घटनाएं ही सम्मानकी दपि 











¡होती 


है, जिसका इतिहास लाखों वर्षका पुराना माना जाता है, जो अपने को अनादि सनातन एवम्‌ सारे ` 
मानवसमाजको सभ्यता सिखानेवाला गुर कहती है, जिसके अनेकों ही विशिष्ट पुरुषोकी घटना विशेवोसे 


समे उत्सव ओर व्रत इतने कम नहीं हं जो किं आधृनिके जातियोके उत्सवो ओर व्रतीकी 





ग तरह अंगुलियोपर्‌ 


संभार जासकं ! न वह एसी किसी साधारणकी बातको लेकर प्रचलति ही हुएहंजोकिं, बातौर्मेहीवता 
दिये जायं } न वह्‌ अगण्य या महत्वहीनही हँ जो किं, उपेश्नाके गद्ढेमं मरकर बूर देनेयोग्य हो । प्रत्येककी 
स्मृति जातिमे नवीन जीवन लानेवांी है । हरएक के साथं जातिंके गौरवकी मात्राएं अत्यन्त प्रचुरतके ` 
साथ लगी हई ह । पूवं पुरूषोका गौरवास्पद इतिहास इनके साथ मिला हुआ है उनकी श्वद्धाकी अमूल्य कहानी ` 
मी हुई है जिस श्रद्धाको योगं भाष्यकारने साधककी माके तुल्यं कहा है । इनका) स्मृतियोने सादरस्मरण 
किया है । इतिहास ग्रन्थोने इनका गौरवोकौ गरिमामे बो्निल हज पुरावृत्त विस्तारकेसाथ मायाह । पुरा- ` 


इनका हर जगह उल्लेखं करके इनकी प्राचीनत्ताकी दुन्दुभिं बजाई | 
-तरह्‌ उचित स्थलोपर पुेहुएु इन त्रतोत्सवोका अनेकों धर्मशास्त्रकारोनिं अपनी अपनी शक्तिके अनु- ` 
संग्रहं किया ५९ है । फिर भी उनसे बहृतसे वाकी वच गये ह ५ जो सुष्टिके आरंभकामी उत्सव ब्रत 








उन्होने ने अ भपनेसे ज नेसे पीछे के उत्साहियोको अपनी 9 संग्रहकी हुई निचि देकर उन्हं गाडी डी ` बढ 
उत्साहित किया दै } व्रतराजके रेखकेको इस पुराने संग्रहसे अच्छी सहायता भिरी 
नूतन खोज ४. करके इस कमीको पूरां कर दिया रहै । हिन्दूषमेके 
आजसे दोसौ वषेके लगभग पहिले 








यह रख रहा हूं । इनका ८ | 
कमलाकिरभदटरके धरममेनि्णंय अगण्यसे बन |जाते हँ । व्रत 





अनेको प्राचीनं ग्रन्धे ` 


है तथा बहुतसी.' : | 











| सभी संग्रह प्रन्थोसि 





देवताओंका अनुसंधान कर ठीजिये ।वेदके भाष्यकारौका 





 करनेका प्रयत्न किया द । दूसरे स्थलों पर भी जहाँ हमने रिप्पणीसे ग्रन्थक विषयोकी ग्रन्थि मुल्लानेकी 
 पूणचेष्टाकी है । यह सव कुछ करके हम इसी परिणामपर पहंवे है कि, निर्णयसिन्धु आदि धर्मशास्वके 


संग्रह ग्रन्थोका परिष्कारही व्रतराजके नामसे श्रीविरवनाथजीने करडाला है 1 इसके सभी निणेय वतंमानके _ 
से उच्च कोरिकेदैजो कि, आजतक के करिसी धर्मञ्ञास्त्रोकि संग्रहं करनेवाक्से नहींकिये 





गये थे । वह्‌ केवल ब्रतोत्सवोपरही रहा हो, दूसरे कल्याणकारी विषयोपर ध्यान न दिया हौ, यह भी वातत 


नहीं दै; किन्तु उनके बहाने कर्मकाण्डके बहुत वड़े भागको कहडाला द । देवोपासनाके स्यि तो इसने अमृ- ` 


१५५ 





है । जिनके वैवप्रयोगसे उपासक इष्टदेवका साक्षात्‌ करसकता दै, जिन जिन विरिष्ट पुरुपोने उन, विधियोसे | 
 इष्टदेवका साक्षात्कार करके अपने एेहलौकिक एवं पारलौकिक का्मोको पाया ह उनका पूरा इतिहास मान्य ` 
 भ्रमाणोके साथ दिया है जिसके देखनेसे कलिय॒गके क्षित प्राणियों की भी श्रद्धा उनमें उत्पतन हो तया वह ५ | 
भी सुखपूर्वैक अपना कल्याण कर सके । हवनादिका भी बहुतसा विषय आया है अनेक तरह की आहति ओर 
भद्रोके भी विधान विस्तारके साथ अये हं । कोर भी लौकिक कर्मकाण्डका देवता बाकी न रहा होगा जिसका ` 
कि, पूजन हवन इसमे न आया हो 1 सवही की सब बातें विस्तारके साथ, आमर्द हें । ब्रत्चयकि वहने 
| मानवीय धमेशास्त्रकाभी बहत वड़ा भाग कहं दिया है, जो परिभाषा आदि प्रकरणोमें इधर उधर सूत्रम 
मणिकी तरह पिरोया हभ है । हविष्य वस्तुओकि नामपर खाद्याखाचकामी निणंय करदियाहै! 
इस तरह इन्होने घमं शस्त्रके किसीभी उपयोगी सारवेजनीकं विषयको नही छोडा है । जिन्हें देलकर हम यह | 
कह दे कि, ब्रतराजके नामपर मानवसमाजका जितनाभी कल्याणकारी उपदेश है, एवं जो भी कृ अत्या- 
वयक कर्मकलाप है वह्‌ सब उसको कहदिया है तौ कोई अत्युक्ति न होगी । आजकल्के कर्मकलापमेदेसे = 





भी अये हं जिनका कि, अथं यकि विनियोगके अनुसारही हमने किया हैँ । जहा तकहोसकाहै यहनी 
ध्यान रखाहै कि, किसी भी भाष्यकारसे विरोध न हो, यह योजना सिवा इस व्रतराजकी टीकाके दूसरी 
जगह कम देलनेको मिरेगी । यह किया भी इसी उदश्यसे है कि, मन्त्रके अथंसे उसी देवताका परिपुणं अनु- ` ` 
` सन्धान करके कमेकलापको सर्वोत्कृष्ट गुणवाला बनाया जासके ; क्योकि, विना देवताका अनुसन्धान ` 
` किये उस कर्मको श्रुतियोने उत्तम नहीं बताया है । जो मंत्र यहाँ आये हँ वह्‌ ही आजके कर्मकाण्डके ग्रन्थोमे > ६ र 











कामम विनियुक्त ५४५ किये गये ह । इस अथं उनके ल्यं वहाँ भी पथ दिखादिया है कि, इस अथंसे सेउनके 





देवतायकी स्तुति करने कग जाता था पर निरुक्तने इसे कोई महत्व नहीं र दिया 


महपि पाणिनिने अपनी रिस्षामे अंके अनुसंधानके विना मंत्रपरयोगको निरर्थक बताया है । इस अर्थसे 





 प्रायदिचत्तोके उपवासोसे भी अगाड़ी बढगये हूं अनेको भव्य पुरुषोने भी अपनेको ब्रतोपवासंत्ि शुद्ध 





रकेही सुखमय ईदवरीय साभ्राज्यमं क्सनेकी योग्यता पाई थी । ये आतत्मसोधने करकं पुरुपक कव्रल्यक्रा 
धिकार वनादेतेहं । इस कारण मोक्ष कामीको मी सवेतोभावसे उपादेय हु । सकाम पुरूष इनको विधिके 





7 साद्धेपाङ्ग पुरा करके अपनी कामनाओंको अनायास ही पाजाते हँ अतःएव मुक्िकें 


ऋस्विधान वासिष्ठी लिक्षा आदि वैदिक ग्रन्थोमें भी तो यही वात टै । पतित प्राणियोको उच्चकोटिका ` 


नानेवाछे त्रतही तो हैँ एवं सभौ समाजोके शिष्ट पुरुषोमें देखा जात्ता टै । एमे भृक्तिमुक्तिसंपादक ब्र्तोका 
मरण, हमने अपनी छेखनीसे अनवरत परिश्रमके साथ किया है कि, ब्रतराजके कहें हए सब्र ब्रत आदिकाको 
ग गायद इस जीवनम न कर सक, उनके पापहारी परम पवित्र स्मरणसेही अपने पापोक्रो धोडालं 


वब्रतराजमें आये हए संग्रह म्रन्थ- हंमाद्वि, कल्पतरु, मदनरत्त, पृथ्वीचन्दोदय, गौडनिव्न्ध, षट्‌- ॥ | 
विशन्मत, सिद्धान्त दोखर, शारदातिकल, पदार्था, गोविन्दाणेव, भार्गवार्चनदीपिका, माधवीय, जान | 
माला, नि्णयामृत, द्ैतनिणेय आचार मयूख, दु्गाभिक्तितरंगिणी, शिवरहस्य, कालाद, खद्रयामल, ब्रह्मयामल ` 
वाचस्पतिनिबन्ध, पुराणसमुच्वय आदि ग्रन्थ है । व्र्तराजकारने अपने म्रन्थमें इनका उल्लख कियादहै। 

पुराण-ज्राह्य, पाद्य, दैष्णव, विष्णुधर्म, विष्णुधर्मोत्तिर, गेव, लिङ्क, गारुड, नारदीय, वृहन्नारदीय, 
भागवत, आग्नेय, स्कान्द, भविष्य, भविष्योत्तर, ब्रह्मववैतं, माकंण्डेय, वामन, वाराह, मात्स्य, कौर्म, ` 
बह्याण्ड, देवी, भारत; आदित्यपंचरात्र, गणेश, कालिका, नृरसिह, अगस्त्यसंहिता आदि इतने पुरार्णौ- १. 
व्रतो ओर उत्सर्वोको तथा ब्रत ओर उत्सवोमे संबन्ध रखनेवारू विशेष वचनोको व्रतराजमं र्वा = 










है । स्कन्द ओर भविष्य तथा भविष्योत्तर ओर विष्णू धर्मोत्तिर के व्रत अधिक संख्याम अये हं 


वसिष्ठ, वृद्धवसिष्ठ, सत्यव्रत, पेटीनसि क यले क, धायन मादि आई हं । 


१1 र कोई ग्रन्थ इससे नहीं बचा है । इसकी भाषाटीका करती वार हमे इन ग्न्थोमेसे जो मिलसके उन 
ग्रन्थोको इकट्ठा करना पडा तथा इनके अलादा ओर भी बहते ग्रन्थ हमे इकट्ठे करने पड़ । इसग्रन्थ- 
दिकः । कियाहैतथा ` 
्न्थोका भी उपयोग हा है । सवेदेवप्रतिष्ठप्रकाश, ` 
नवग्रहविधानपद्धति त ४ घानपद्धति, प्रतिष्ठासंग्रहु, मन्त्रसंहिता, प्रह- 






चयि निणेयसिन्धु, धर्मसिन्धु, जयसिहकल्पदरुम आदिका उल्टेख ठि 





क्तिके साधनभी येही ` 


` | स्मृतति-मनु, याज्ञवल्क्य, नारद, देवल, विष्णु, हारीत, यम, आपस्तंब, कात्यायन, वृहस्पति, व्यास, = 





सहाराजको दैव मूसे वाणीद्रारा अगम्य पहाडी स्थानम मी रोगोमे श्रमिक जौवनकौ चः 
लिये मजा । वही करयो ? सनातन 





 धर्मप्रचारके लिये जाते हुषएु प्रतिवादिभेयंकर मछ्के अधीदवर राजसम्मानित जगदगुरु श्रौमदनन्ताचायजौ | 
¦ र मा दमक 


कर विरिष्टः 
` पृरुषके स्मृतिचिन्टोको देखनेके लि मेने पैदल यात्रा तक करते देखा दै । यदि धोड़े शब्दम केतो यह्‌ 

केह सकते ह कि, यह उन्हीं की घामिकं भावनाओं (५ मे ओतप्रोतत हुई चिर प्रेरणा है जिसे कि, म॑ व्रतराजकी ` 

इस भाषाटीककि शूपमे रख रहा हुं | (5 ५ 

पुस्तकके विषय-मंगचरण करते हुए अनुबन्धचतुष्टयके साथ प्रन्थकारने अपना परिचय दिया 
है सामान्यपरिभाषाप्रकरणमं व्रतका खक्षण, देख, अधिकारी, धर्म, प्रायरिचन, उपवासधर्म, हविष्य, उप = ` 





(य 








धमक लिये आपने समय समयपर अपूर्व त्याग कियाद । मारः 





। ५ | ५ युक्त वस्तु, भद्रमंडल, उसके देवता, पुजन अग्निमुख आदि वें विषय हुं जिनका सभी ब्रतोमं उपयाग हृता ध । | 
है) इसी कारण इस प्रकरणका नाम प्ररिभापाप्रकरण लिखा दिया है । इसके पी प्रतिपदि लेकर अमाव ` 


4 सतककी तिथियोकै 





त्रत तथा होली आदि सव उत्सव, ब्रतोकी देव पुजा, कथा, उद्यापन तथा विधि भौर ` 


| उनकी तिथियोका निर्णय एवं अन्य एतिहासिक वृत्त है, इसके पीछे वाखव्रत है । इनमे प्रत्येक वारे सूर्यं आदि ` । 





देवोका पूजन ओरं उनकी कथाएं वणित ह । बध ओर बृहुस्पतिके त्रत हमने ओर भी दूरे प्रन्थोसे ककर ध ५ 
 . जोड द्यि हें । कुछ प्रदोष आविकि ब्रतभीषएेसेहीगयेहं जो वार तिथि दोनो सेही सबन्ध रखते हं । व्यती- 
पातके व्रत दान आदि आये हँ जिसके ताराके प्रकरणको ऊेकर्‌ हमने एकं वैदिक रिप्पणी दी है । संक्रान्तिके | 








 भ्रकरणके पीछे लक्षपूजा आदिका प्रकरण आया है । पीठे मंगलागौरीके त्रत आदि आकर ओर मी बहुतसे ` 


` त्रत आदि अये है जौ कि, अनुक्रमणिकामें सब मिन्न भिन्न क्रिरके दिखा दिये गये हं ओर भी अनेकं ध्म- 
`  शास्त्के स्त्रके प्रयोजनीयं विषयं आये हैँ जिनका पृष्ठाङ्क अनृक्मणिकामे लिखा हज है पर मूरमे कहीं मासोके ` 

`  मानोमिं हेरफेर हज है । हमने उसे अविरोषके पथसे लेजानेको चेष्टा की है फिर भी विवेकी पाठक उ 
 सुधारकर पठ कगे । यद्यपि शिकायन्त्रोसे कितनीहि बार मनमानी रीतिसे दूसरे दूसरे प्रेसोने इसका प्रकाडान 
| .8 किया था, पर इतने बडे धाभिक मान्य प्रन्थका पदाथ विचार एवं धर्मशास्त्रके दूसरे दूसरे शर॑न्योको रख 












` यह दुर्दशा देखकर अनेकों माननीय पूरुषोके मुखस उच्चस्वरपे येही शब्द निकठे कि, एेसा न होना चाहिये हवः 4 
इस ग्रन्थका सुधारके साथ यथाथं रूपमं प्रकादान हौ 1 हिन्द संस्ृतिके पोषके एवं शास्त्रोके उद्धारका श ग 
अनवरत ब्रत रखनेवाखे वैकुण्ठवासी सेठ श्रीक्षेमराजजीने खाडिलकर आत्मारामजी शस्त्री त्था 
शस्त्रीको आमंत्रित करके इसका संशोधन करा, आवर्यक द्प्पणियोसे मूका परि 






महाबल ङष्णशारत्र | 
ष्कार कराके आजसे ४ वषं पहिरू अपने श्रीवेकटक्वरं प्रेस बंवरई से प्रकाशित र केया ! अवतकं यह ग्रन्थ 








सकलशभगगालंकृतः सत्यरूप 
श्रीभूषदमाविलासौ त्रिभुवनविजयी ब्रह्मरदेरपुज्यः ' 

` मिथ्याक्मन्धिरात्रिप्रमथनतरणिः ` प्रेमपूर्णान्तरङ्ध 
स्वेषां नस्तनोतु प्रतिदिनमुदयं श्रीहरिः शान्तमूतिः ।। १।। 








 जगच्िवासस्य हरेः परतन्त्रो जनो भूवि 1 प्रेरणात््ाप्नूयादाशामाह्ादस्यतरस्य कवा ।। २।। 
 अस्माभिर्ेतराजस्य विद्वनाथकरतेः खल्‌ ।। ग्रन्थस्यात्यनवद्स्य सर्वाङ्नि रनुसंभृतं १. 
 केखकानां पाठकानां प्रमादेनानवस्थितेः ।। सम्पुणविषयापूति दृष्ट्वा तत्सग्रहुण वे ।। ४ 

सारल्यं संविधात्‌ च शास्त्रिमण्डलसमण्डनौ 1} आत्मारामाख्यङृष्णाख्यदास्त्रिणौ सुनिमन्तिततौ ।1 ५.।। 
 ताम्यां सहाप्रयत्नेन सवन््रन्थान्विलोडय च ।! स्थले स्थल टिप्पणीभिः संस्कार्यं विशदीकृतं 

` स्वेन्प्िपूयं विषयान्‌पकारकरः कृतः । सो पयं ग्रन्थो मृद्रयित्वाऽसाघारण्यमनीयत्‌ 11 ७1 
 लगारिनागधरणीमितीयनृप्ासने ।! आरोहणेन स्वातंत्यवन्धनेकनिवन्धनः ।\ ८ 1 1 
परत्वस्य च ग्रन्थस्य कर्मणा स्वेन सूचितः ।। हगिष्ठे इत्युपाख्यो वै वैस्यवयंः सुबुद्धिमान्‌ । ९1! ` 
 मोरेवरो बापुजीजोऽविचायवाथ समुद्रणे ।। प्रवृत्तोऽसौ तदास्मामिः सूचितो “ नैव मूद्रघताम्‌ || १०! ` 
इति ' तन्नोररीकृत्य यथाप्रति अमुद्रयत्‌ ।। ततोऽ्स्मामिहौयकोर्टाख्यायां वे राजसंसदि | 
धनीत्यधीरस्य पुरो वादः प्रवितः ।1 तत्र सक्ष्यादिभिवदि विपुलीकारिते सति 1! १२ 
वादेषा निर्गता वे सरस्वती ॥ प्रतिवादिसुद्रितोऽयं श्रन्यो वादग्ययक्च वे !। १३ 1 
वादिने च सत्वरं प्रतिवादिना ।! इति त्निर्मतां 


















| देवीमनादुत्य सरस्वतीम्‌ 1} १४) 



























ल्ष्मीनिगमरनधरं वा कुरवचिव पुनः स्वयम्‌ 11 अपीराख्य वादशोधं जज्जात्रे समकारयत्‌ ।। १५ 
सत्येतरभीशंकया सुविचक्षणौ । न्यायावीजौ दावपीदमनूचतुरमुष्य वं 1 १६। 





(0 110 


| अन्यकापरारम्भकाल ` 


आचमनसे शुदि 


अभाव 


प्रवणवका उपयोग 












विदः ` ` : ॥ पृष्ठकः | ५ | “< विषः 4 ५ पृष्ठकः. 








प 














णतम मित 





तोभद्र २९ चैं० शु आरोग्य प्रतिपदाका व्रत्त९९ | सतीदेवी ओर शिवपूजनं आदि , 
शलिगोद्धव ` ३५ [चं०गु° विद्या प्रतिपदाका त्रत , | इसीम गौरीके डोखाक्रा उत्सव ५ 
छोकि देव्ता ओर उनके |च० शु° तिरक व्रत + [इमीमें मनोरथ ततीयाका त्रत 
वासनादिके मन्त्र ३१ साधारण स्त्रियोको वेदका | उसकी कथा 9 
पूजनकी उद्यापनविधि ३७ | अधिकार नही 9. [अरनधतीका त. ~ ११६. 
वाय्वेकावरण  ,; [चत्र०्शु०प्र°नवरात्रकाप्रारभ , [ अरुन्धतीके पूजनकरी विधिः + ॥ 
त्वजोकी प्रार्थना „+ |चें० शु प्र° प्याऊकरादान [अरुन्धती ब्रतकी कंथा +» . : | 
7 सस्योकी निष्कासनं ¢ | आर धमधटका दान .. । { इस्तका उद्यापत्‌ ९ ५ १ १ | 
 ,. | श्रावण शु° प्र० रोटकं व्रत „ |वेक्लाखशुक्.तुतीयाको अक्ष- ` 
यतृत्तीयाके व्रतं 4२६. 


गव्यसे प्रोक्नम क उसी { 
न्युतारणं ५ ध ध ~ {स्तत्र तोकी दिव पुजा ७४ वदाखस्नानं 4 9 
+ | रौटक व्रतकी कथा ५ [परशुसमर्जयस्तीः ४ 
अक्षयतृतीयाकानिर्णय  * 


भप्रतिष्ठा | ध ५ 

| उपवासकी प्राथेनाके मन्त्र > | 
षस॒क्तके म॑त्रोसे षोडशोप- ` । इसको वधि 
तार प इसको युगादि कथन भौर कर्तव्य, ` 



















कपर देवपुजन ` # 
| स्थापन मौर पूजन 9 
 .{ उद्यापनं .:. 4. 


४४ | आर्विन शु प्रतिपदा दौहित्र  , | कथा ¢ 
4: अतप ७९ | ज्येऽ शु० तु° रंभाव्रत १२५ 
{इसमे नानाका श्राद्ध दौहिव करे , |श्रा० शु त° मधुस्रवाब्रत 
५५ [ मामके जीतेभी,पितावालेको | इसीको स्वर्णगौरी त्रत 

५७ स॒ण्डनका अभावं `: + | स्वणगौरीकी पूजा 
| स्व्णगौरीकी कथा 
++ | उद्यापन ५ 
[(सृक्रततुतीयाको ब्रतकी विधि 



































(0 {त | नवरात्रशब्दका अथं 
^ ६ | घरस्थापनका समय, | 
{निषेव  -. -:: [कवा | ५ 
> [नवरात्रके घटकी स्थापना विधि » [भार शु° त° हर्तिलिकित्रत 
>+ [नवरात्रकी दुर्गादूजा > 1 अंगोकी 1 
| अगपूजा ५ 1 ८ र्जा 
1 कूमारीपुजा 431 ॥ 1 
कातिकशुक्काप्रतिपत्‌ = ८८ | मा० शु° तृ° बृहद्गौरी 












दर्वागणपतिन्रतं 
परऽ दार बण सिद्धिविनायक 


बरत ९4 


व्रतकं विधिं 

अंमपूजा 
कथा 
महिमा तथा इ 

का निषेधं 
दोषदान्तिका मंत्र 
स्यमन्तकमणिकी कथा 


माघ शु° च० गौरीचतुर्थीतरत २ २ 
 “ वरदचतुर्थीब्रत 1 


वृम्पाषष्टीकातव्रत 


निधंनकोविधि ३०२| 


वै° शु° गंगाजीकी उत्पत्ति° ३०७ 
श्रा० कर° शीतलासप्तमी ` 


भाद्र ङ० जन्माष्टमीका व्रते 
दमक निर्णय 


भाद्रपद शुऽ ज्येष्ठात्रत 


| ज्येष्टदेवीकी पूजा 


इसका स्त्रियोको नित्य 
व्रतकी विधि गौर परजा 


कथा 



























विषयः: : `. पृष्ठकिः 
कथा याहमाहातम्य ५५८ ` 
ज्येष्ठ शुक्छा निजंखा एका- ` ` 
दशोकी कथा या माहात्म्य ५६० ` 
आषादकृष्णां योगिनी एका- ॥ 
दरीकी कथा या माहाटम्य ५६३ 
आ० शु० पद्मा एकादशीकी ` ` 
कथायामा० ५६९ 


विषयः = पृष्ठकः 














 -पलपुष्य्‌ 
तथा दूसरी वस्त्ूओके सम- | उपवास, आठ महाद्रादशी- 
पणेकाफक ` + {| या, शुक्लकृष्ण दोनोका 
आवरणपूजा. + | उद्यान, उसकी विधि ^ 
चौसठ देवी ओर माताएं ६ > [युजाकी , विधि 
पांच मुख ओर आयुध , -[पूराणोकी केही दोनो एका- । £ 
का०शु° अक्षयनवमीके व्रेत- दरियोके उद्यापनकौ विधि „+; 
४५४ | आषाढ शु गोपद्यव्रतकी | 





































उद्यापनविधि ४९० | इसीमं विष्णुशयन ओर चातु- 
(८ प्नाविधिः ` + [्मास्यत्रत ग्रहण होता है इसका | 
ध क 1. मादात्‌ 


श्रावण कृष्णा कामिका एका- 
द्वादशीकी कथा या माहात्म्य ५८२ 
ओर उसके पाठ्की रीति ४६० |श्रा० शु° एकादशीको वामन | श्रावण बुक्छा पुत्रदाएका- ` 
आशादरमीका | काञवतार ४९९ |द्वादीकी कथाया माहात्म्य ५८४ 
४९५ [कात्तिक ० शु ° प्रबोधके उत्स- ` [भाद्रपद कृष्णा अजा एका- ` 1 
क # ` "५०० [दक्लीकी कथाया माहात्म्य ५८७ 
0 [गि वदतं र सहिता: ९५ 
[आ बु° पाशकुशा एका 
दरीकी कथा या माहात्म्य 





ज्ये० शुण दकषहराका त्रत ४६० | पुरुषोत्तममासकी कमलाए्- ` 
दश्षहरानामका गंगास्तोत्र | कादशीका माहात्म्य ४९५ 










































भा० शु 
श्‌० विजयादकश्षमीका 











४७२ | मागंसीषं कृष्णा एकादशीका 
^ `| माहात्म्य 






व विषयः = पष्मकः | 








दुग्धत्रतका संकल्प ६९९ | अनन्त चतुदंशीका ब्रत ` ६९९} पूणिमाकेव्रत ¦ 
` दूधके धिकारकी त्यागात्याग-  [व्रतकी विधि, पूजा ` » | पूणिमाका नियं । ७६४ | 
व ध | नाम पूजा ५ | चैतरीको चित्रवस््रदानकाफङ , । 
0 यही भवणकत यमे रवणः [बन ध * '|दमनसे सबदेवोकीपुना + | 
, द्वादली कंहाती है | ` पीठपूजा ध `  » [वैशाखी कातिकी ओौरमाधीके 
9 इसीकी विष्णविक्षं लंखसन्ना. .  अनन्तपूजा 0 $ 0 | दानकी प्रसा 3 1 4 
(नौर्‌ माही »„ | ग्रंथिपूजा, अंगपूजा, आव- ,„ |ज्ये० श॒० वटसावित्रीकाः ब्रत ७९५ ` 
 } इसीपरहेमाद्रिओौरनिणेया- | रण पूजा [वतको विधिः ५८ 
` ` मृतक व्यवस्था ५ [पत्रपूजा, पृष्पपूना, एकसौ | पुजा विधि 11 
 ब्रतकी विधि 1 क: |: आठ. नामसि पूजा ~ वृणा प ८ 1 
 विष्णुधरमेका दूसरा विधान „ |डोरेकीप्राथेना,डोरकेवांध- | अंगपूजा ब्रह्मसत्यपूजा = + 
। ब्रह्मवैवर्त, भविष्यओौरविष्णु | नेकेमंत्रओौरजीणेकेविस- |कथा ` 9 
. सह्स्यका कटा विधानान्तर्‌ ५ | जनके मन्त्र » [अब्द साध्यत्रत 
कथ ध  » | वायनेके मंत्र, पुराने डोरेकं ` [उद्यापनं 1 
` इसीमं वामन जयन्तीकात्रत „ | दानकेमंत्रभौरकथा , | आषाढीको गोपश्चत्रत ओौर ७८७ 
वामन पूजा ओर उनके अंगो  !अनन्तके ब्रतका उद्यापनं | ८ „| उसकी पजा 4 
 कीपूजा ` न विषलेर्कीविषि  _ = |श्थो ७६ 
 श्िक्यके दानका संकल्प  „ |भाद्र°गु°कदलीव्रतकी विधि ७२५ | उद्यापन न 
` पौ० ° सुरूप द्रादजीका त्रत रंभाकारोपण्‌ =» | आषाढबु° पौर कोकिलात्र 

ओर उसकीकथा ` ६३९ |कथा » [उसकी विधि 

` ज्रयोरशीके व्रत 4 गृजरातियोके आचारसे प्राप्त {कृथा 
` व्रतं क्था आदि ` ¦. ६४५ | क | 1 । । (६ 4: ध श्रावण पौ रक्षाबन्धतकी | 
भा०शु० गोतिरात्रब्रत ओर. |. ८. < 

गुजरातियोका गोतरिरात्रत्रत ६५२ | | 


















































































अशोक त्िरावव्रतं ६६१ च्ल मं प्रातःतिलके तेरे 




















` विषयः = पूष्ठंकः 












क | तेनसंकरंतिके त्रत ओर विधि ९५५ 





„ | दूसरी रीतिसे 


















: 3. ` 

आ० क० अमा गजच्छायापवे ८४५ | मंगल्वारके व्रत ९१५ | सौभाग्यसंक्रान्तिका व्रत इस- 
काति° अमा० रक्ष्मीत्रत ओर | व्रतकीविधि . क सोनेके कमरुका दान + 
बिके राज्यका उत्सव विधि , |मंगरुका यंत्र इसके बनाने- ` [ ताम्बर संक्रान्तिकाव्रतओौर 
भरविष्यपरीक्षा = की विधिं. गौर पूजनकीः :, ल [¦ विधानं: ९५६ 

 राजाओके सिये विशेष २ | रीति ` ९१६ | अशोक संक्रान्तीका त्रत इस 
 मागे° अमा ० गौरीतपोव्रतका मंगरूका कवच „+ |. में सोनेके सूयेकी पूजा ९५१ 

विधातुः. ~ . ८४९ कथो ९१७ | क्पिखाकादान ` 

मागं ० इसको महाव्रत कहा है ८५२ | उद्यापन ` `  „ [आय्‌ संक्रान्ती व्रत तथा धान्य 

सोमवती अमावस्याका ब्रत ८५४ |टी° बृद्धका ब्रतादि ` ९२३| संक्रान्तिकी तरह उद्मापन 
प्रज ६ ८५५ | बह॒स्पतिवारका त्रत ओर विधान ९५८ 


` अदवत्यकी पूजाका मंब „ |श्रावणमेः शुक्रवारे वरख- 
 प्रदक्षिणाका मंत्र = क्मीकातव्रत ` ५ ९४ 

0 पूजाकी विधि ॥ ५:२५ 
अमावस्या अधेदियं व्रत ८९६ |अंगपूजा ` - 1, 


धन संक्रान्ति व्रतं पूववत्‌ उद्या- 
पन विधानं 1 
सब संकान्तियोका उद्यापन ९५९ 
धनु संक्रान्तिकी विशेषता ९६० 
रविका घत स्नान (य १ 


2 

















(बा 4" द 
८७१ | श्रावण श० शनीचरका व्रत ९३० की महिमा 
नका दान 
पानके दाचका 








0 








` मानकी लाख प्रदक्षिणाओं 

की विधिः ~ 
ब्रह्महत्यादि महापाप, उनके 

समपाप, जातिभरंशकर पाप 
` संकर करनेवाङे पाप, मलिन 


८  उच्यापन 
।  . शिवकी नाना लक्ष पूजा 
विधि ११२ 





 करनेवाटे पाप ओर उप. 


पातकोका उल्लेख ९९५ | यु 
 उ्यापन 1 
लाख बेकूपत्रोसे पूजा ओर 


उसका माहात्म्य 


 तुरुसीकी लक्ष पूजा विधि १००५ 
: थते मन्तं + 
पत्र छेनेके मन्त्र $ 
विधि". ८ 


`  अभित्वा देव सवित 

अग्नि दूतं वृणीसहे 
अदिवनावतिस्मदा 4 (1 
 . अभित्यं देवं सवितारम्‌ ` + ‹ 8 1 | 


ह उद्यापन । द 3. 
| विष्ण्‌ ओर सूर्यकी लाख नम- 


 उदयापनं | 1) 


[गौरीकीष्ला `. 1 

कधा १ 

+ [उद्यापन 
७ मौन व्रत ओरकथा ` 





विषय 
| उद्यापन 
धाम्यपूजा 
| उद्यापनं ध 
शिवामुक्तित्रत १०४६ 
0: [उचापन: ~ 1 
१०१६ | हस्तिगौरीत्रत १०४९ 
उयापन ५ ५4 कंथा क 
त वत्ती त्रत १०२२ | कृष्माण्डी व्रतं तथा कथा 
[1 
 कृकंटीका व्रत उदययापनसर्हितं १०५८ 
ककेटीका पुजन १०५९ 
[उद्यापनकी विधि | 
१०२५ | कोटी दीपदानका उथ्यापन १०७१ 
| पाथिव लिङ्कका उथ्ापन १९७२ 
 [व्रतराजमें जये हृष्‌ विष्य | 
विषय शकोकषद्ध याजन्‌- 
कमणिकाध्यायं १०४७४ 
| सात घानोसे लक्ष पूजा विधि १०७५ 
लक्ष पूजाका उद्यापन्‌ ` 
टीकाकारकी इष्ण प्र 


भ्म 








१०५५ 


१०२३ 


स्कार विधि 


श्रा० भो० मंगला गौरीका 








१०३९ 


अग्ने त्वं नो अन्तम 


1 ५ | जद्वत्थे वो निषदम्‌ 
३२ |अस्वपूर्णाम्‌ 
`. | अभिस्व वृष्टिमद 








4 „ | | अपत्ये प । यथा १ 























६ ।* ठ , ५ ४ 
८ {> ड {क ९ 
. ` (नि 
भो मत कमय कन कम न माय भ मभक पं ०८५ भतम सकण न ४ 





उदन्लद्य मित्रमह + | त्वमं सोमाऽसिथारथ्‌ ` ९११ | यदापो अध्या 2 ३3 ५ 
उदमादयमादित्यौ ` र +» | तदस्य प्रियमभिपायो ५७७ | यस्त्वा हृदा कीरिणा. = द 
| | तामग्निवर्णां तपसा ज्वलन्तीम्‌ २६ | यस्मै त्वं सुकृतो जातवेदः ५ ६ 











उद्बुध्यस्वाग्ने ` र ५ | 

उभोभयाविन्नुपधेहि ८३८ [यानु क्षवियां जव ३२ | यतौ विष्णुषिचक्रमे 
उतारब्धान्‌ स्पणहि ८३९.। तामआावहु . ~ ~: `! 4२ | मनसा 
उदग्ने तिष्ठ ` ८४० [ब्रीणि पदा विचक्रम ३३४ | यदौ देवा 
उर््वोभवप्रति >» [च्रिदेवः पुथिवी ४७७|यः शुचिः प्रयतो भूत्वा 
ऋषभं वा समानानाम्‌ ` ३२ त्रिपादुष्वे . . ` ` ४२ |यतं इन्द्रभयामहे - 





एष्यगन इह होता ` ` ४ ध ` ४४ | तीक्ष्णेनाग्ने चक्षुषा ८३९ [यत्रेदानीं पयसि 
एषोहि देवः प्रदिलोन्‌ ` ४५ | देवस्त्वा सविता पूनातु ` १८ | यजञैरिषूसंनममाना 
एवा पित्रे ह ` ++ [दधिक्रान्णः » [याः फलिनीर्या अफला 
एतावामस्य -महिमा ` ` ४२ | देवस्यत्वा सवितुः ३५४ |युबा सुवासा 
 ओमासर्चषेणीधूृतः ३१ | घामं ते विश्वं भुवनम्‌ व ४९ [येभ्यो माता मधुमत्‌ ` 
ओषधयः समवदन्त `  <२ | धाम्नो धाम्नो राजन्‌ ३३ |यो वाः शिवतमो रसं 
 कटूद्राय प्रचेतसे ` ३२ धरुवा योः ध्रुवा पुथिवी ४७९ | रक्नोहणंवाजिनमा 
 कदमेन प्रजा भृता ८२ | धुवंतेराजावस्मौ ` „+ : [वायो इतं हरीणाम्‌ 
| विह्वानि वो दुगहा 


स ८ | विष्णोनक ध 

वति समुद्न्धम्‌ ३२ | नृचक्षा रक्षः परिपाहि ८३९ | विद्यामेषि रजस्पुश्वहा 
++ ` | निषुसीद गणपते गणेषु +. | विष्णोः कर्माणि परयत 

विचक्रमे पृथिवी 































| तयङ्गदेवाना ४. विश 
३२ | पवित्रं ते ठि हंस शुचिषद्‌ वपुरन्तरिक्षसद्‌ २९ 


हिरण्यारूपा उषसो विरोके ८ र 























दवान्कुरुते हि प्रन्थं देवज्ञश्र्मा जगतो ४२ हिताय ।\१। विष्ण्वचचेनं क दा 
च उत्सगधमत्रतनिणेयक्ष्च ।। वेदात प | 















कृपया युक्ताः कु वन्तु 
ण्डताः ।। प्रचारणीयो 










































वावयोका भी उल्लेख ल्केल किया हे, मेरा इसकं बनानम निजी कोड्‌ भी स्वाथे नहीं ह कंवल == सायं नदा हे केवल रोक कल्याणक कल्याणकी 
कामनासे प्रेरित होकर ही इसे लिखनं बढा ह मेरी आन्तरिक इच्छा यह है किं यह्‌ मरा भ्रन्य विद्वानोके 
अनान्दके लिये हो \३।\ इस संसारम जितनं भी धर्यं शस्त्रके जाननेवाठे विद्वान्‌ ब्रषह्यण हं वं सबकसलन 1 
7 करके मेरे इस छोटेसे ग्न्थका संशोधन करनेको कृषा करेगे \१४।। मे गुण मण्डित सकल पंडित | | 
नीत शर्थना करता हूं कि, जिस तरह माबाप बालकके अस्यष्ट तोतली बोलौका प्रचार आनन्दसे 
करते है इसी तरह आएप अपने इसं बालकके ग्रन्थको भी प्रचलित करेगे \\५।। सवत्‌ सन्रट्‌ सौ तिरानरवेके 

तथा शक सोलह सौ अठानवेकं मध सुदी पंचमीकं दिन \\६\ अनेको अ्रन्थको देखकर श्जज्ञ लोगोके लियं 

लिखना घ्रारम्भ किया है । एेसेही लोगोको समक्ञानके कारण 

विद्रान्‌ तो सब कु जानतेही हं ।1७\\ मरा जन्त चिस्तपावनं जातिम हज हं शांडिल्य 
स्थान रखता है, सुकं रोग संगमद्वर कहा करते हैं मेरे पिता श्रीका नाम गोपालजी हे मे ज्योतिषौ हू \\८\\ 
बनारसमे मेरा रहना दुर्गा चाट पर होता है बही को प्रणाम करके लासे विस्तारकं < ध 
साथ व्रतराज नामके ग्रन्थको लिखता 5 







































प. 


॥ 















५१ 


















| रत्ना दधतकाल्विधाने-सिहस्थित | सुरणुरुयदि न्सदाथाः तं वजैयेत्सकःत ध 


कर्मसु सौम्यभागे ।। विन्ध्यस्य दक्षिणदिशि प्रवदन्ति चार्था 























पञ्चदले ।। व्याघाते वजकेऽडकाः पितमूतिदिवसोना- 
तिथिखं (ल. ( ल तिथि व्युद्गमां दु 














है" यहु अथं नहीं हं कि चष भरकं त्रतोकोही न करे यदि एेला न मानोगे तो शरदे तो लेकर ग्रीष्म तकके ` 
समयमे अगस्त्यका सम्बन्ध होनेसे इस कालमें कहे गये स्त्र व्रतोका सर्वथा निषेध हो जायगा । दिवोदास = 
 यम्रत्थमे अगस्त्यजीके उदयका काल गग आदिके वचनोको 
दक्षिण दिशा में होता ह जब कि सिहकी संकांतिके इक्कीस अंश नीत जाते है तथा वृकी संक्रंतिके सात अंश ` 
व्यतीत हीने पर अस्त होते हं । हेमाव्रिमं सत्यत्रतने त्रतके आरंभ करने ओर समाप्ति करनेकी तिथिको बताया _ ` 
ह कि-सूय्यं नारायणकं उदयके समयमे तो जो तिथि हो पर मध्याह्नके समयमे बहन रहे उस खण्डातिथिमं | 
नतो व्रतका प्रारंभ करना चाहिये तथा न व्रतकी समाप्ति ही करनी चाहिए । तहां ही वृद्ध वसिष्ठने खण्डासे ` 
` भिन्न जो जखण्डा तिथि है उसमें व्रतके प्रारभ करनेको कहा है कि जिस मध्याह्वकालमे भगवान्‌ सुथेदेव ` ( 
 आकाडको पणं व्याप्त करते हँ उस समय जो तिथि खण्डित नहो तथा शुक्र ओर गु दोनो हो तबव्रतका आरभ ` 
करना चाहिये \ यानी निसमें शुक्र ओर बृहस्पतिजी अस्त न हों उसमें ब्रतका प्रारम्मे करना चाहिये यह ` 
इस कथनका तातपयं हुआ । रत्नमालामे कहा ह कि -सोमवार बुधवार वृहस्पति वृहस्पति ओरं शुकवारको कोई भौ | . 








को उद्धत करके कहा है कि, अगस्त्यजीका उद्य ` 








कौ अवश्य सिद्धि होगौ क्योकि कि 













यज्ञियो देशो स्लेच्छदे स्ततः परः ।\ एतान्दरिजातयो देशाः प्रयत्नत 
पि--यस्मिन्देशे मृगः कृष्णस्तस्मिन्‌ धर्माचिबोधत ।! इति ।। 








देश हं नैमिषारण्यं तो विदञेष करके हे । देवीपुराणमे कहा हे किः 
स्कर, बनारस, कुरकषेतर, प्रयाग, जंबुकेडवर, केदार, वामपाद, कुडव, पृष्कर,महावुण्य, सोभेहवर, अमरकंटकः, 
कि गुह्‌ भगवान्‌ विराजते हैँ \ गुहे स्वामिकातिकको कहते हं । ये सब पुण्य देश हं । 

















परिभाषा 








शै 





` युक्तैम्लेच्छैरन्येच मानवेः । स्त्रीभिश्च कुरुदादृल तद्विधानि 


दं रण्‌ । वैक्य- 


` श्रयोस्तु द्विरत्राधिकोपवासो न भवति । वेश्य: शद्रादच ये मोहादुपवासं ` 


प्रकुर्वते ।! त्रिरात्रं पञ्चरात्रं वा तेषां व्युष्टिनं विदयते ।। इति प्राच्यङ्िखित- 





भार्या भतुमंतेनैव व्रतादीन्याचरेत्सदा ।! इतिकात्यायनोक्तेः । यततु-पत्यौ जीवति 
॥ या नारी ह्यु पवासत्रतं चरेत्‌ ।! आयुष्यं हरते भतः सा नारी नरकं व्रजेत्‌ । इति 























भ्ये + 


योनिम पदा हुए जौव मी हं तथा 
२ मं स्लेच्छोका अधिकारभी देखा जाताहं 








म्कच्छ तथां अन्य मनुष्य स्तानि करक भ्रस्ता साय कर सकत ह इस त्रत्का यह्‌ विधन ह जपि चुन 


वैश्य ओर शदरोके लिये दो रात्रसे अधिक्र उपवासक विधि नहीं है कि-जो वैश्य ओर शूद्र मोहके वमे होकर 





तीन रात व पांच रातका उपवासं कर बैठते हँ उन्हुं उसका फल नहीं मिता 














मकम 


अनुरोध हं । इलोकमे जो व्युष्टि शाब्द आया है उसका फल अथे है । सधवा 





लता यह पहिलोका लिखा हुए 


























॥। तास्रपान्राद्यभान 


स्थितः ।\ देवपुजा-यहैवत्यं 


पुज्यदेवतोदेशेन : होम > 1. अवक्त 3 तच सप्तमीत्रते 











` [ सामान्य 


वा \\ व्रताद्यारम्भे वद्धिश्वाद्धं कायम्‌ ।\ तदाह शातातपः-नानिष्टवा तु पित्‌- ` 
 उ्छाद्धे कमं किचित्समारभेत्‌ । 
व्रतधर्म-त्रतके संकल्पकी विधि महाभारतम लिखी हं किं, हाथमं भरा भराया तांबेका पात्र लेकर 


| उत्तर दिक्राकौ ओर मुख कर संकल्य करके उयवासको ग्रहण करना चाहिये । यदि रातका कोई उपवास 
`: करना हो तो उसमे भी इसी प्रकार संकल्प करना चाहिये \ अब ग्रन्थकार श्लोकको व्याख्या करते हं कि, 





१ ` ग्रन्थमं ऊपरकं इलोकका अथं करते हुये लिखा हे किं दिनकी तरह रातके व्रतादिकोका 1. 
` श्रीदत्तने तो कल्पतरुकारके मतके शलोकम आये हुए वाकारको ˆ च ` के अर्थम मानाहं चका ओर अथेहोता 
द, यह्‌ करनेसे इलोकका जो अथं होता हे कि दिनके ब्रतकी तरह रातके व्रतकोभी संकल्प पू्वेक ग्रहण करे ` 


 ओौदुम्बर तांबेके पात्रको कहते ह क्योकि विह्वकोशषमं ओदुम्बर तांबेकं पात्रकं पर्य्यायमं आया हं \ कल्पतर्‌ 





1 वह पहिरही कहा जा चुका हं । इस तरह माने विना इलोकमं आये हुए वा जौर उपवास ये दोनों पद व्यथं | 


`  हयेजाते ह क्योकि, इनके विनाभी इनका तात्पयं वाको विकल्पार्थक मानने पर निकल आता है ! यदि तावका ` 








3  बतेन उपस्थित न हो तो हाथमे ही षानी लेकर संकल्प कर लेना चाहिये । यदा संकलत्पयेत्‌' कं स्थानम मदन- | ५५ 
` कारने यथा संकल्पयेत्‌ एसा पाठ लिखा हं । थथाका तात्पयं यह ह कि जसौ कामना हो उसको कहकर संकल्प 
चाहिये । इसी कारण माकण्डेयपुराणमे कहा हं कि जिन कामनाोको केकर त्रत करना चाहता 














परिभाषा 








ह 1 श्लोकम 'सर्वत्रतेषु' यह जो पद आया ह जिसका सब ब्रते, ठेसा अथं किया गया है इसमें बत भविष्य ` 
पुराणकं कहं हृए ही हँ उन्हीमे होम आदि कौ विधि ह ब्रत मात्रमे यह्‌ व्यवस्था माननेसे ठीक नही होगा । = 
पृथ्वीचनदरोदय ग्रन्थमें अग्निपुराणकं मतको केकर लिखा है कि-व्रतके समयमे भूमिपर हायन करनेवाङे ` 
ब्रतीको चाहिये कि सन ब्रतोमे स्नानके पीछे शक्तिके अनुसार सोने आदिकी बनाई हुई त्रतकी सूतिका पुजन ` 
करे फिर सामान्य जप होम करनाचाहिये ब्रतके अन्तमं दान भी देना चाहिये । ज्ञवितके अनुसार चौवीस या | 
१२ या पांच था तीन ब्राह्मणोको भोजन करा, उन दक्षिणा देनी चाहिये \ जिस देवका व्रत हो व्रतके ल्यि , | 
| बनाई गई उसको मूतिको व्रतमूति कहते हँ । देवलने लिखा है कि-जब कभी त्रत करे उस समय सदाही ` ` 
` ब्रह्मचयं अ्हिसा सत्य ओर निराभिष भोजन ये अवदय ही करे \ स्त्रियोके देखनेसे छनेसे तथा उनकेसाथ 

बाते चीतं करनेसे ब्रह्मचय्यंका नाच होता. ह \ ऋतुकालमे अपनी स्त्रीके साथ समागम.करनेसे ब्रत नष्ट 
नहीं होता । इलोकमें न दारेषु इसके स्थानमे स्वदारेषु एेसा पाठ मानते हँ । तब स्वदारमें ऋतुगामी होनेपरभी ` 
। | जरत नाञ्च हो जाता है यह पक्षातर अथं है । मांस, मुसकका पानी ओर गञको छोडकर बाको पशुभोके दूधको ` 
| आमिष कहते हँ सस्योमं ससुर आमिष तथा फलोमे जंभीरी आमिष है सीपीका चूरन भी इसी कोष्मिहै 
| तथा कांजिक भी आमिषम ही संभाला हे" ये दूसरे २ स्मृतिकारोकं मतोसे आमिष गिनाये हे । ब्रतादिकोके ` 


गोहितः ।\ न जीवन्भवति चाण्डालो मृते इवाऽभिजायते । काममोहित इ 
विषयषणाद्याध्यादिनाऽ्नाचरणे न दोषः ।। तथा च हेमाद्रौ स्कान्दे-सवभूतः 


पं मतिहेमाद्विः । मदनरत्ने त॒ सवं च तभय 
॥ भित यपरिचितत्वाद्याख्यातम्‌ सवेमृतभयम्‌-सर्वेभ्यो भूतेभ्यः सकाशा 


हिन्गेटीकासहित = (११) 











सामान्य- 





अथं यह किया ह कि किसी भी अपरिचित जीवके भयसे व्रतकर्तीफे भीत होनेषर यदि व्रतम चरुटिहो तो दोष 
नहीं है । पर परिचित सयं आदिक भयसे कमं लोप हो तो अवह्यमेव व्रतकी हानि होतौ ह । सपं आदिक 





होता हे । एकवार इस अथवाला सं | 
वारंवार इन बातोसे व्रत कमंके लोप करनेमं प्रायश्चित होता ह । यही स्कन्द ओर गरुड पुराणम कहागया 
हे किं कोष प्रमाद ओर लोभके कारण यदि ब्रतभेम हो जाय तो तीन दिन भोजन त कराना चाहिये । यदि 
` यह न हौ सकं तो शिरका मुंडन ही करना चाहिए । इससे यहं बात नहीं है कि, जो व्रत बिगड़ गया हौ फिर 


























भ हन्द टाकासाहत 
मौषध रूपमपि मासं त्रताहे व्जयेदित्यथेः ।\ विष्णुरहस्येः-स्मृत्यालोकनगन्धा- 


दिस्वादनं परिकीतंनम्‌ ।। अन्नस्य वजंयेत्सवं प्रासानां चाभिकांक्षणम्‌ ।। ` 
गात्राभ्यद्खः क्िरोभ्यङ्खः ताम्बलं चानुखेपनम्‌।।त्रतस्थो वजयेत्सवं यच्चान्यहलराग- ` 
करत्‌।। इति ।\ हारीतः-“पतितपाखण्डादिनास्तिकादिस्तंभाषणान्‌ताहलीलादिकमुप- ` 
वासादिषु वजेयेत्‌ इति अन्नादिपदेन य्पुरुषाथंतया स्वंदा निषिद्धं तदपि 
ऋत्वथतया संगृह्यते । अत एव व्रताधिकारे सुमन्तः-विहितस्याननुष्टनसिन्ि- 
 याणामनिग्रहुः । निषिद्धसेवनं नित्यं बजेनीयं प्रयत्नतः ।। पतितादशेने तु विष्णु- 
पुराणे--तस्थावलोकनात्सृर्यं पद्येत मतिमान्नरः ।। स्प्ञाद ।! विष्णुधमे- 
संस्पर्शे च नरः स्नात्वा शुचिरादित्यदशेनात्‌ ।। संभाष्य ताञ्छचिपदं चिन्तयैद- 





























|: 1 क. 





स्वयंकुर्थादित्यर्थः ।\ पुसोण्येष विधि- 
व स््ीभी रजो दशनेपि कायम) तथाच 


है, सब प्राणियोपर दया, सहनं 


. प्र्शिका 4 हिन्दी टीकासहित ^. (1 1 





` चाहे व्रत हौ चाहे नं हौ \ व्यासस्मृतिमं कहा है कि, जिस दिन दातुन न मिलता हौ अथवा जिन तिथियोमे 

`  काठकी दातुन करनेका निषेध हौ उनमें पानीके १२ कुल्लो मुखशुद्धि कर छेनी चाहिये \ इन वचनोसे यह ` 
। सिद्ध हता है कि, पणं जादिसे जीभ तथा कल्लोसे गंतोको उस समय भी शुद्ध रखना चाहिये, जब किं दातुन 
न मिल रही हौ अथवा दातुन करनेका निषेध कर दिया हो । देवलस्मृतिमं कहा है कि एकवारको छोडकर ` 
ज्यादा पानी पीनसे तथा एकवारके भौ पान खा ल्नेसे, दिनके सोने जौर मथुनसे उपवास नष्ट होजाताहै ! 
 , पानी पिये विना न रहा जाय तो एकवार पानी पी लेना चाहिये, यह इसी वचनसे प्रतीत हो जाता है कष्टके 
समय पानी पीनसे उपवास नष्ट नहीं होता, वो कष्टभी साधारण न हौ किन्तु सरणन्तसा प्रतीत हो यह ` 
(अत्यये) का ग्रन्थकारका आहय है । विष्णुधरमेमे लिखा है कि, वारंवार पानी पीना, दिनम सोना, मेथुन | 
` करना, पानका चबाना ओर मासका खाना व्रतके दिन कभी न होना चाहिये । वार वार पानी पीनेकानिषेव = ` 
| किया गया है) इस कारण एक बार पानी पीनेका कोई दोष नहीं है । जब तक ब्रतकी पारणा नहो उसदिनि 
| तक ब्रतका दिन समन्चा जाता है । ब्रतकी समाप्तिमे ब्राह्मणभोजन अवश्य होना चाहिये । जबतक पहिला ` 
` ब्रत परान होरे तबतक दुसरे ब्रतकरा प्रारंभ न करना चाहिये \ पारणाका दिन भी व्रतकाहीदिनहैःइस 
कारण मांसं आदि निषिद्ध वस्तुभका सेवन पारणाके दिन भी न होना चाहिये । उयवासमे तो भोजनकी ` ' 
। ` प्राप्ति ही नहीं है । क्योकि; इस इलोकमं वतका संबन्ध है उपवासका संबन्ध ही नहीं है ! तबही निणेयमृतमे ` 
।  व्यासजौका वचन है कि, व्रत ओर पारणा दोनों ही के दिन मांस अथवा शिनकी मांस सं्ञाकौ गयी हैएेसी ` | 
 ओषधि्योको ध । कभी भोजनके कायम न लाना चाहिये । जल, फक, पय, ब्राह्मण काम्या, हवि, गुरुके वचन भौर ` 
बधं ये आटो त्रतको नष्ट नहीं करते; इस स्कन्दाके वचनसे जो ओौषधिके रूपमे मांससंज्क ओषधोका = ` 
` सेवनं व न प्राप्त हुमा था उसकाभौ निराकरण उक्त निणेयामृतके वचनसे हो जाता है । विष्णुरहस्यमे लिखा 
कि, अच्नका स्मरण, दलेन, गन्धोका आस्वादन, वर्णन ओर प्रासोकी चाह इन सबका त्याग बरतके दिन होना 






































प्राखण्डी जौर नास्तिकोसे बोलना, शूट बाते बनाना - १५ १ बाते क 
` चाहिये ! अन्नका तात्पयं केवल भोजन वस्तुसे हौ नहीं 








है । कोई श्रतदानादिकक्रमः' इसके स्थानपर ¶्रतदानादिकक्रियाः' एला पाठ रखता है उसके मतमे-त्रत = 

दान आदिक क्रियां ठेसा अथं होगा कि ये सूर्योदयके विना न होनौ चाहिये । सूर्योदयशब्दसे उषःकालका ` 
 । ग्रहण है. क्योकि, कल्पतस्ग्रन्थम लिखा है कि, उषःकालके विना रातमे स्नान आदि न करने चाहिये । छन्दोग 
परिशिष्टमें लिला हु कि, उपवीतसे सदा रहना चाहिये 











क तवका ८१9). 
प स प शकः ५ 4 य ५ सः स प प = | । सथ ए त शर 





( क्षणप्रसिद्धा ।। वास्तुकं दथवा इति स्यातः |! 
अ हिल शुक्रं मोचयति इति क्षीरस्वाम्य॒क्तेः शुक्रासारी हिलसार इति प्रसिद्धाः 
शाका जलोद्भवाः । गौडदेशे हेलंचले इति प्रतिद्धाः\।कार्काकमुत्तरदेशे कालिकि- ` 
ति प्रसिद्धम्‌ ।! केमुकं केमुत्ा इतिपवेदक्षे प्रसिद्धम्‌ ।। नागरङ्धकं नारिद्धम्‌ ।॥ ` 
“एरावतो नागरद्खो नादेयी भूमिजबुकः" इत्यमरात्‌ ।! नागरं चैवेति पाठे! ` 
` नागरं चुण्ठो । कवली रायञांवलीतिमहाराष्ट्माषयोच्यमानं फलम्‌ । हर 
 फररेवड़ी इतिमध्यदेडाभाषथा ।\ अतंखपक्वमित्येतत्कथितहविष्याणामेवं विल्ञे- ` 
षणम्‌ ।। मनुः-सुन्यन्नानि पयः सोभ मासं यच्चानुपस्कृदम्‌ \\ अक्षारलवणं चैव 
प्रकृत्या हविरुच्यते ।! अनुपस्कृतमपक्वम्‌ । क 
(0 अय व्रतको हविष्य चीजे -हेमादव ग्रन्थे छान्दोग्यपरिशिष्टमे कात्यायनके वचन कहे हँ कि, हविष्य ` 
अनलोम जौ मुख्य कहे ह, उनके पीछ ब्रीहिकी गणना है, चाहं कुछ भी न मिरे पर उडद, कोदो ओरसफेद | 
सरसोको कभी ग्रहृण न करना चाहिये । इसी विषये अग्निपुराणमे कहा है कि, गाली, साडो चावल मूग | 
तथा कलाय, पानी, दूष, इयामाक, नीवार ओर गेहं आदि पारणमें हितकारी हे । पेठा या काल्लीफल,घीया;, ` 
। बेगन, पाठ्कका साग, ज्योस्तिका इनका त्याग करना चाहिये । मीठा दधि, घृत, चतुभेकष्य, सामा, शाली 
| चावल, नीवार, सत्त कण, क्ञाक, साधारणं चावल, यावक, ये सब रातके व्रतादिमे हविष्याच्न कहे गये ह 


अग्निका्यमं 4. १ 


यमे भी इनका ब्रहुण हो सकता है ।पर किसी भी व्रतो पृरुषकोश्तवु मासका कभौ भीब्रतमे 





र मटर इतिप्रसिडा टाणे इति दक्षिणर्भा 






















त ५ 1 न ति १५१५५ ५१ ६. 0 


~  # नोट-य्यपि हमे कितने ही स्थखोमें मांसं शब्द मिलता दै, अथं भी सीधा मांस ही किया हुमा पाया जाता 
|  हैजो कि, मांस आज संसारमे प्रसिद्ध टै, मनुस्मृतिके श्राद्धपरकरणमें मांस दाघ्द अनेक विरोषणोके साथ दृष्टि 
रहो जाता है सदं ग्रन्थौमे भी इसका कस-प्रसंग नहीं आया है, पूराणौमे भी इसकी पूरी कहानी मिरती है, 
इसे देखकर प्रत्येकके हृदयम यहे रंका होनी स्वाभाविक है कि, क्या प्राचीन आय्योकि यहां मांसकी गिनर्त 
हविष्या्रतकमें हु करती थी ? जब मनुस्मृति इसे प्रकृतिसे हनि कह गयी तो फिर इसके हविष्यान्नपनेमे 1 
कौनसा सन्देहं साकी रहं जाता है । उचित तो यह्‌ था कि जैसे ब्रतराजके छेखकने अग्निपुराणका ग्रह॒ वचन | 
उद्धृत किया है कि“ मधु मांसं विहातव्यं सर्वेदव ब्रतिमिः सदा" सभी व्रतवालोको मधु मांसकास्वैथात्याग ` | 
| करना चाद्ये, ओर इसी ग्रन्यमे पारणाके दिनको भी ब्रतका दिन संभाला है, इससे यह बात सि होती है कि, ` | 
व्रत अथवा पारणाके दिन मधुमांसका ग्रहण न करना चाहिये । दसके पीछे इसी प्रकरणम रेखक मनका वचनं 
इसके हविष्य होनेमें रखता है, तब इस ग्रन्थसे हविष्य ओर अहविष्यका निर्णय करनेवाखे लोग इसं विषयमे 
` क्या समन्ञेगे ? यद्यपि टेखकने इसं विषयमे यहीं अच्छी व्यवस्था करदी थी पर ठेखककी व्यवस्था दुरूह्‌ हुई 
है, इस कारण यहाँ इसकी कु व्यवस्था करना अत्यावद्यक है । मनुस्मृतिकारने मांसादि न खानेको महाफल- 
ध शाली बताया दैः तथा मांसकी निरुक्ति करतीवार यह भी कह्‌ दिया हँ जो मृनने यहां खाते है मै उन्हं वहां बाङंगा, ॥ 
































2 














सेवन न करना चाहिये ! म्रन्थकारके यहां पारुको, पाथरी ओर ज्योस्निका, कोातकोको कहते हे ! भविष्यमे ` 


कहा है-हेषन्त ऋतु होनेवाखा हैमन्तिक, विना भौगे हुए सफेद धान, मूंग, जौ, तिमर, कगुनी, नीवार, 


` बथुजा, हिरुमोचिका, सांठी चावल, कार शाक, कैबुकको छोडकर बाकी सूल, कंद, सेधा ओर समुद्र नोन, ` 


तथा गङके दधौ ओर घी, मलाई आदि नः निकाला हज दूष, कटहर, अम, हरीतकी, पीपल, जीरा, नारंगी, ` ॥ 


त ` इमी, केला, लवली, असला ये सभी हविष्याच्च हुं ! पर ईखका गुड हविष्य अन्न नहीं है । जो ब्रतग्राह्य वस्तु र | ८ 
तेलमें न पकार हौं वो व्रतम ग्रहण कर ठेनी चाहिये । ऋषियोने इन चीजोको हविष्य बताया है । जिनकी कि ` 


हेम मणना करुके हैँ \ कहीं २ गव्ये च दधिसपिषी' के स्थानम "क्वणे सधुसर्पिषी' एसा भौ पाठ है जिसका ` 
अथं होता है कि, दोनों नमक, सधु ओर सपि इत्यादि भौ हविष्यान्न है । हैमन्तिक धानका नास है कलसा, ` 


` बह भौ विना भीगी हई सितौर इवेत-हविष्य है । कलाय ओर सतीनक दोनो परय्यायवाची शब्द है ! यह ` 
भटर करके प्रसिद्ध है. इसे दक्षिण देशसं वाटाणे एसा बोलते ह्‌, वास्ुकं बथुञके नामसे प्रसि है । हिक 


` शुक्र-हिल माहिने शुक्रको जो, मोचयति" छुडवादे उसे हिरुमोचिका कहते है, एेसी क्षीर स्वामीने व्युत्पत्ति ` 
 कीहै। जिसे शुक्रासारी ओर हिलसार भी कहते है । यह्‌ एक पानीमे होनेवाला शाक है, जिसे गोडदेदमें 
 हित्मंचर कहते हं । कालन्ञाके उत्तर देशमं कालिका करके प्रसिद्ध है । केमुक केमुत्रा करके पूरव देशम प्रसिद्ध॒ ` 
दै । वामर्ग-नारंमीका नाम है, क्योकि अभमरसिहने एेरावत, नागरंग, नादेयी, भूमिजम्बका. ये पर्यय 
वाचकं शब्द रखे हे \ यदि नागरं चैव' एसा पाठ रखेंगे तो नागर शुंटी अथं होगा । लवली रायभांबलीको महा- 





रष भाषामं कहते हं । जिसे मध्यदेशं हरफररेवडी कहते हं । अतल पक्वे यह्‌ कहै हए हविष्य अघ्नोका 1 


खारी नोनको छोडकर बाकी नमक ये स्वभावसे ही हविष्यान्न हँ । अनुपस्कृत अपक्व, यानी विना पकाया 
हआ सांस भी हविष्यान्न है । 





विशेषण है । मनुस्मृतिमें कहा गया है कि, दूर सोम, मांस, जर विना उपस्कार किया हुमा मांस एवम 


॥ कह १ # र ध ॥ ध 4 ^ ८ ५ ५ ५ (; † क ५ । 1 ‡ 1 
कष सवव त „< {हलक स्‌ हूत 0 । ( २.९ ) 1 
12 ¢ प 44 0 0 ॥ ¦ 





। तथा मधुरत्रयमुच्यते ।। षड्साः ।। तत्रैव भविष्ये-मधुरोऽम्लज्चव ल्वणः कषाय- ` 
` स्तिक्त एव च ।\ कटुकश्चेति राजेनद्र रसषट्मुदाहूतम्‌ ।। चतुःसमं तु \\गार्ड- ` 
| कस्तूरिकया द्वौ भागौ चत्वारदंचन्दनस्य च ।! कुकुमस्य त्रयश्चेकः शशिनः ` 
¦  स्याच्चतुःसमम्‌ ।। कृकुभम्‌ कलरम्‌ ।। चन्म ।। कर्पूरः ।। सवेगन्धम्‌ ।। कर्प्‌रःचन्दनं ` 
दपः कुंकुमं च समांशकम्‌ \। सवेगन्वमिति प्रोक्तं समस्तचुरभूषणम्‌ ।। दपेः क्स्तू- ` 
रिका ।\ यक्तकदमः ।। तथा-कस्त्‌री ह्यगुरदचव करपूरह्चन्दनं तथा \। ककोले च : 
च भवेदेभिः पचभिर्यक्षक्दमः । अथ सवाषधय छन्दोगयरिक्िष्टे 
` कुष्ठ मसी हरि दे सेलेयचन्दनम्‌ । वचा चस्पकमुस्तं ` 
च सर्वोषध्यो दक्ष स्मता सोभाग्याष्टकम्‌ । पादेदृक्षवस्तणराजं 
च निष्पावाजाजिधान्यकम्‌ ।। विकारवच्च गोक्षीरं कृथुमं कुंकुमं तथा| . 
 क्वणं चाष्टमं तत्र सौभाग्याष्टकमुच्यते ।\! तुणराजः ताकः। अजाजी 
जीरकम्‌ }) अर्ध्याष्टाङ्खानि ।। आपः क्षीरं कुशाश्राणि दध्यक्षततिलस्तथा ॥ 
यवाःसिद्धाथकाहचेति हयर्ध्योऽष्टाङ्कः प्रकीतितः ।। मण्डलाथम्‌ पञ्चवर्णानि । 
 पञ्चरत्र-रजांसि पञ्चवर्णानि मण्डलाथं हि काययेत्‌ । शक्तिण्ड्ल्चूणन ` 
श शुः  यवसंमवम्‌ ।। रक्तं कुसुभसिन्दुरगेरिकादिसमुद्भवम्‌ ।। हरितालेद्‌- 
भवं पीतं रजनौसंभवं तथा ।। कृष्णं दग्धयनेहुरित्पीतङ्कष्णवीमिधितम्‌ ।। रजनी ` 
` हरिद्रा 1! कौतुकसंज्ञानि \ भविष्य-दूर्बा य्वाकु राहचव वालक चूतपल्लवाः 11 | 
 हरिग्रादयसिदार्थश्िखिपत्रोरगत्वचः । कङडकणोषधयहचेताः कोतुकाख्या नव॒ ` 
 स्मताः ! अय सप्तभदः ।\ मात्स्ये-गजार्वरथवल्मीकसंगमाद्धदगोकूलात्‌ ॥ ` ` 
मृदमानीय कुंभेषु प्रक्षिपेच्चत्वरात्तथा ।। गोकूुलावधि सप्त, चत्वरेण सहाष्टौ | 
मृदो भवन्ति ।। सप्तवातवः ।। हेमाद्रौ भविष्ये-सुवणंरजतं ताख्रमारकूटं 
तथेव च \। लोहं त्रपु तथा सीसं धातवः सप्तं कीतिताः ।\ आरक्टं पित्तलम्‌ ।! | 
स्‌ धानि ।। षट्‌ वथवगोधमधान्यानिः किला क डःगुस्तथव च ।। 
ं चीनकं चेव सप्तधान्यमुदाहूतम्‌ । सप्तदश्ञधान्यानि ।। माकण्डेय- 
ग-त्री वाचैव अणवस्तिलाः ।। प्रियद्धवः कोविदाराः 


































कल्ला उक्ताः विष्णुधर्मे-हमराजततास्बाइच सम॒न्मया लक्षणान्विताः 1) यात्नो- 
1हुम्रतिष्ठादौ कुम्भाः स्युरभिषेचने ॥। तत्परिमाणं च । तत्रैव--पञ्चाशा- 
डगलेवयुल्या उत्सेधे षोडशषाडगुलाः ।। दाद्ाडगुलम्‌लाः स्युमुखमष्टाङगुल 
भवेत्‌ ।। पंचगृणिता आशाश्च पंचाला आला दज्ञ । पंचाहादगलानि वेपुल्यमित्यथः। ` 
केचितु पञ्चदशशांगुल्वेपुल्या इत्याहुः ।! प्रतिमाद्रव्ययोः परिमाणम्‌ ।। हेमाद्रौ 
ष्ये-अनुक्तद्रव्यतत्संख्या देवता प्रतिमा नृप \\ सौवर्णां राजतौ तारी वृक्षजा 


सादिक तथा ।। चित्रजा पिष्टलपोत्था निजवित्तानसारतः \ आमाषात्पल- 
पयंन्ता कतव्या शक्तिखभवे \। अंगुष्ठ 








४. 


वेमारमभ्य वितस्यवधिका स्मृतां \। मात्स्ये 
तु विश्षेबः-अंगृष्ठपर्वादारभ्य वितस्तिर्यावदेव तु ।। गृहे तु प्रतिमा कार्या नाधिका 
शध्यते बधः ।। आःषोडशात्त्‌ प्रासादं कर्तव्या नाधिका ततः ।। इति ।\ अधिकं 
कल्पतरौ प्रतिष्ठाकाण्डे ज्ञेयम्‌ ।। अनादेशे हौमसङ्कया ।। तथा -अनुक्तसस्या- 


होमे तु ¦ शतमष्टोत्तरं स्मृतम्‌ ।! मलत्स्ये--होमो ग्रहाधिपजायां रातमष्टोत्तरं 











































मुनीन्द्रः ।। सजेरसो राल इति प्रतिद्धः । मांसी जटामांसी ।। च्निलवं न्िभागम्‌ | 
घनः कपरः ।। पुरो गुग्गुलुः ।। युवणेमानमाह्‌ ।। याज्ञवल्क्यः--जःलसू्य॑मरीचिस्थं ` स 
त्रसरेणू रजः स्मृतम्‌ ।! तेऽष्टौ विक्षास्तु तास्तिस्मे राजसर्षप उच्यते । गौरस्तु ` 
ते त्रयः षट्‌ ते यवो मध्यस्तु ते चयः ।! कृष्णलः पंच ते माषस्ते सुवणेस्तु षोड ।। 

| पलं सुवर्णाहचत्वारः पञ्च वापि प्रकोतितम्‌ । रजतमानमाहः ।। द्वे कृष्णले | 
`  रुप्यमाषो धरणं षोडशेव ते ।। हातमानं त॒ दशभिधरणेः पलमैव त्‌ ॥¦ निष्कः ` 
सुवणीहचत्वारः ।\ इति ।। ताख्रमानमाह--कातिकस्ताभिकःपणः इति पल- ` 
चतुर्थाशेन कषणोन्मितः का्षिकस्तास्मसम्बन्धी पणो भवति ।। कर्षसं्ञा च | 
।  निषण्टौ--ते षोडज्ञाक्षः कर्षोऽस्त्री पलं कषचतुष्टयम्‌ \। इति ।। ते षोड माषा ` 
अक्षाः स च कर्षं इत्यर्थः ।! घरणस्यैव पुराण इति संज्ञान्तरम्‌ । ते षोडश स्याद्धरणं ` 
स्मृतेः! लतमानपले पययि । युवर्ण- | 
 चतुष्टयसमभतोलितं रूप्यं राजतो निष्कइत्यर्थः । सुवणेनिष्कस्तु--चतुःसौर्बाणको | 
॥ विज्ञेयस्तु प्रमाणतः ।। इतिमनूक्तेः, स च पठ समान एव ।। कोऽ कार्षापण 
इत्यपेक्षायां प देशमेव कार्षापणो. \ मिन्त इत्याह, हेमाद्रौ नारदः -कार्षापिणो ` 
दक्षिणस्यां दिक्ि येप्यः प्रवर्तेते ।। पणेनिबद्धः पूर्वस्यां षोडक्षेव पणाः सं तु । 
षोडशपणाः अष्टौ उन्बूका कार्षापणः पूर्वास्यामित्यथेः ।। तावता लभ्यं रूप्यं 
 दक्षिणस्थां स इति द्रैतनिणेये । लोलावत्याम्‌ --वराटकानां दश्चकद्रयं यत्सा ` 
काकिणी ताहच पणश्चतस्रः ।। ते षोडश द्रम्म इहावगम्यो दरम्मेस्तथा षोडशभिश्च ` 












































` चांदी, मोती, संगा ओर लाजवदीं ये पांच रत्न कहं हँ । बाकी वस्तुंगाडी करगे । समयप्रदीप १ प्रन्थमं रखे 
त हं । मू त ६ लो मे जो कुलिशदान्द आया है उसका हीरा अथं है । स्मृत्यन्तरमे ल्ल है कि, ` 












(द) तरो. : समान्य. 


१ (0 य य 40 ध. 1111111 0 














दही भौर शुक्रमसि, से घी ओर दैइस्य त्वा" से करका पानी भिखाना चाहिये ! ऊपर कही हुई पाचों चीजोके 1 
योगसे पंचगव्य बनताहै। ` भ | 
“ॐ गन्धद्वारां दुराधर्षा नित्यपुष्टां करोषिणीम्‌ । ईइवरी सर्वभूतानां तामिहोपह्वये श्रियम्‌ 1" यह ` 
= लक्ष्मीसुक्तका मंत्र है लक्ष्मीके विषयमे इसका अथं यह अथं होता है कि, अनेक तरहकौ स्वच्छ सुगन्धिकी ` | 
 द्वारभूत, किसीसे भी अभिभूत न होनेवाली तथा सदा सब तरहसे पुष्ट करनेवाली, दानमं चित्तकरनेवालौ | 
अथवा हाधि्योकौ ईकनरी हाथी आदिः उत्तम सवारी देनेवाली संपुणं जगतकौ ईश्वरौ श्रीको बुला रहाहं ! | 
`  भोमयके विषयमे विविध तरहको सुगम्धि देनेवाङे तथा किसीसे न दबनेवाे, सदा ही पुष्टिके देनेवारे एवम्‌ ५ 
शुष्क गोमय रूपमे आजानेवारे सब प्राणियों प्रशंसित तथा विविध छोभा संयुक्त मोमयको बुलाता हूं । 
निस संत्रका जिस विषयमे प्रयोग हो उसका उसी विषयमे अथं होना चाये ! “ओंजाप्यायस्व समेतुते विश्वतः ` 
` सोमवृष्ण्यम्‌ ! भवा वाजस्य संगथे ।' हे सोम ! आपका बल्वर्धक सत्व चारों ओरसे अजाय मुके वाजके 
 संगमकेच्यिहौी\\ 1 
, : “ओं दधिक्रान्णो अकारिषं जिष्णोरश्वस्य वाजिनः । सुरभिनो मुखाकरत्‌ प्रण ायूंषि तारिषत्‌ ।“ | 
दषम शी घ्रही व्याप्त हो जानेवारे, बलञ्ञाली, व्यापन शील दहीको इनमें मिला रहा हुं \ अथवा प्रत्येक पाद | 
| विक्षेषमें पुथ्वीको आक्रान्त करनेवाले, जयज्ञील तथा वेगवा अह्वका संस्कार कर दिया है । वो दधि जथवा ` 
अहव हमारे मुखम सुगन्धि कर दे एवम्‌ हमारी आयुको बढा दे \ “ओं शुक्रमस्यमृतमसि धामनामासि प्रिय 
 देवानामनाघष्टं देव यजनमसि !" हे आज्य ! त्‌ शुक्र-दीप्तिमान्‌ अथवा वीय्ये रूप है । आप विना रहितहो 
यानी जो अएपका सेवन करता है उसकी शीघ्रही अल्पायुमें मृत्यु नहीं होती \ आप शश्च विहृत होते हो आप 
धामनाम है, आप देवोके प्यारे तथा नहीं तिरस्कृत होनेवाके देव यजन यानी देवताजोको यजन करनेको वस्तु 
ओम्‌ देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽशिवनो बाहुभ्यां पुष्णो हस्ताभ्याम्‌ 1}” देव सविताकौ आज्ञां प्रवतेमान 
हभ मे अद्विनीकी बाहु तथा पुषाके हाथोसे ग्रहण करता हूं । याज्लिक विनियोगादिके आधारपर ठिखे गये ` 
द भष्योमे इन संत्रोका वही अथं है जो इनके विनियोगके हिसाबसे होता है । एक काममें विनियोग कयि 
गये मंत्रौका यह नियम नहं है कि, फिर दूसरे कामम उनका विनियोग ही न हो किन्तु दूसरेमं भो उनके 


तथा शन्धद्रारामः इस मंचको बोलकर गोबर एवम्‌ “आप्यायस्व इस संत्रसे दध तथा 'दधिकाव्णोः इस म॑त्रसे = | 
| 








स 9 2 































परिभाषा] हिन्दी दीकासहित ` ` ` (रर) ` 





क्ास्त्रमं लिखा हृजा है कि, मण्डल बनानेके लिये पांच रंणके पांच चूणे तयार करना चाहिपे, श्वेतकते स्थानम 
गहुः चावल तथा यवका चून वरतना चाहिये । कुसुम, सिन्दूर ओर गेरको लाके स्थानमें तथा हुरताल्के ( 
` ओर हल्दीके चनका पीलेरंगके स्थानम लेना चाहिये । जले हुये जोओसे काला तथा पीले ओर कल्येहसा ` 
बना रेना चाहिये । क्योकि इन दोनोको मिता देनसे हरा रंग बन जाता है ! इलोकमे रजनौ शब्द हरिद्राका 
` ही पर्याप्त जाया है । कौतुकसंज्का-भविष्य पुराणमें लिखा हभ है कि, दूध, जौके अंकुर, खसकी जड, आसकौ 1 
 . शरः दोनों हदिया, सफद सरसो, मोर पंख, सांपकी कचली ये ककणकी ओषधि हुं इन्टं कौतुक कहते हँ । ~. 1 
 सप्तमद-मत्स्य पुराणमें लिला है कि निस स्थानम घोडा बधे जौर हाथी बेषे उन दोनों जगहोकी धूल, ८ | 
स्थकी रेत, बामीकी सिद्री, नदियोके संगमकौ भिदटरी, तालाबकी भिद, गउमोके खिरक्की ओर चौराहेकी | 
मिह ये सात मृत्तिकाए हे । इन्हुं घटम गेरे । जहां गेरना कहा हो वहां, अन्यत्र नहँ । इलोकमें गोकरुलतक = | 
सात तथा एक चौराहेकी इस तरह आठ मिरी होती है ! सप्तधातु-हेमाद्रि्रन्थमे भविष्यका क्खिहैकि, । 
सुवणं, रजत, तार, आरकूट, लोह, घ्पु ओौर सीसा ये सात घातु हे ! आरकूट पौतलको कहतेहं । बहांहौ | 
` सप्तधान, षट्तरिशद्‌ग्रन्थके मतसे-यव, गोधूम, त्रीहि, तिल, कंगु, श्यामाक ओर चीनक इन सातोंको सप्तधान्य ` 
` कहते हें । सत्रहधान-मार्कण्डेय पुराणमें कहे हे कि नीहि, यव, ग प्रियंगु, कोविदार,कोर्रूब, | 











 कज्ाक-हेमादवि ्रन्थमें क्षीरस्वामीके मतसे क्षाकमौ गिनाये है कि, शाक दज तरहफे होते है सबन्लाक (| 
उन्हीके भीतर आजाते हं । कोई-जड कोई पत्ते तथा कोई कुला ओर कोई पल्लव एवम्‌ कोई फल ओर कोई 2 





छ अपने लक्षणके अनुसार सोने, चांदी, तांबे मौर मिट श भेके 
निमित्त होते है । कलहाका परिमाणभी वहीं कहा 
।  जड्वाला ओर आठ अंगुलका मुंह होता है । दिशा दश है 
` दहकोगुणाकर देनेपर ५० होते हं क जिसका यह मतः 
अंगु ही विपुर मानते हेः ४ १ श १ 4 चौडा होता 


पचाागुल विपुल, सोलह अगुरु उचा, १२ अगल ५ 






(ब) 1 त्रतराज र  वुामात्य- 





कही गयी बोन मिले तो उस जैसौ दूसरी वस्तुको खेलेना चाहिये \ जैसे-जौ नहो तो गेहुंगोसे तथाब्रहिनं + 
हँ तो तण्डुलोसे काम कर ठेते है । जहां कोई हवन द्रव्य न लिखा हौ वहां बिधिके साथ घीकीही आहुतिदेनी 
चाहिये । जहां कोई मंत्र देवता न कहा गया हो वहां प्रजापति समञ्चना चाहिये \ एेसौ स्थिति है । इसका प्रन्थ- = 
करार अथं करते हे कि, मंत्र भौर देवतके अविधानमं प्रजापति देवता र समस्त व्याहृति ही संत्रहोताहै। 
इसरो २ स्मृतिये मी लिखा हुभा है कि, व्याहृति्ोल हवन करनेके बराबर दूसरा कोई हवन नहीं है मथवा = | 
व्याहूतियोके बराबर कोई हवन संत्र नहीं हे । गरुड पुराणम लिखा हेमा है किह सत्तम ! जिस देवताकामूल ` 
मंत्र बनाना हो उस देवताके नामको चतुर्थोका एक वचनान्त करके उसके आदिमं ओम्‌ भौर अन्तम न॑मः 
`  लमानेसे सब देवताभके मल मंत्र बन जातेहं। 11 4 4 (> 
। द्रव्याभावे प्रतिनिधि-हेमाद्रिमे विष्णुधरमको लेकर लिखा हुमा है कि, है राजन्‌ यदिद्हीनमिलेतो 
दष तथा मधुके अलाभमं गुडसे काम करना चाहिये \ यदि घी न होतो दही व दधसे काम लेना चाहिये । उसौ + 
` ग्रन्थमें मेत्रायणीय परिश्िष्टका वचन है कि द्रुबके अभावमं काको रेलेना चाहिये \ पेटठीनसिने कहाहै कि, | 
सबके बदले जौओंसे काम ठेना चाहिये । इस विषयमे बहां देवलका भी वाक्य है कि जहां कहीं आञ्यका ` 
`. होम है वहां सब जगह गौका ही घुत ठेना चाहिये ! यदि गोका न मिल तो भेसका. यदि भेसकामीनिमिके | 
तो बकरी ओर बकरीकाभी नहो तो भेडका वतना चाहिये । यदि यह भो नहो तो तिलका तेल तथा तिलका | 
तेलभी नहो तो जात्िलका तेल तथा इसके भौ अभावे कौसुभका तेल तथा इसकेभी अभावमे सरसोका | 
तेल ठेना चाहिये । | 1 | | (५ 
`.  पवित्र-हेमाद्वि्रन्थमे कात्यायन परिशिष्टके मतको केकर लिखा है कि, जिनके बीचमं कुछ दल नहो ` | 
मर भाग साबित हो एेसी द्विदल कुशा लेनी चाहिये वो प्रदेश मात्र होनी चाहिये । जहां भी कहीं पवित्राका 
प्रकरण भये बहु तथा जहां कहीं घतकी शुद्धिके लिये पवित्र आया है वहां भी एसा ही समन्नना चाहिये \\ 
इध्म-पलादा, अश्वत्थ, खदिर, वट, उदुम्बरये समिध हः । इनके अभावमें काटेदारोको छोड कर सब वन- ` 
स्पतियां लेलेनी चाहिये । धूप~अगुर, चन्दन, मुस्ता, सिद्धक, वृषण इन पांचो वस्तुजोको बराबर लेकर | 
जो धूप बनाया जाता है उसे अमृत कहते ह । सिह्धकको सिह्वार कहते है, वृषण कस्तुरीको कहतेहँ । = 
दशागधूप-दे भाग कुष्ठ, १२ भाग गुड़, ३ भाग लाक्षा, पांच भाग नख, हरीतकी, सजरस ओर मांसी ` 





































याज्ञवल्वयने कहा क है कि, जालमे सूर्यकी किरणोमं जो कण उडते, चलते दीवते हे, इनमेसे 






परिभाषा 1... हिली दीकासहितः -; (५) 





रजत मान-दो कृष्णलोका एक रूप्यमाष होता है । सोलह मासोका एक धरण होता है, दस धरणोका 


` एक तमानं पल होता है, याज्ञवल्क्यजीके कहे हुए चार * सुवर्णोकाही एक निष्क होता है । 


तास्रमान-चांदीके मानके पलक चौयाहिस्सा जो कषं है उत्तसे तोला हुमा कर्णीघक बनता है यह्‌ तांबेका 


-पण होता है । यह्‌ याज्ञवक्ल्य स्मृतिसे ही लिखा गया है । वै्कके निषण्टुमे कषंका अथं क्रिया है कि-सोलह ` 


 मा्षोका एक कषं तथा चार कर्षका एक पल होता है 1 सोलह माषका एक अक्ष होता है, उतनाही कष 
` होता है, एेसा ग्रन्थकार कहते हं धरणका दूसरा नाम पुराण भी है-क्यों कि, सिताक्नषरासं लिखा है कि, सोलहका 


४ ध धरण होता है जिसे चांदीके तोलमे पुराण भी कहते हँ । शतमान यह पलकाही पर्याय है । चार राजतसुदणेकि ` 
बराबर तुला हूञा रूप्य यानी राजत निष्क होता है एवम्‌ चार सोनेके सुबणके बराबर सुवणं निष्क होता ` 


कार्षापण होता है । दक्षिणदिशामें उतनेहीमे 


५ ४ है । एसा मननं कहा है बो पलके समान होता है । अब यहां यहं जाननेकौ अपेक्षा होती है कि, यहां काषपिण ` । 


८ ध क्या है ? देकभेदसे कार्षापण भिन्न है । इसी विषयमे हेमाद्विमे नारदजीका वाक्य है कि, दक्षिण देशमं रौप्य 
कार्षपिणही प्रचलित है । पुरबमं सोलह पणोसे कार्षापण 








हमें रूप्य मिल जाता हैभयह्‌ दवैतनिणयमं लिखा हृ है । लौलावतीमे 





पण निबद्ध है । सोलह पण या ञाठ दब्बूका पूरवमं 


८ ॥ तो यहं लिखा हुआ है कि, २० कोडियोकौ एक काकिणी तथा चार काकिणीका एक पण होता है सोरह ` ५ 4 


द्रोणैः षोडशभि खारी विहात्या कुंभ 





(२६)... ^ (वज ^^ [ सामान्य- 


र तोन १५७ ५ 
अ 


माताम, ४५१५-१ 


करभ होता है इस पक्षसे भिच वीस द्वौणके बराबर कुंभ होता यह भो किसीका पक्षहै । पराश्रजीने द्रोण 
ओर आढकका कख ओर ही परिणाय कहा. है कि, धमं शास्त्रौके अनुपालक वेद तथा वेदागोके जाननेनाल 
ब्राह्मण ३२ प्रस्थोंक द्रोण सौर दो प्रस्थक। आढक सानतं हं ।यहं जो कहीं छोटा ओर कहीं उसके अधिक्का 
` जो द्रौण तथा आढक तथा अन्य मान कहा है उसकी देशा ओर कालके अनुसार व्यवस्था जानन चाहिये कि, ` 

` उसं समय उस देशमं यह्‌ व्यवस्था थी तथा उस देदमे उस समय बहु थी आज इनका व्यवहार नहीके बराबरहै। 

५ । भथ होमद्रव्यमानम्‌ | 

सिडढान्तश्ेखर--होमद्रव्यप्रमाणानि वक्ष्यन्ते तु यथाक्रमम्‌ ।! कषप्रमाण- = 
माज्यं स्यान्मधुक्षीरं च तत्समम्‌ 1; तण्डुलानां शुवितमात्रं पायसं प्रसूतेः समम्‌ ॥ . 
 कर्षमात्राणि भक्ष्याणि लाजा मुष्टिमिता मताः \\ अन्तं ग्राससमं ग्राह्यं शाकं 
 म्रासादधंमात्रकम्‌ \। मूलानां तु विभागः स्यात्कन्दानामष्टसोशकः ¦! इक्षुः पव- ` 
प्रमाणः स्यादडगरष्टितयं र्ता ।। प्रादेशमात्राः समिधो ब्रीहीणां चाञ्जलिः 
समः ।। तिलसक्तुकणादीनां मगीसुद्राप्रमाणतः \। तत्रे पुष्पफलादीनां प्रमाणाहु- ` 
` तिरिष्यते ।॥ चन्रभीखण्डकस्त्रीकंकुमागुरुकदेमाः ।। हरिमन्यसमाः प्रोक्ता 
गुगलबेदरोपमः ।। हरिमन्थः चणकः ।! आहुतौनामिदं मानं कथितं वेदवेदिभिः ` 
स्यात्त्रमुद्रा मुगीमुद्रा होमे सवेफलम्रदा ।\ भमानान्तरं शारदातिलकटीकायां 
र्थादशं कर्षप्रमाणमाज्यं स्याच्छक्तिमात्रं पयः स्मृतस्‌ ।। उक्तानि पञ्च- ` 
यानि शुदितमात्राणि "साधुभिः ।। तत्छमं मधु दुग्धान्नं प्रासमाद्रसुदाहूतम्‌ । 
दधि प्रसृतिमातरं स्याल्लाजाः स्य॒मष्टिसंमिताः \! पथुकास्तत्प्रमाणाः स्यः सक्त- 
बोपि तथाविधाः \\ पलाद्धं गुडतानं च शक॑रापि तथाविधा । प्रासाद्धेमात्र- ` 

तरानामिन्षुः पवेप्रमाणतः एकं स्थात्यन्रपुष्यं च तथा धूषादि कल्पयेत्‌ ॥। मातु- 
लिङ्क चतुः खण्डं पनसं दशधा कृतम्‌ ।! अष्टधा नारिकेलं च चतुर्धा कदलीफलम्‌ !\ ` 
तं फलं बैल्वं कापित्थं लण्डितं दविधा ॥। व्रीहयो मुष्टिमानाः स्यर्मुक्गा ` 








न ५ जिनो 

























क्षीरस्य मधुनस्तथा । 6 





। होने चाहिये । साबित चावलको को: 
चाहिये । यदित्रीहिभीन होतो गेहं केखेना चाहिये 


हयै, चावल शुद्ति भर तथा खीरं प्रसृत्िके बराबर लेनी 


` परिभाषा ] दी टीकासदित श 





9६ म ५१५ क क 
वि ति 


 पंचच ।। इणां पवेकं मानं लतानामडगुलद्रयम्‌ ।) चन््रचद्धनकादमीरकस्त्री- ` 
` यक्षकदेमान्‌ ।। कलाथसंसितानेतान्‌ गुग्गुलं बदरास्थिवत्‌ \! द्रवः सवेण होतव्यः 

` पाणिना कठिनं हविः ।। सुवपूर्णा द्रवा प्रोक्ताः कठिना ग्रासमाघ्रेकाः ।। ब्रीहयो 
 यवगोधूमप्रियडगुतिलक्षाल्यः ।। स्वूपेणेव होतव्या इतरेषां च तण्डलाः ! 


होम द्रव्यमान-सिद्धान्त शेखरमं कटा है कि, एक कषं आज्य हो तथा मधु ओर द्धभी उसीके बराबर 
५ नी चाहिये । जितने भी भक्षय हैँ वे सव करषमा्रलेने | 
चाहिये, खीर मुट्‌लीभर होनी चाहिये \ ग्रासके बराबर अन्न तथा आधे प्रासके बराबर शाक होना चाहिये, 
मूलका तीसरा ओर कन्दका आखवां हिस्सा एवम्‌ ईख पोरुएके बराबर एवम्‌ दो अंगुल लता तथा प्रदेय मात्रकी | 
 समिष ओर व्रीहियोकी अंजलि, तिल ओर सत्तुकण आदिकोको मृगम राके बराबर सेना चाहिये । पृष्पओर | 
५ नसी आहति होनी चाहिये । चंदर, श्रौखण्ड, कस्तुरी, कुंकुम, अगुरु, करदेमये ` 
 चनेके बराबर तथा गूगर बेरके बराबर होना चाहिये । ¦ | 












आहृतिर्योका यहं मान कहा है । मध्यमा, अनामिका स र 





तथा श शिः क हावितमात्र ही पंचगव्य लेना चाहिये एसा श्रेष्ठ 


















तावतिक ककी पदार्थादं ठीकामें छिखा हमा .. 


१५. चाहिये ९. | ं ध, दरधका सन्न ग्रासके बराबर छना चाहिये | - 1 ॥ : 
श बराबर लेने चाहिये } गड ओर शकरा आधे पल 1 
















जी 4. ति : . [414 


५ ध ५ 
नि 


भषणं चैव सणिबन्धस्य भूषणम्‌ ।! एतानि चैव सर्वाणि प्रारस्भे धमंकसंणाम्‌ ॥। 


पुरोहिताय दत्वाथ ऋत्विग्भ्यः संप्रदापयेत्‌ । पूर्वोक्तं भूषणं स्वं सोष्णीषं ५ 
वस्त्रसंयुतम्‌ ।। दद्यादेतत्प्रयोक्तुभ्य जाच्छादनपटं तथा ।। व्रताङ्खमधुपकमाह 
 विदवामित्रः-संपृज्य मधुपकण ऋत्विजः कमंकारयत्‌ ॥ अपुज्य कारयन्‌ कमं 


कित्बिषेणेव युज्यते ।। ऋत्विजां संख्यामाह ।। तन्व मात्स्य-हेमाक्ड.कारिण 


` कार्याः पंचविंशति ऋत्विजः ।। येच्च समं सर्वानाचाये द्विगुणं भवेत्‌ \। दक्षिणया ` 
` तोषयेदित्यथैः । 


ऋत्विक्‌ संबरण-हेमाग्रिमे पदयपुराणका वचनं कहा है कि-अनेक सदगुणोसे युक्त परम सुन्दर छोटी ` 


| |  उश्रसे अग्निहोत्र करनेवाले सपत्नीक विद्वान्‌ ब्राह्मणक भली भाति पूजा कर फिर अनेक सरहके आभूषणोसे 9 
अलंकृत करके मुख्य पुरोहित बनावे, पीछे दूसरे ऋत्विजोका वरण करे । वे ब्राह्मण मी सपत्नीक तथा चौवीस 


 गुणोसे युक्त, अहुतवस्त्र (अहत वस्वका लक्षण-"अहतं यन्त्रनि्ुक्तमुक्तं वासः स्वयम्भुवा । तच्छस्तं माद्ध- 


 चिक्येष्‌, तावत्कालं न स्वेदा ।" स्वयंभूने कटा है कि कोरे वस्त्रको अहत वस्त्र कहते हं वही माङ्गलिक कार्य्यो ` 4 
शरेष्ठ नियतसमयको है) भौर माला पहिने हृए एवम्‌ अनेक प्रकारके पवित्र भूषणोसे विभूषित हृए हो उन्हं 








रसे छाप, छल्ले ओर कीडल देने चाहिये । वहा ही {गं धुराणका कचन रखा है कि जिन ब्राह्मणोका ५ | 
किया हो उनमें सबसे पहिठे पुरोहितको दो वस्र, पाग, कानोफ़े दो कुण्डल, कंठका भूषण, अंग्‌ल्ियोके 


। भूषण, मणि बन्धका भूषण ओर आच्छादन पट, सब कभक प्रारंभमे हौ देना चाहिये । पीछे अन्य ऋत्विजोको ` 





ही सब चीजें देनी चाहिये । व्रतांग मध्‌ पकंविरवामिच्रजीने कहा है कि मधुपकंसे ऋत्विजोकी 


करनेके पीछे उनसे कमं कराना चाहिये, विना पूजे क्म करानेसे करानेवालेको पाप लगता है \ ऋषित्विजोकी 


ध तोषयेत्‌ का मतलब ह कि दूनी दक्षिणासे तुष्ट करे । 
4 अथ सवेतोभद्रमण्डलम 


1९१1111. ¢ १९५1112 






कम 


२० पदोकी परिषि होनी चाहिये, बीचमें सोलह कोष्ठोसे अष्टदल कमल बनाना चाहिये । उल उक्ीसं 
आडी सीधौ लकीरोके बनेहुएु इन कोठो रग भरेते खण्ड चन्द्रमा आदि बन जाते है । सौ कंते बनत €“ =` 
 इसीपर लिलते ह कि, चन्द्रमा इवेत तथा ्टेवलाओंमे काला, सब वल्लि नौला रंगं भरन। चाहम 1: 
भ्रमं लाट, बापीमें श्वेत, परिधिं पीला, दलम सफंद जौर कणिकाके कोष्ठकोमं पीला रग भरना बहि! 
` मध्य कमलको परिधिसे परिवेष्टित करके बाहिर सत्व.रज-तम समञ्ने चाहिये । इसके मंडलम ब्रह्मादि  . ` 
देवकी स्थापना करके उनका वेध पुजन करना चाहिये । (1 
1 अथ लिगतोभद्रम्‌ 0 1 
चतुधिशचतिराेख्या, रेखाः प्रागदक्षिणायताः । कोणेषु शर्खलाः पच्च = | 
पदा वल्ल्यस्त्‌ पार्वतः ।। पदै्नवभिरालेख्याह्चतुि्टघुशरङ्कलाः ॥। लधुवल्त्याः = 
पदैः षड्मिस्ततोऽष्टादक्षभिः पदैः कृत्वा लिङ्खानि वाप्यःस्युस्तरयोदश्षभिरन्तराः।॥ = ¦ 
। ततो बीथोदवयेनैव पीठं दरयाद्विचक्षणः ।। तस्य पादा: पञ्चपदा ्राराण्यपि तथव 
। „ `च ।। एकाज्ीतिपदं मध्ये पद्यं स्वस्तिकमुच्यते ।। कोणेषु शर ङ्ला कार्याः पदस्त्रि- ८ 
। भिस्ततः परम्‌ ।। पदेश्चतुभििक्षु स्युभैदराण्येषां समन्ततः ।। एकादशपदा वल्त्यो १ 
।  मध्येऽष्टदलमालिखेत्‌ ।\ पद्यं नवपदं ह्येव लिद्धतोभद्रमुच्यते ।। शर्धत का 
वर्णेन वल्लीरनीलेन पुरयेत्‌ ।! रक्तेन श्रङ्खला रघ्वीवल्लीः पीतेन पूरयत्‌ ।। 

` लिङ्खानि कृष्णवर्णानि शवेतेनाप्यथवापिकाः । पीठं सपादं इवेतेन पीतन 1 ५ 
पुरणम्‌ ।! मध्ये स्थुः श्रुखला रक्ता वल्लीर्नोखिन परुरयेत्‌ ।। भद्राणि पौतवण ते 
` पीता पडकजकणिका ।। दलानि इवेतवर्णानि यद्रा चित्राणि कल्पयत्‌ ।। तिला 


ड व पः 


व ङ ^ ~~ ८ = स 1 त 





























पाच पदकी भ्टखत्छा बनानो चाहिये, पारर्वमें नौ पदोसे वल्ली बनानी चाहिये । चारपदोसि द भीतर 1 | 

| चाहिये, छः पदोसे लघुवल्ली बनानी चाहिये, फिर अठारह पदोसे {छग बनाना चाहिये, उसके कंचपदके 
चापी नाना चरपहुये री ये, ययोसे पीठकी रचना होनी चाहिये । इसके पाद ओर हार १ 
॑ टक्यासं छी पोका ~ कः ग पद्य होता है जिसे स्वस्तिक भी कहते हं दसके बाद व कोनोम्‌ न ५ नक 

















` लिङ्गानां स्कन्धतः कोष्ठा विश्षति रक्तवणकाः ।। परिधिः पीतवषेस्त्‌ पदैः ` 
` षोडशभिः स्मृतः ।। पदेस्तु नवभिः पश्चा्रक्तं पदं सकणिकम्‌ ।। ८ 
`  चर्ुलिगतोभद्र-चरतुङगभद्रमे पूवकी तरह अठारह २ रेखाये होती हँ उनके कोणोमे सफेद रंगका तीन ` 


 पदका चद्रमा बनावे, कारे रंगसे नरिषदकी बनी श्टुखलाको भरना चाहिये, सप्त पदकी वल्ली नीके रगसे 


भरना एवम्‌ चार पदका भद्र लाल रंगसे भरना चाहिये । अारहपदोके भद्रया मे कृष्णमहाखुढर तथा उनके ` 
` पा्वैमे पांच पदकौ वापी बनानी चाहिये । जिम हवेत रंग भरना चाहिये भद्र ओर वापीके बीचका पाद 


पीके रंगका होना चाहिये तथा श्पुललाकफे शिरेके तीन पादभी पीले रंगके होने चाहिये । किगोके स्कन्धमें आये | 





५ । कणिका सहित लाल रंगका कमल बनाना चाहिये । = = † 
1 2 अथ दादशल्गद्धवम्‌ ५ 
तत्रैव--श्रागुदीच्यायता रेखाः षट्ध्िशद्धि प्रकल्पयेत्‌ । पदानि दादशरतं 


कोष्ठ लाल रंगके होने चाहिये, सोलह पदोंकी परिषि पीले रंगकी होनी चाहिये । पीठे नौ दोसे ` 


 पञ्चबिशतिरेव च ।\ खण्डेन्दुर्त्िपदः कोणे श्ंवलाः षट्पदैः स्मताः।। योदक्ष- ` | | 


पदा बल्खी भद्रं तु नवभिः पदैः ।। त्रयोदश्चषदा वापी लिद्धमष्टाद्ञ स्मृतम्‌ ।॥ ` ` 
द्धत्रयस्य पक्तौ तु ोभाकोष्ठाहचतुदंल्ञ ।। तेषामुपरि पक्तौ तु कोष्ठाः सप्त- 









कोष्ठा दचद्ीतिसंस्थय। ।\ परिधिः स च विजेयो मण्डले ह्यन्तरा दयोः ।\ परिध्य- ` 


वसं तत्र इाराणि कारयेत्‌ ॥ सितेन्दुः भ्रंवला ` 


५. व क नीता प्रकौतिता ! भद्रं चेवारुणं ज्ञेयं वापी स्याच्छ्वेतर्वणिका ।! ` 


„ वगतः 4. 1१द।८।क।८ह्‌्‌। = ५२६९) 


अ न क च 
4 व 


व 
सिरि 1 1 ------------------------------- 








एतर्हि) म 





काले रंगकौ मंडक्के चारो ओर परिधि बनानी चाहिये । इनमे ह्ारभी बनाने चाहिये । उवेतरंगका चन्रमा" 


कालेरंगकी भ्णलला, नीलेरंगकौ वल्ली बनानी चाहिये । लाल रंगका भद्र तथा इवेतवर्णकौ वापी बनानी ` 


५. चाहिये ! बगलमे कृष्णवणेके बारह च्गि बनाने चाहिये । पौतव्णैकौ परिधि होनी चाहिये, पचरंग कमल ५ 
बनाना चाहिये । भद्र मंडलोका सेमय विभाग-सारे व्रतोके उद्यायनोमें सर्वतोभद्र सण्डल बनाना चाहिये! 


पर क्िवत्रतोके उद्यापनोमे क्गतोभद्र ल्िलना चाहिये, इस विषयमे यह कारिका प्रमाग है कि, विदरान्‌को ` 
बाहुके बराबर म्बी शुद्ध मिटीकौ वेदी बनानी चाहिये उस बेदीपर सर्वतोभद्र मंडल लिखना चाहिये ओर ` 


| क्षिवच्रतोमे लिगतो भद्र मंडल बनाना चाहिये, उसके बचें ब्रह्मादिक देवता तथा इन्द्रादि देवको स्थापित ` 


करना चाहिये \ 





अभ पण्डटदवता 


। तन्मध्य ब्रह्माणम्‌ ।। ब्रह्मजज्ञानं गोतमो वामदेवो ब्रह्मा त्रिष्टुप्‌ । मध्ये 
 ब्रह्मावाहने विनियोगः ।! ॐ ब्रह्मजज्ञानं प्रथमं पुरस्ताद्विसीमतः सुरुचो वेन ` 
आवः ।। सबुध्न्या उपना अस्य विष्ठाः सतश््वयोनि मसंतश्च विवः | भो ब्ह्यन्‌ = ` 


इहागच्छ इह तिष्ठ पूजां गृहाण मम संमुखः सूप्रसन्नो बरदो भव ।। इत्येवं प्रकारेण ` 


| सवेदेवतानामावाहनं जेयम्‌ ।! तत्‌ उदीचीमारमभ्य वायवीपयंन्तं सोमादयो ` 


स्थापनौया नीय 1: ।\१।। तत्र आप्यायस्व राहूगणो गौतमः 9 


ओंडन्द्रं बो विर्वतस्परि हवामहे जनेभ्यः ।। आस्माकमस्तु केवलः ।\४। आ । अग्नि 


दतं काण्वो मेधातिथिरग्निर्गायनी आगने्यामश्न्यावा० । ओम्‌ अग्नि दतं ` 





४6004; 


वृणीमहे होतारं विश्ववेदसम्‌ ।। अस्य यज्ञस्य सुक्रतुम्‌ ।\५॥। थमाय सोमं वेवस्ततो 








[ सामान्थ- 

` शरोता दूतस्य जग्मुषो नो अस्य ।\१०।। आसद्रासः श्यावाश्च एका दज्ञ स्रा जगती ।॥ 
 सोमेश्ानयो्मध्ये एकादश्चरद्रावा० ।।! ोम्‌ आरुद्रासं इन्द्रावन्त सजोषसो हिर- ` 
 गण्यरथाः सुविताय गन्तन ।। इरं वो अस्मत्प्रति हर्यते मतिस्तृष्णजेन दिव उत्सा ` 

` उङ्न्यवें \\ ११॥ त्यां नु मत्स्यः सांमदो द्राद्लादित्या गायत्री ।। ईानेन््रयो- ` 
र्मध्ये द्रादशादित्यावा० ॥ ओम्‌ त्यां नु क्षत्रियां अव आदित्यान्याचिषामहे \ 
. सुमृलीकां अभिष्टये ।\१२।\ अश्विना्दति राहूगणो गौतसोऽदिविनादुष्णिक्‌ ।! ` 
इन्दरागन्योर्मध्ये अन्यावा० ।! ओम्‌ अद्विनावतिरस्मदा गोमटख्राहिरण्यवत्‌ ।॥ ` 
` अर्वाग्रथं समवसा नियच्छतम्‌ ।।१३।। ओमासो सघुच्छन्दा विश्वेदेवा गायत्री ।॥ ` 
। अग्नि ययोर्मध्ये विहवेदेवावा० । ओम्‌ ञोमासश्चषेणीधृतो विश्वेदेवास आगत! ` 
 दाहवांसो दालुषः सुतस्‌ ।११४।। अभि त्यं देवं गोतमो वामदेवः सम्तयक्षा जष्टी | ` 
यमनिकऋैत्योर्मध्ये सम्तयक्षावः० ।। ओम्‌ अमि त्यं देवं सवितारमोण्योः कवि- ` 
 करतुसर्चामि सत्यसवं रत्नधामभि प्रियं मति कविस्‌ ।। ऊर्ध्वा यस्यामतिर्भा 
` अदिद्युतत्सविमति हिरण्ययाणिरभिमीत सृत्ततुः कृपास्वः ।१५।। आयंगौ सा्- ` 
राज्ञो सर्पा गायजी ।। निऋतिवरूणयोमेध्ये सर्पावा० ।! ओम्‌ पदिनरक्रमी दस- 
दतन्मातरं पुरः ।\ पितरं च प्रयल्त्स्वः ।\१६।। अप्सरसामतछ् ऋष्यश्रुद्धो गन्ध 
बप्सिरसोऽनुष्टुप्‌ ।। वरुणवाय्वोमेध्ये गन्धर्वाप्सरसामान० । ओम्‌ अप्सरसां 
वाणां मृगाणां चरणे चरन्‌ ।। केशी केतस्य विदवान्सखा स्वादुमदिन्तमः ।\ १७।। 
यदक्रद ओचथ्यो दीघतमा स्कन्दस्न्रष्टुप्‌ ।। ब्रह्मसोमयोमध्ये स्कवदावा० ॥। ` 
ओम्‌ यदकन्दः प्रथमं जायमान उद्यन्त्समुद्रादुत वा पुरीषात्‌ ॥! श्येनस्य पक्ष ` 
हरि १. बाहुः उपस्तुत्यं महि जातं ते अवन्‌ ।(१८।\ तत्रैव ऋषभम्‌ ! ऋषभं मां | 






























परिभाषा ] 





__ हन्दीटीकासहित = (३३) . 
ध्ये विष्ण्वावा० । ओम्‌ इदं विष्णुविचक्रमे त्रेधा निदधे पदम 

|  परसुर ।२४:।। उदीरतां शंखः स्वधा चरिष्टप । ब्रह्मर्योमंमध्ये स्वधावा० 

|` ओम्‌ उदीरतामवर उत्परास उन्मध्यमाः पितरः सौम्यासः ।। असं य ईयर 








| ब्रह्मयभयोमध्ये स॒त्यरोगावा ।॥ परं मृत्यो अनु परेहि पा 


। समूलहमस्य ` 


 ऋतन्ास्ते नोऽवन्तु तिरो हवेषु ।॥२५।। परं मल्यो सकुुको ूतयुरोगास्त्रिष्मय । = ` 


, देवयानात्‌ ॥ चनुष्मत श्रुण्वते ते ब्रवीमि मा नः प्रजां रीरिषो मोत वीरान्‌ ।।२ ६। क 


गणाना त्वा शौनको गृत्समदो गणपतिजगती ।। ब्रह्मनिक्ऋत्योमं 
ओम्‌ गणानां त्वा गणर्पाति हवामह कवि कवीनामुपमश्रवस्तसः 


ध्य गणपत्यावा०।। ` 
० ।। ज्येष्ठराजं 


















इ सिन्धु ठीष आपो गायत्री ।, बरह्मवरुणयोमं र म ध्ये अलावा ॥1. ओम्‌ हनो : 
1: | : भिष्टय 1 | योरि भिस्त भेसरवन्तनः ।1२८।।ञमर्तो यस्य रा 
गौतमो मरुतो ° । 
। ` क्षये पाया ञ सुगोयातमोजनः ।\२९।। स्योनापृथिवौ का पी 

पणः पा ४ | ठ दमूले कणिकाधः ` पृथिव्यावा० । । ; = 


क उ तैव अंगादिनद्यावा० ।। ओम्‌ हमं र 
भ गङ्ग यनुन सरस्वती शुतुद्रि स्तोमं सचता परुष्ण्या ।। असिक्न्या मरुद्वधे ८ 


` वितस्तयार्जीकीये श्रुणु ह्या ` 





मरुदावा० ।। ओम्‌ मरुतो यस्य ध हि ~ 









। . 9 "+ 4 ध ॥ 1 न त्रतराजं व्वा : # १६ 1 = वाता = 9 
५८ ‡ † | ‡ ८ व < 45: 0111101. 





. ` मण्डल देवता-सबते पहिले मण्डलके मध्यमे ब्रह्माजीको स्थापित करना चाहिये, “श्रह्म जज्ञानम्‌" . ( 
इस सं्रका गौतम वामदेव ऋषि है । ब्रह्यादेवता है त्रिष्टुप्‌ छन्द है मध्यमे ब्रह्माके आवाहनमें इसका विनियोग ` 


` होता है । जिस वावयके अन्तम विनियोग आवे वहां सीघे हाथमे पानी लेकर विनियोगान्त पद समुदायको 


बोलकर पानी भूमिपर छोड देना चाहिये \ यह सब जगह समदना चाहिये । ब्रह्म जज्ञानं प्रथमम्‌ इस संत्रको ` 


बोलकर ब्रह्माकी स्थापना करनी चाहिये मंत्रका अर्थ-( १) पहिले सवं प्रथम ब्रह्माजी उत्यच्च हुए थे जब 
 इन्होने तपस्यासे भगवानके ददोन करके बेन पद पालिया उस सभयमें क्रान्तदर्शी होगये, पीछे उन्होने नियमित 
रूपसे सुन्दर प्रका क्षीर देवता रचे तथा जो वस्तु हम देख रहे हू एवम्‌ हमारे जो दृष्टि गोचर नहीं हँ उन 

` सब वस्तुओंको ओर उनके कारणोका उघीने विस्तार किया था । ऊपरके भी लोक इसीने रचे हे इसकी 


` बराबरीका कोई नहीं है \\ हे ब्रह्मन्‌ ! यहां आभो यहां बैठो, मेरी पुजाकी ग्रहण करो, मेरे सन्मुख हो, भली ` 





अति प्रसन्न होकर वरदान देनेवाङे हो ।\ श्रीब्रह्माजीकी तरह ओर भी सब देवताओंका आवाहन करना ` ८ 


| चाहिये, इसके पीछे आलो लोकपालोको शास्त्रोक्त क्रमसे उत्तर, ईशान कोण, पूरव, वद्धि कोण, दक्षिमा र 
. सैच्त्थकोण, परिचिम, वायव्य कोण; इन आठों दिश्ाओमं स्थापित कर देना चाहिये “अप्यायस्व इस 


(  मंत्रका राहुगणं गौतम ऋषि है, सोम देवता है, गायत्री छन्द है, उत्तरम सोमको अवाहनमं इस मत्रका ` ४ 





विक्लियोम्‌ ॥॥ ग किया है. (२) म॑त्राथ-हे सोम । हमे बढ़ा आप भौ बो, आयक्ता जो अनेक कामनाओंका देने- 


मधुच्छन्दा १ ऋषि हे, इनदर देवता है, गायत्री छन्द है, परव इनदरके आवाहनमे इनका ठि र वनियोग त हो होता १ द) 
हमारे लिये इन्दर ही सवं जनोसे बडा है, हम इन्द्रको ही बुलते हे, वो हमारे च्वि केवल हों ।। “अगिनदूतं 
मत्रका व मेधातिथि ऋषि है, अग्नि देवता है, गायत्री छन्द है, अग्नि कोणमें जग्निके आवाहन करनेमे 





परिभाषा ५ | | ‡ हिन्दीरीकासहित (२३५) 1 








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ति 01 


` यह आषके विराजनेकी गह्‌ है ! हे भूमिपर विघरनेवाले वसु देवो ! यहां रमण कसे । हे सुंदरो ! इस विस्तृत ` ८. 


अन्तरिक्षम आएप विचरते हौ । आपने हमारे भेजे इतका बुलावा सुन लिया है, आनेकी इच्छसे केगके साथ ` 


 चर्नैवाले आप, सामनेके रास्तेको तय करके आजाओ । “आख्रासः" इस मंत्रका श्वावाद्वं ऋषि है, ग्यारह 


रद्र देवता है, जगती छन्द है, सोम ओर ईशानके बीचमे एकादज्ञ रद्रोके आवाहनमे इसका विनियोग होता = 

है (११) इ््रवाले परस्पर प्रेम रखनेवाकत, सोनेके रथवाले ग्यारहों खर इस मेरे यजमें आनाभो, यह मेरी ` 
` - स्तुति जापको चाहती है, जसे कि, पानी चाहुनेवाखे, गौतमके लिये आपने मेघ भेजे थे उसी तरह हमे भमी. ` 
अभिमत द \\ ^त्यानु क्षत्रियान्‌" इस संत्रका मत्स्य सांमद ऋषि है, दरादश्च आदित्य देवता है, गायनी छन्द ` | 
हैः उनके आवाहनमें इनका विनियोग होता है (१२) सुख देनेवाले पतनसे रक्षा करनेवाले जो आद्त्य ` 
ह उन जादित्योको याचता हूं कि वो मेरी रक्षाकरं तथा यह आकर मेरी प्राथना सुनेभेरी मनोकामनाकोपूरा = 

। कर । “भरविनावति” इल भंत्रके राहुगण गौतम ऋषि ह । अश्विनी देवता हँ, उस्णि्‌ छन्द है, इन्र ओर = 
 अग्निके बीचमें उनके आवाहने इसका विनियोग होता है (१३) है एक मनवा देखने योग्य अष्िनी ` | 
कुमारो ! सोनेके क्चिलमित्यहट करनेवाले रथको सामने ठे आओ । “ओमाल'" इस मंत्रके मधुच्छन्दा ऋषि 1. 














यजमानके सेवन करये हुए सोमको पीनेके लिये यहां आमो ओर जपने स्थानपरविराजमान होजाओ।\ भम्‌ क 
। अभित्यं देवं! का गौतम वामदेव ऋषि है, सप्त यक्ष देवता हे, अष्ट छन्द है, यम ओर नैत्यके नीचमं सात | 


 दशित्व आदि अनेक गुण हँ, जिसकौ कि मति प्रका शील है वो मेरे मनोरथोका पुरा करे ।\ “आयं 
इस सत्रकी सराज्ञी ऋषिका है, सपं देवता हुःगायत्री छन्द है, निति ओर वरुणके बीचमें सं देवताके 


आवाहनमें विनियोग होता है (१६) जो कि अपनी शी त्र गतिते जमीनमे धुसकर वैठ जाते तथा आसमानमें ` 


अव्याहत चङे जाते हँ एसे अनेक तरहके सपं देव मेरे सामने अपने स्थानपर पूजके लिये विराजमान हौ ` 
जाओ ।। “अप्तरसां गन्धर्वाणाम्‌” इस मंनेके ऋष्यभ्पुग ऋषि हः गषव ओर अप्सरा देवता है, अनुष्टुप ` 


छन्द है, वरुण ओर वायुके मध्यमं गन्धव ओर अप्सराओंके 















. र त (9. ह ५ । # । च „ & ५७५ = श त ९.५ । 
ष द व 2 110 ध) ए 





॥ | 1 


ति है, दक्त देवता है, अनुष्टुप छन्द है, ह्या ओर दिवके बीचमें दक्षाद सप्त गणोके आवाहनमं इसका 


` विनियोग होता है (२२) हे दश्च ! आयकौ दुहिता जो अदिति उत्पन्न हुई थी उसको सम्बन्धसे ही अमुत पीने- ` ध 


 . बाले भद्रदेव आदित्य उत्यन्च हए थे अथवा हे दक्ष ! अएपकौ रुड़की अदितिने जो आद्त्य पदा किये उनके 
पीछे अमृत पीनेवाले सब देव पैदा हृए हँ ।। “तामग्निवर्णाम्‌”' इसका सोभरि ऋषि है, (यह गोच्रकार अंगि- ` 


सकी परंपरामे है, आदिसुरने इनके वंशोपवंशको भ बुलाया था, इनका ऋ्ेदें इतिहास है, ये एक विशिष्ट 
 . गौडवंहाके प्रधान हँ) इस मंत्रकी दुर्गा देवता है, चरिष्टुपु छन्द है, ब्रह्मा आर इनदरके बीचमं दुगकि जवाहनमं 


` इसका विनियोग होता है (२३) कर्मं फलोके निमित्त पूजौजाने वाटी अग्निके वणंको तथा तपसे देदीप्यमान = ` 
हई वैरोचनी दुर्गा देवीके शरणको सै प्राप्तं हुभा हूं! अच्छे वेगवाल्म देवि ! तेरे वेगके लिये नमस्कारदहैःजाप 
` हमें च्छीतरह पार छा देँ ।। “इदं विष्णु" इस सन्त्रका काण्व मेधातिथि ऋषि है, विष्णु देवता है, गायत्रौ ` 
~ -खन्द है, ब्रह्मा ओर इन्द्रके बीचमें विष्णु भगवान्‌के आवाहनमें इसका विनियोग होता है (२४) इनश्रीविष्णु 
भगवान्‌ महाराजने वामनावतार केकर बलिके दान लेनेके लिए तीन डंग भरे थे, तीसरा ङग धूरि घूषितं 
बवक्तिके शिरपर रखा था, एसे ये विष्णु भगवान्‌ हँ ! उदीरताम्‌" इस सन्त्रका शंख ऋषि है । स्वधादेवताहै 
 चिष्टुष्‌ छन्द है पितृके आवाहनं इसका विनियोग होता है (२५) इस लोकमं परलोकमं जौर मध्य 
लोकम जो पित्रेशवर स्थित स्वधा तथा सोम संपादक हें बे ॐंचेके लोगोमं चले जायं । जो निःसपत्न सत्यके ` 






तने भौ पित्रेदवर हे, बे सब हमारी हविको ग्रहण कर हमसे अनुकूल रहं । जो उत्यके जाननेवाके है बो 
प्राणोके रक्षक हों ।} “परं मृत्यो इस मःत्रका संकुयुक ऋषि है, मृत्यु ओर रोग देवता है । ब्रह्य ओर यमके 
बीचमं मृत्यु ओर रोग बिठानेमे इसका विनियोग होता है । (२६) है म॒त्यु ओर रोगो ? आपका जो रास्ता 
देवयान पितुयान है, उसपर आएप जायं कान ओर आंखोवाले आपके किए मेँ कह रहा ह! आप 
मेरो प्रजाको मौर बीरोको मारने की इच्छा मतं करना ।। “गगानन्त्वा'' इस सन्त्रे गृत्समद शौनक ऋषि 








जाननेवाले ह, जिन्होने असुको पराप्त कर लिया है, वे होमे भेरी रक्षा करे । अथवा उत्तम मध्यम ओर अघम = ` 









(३७) 


न पचाव तथा व्यापक भूके भी विध्नोसे मुशे वचालो ।। इसके पीछे मेरुका मेके नाम मन््रसे पूजन करना = ` 
चाहिये, (ओमूमेरवे नमः) मेरुके लिये नमस्कार है । मेरका आवाहन करता हुं । इसके पौरे मंडल्ते बाहिर ` 
 सोमादिके पास उनके आयुधोकी स्थापना मसे करना चाहिये । सोमके पासं पाश, श्िवक्े पास लिश, ` 
 इद्रके पास वचर, अग्निके पास शक्ति, यमके पास ण्ड, निकऋेतिके समीय तलवार, वरुणके पास पाड, वायुके 
समीप अंकुश स्थापित करना चाहिये । इसके पीछे इनके बाहिर ऋषियोको स्थापित करना चाहिये जैसेकि. ` 
 दैवताओंको स्थापित किया करते हं ।उत्तरमे गौतम, ईलानमें भरद्वाज, पुर्वमे विर्वामित्र,अग्िकोणमें कश्यय, 
दक्षिणम जमदग्नि, नेऋत्यमे वसिष्ठ पर्चिममें अति ओर वायव्यकोणमे अरुन्धतीको स्थापित करना चाहिये! ` 
` इसके बाहिर इसी कमसे एरी, कौमारी, ब्राह्मी, वाराही, चामुण्डा, वैष्णवी, माहेश्वरो ओर वैनायकी इन ` 
 आों महा शक्तियोकौ देवताओंकी तरह आवाहन प्रतिष्ठा करके चाहं तो एक एकका, चाहं सबका एकसाथ = ` 

` पजन करना चाहिये ।॥। 2 


परिभाषा | 





अथ लक्षपएननोचापनविधिरुच्यते ` | 
अद्य पूर्वोच्चरितेवंगुणविशेषविश्िष्टायां पुण्यतिथौ मयां कृतस्याऽमुक- 
` देवताप्रीत्यथमम्‌कलकापुजनकमणः साद्धतासिद्धचथम्‌ तदुद्यापनं करिष्ये ।॥ ` 





तदंगत्वेन पञ्चवाक्येः पुण्याहवाचनमाचार्यादिवरणं च करिष्ये ॥ तत्रादौ ` 
 निविघ्नतासिद्धच्ेम्‌ गणपतिपुजनं करिष्ये ।। ततो गणपति संयुज्य पुण्याहं ` 


वाचयेत्‌ । तदित्थम्‌--अस्य लक्षपुजननोद्यापनकर्मणः पुण्याहं भवन्तो ब्रुवन्त्व- 
त्यक्तो ब्रवन्त्‌ ।। कमं कऋध्यताम्‌ ।। श्रीरस्त्विति भवन्तो ब्रवन्त्‌ ।। अस्त श्रीः, 






कल्याणं भवतो बरुवन्तो वृवन्तु ।\ अस्तु कल्याणम्‌ ।\ कर्माद्धदेवता प्रीयताम्‌ ! ` 
` ततो गोत्रनामोच्चारणपुवेकममुकगोत्रोऽमुकशर्माहं यजमानोऽमुकगोच्रममुक- ` 


 सर्माणं स्व 
। वृणे ।। आचायत्वेन 





` श्लक्रादीनां बृहस्पतिः ।। तथा त्वं मम यज्ेस्मिन्नाचार्यो भव सुत्रत ।। इति संप्ाथ्यं 





स्वशाखाध्यायिनं ब्राह्मणमस्मिल्लक्षपुजनोद्यापनाख्ये कर्मण्याचार्य त्वां 


चा्यत्वेन वृतोस्मि ! यथाज्ञानं कमं करिष्यामि ।। आचार्यस्तु यथास्वगं 







गन्धादिना आचायपूजनं कुर्यात्‌ ॥। तथेव ब्रह्माणं वृणुयात्‌ ।। यथा चतु 


प्राणानायस्य यजमानेन वृतो ऽहुमस्‌ सुकं कमं करि पे ।॥ कर्माधिकाराथेमात्मनः | 








(८) ~ वतसज ~ “= कण 
| अथ लक्ष पुजा ओर उद्यपनविधि-स्नानादिसे निवृत्त होकर हाथमे पानी लेकर संकल्प बोलना चाहिये 

1 कि, आजं एसी २ पुण्य किथिमं इस सहीनाके इस पक्षम इस संवत्सरं इस देवताके प्रसन्न करनेके व्यि इस 4 
` चक्ष कर्मकी सांगता सिद्धिके लिये यानौ यह्‌ लक्ष कमं अंगोंसहित परा हो जाय इसके लिये उसका उद्यापन = ` 
करता हुं एवम्‌ तदंग होनेसे पुण्याहवाचन ओर आचाय्यैवरण भी करता हं, । उसमे सबसे पटिठे गणयतिपुजन ` 
` करता हुं (इस इसकी जगह करती बार जो तिथि हौ कहना चाहिये तथा इस देवताका मवल्ब है कि, जो ` 
। वता हौ उसका नाम लेना चाहिये इसी तरह ओर भौ समश्नना) इसे पोछे गणपतिका पूजन करके पुण्याह ` 
५ १ वाचनं कराना चाहिये, चो पुण्याहवाचन इद प्रकार है-यजमान ब्राह्मणोसे प्रायना करता कि, अप इस | # (व 
 . लक्ष पुजनके उद्यापनका पुण्याह कहौ । यजमानके ठेसा कहनेषर ब्राह्यणोको कहना चाहिये कि पुण्याहे ! _ ` 
यजमान-जाप कं कि, ऋद्धि हो । पीछे ब्राह्यण-कम्मं ऋद्धिक प्राप्त हो । यजमान-धी हो एेसा जपक्हे, = ` 
ब्राह्मण-श्रौ हो । यजमान-कल्याण हौ एेसा आप कहे, ब्राह्मण-हो कल्याण । संस्कृतम जो वाक्य ज्सि ` 
बोलने कट हँ वे उसे संस्कृतम ही बोलने चाहिये) । कमके अंगभ्‌त देवता प्रसन्न हो जाओ ।। ८.1 
1 आचाय्यं वरण~-यजमान आचायं वरण करती वार कहता है कि, इस गोका इस नामका मे, इस गोत्र ` 
` ओर इस नामके इस शाखके इस ब्राह्मणको, इस लक्ष पुजनणके उद्यापनमें आचायेके कूपमे वरण करताहं । = ` 
वरण होनेके पीछे आचाय कहता है कि, मं आचायेके रूपसे वरण किया गया हु, जसा मुषे ज्ञान है उसके 
अनुसार क्म कराऊंगा ! पीछे यजमान आचार्यकी प्राथना करताहै कि, जसे स्वगेमे इन्द्रादिकोका आचाय ` 
बृहस्पति है, उसी तरह सुव्रत आप इस कमंमं मेरे आचायं होजावो । पीछे यजमान अपने अचायका पुजन किया ` 

करते । इसके बाद अन्य ब्राह्मणोका वरण करना चाहिये । हे द्विजोत्तम ! जसे स्व्गमें चतुर्मुख पितामह ब्रह्मा ` 
होते हँ उसी तरह आप मेरे इस कमेमे मह्या बन जावो । इसके बाद यजमानको ऋत्विजेसि प्राना करनी ` 
चाहिये कि, मेने इस यागकौ सिद्धिके लिये भआपका वरण किया है, आप भली भाति प्रसन्न होकर इस कर्म॑को मेको 
विधिपूवेकं करे । पीर आचमन भ्राणायाम करणके आचा्यको कहना चाहिये कि सन्ने यजमानने अच्छी 
तरह वर किय है । मं कमं करूगा तथा कमके जधिकारके लिये जत्मशुद्धचथं पुरषसुक्तका जपभी करूंगा ` 
पृथ्वी" देस मंत्रका मेरुपुष्ठऋषि है, सुतल छन्द है, कमं देवताहै, आसनपर बेखनेमे इसका विनियोग होताहै 
पृथ्वित्वया धृता समोका देवि त्वंविष्णुना धृता । त्वं च धारय मां देवि पवित्रं कुर चासनम्‌" हे पृथिविदेवि! 
आपने लोको घारण कर रखा है । हे देवि ! आपको विष्णुभगवान्‌ने धारण किया है, जप मृन्ने घारण करे ` 
द आसनो पवि इकत्तीसर्वीं ( ५ ` अध्यायके प्रारभसे लेकर सोलह मंत्रोको पुरुषसुक्त* 
सरसों लेकर “जोम्‌ यदत्र संस्थितं भूतं स्थानमाधित्य स्वेदा! ` 
स्वतो दिशम्‌ । सर्वोषामविरोषेन ` 





स त 1 वा, (मं 






































; प्रितिषो 





हन्दीटीकासहित = (३९) ` 





`  , बनादे ! अथवा आपके उस रसस हम तप्त हो जायं जिसके निवासके लिये आप प्रसद्ध है, आप उस रका 
स्वामी हमं बनादं । इन मंत्रोसे कुशाजोसे पंचगन्यसे प्रोक्षण करना चाहिये ! प्रोक्षण छीर देनेको कह्षेहे ! = ` 
इसके पीछे हाथ जोड़कर “ ओम्‌ स्वस्त्ययनं ताक्षय॑मरिष्टनेमिम्‌, महदव व्यचसं देवतानाम्‌ । अभुरघ्नमिद्दध॒ 
सलं समत्सु, बुहद्‌ यश्चो नावमिवारुहेम ” तारनेमें समथं जो नाव है, उसकी तरह जिसके प्रवाहको कोई रोक 
नहीं सकता एसे गरुड भगवानूके स्वस्त्ययनपर आरूढ होता है, संग्राममे हमारे वीरको न नष्ट होने देनेवाले ` 
 देवताभके सबसे बड़े, अग्रणी प्रेमी यज्ञस्वी इन्दरका आश्रय लेता हूं ।\ “ ओम्‌ जंहो मुञ्चमांगिरसोसंगयंच ` ` 
स्वस्त्या तरेयं मनसा च त्यम्‌, प्रयतपाणिः ईरणं प्रयये स्वस्ति सम्बाधे अभयं अभयं नो अस्तु ।" हि पयते | 
 इटानेवाले ! मुञ्चे पापोसे छडा दे, में वाणीसे अग्निकी स्वस्ति ओर मनसे ताक्येकी स्वस्ति प्रप्वहो गयाहूं।! 
 . मं हाथ जोडकर आपकी शरण प्रप्त हुआ हु विवादे कार्यमे हमारा कल्याण हो तथा किसी प्रकारकाभय 
नप्रतीत हौ । इन दोनोको बोलना चाहिये । देवता आज्ये ओर राक्षस लोग यहासे चठे जायें । हे विष्णु भग- ` 
घन्‌ ! देव यजन भूमिक रक्षा करो, एेसा.करकहकर कलशा पजन करना चाहिये 11 लिगतोभद्र बनायाहोय ` | 
तो छिगतोभेव्रमे तथा सर्वातोभद्र बनाया होय तो सवेतोभदरमे बरह्मोदिक देवोंका आवाहन करके उनका पूजन ` 
करना चाहिये ! ` | 4 





ततो मूर्तावग्युत्तारणम्‌ ।। अस्यां मूती अवधातादिदोषपरिहाराथंमन्युत्तारणं ` 
देवतासाननिध्यार्थं प्राणप्रतिष्टां च करिष्ये ।। अग्निः सप्तिमिति सुक्तमग्निपदर- ` 

हितं सहितं च परन्प्रतिमायां जलं पातयेत्‌ ।। सक्तं यथाञअन्निः सप्ति वाजं भरं 
ददात्यग्निर्वोरं भरत्यं कमेनिष्ठाम्‌ ।\ अग्नी रोदसी विचरत्समञ्जस्लग्निर्नारं 
 वीरकुक्ष पुरम्धिम्‌ ।\१।। अग्ने रजसः समिदस्तु भद्राऽग्निमहौ रोदसी आवि- 
वेश! अग्निरेकं चोदयत्समत्स्वग्निवृ्राणि दयते पुरूणि ।॥२।। अग्निं त्यं जरतः ` 
 कणेमावाग्िरभ्यो निरद हज्जरूथम्‌ । अग्निरत्र धमं उरुष्यदन्तरग्निन्‌मेधं ` 
प्रजया सुजत्सम्‌ ।\३।। अग्निर्दा द्रविणं वीरपेशा अग्निक्रषियः सहस्रासनोति ।। | 
अग्निदिविं हव्यमाततानानेर्धामानि बिभुता पुरुत्रा ।।४।। अग्निमुवथैऋषयं 
ह्वयन्तेर्भग्न तनं नर नरोया ४ मनि बाधितासः । अग्नि वयो अन्तरिक्षे पतन्तोऽग्नि 






























अग्निर्गान्धर्वी पथ्यामृतस्यागनेगेव्यूतिधत आनिसत्ता ।\६।। अग्नये ५ 
श्षुरग्नि महामवोचामा सुवुक्तिम्‌ ।\ अग्ने प्रावजरितारं य यवि- 












©. ) त क | सामान्य 
11111 ध ध प त 


 श्रोत्रजिह्ला्ाणपाणिपादपायूषस्थानीहागत्य सुखं चिरं तिष्ठन्तु स्वाहा . 
असुनीते पु० या नः स्वस्ति ।। गर्भाधानादि पञ्चदङ्मसंस्कारसिद्धयथं पञ्चदहा ` 
 प्रणवार्बात्त करिष्ये ।। प्रणवं पञ्चदशवार जपित्वा । रक्ताम्भोधिस्थपीतो- ` 
` ल्यसदरुणसरोजाधिरूढा करान्जैः पाशं कोडण्डमिक्षू-द्‌वमथ गुणमप्यंकुक्ञं पञ्च 
बाणान्‌ ।। विभराणासुक्कपालं त्रिनयनलसिता पीनवक्षोरुहाढ्या देवी बालकं- 
ब्गभिवतु सुखकरी प्राणश्ञक्तिः परा नः ।॥ ततो मण्डलोपरि ब्रीह्यादिधन्यय- ` 
बतिरेस्तिक्‌टं कृत्वा तच महीद्यौरित्यादिना अत्रणं कलं संस्थाप्य कलशोपरि ` 
पूर्णपात्रं संस्थाप्य तस्योपरि व्यंबकमंत्रेणोमया सह व्यम्बकं वा, विष्णुमंत्रेण ` 
लक्ष्या सह विष्णु, सिदधिबुद्धिसहितं गणेन्ञं वा पलन्या सहितं सूर्यं वा भवानीं तत्त- ` 
५ | न्मत्रेणावाह्य शिवस्य दक्षिणे ठक््स्या सह्‌ विष्णमावाहयेत्‌ ।\ शिवस्योत्तरे सा- 1 
 साविश्या सह ब्रह्माणम्‌ ।। एवं विष्ण्वादीनामपि । अथ षोडदोपचारपुजा । ततः 

 सहलशीर्ेत्यावाहनम्‌।पुरुष एवेदमित्यासनम्‌।।एतावानस्येति पादम्‌ त्रिपाूध्व॑मि ` 
त्यथ्यंम्‌।।तस्माद्विराडित्याचमनीयम्‌।।यत्पुरुषेणेति स्नानम्‌ ।। तं यज्ञमिति वस्त्रम्‌।। ` 
तस्मादयज्ञादित्युपवीतम्‌ ।! तस्माद्न्नात्सवंहुत ऋच इति गन्धम्‌ ।। तस्माददवेति 
पुष्पम्‌ ।। यत्पुरुषं व्यदधुरिति धूपम्‌ ।। ब्राह्मणोऽस्येति दीपम्‌ ।। चन्द्रमा मनस | 
इति नैवेद्यम्‌ ।! नाभ्या आसीदिति प्रदक्षिणाः ।। सप्तास्यंति नमस्कारान्‌ ।। यज्ञेन 
यज्ञमिति मंत्रपुष्पाञ्जलिम्‌ ।। इति षोडश्ोपचारः पञ्चामृतङ्च वेदिकमन्त्रेः 
` पुराणोक्तमंतरश्च स्थापितदेवताः संपुज्य रात्रौ जागरणं कुर्यात्‌ ।, प्रातनित्यकृत्यं ` 









































~ परिषा हिन्दीटीकासहितं ~ (४) 4 





` एक हजार गरं दक्षिणाम दी थीं, अग्नि ही यजमानकी दी हुई हविको देवताओंमे षहुचाता है; यही अपने 
अनेक रूप करके अनेक जगह विराजमान है, (५) अग्निको ही कृषि लोग स्तुतियोसे अनेक भति बुलाते 
. हं, मनुष्योको जब युद्धम कष्ट होता है तो अग्निक ही शरण जाते ह, जआकाञ्लमे उडनेवाले पक्षी अग्तिकोही 
देखते ह अगिनिही गञओकी रक्षके च्यि जाताहै।! (६) मनुषी प्रजा अग्निक ही प्रायेना करतीहैः 
 नहुषके वंशज भौ अग्निकी ही उपासना करते ह, अग्नि ही यज्ञकौ गन्धर्वी ( बागीहूपी ) पथ्याहै,जनिही 
` घीका भरा हुआ रास्ता है ! (७) ऋभुओने अग्निके लिये ही वैदिक स्तुतिथोका अन्वेषण किया था हम | 
क्गीघ्रही मनोरथोको पुराकर देनेवाखे अग्निकी स्तुति बोल रहे है, अग्नि स्तुति करनेवालेका रक्षण करताहुमा = 
बड़ा भारी धन देता है ।। प्राणप्रतिष्ठा-इसके पीछे देवताओं प्राण प्रतिष्ठा करनी चाहिये इस प्राणप्रतिष्ठा | 
 भंत्रके ह्या विष्णु ओर महेश ऋषि हे, ऋग्‌, यज्‌ साम ओर अथवंछन्द है, क्रियामय शरीरवाला प्राम नामक 
 देवताहै, आं नीजहै, हीं शक्ति है, कौ कौलक है, इस मतिम प्राणप्रतिष्ठा करनेमें इसक्रा विनियोगहोताहै! | 
पीछे उल्टा हाथ मूतिपर रखकर~ ओम्‌ आं हीं करौ अंयंरलंवंक्ंषंसंलक्षं अःकोंरीआंहंसःसोहम्‌ | 
इन बीजोका उच्छारण करते हुए यह भावना करते रहना चाहिये कि इस मूतिमें प्राण जग ग्येवे यहांहैं! | 
। फिर दुबारा इन बीजोको बोलकर यह भावना करनी चाहिये कि, दस मू्तिमें यहां स्थितहै फिर तिषारादहृन्ही  ॥ 
` .  बीजोको बोलकर भावना करनी चाहिये कि इस मूतिमें ज्ञानेन्द्रिय ओर कर्मेन्द्रिय सुख पुवेक रहँ । ` ओभ्‌ | 
असुनीते ' यहांसे केकर, यानः स्वस्ति ' तक एक ऋग्‌ ८-१-२३ का मंत्र हे । यह्‌ पुरा-भष्‌ अषुनीते पुन- | 
 रस्मासुचक्षुः पुनः प्राणमिह नो धेहि भोगम्‌ । ज्योक्‌ पदयेम सूर्यमुच्चरन्तम्‌, अनुमते न मृडया नःस्यस्ति। ` 
 यहांतक है । हे असुनीते ! यहां हमारे इन देवोमें फिर ज्ञानेन्द्रिय ओर कर्मेन्द्रिय प्राण ओर भोगको स्थापित =. 
कर, हम रोज ऊपर चते हए सूथ्यंको चिर काल तक देखें, इन मूतिरयोमें ये सब सदा बना रहे हे अनुमते ! हमे _ 
हमें सुखीकर हमारा कल्याण हो { गोबिन्दा्जन चंद्रिकामे तथा सवेदेवप्रतिष्ठा प्रकाश आदि ग्रन्थोमे प्राण- 
` प्रतिष्ठाके विषयमे इस मंत्रको नही रखा है तथा भीमान्‌ चौबे बनवारीलालजीने तो इसी मंत्रकी प्रतीकको 
` प्रणवावृत्तिके संकल्पम ही साभिल कर बिया है न उक्तविषयमें पं° चतुर्थालालजीनेही उक्त मेत्रका उल्लेव ` 
किया है ) पूर्वोक्त ऋचाका पाठ करके गर्भाधान आदि पन्द्रह संस्कारोकौ सिद्धिके लिये पन््हवारप्रणवका 
जपक्रता हं हस प्रकार संकल्प करके पन्द्रह वार प्रणवका जपकरना चाहिये । पीठे प्रणवशक्तिका ध्यान करना 
चाहिये कि, लालरंगके समुद्रम सुन्दर जहाजपर लालकमलके आसनपर विराजमान हुई है, तथा हाथो 
पाश, ईखका धनुष प्रत्यंचा अंकुश ओर पांच बा्णोको धारण किये हए है तथा रोहूते भरा हृभा कपाल मी 
होमे चये हुए है, तीन नेतर ह, बड़ बड़े वक्षस्थल हे तया बालसुयेके समान अरुण रंगकौ परप्राणशक्तिदेवी | 
हमे सुखकारी होवे । पीछे बनाये हए स्वेतोभद्र या लिगतोभद्र दोनेकि ही उपर त्रीहि जादिके तया धान्य यह्‌ ` 
मौर तिलसे तीनकूटवाला पवेत बनाकर उसपर “ ओम्‌ मही यौः पृथिवी च न इमं यज्ञस्मिमिक्षताम्‌ पिपु- 
तान्नो भरीमसि ” महती भू हमारे यज्ञको पु्णं करे तथा जो आवश्यकीय वस्तु हँ उने हमारे घरकोभरदे।! | 
इस म॑त्रसे विना एूटे घडेको रख, उसके ऊपर पुणेपात्र रखकर पौ “भोम्‌ त्यम्बकं यजामहे सुगंधिगृष्टिवध- ` 
नम्‌ । उर्वारुकमिव बन्धनानमुत्ये म मृक्षीय मामृतात्‌ ” हमारे यश्को बदानेवारे तथा हमारी पुष्क बढाने- ` 
बाले उयम्बकका यजन करता हूः चो ककडीके बन्धकी नण गै तरह मुञने मौतसे मुक्त करे पर, अभरत्वसे कभी मुक्त 








































(र) 2 वतरा... 1 पमल्व - ( 





बह परब्रह्म परमात्मा श्री विष्णु भगवान्‌ अनेकों शिर आदि अंग तथा अनेकों ही ज्ञानेद्िय ओर कम- 
` न्दियवाला है वो इस सुष्टिमे सब ओरसे ओत प्रोत होकर नाभिसे द्वादश अंगुख जो हृदय है उसमें विराजमान 
` होता है । इस भंचरसे भगवान्‌ का आवाहन करना चाहिये | 9 9 
५ ॐ पुरुष एवदप$सर्वं यद्‌भूतं यच्च भाव्यम्‌ 
उतामुतत्वस्येश्ानो यदघ्नेनाति रोहति व 
जौ कुठ अनुभवे आ रहा है तथा जो हो चुका ओर होगा वह सव पुरुष ही है वो सोक्षका अधिपतिहै ` 
तथा जौवोको कर्मफल देनैक चये कारणावस्थासे का्यावस्था स्थूल जगत्‌के रूपमे आताहै । इस मंत्रसे 
` आसन देना चाहिये । 4 
` ॐ एतावानस्य महिमातोज्या्थाहच पुरुष 
पादोऽस्य विहवा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ।। क 
 . इसकी इतनी तो महिमादै, इससे पुरुष वड़ा है, सबजीवं इसके अंश सात्र हं मौर अंशी चो नित्यधाम ` 
 . वैकुष्ठमें विराजमान है । इस मंत्रसे पा्यका प्रतिपादन करना चाहिये । 1 
( उत्रिपादृरध्वेऽउदेत्पुरुषः पादौऽस्येहाऽभवत्पुनः। 
ततो विष्वडः व्यक्रामत्साशनानशनेऽभि ।॥ र 
वो त्रिपाद पुरुष ऊध्वं उदित है, उसका अंश जीवर लिगदेहसे बारंबार आवागमन करता है । वो अंश 1 
मनुष्यादि अनेक रूपमे होकर संसार में भ्रमता फिरता है तथा जङ्‌ चेतनादि व्यवहारभाक्‌ एवम्‌ ` 
बद्ध सक्त होता रहता है \ इस मंत्रसे अध्यं देना चाहिये \ | 1. 
ॐ ततो विराडजायत विराजो अधि पुरुष 
स जातो अत्यरिच्यत पहचाद्ध्‌ भिमथो पुर ~ 
। इसके पीछे इससे विराट्‌ उत्यशच हृभा एवं उस विराद्मे विराट्का अभिमानी पुरुष हुमा वो देव मनुष्या ` 
दिभावसे भिल्ञ-भिन्न अनेक प्रकारका हो गया इसके पीछे क्रमदाः पुर ओर नगर रचे गये ।इस मंत्रसे आचमन- = ` 







































सस्मिता]. हिन्दीदीकासदित = (४३) | 





तस्माद्यज्ञत्सवहृतः सम्भूत पृषदाज्यम्‌ । | 
पञ्‌ स्ताह्चक्र वायव्या सारण्या ग्रास्यास्चय।। ५ 
| उसी परमात्मासे पृषत ओर आज्य दोनों प्रकट हए तथा उसीने वायव्य एवम्‌ ग्रामीण जौर वन्य ञ्चुः 
ओको उपजाया । इस मंत्रसे उपवीतका सम्पणकरना चहिये! 1 
ॐ तस्मादश्वा अजायन्त ये कं चोभयादतं 
गावो ह जज्ञिरे तस्मात्तस्माज्जाता अजावयः ।। 1 
उसीने अर्व तथा अव सरीख प्राणी एवम्‌ जिनके ऊपर नीचे दोनों ओर दात है उनको उत्प क्या, | 
` उसीने गऊ ओर मेड बकरी आदि बनायें । इसमे पृष्प समपित करने चाहिये । ‹ व 
ॐ यत्पुरुषं व्यदधुः कतिधान्यकत्पयन्‌ 
मुखं किमस्यासीत्‌ किम्बाहूकिमुरूपादा उच्यते 1 
। जब विराट्‌ उत्पन्न हुआ था उस समय उसमे अनेक प्रकारकी कल्पना कौ गथीं वोही प्रष्नोत्तरकेस्पर्मे 
भगवती ऋचा कहती है कि, उसका मुख बाहु उरू ओर पाद कौन कहे जते हँ ? इस मंत्रे धूप देनी चाहिये ` 
। ॐ ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद्‌ बाहु राजन्यःकृत | 
ऊहतदस्थ यद्वेश्यःपद्भ्या ११ शूद्रोऽजायत।। ध 
मृखसे ब्राह्मण, बाहूसे क्षत्रिय, उरूसे वैश्य ओर पदोसे श्र उत्पन्च हुए \ इस मंत्रसे दीष देना चाहिषे ` 
ॐ चन्द्रमा मनसोजातश्चक्षोः सूर््योऽअजायत = 
८ श्रोत्राद्‌ वायुश्च प्राणश्च मुखादग्निरजायत \। 
| मनसे चन्रमा, नेत्रोसे सूरय, भो्रसे वायु ओर प्राण तथा मुखसे अग्नि उत्यञ्च हभ । इस सत्ते नैवे 
 निकेदन करना चाहिये) 4 
॥ उत्नाभ्याआसीदन्तरिक्ष शीर्ष्णो यौः समवतंत । 
पद्भ्यां भूमिदिशः श्रोत्रात्तथा लोका अकल्पयन्‌ । 
 नाभीसे अन्तरिक्ष, शिरसे दिव, चरणोसे भूमि, शरोत्रसे दिशा उत्पन्न हुई । इसी प्रकार अन्य 
५ भी कल्पना कौ गयी \ इसं मंत्रसे प्रदक्षिणा करनी चाहिये । | 
८ असमप्तास्यासन्‌ परिधयस्त्रिःसप्त समिधः कृताः ! 
 „ देवा यद्यज्ञं तन्वाना अबध्नन्‌ पुरुषं पशुम्‌ ।॥ 
५ करना चाहिये \ 






















५ (४)  व्रतराज ` १ । ति ` [ सामान्य- 





अश्षश्निमखम्‌ 


आचम्य प्राणानायम्य तिथ्यादिसंकौत्यं एवंगुणविश्ञेषणविषशिष्टायां पुष्य- ` 
 तिथावमुककर्माद्धतया विहितामुकहवनमहं करिष्ये इति संकल्प्य गोमयादि- | 
लिप्ते शद्धे देशे शुद्धमृदा ईश्ानीमारभ्य उदक्संस्थं चतुरड्गुलोद्नतं वा चतुद्क्षु 
मिलित्वा द्विसप्तत्यंगुलपरिधिकं फलितमष्टादशांगुरविस्त॒तं होमानुसारेण तद- ` 
 धिकंवानतु ततो न्यंनं मध्योन्नतं स्थण्डिलं कुर्यात्‌ 1 तद्गोमयेन प्रदक्षिणम्‌प- 
 लिप्य दक्षिणेऽष्टावुदीच्यां हे प्रतीच्यां चत्वारि प्राच्यामर्धमित्यंगुलानि त्यक्त्वा 
 दक्षिणोपक्रमामुदक्संस्थां परादेहामात्रामेकां रेवां ( लिखित्वा ) तस्या दक्लिणो- ` 


 त्तरयोः प्रागायते पवरेलयाऽखंसृष्टे प्रादेशसंमिते दे लिखित्वा तयोर्मध्ये 


 परस्परमसंसृष्टा उदकसंस्थाःप्रागायताः प्रादेशसंमितास्मिल इति षड्‌ चेवा 
 यज्ञियश्चकलमूलेन दक्षिणहस्तेनोल्लिल्य रेखापु तच्छकलमुदगग्रं निधाय स्थण्डिल- 
मब्दिरभ्यक्ष्य शकलसाग्ेय्यां निरस्य पर्णण प्रक्षाल्य वाग्यतो भवेत ।। तेजसपात्र- ` 









युग्मेन संपुटीकृत्य सुवासिन्या श्रोतियागारात्स्वगृहाद्रा समृद्धं निर्धूममाहूतमेग्नि ` 
 स्थण्डिलादाग्नेथ्यां दिशति निधाय । जुष्टोदमूना सत्रष्ट्प्‌ 1 
ग्न्यावा० ।\ ॐ जुष्टोदमूना अतिथिदुरोण इमं नो यज्ञमुपयाहि विद्धान्‌ ।! विर्वा 

मग्ने अभियुजो विहव्या शत्रूयतामाभरा भोजनानि ।\९।1 एह्यग्न इत्यस्य मंत्रस्य 
राहूगणो गौतम ऋषिः ।\ अग्निर्देवता ।! त्रिष्टुप्छन्दः \! अरन्यावा० !! ॐ एह्यग्न ` 
इह होता निषौदादब्धः सुपूर एता भवा नः ।! अवतां त्वा रोदसी विदवमिन्वे ` 
यजामहे सौमनसाय देवान्‌ ।\२।१ इत्यक्षतेरावाह्य आच्छादनं दूरीकृत्य समस्त- ५ 














"वारण 1. -्सदाक्ासाह्त {४५}... 





 संकीत्यै श्रीपरमेश्वरभ्रीत्यरथं क्रियमाणेऽमुकव्रतोद्यापनहोमे देवतापरिग्रहाथंमन्वा- ` 
धानं करिष्ये । अस्मिच्न्वाहितऽग्नौ जातवेदसमग्निमिध्येन प्रजार्पाति, श्रजार्पात 
चाधारदेवते आच्येनात्र प्रधानदेवताः अमुकहोम्यद्रव्येण परत्येकमसुकसंख्याका- 
`  भिराहृतिभिन्रह्याद्यावाहितदेवताह्च नाममंत्रेण प्रत्येक मेकंकयाऽऽज्याहूत्या यक्षये। | 
` ज्ेषेण स्विष्टकृतमग्निमिध्मसच्रहनेन रद्रमयासर्माग्नदेवान्विष्णुर्माग्नि वायुं सूय्यं | 
 प्रजार्पाति चताः प्रायश्चित्तदेवता आज्यद्रवेण ज्ञाताज्ञातदोषनिदेहणाथं चन्रिवार- | 
माग्नि मरतश्चाज्येन विहवान्देवान्त्संसावेणाद्धदेवताः प्रधानदेवताः सर्वाः स्ि- 
हिताः सन्तु ! एवं साङ्खोपाङ्धेन कर्मणा सद्यो यक्ष्ये ।। व्याहूतीनां परमेष्ठी प्रना- 
` पतिः प्रजापतिबृहती । अन्वाधानसमिद्धोमे विनियोगः !\ ॐ भूर्भुवः स्वः स्वाहा | 
प्रजापतय इदं० ।! तत इध्माबहिषोः सन्नहनं कृत्वार्शग्न परिसमुह्य परस्तृणी- | 
थात्‌ ।! तच्चेत्थम्‌ अग्न्यायतनादष्टाडगुलमिते देशे एेशानीं दिकमारभ्य प्रद- | 


^ 


ं समन्तात्सोदकेन पाणिना त्रिः परिमृज्य षोडदादभेः परिस्तृणीयात्‌ 1 | 












।  व्यपाणिभ्यां कमेण चरस्थालीप्ोक्षण्यो 1, नी व्रौवौ 
इति द्रश्च उदगपवर्भ प्राक्संस्थं च न्युब्जानि 5 ५ | त पा 


५ ( ॥ ) । ए ४ (9 “ त्॑तराजं श ह भिः , ५ 
1 | नतराज ० | सामान्य-- 
, च ध प र ॥ 





 सुव्त्वातिसृजेत्‌ ।\ ततः कर्ता तत्प्रणीतापात्रं दक्षिणोत्तराभ्यां पाणिभ्यां नासिका- ` 
समीपं तीत्वोत्तरतोग्नेनिधायान्येदंभेराच्छादयेत्‌ । ते पवित्रे आज्यपात्रे निधय ` 
तत्पात्रं पुरतःसंस्थाप्य तस्मिच्चाज्यमासिच्य परिस्तरणाद्रहिरत्तरतोद्धारानपोह्य ` 
` तदुपर्याज्यपान्रं निधाय ज्वलता वर्भोल्मुकेनावज्वल्य दर्भग्रहयं निल्लिप्य पुनस्ते- ` 
 नैवोल्मुकेन प्रधानद्रन्यसहितमाज्यं त्रिःपयंग्निङृत्वातदृल्मुकं निरस्यापः स्पृष्टा- 
 द्खारानम्नौ क्षिपेत्‌ \। अंगुष्ठोपकनिष्ठिकाभ्यां पवित्रे गृहीत्वा।सवितुष्ट्वेति मन्त्रस्य ` 
 हिरण्यस्यस्तूष ऋषिः । शविता देवता । पुर उष्णिक्‌ छन्दः । आज्यस्योत्पवने- ` 
 विनि० 11 ॐ सवितुष्टा प्रसव उत्पन्नास्यच्छिद्रेण पवित्रेण वसोः सूर्यस्य रद्मिभिः!। ` 
इति सत्रेण प्रायुत्पुनाति सङ्दुद्विस्तृष्णीम्‌ । ते पवित्रे अद्धि: प्रोक्ष्याग्नौ प्रहरेत्‌ । ` 
स्कन्दाय स्वाहा स्कन्दायेदं नममेति \\ तत आत्मनोऽग्रतो भूमि प्रोक्ष्य । तत्र बहिः- ` 
 सन्नहनीं रज्जुमुदगग्रं प्रसाथं तस्यां बहिरास्तीयं तदुपरि आज्यपाच्रं निधाय कुशान्‌ ` 
वामहस्तेन सुक्सुवौ च दक्षिणेहस्तेन गहीत्वाऽग्नौ प्रताप्य दर्वीं निधाय सुवं ` 
वामहस्ते गृहीत्वा दक्षिणहस्तेन लुबबिलं दभगिस्त्िः संमृज्य तथेव सुवपृष्ठं 
दभप्रिरात्माभिमुखं त्रिः संमूज्य कुशमृलेदेण्डस्याधस्ताद्विलपुष्ठादारभ्य यावदुप- ` 





















स्त १ ध  सुबेणाज्यं गृहीत्वा होमद्रव्यसभिधायें उदगुदास्य अगन्याज्ययं गोमेधयेन 
नी्वाऽन्यदृक्िणतो बहिषि सान्तरमासाद्य ततो, विस्वानि न_इति तिसृणां 


परिभाषा | 












` दिशसारभ्य ईलानदिक्पयेन्तं जुहयात्‌ उभयत्र प्रजापतय इदं न ममेति त्यजेत्‌ ।॥ ` 

तत उत्तरे । अग्नये स्वाहा ।। अग्नय इदं ०।। दक्षिणे सोमाय स्वाहा ¦ सोमायेदं 
न ममेत्येतावाज्यभागौ हृत्वा प्रधानहोमं कुर्यात्‌ \\ ततो बह्मादिदेवतानां मत्रेणे- ` 
केकया आहुत्या जृहुयात्‌ । ब्रह्मणे स्वाहा ।। सोमाय स्वाह ।! ईशानाय स्वाहा ॥ ` 
इन्द्राय स्वाहा ।) अग्नये स्वाहा । यमाय स्वाहा ।\ निच्छतये स्वाहा । वरूणाय 
,  स्वाहा।।वायवेस्वाहा \\ अष्टवसुभ्यः स्वाहा।। एकादश्षर्द्रेभ्यः स्वाहा ॥ दादन्ञा- 
` दित्येभ्यः स्वाहा।जध्विभ्यां स्वाहा ।\ विष्वेभ्यो देवेभ्यः स्वाहा ।\ सप्तयक्षेभ्यः ` 
` स्वहा 1) भूतनागेभ्यः स्वाहा । गंधवप्यिरोभ्यः स्वाहा \, स्कंदाय स्वाहा \। नन्दी- 
| इवराय स्वाहा ॥! शूलाय स्वाहा ॥ महाकालायस्वाहा ।। दक्षादिसप्तगणेभ्य | 
स्वाहा \ दुगयिस्वाहा । विष्णवे स्वाहा ।। स्वधायेस्वाहः ।। मूत्युरोगेभ्यः स्वाहा! | 
।  गणपतेय स्वाहा ।! अभ्स्वाहा । मरभ्दयः स्वाहा ।! पृथिव्ये स्वाहा । गंगादिन- | 

` दीभ्यः स्वाहा ।। सप्तसागरेभ्यः स्वाहा ।। मेरवे स्वाहा ।। दाभ्यै स्वाहा ॥ च्रिषू- | 
` काय स्वाहां ।॥ वच्राय स्वाहा ।। शक्तये स्वाहा ।। दण्डाय स्वाहा ।॥ खङ्काय- | 
` स्वाहा 1। पाशायस्वाहाः।।अड्कुशाय स्वा ०।गौतमायस्वा० ।। भरद्वाजाय स्वा०। 
विहवामित्राय स्वाहा ।! कद्यपायस्वाहा ।} जश्दग्नये स्वहा ।। वसिष्ठाय स्वाहा। 

अत्रये स्वाहा ।\ अरुन्धत्ये स्वाहा ।\ एे्ये स्वाहां ।। कौमाय स्वाहा ।। ब्राम्द्ये 
` स्वाहा \\ वाराह्यै स्वाहा \। चासुंायं स्वाहा \। वैष्णव्यै स्वा० माहेय स्वा० ` 
`  वेनायक्यं स्वाहा ।! अथ स्विष्टकृद्ध स्य हिरण्यगभं 
ऋषिः ।। अग्निः स्विष्टकृदेवता ।। 1 ६ न्दः ह दः ॥॥ (व स्वष्टकृद्धोम 

द 




























( ४८ ) ५ स व्रृतराजं | | [ सामान्य- 
१४. प द क प प 0 0 ५ 






देवेभ्य इदं न ०।। ॐ इदं विष्णुविचक्रमे त्रेधा निदधे पदम्‌ ।! समूढहमस्यपांसुरे 
स्वाहा । विष्णव इदं ० ।। व्यस्तसभस्तव्याहतीनां विहवामिच्रजमदग्निभरद्राज- 
प्रजापतय ऋषयः ।! अग्निवायुसूर््रजापतंयो देवताः । गायच्युष्णिगनुष्ठुव्बहत्य- 
 इछन्दांसि ।। प्रायिचत्ताज्यहोमे वि ० ।! ॐ भूःस्वाहा अग्नयइदं ० ।! ॐ भुवः 
 वायवइदं ।। ॐ स्वः स्वा९ सुययिदं ० ।। ॐ भुर्भुवः स्वःस्वाहा प्रनापतयदहं ।। ` 


¦ ५ ततो रह्मा कर्तारं परीत्याग्नेवयिव्यदेशं तिष्ठस्चेता एव सप्ताहुतिनुंहयात्‌ | त्यागं १ ५ 
| म नोऽत्र कुर्यात्‌ अनाज्ञातमिति सन्रद्रयस्य हिरण्यगभ ऋषिः ।। अग्नि- < ध | 
देवता त्रिष्टुप्छन्दः ।! ज्ञाताज्ञातदोषपरिहाराथं प्रायषचिताज्यहोमे वि० ।। ॐ 

 अनान्ञातं यदाज्ञातं यज्ञस्य कियते मिथु।।जरने तदस्य कल्पय त्व ‡ हि वेत्थ यथा- 


तथ स्वाहा ।। अग्नयइ० ।। ॐ पुरुषसंमितो यज्ञो यज्ञ पुरुषसंमितः ।\! अग्ने ` 


पदस्य कल्पय त्वंहि वेत्य यथावथ' स्वाहा ।। अग्नयइ० ।। यात्पाकत्रेत्यस्य ` 


मंत्रस्य आप्त्यास्त्ित ऋषिः ।। अग्निर्देवता ।। तरिष्टुष्छंदः ।। ज्ञाताज्ञातदोष- ` 








` माजेयन्ताम्‌ ।\ उदीच्यां दिष््याप ओषधयो मार्जयन्ताम्‌ ।! ऊर्ध्वायां दिरि 
यज्ञः संबत्वरः प्रजपतिम्जियतामिति -- तत॒ एकश्चुत्या पठन्‌ कुश्रेः ` 


स्वशिरसि मार्जयेत्‌ ।। तत्र मन्त्राः-आपो असमानित्यस्य देवा आपस्त्रस्टय्‌ । 0 
`  ॥ माजेने वि° 1} ॐ आपो अस्मान्मातरः बुन्धयन्तु घृतेन नो घृतप्वः पुनन्तु | | 


विष्वं हिरि प्रवहन्ति देवी रदिदाभ्यः शुचिरापूत एमि । इद मापः सिन्धुदरप 
आपोऽनुष्टुष्‌ ।\ माजन ।। वि० ।\! ॐ इदमापः प्रवहत यत्किच दुरितं मयि ।\ | 
| यद्रा शेषं उतानृतम्‌ \। सुमिन्या न जाप जोधयः सन्तु 1! योस्मन्दरेष्टियंच वयं | 


द्विष्मस्तं हन्मीति निऋतिदेज्े कुशाग्रेरपः सिञ्चेत्‌ ।। ततो ब्रह्मा कतुवामपा्वेस्ति 
 तपल््यञ्जलिस्थजलो पू्णेपात्रस्थं जलम्‌-ॐ माहं प्रजां परासिचं यानः स्या | 
बरीस्थनः।। समुद्रे बो नियानि स्वं पाथो अपीथं ।। इति मंत्रमेकशुत्यां पल्या | 
` वाचयन्‌ स्वथं वा पठन्‌ प्रत्यडमुखं निषिच्याञ्जलिस्थजलेः पापापनोदनार्थमात्मानं | 
यजमानं पत्नीं च प्रोक्षेत्‌ ।। पत्नौ तज्जलं ्बाहिषि निषिञ्चेत्‌ ।। अथवा यजमान | 
एव बहिष्यु्तानं स्ववामपाणि निधाय दक्षिणपाणिना पुणपात्रमादाय माहप्रनामिति | 


तज्जलं तस्मिनप्रत्यङ्मृलं निषिच्य ता आपः समद्र गच्छन्तीति ध्यात्वा पाणिस्थ ` 









जलेरात्मानं पत्नीं च प्रोक्षेत्‌ ।। ततः कर्ता वायव्यदेशे तिष्ठन्नग्निमुपतिष्ठेत्‌ \। ` 
था-अग्ने त्वं न इति चतसृणां गोपायना रोपायना वा बन्धुः सुबन्धः श्रुत 


` बन्धुविप्रबन्धुच्चेकंकर्चा ।। ऋषयः ।! अग्निदेवता ।। द्विपदा विराट्‌छन्द ।। 
` अग्न्युपस्थाने वि० ।। ॐ अग्ने त्वं नो अंतम उत ताता शिवो भवावर्थ्यः ।॥ 


बसुरण्नर्वसुभवाअच्छानक्षिद्युमत्तमं रयि दाः । स नो बोधि शरुधी हवमुरुष्याणो 


अघायतः । समस्मात्‌ ।। तं त्वा शोचिष्ठ दीदिवः 


आरोग्यं दहि मे हव्यवाहः क हन ।। मा नस्तोक इति मंत्रस्य कुत्स ऋषिः ।। दद्र ८५ 
जगतीछन्द दः ।। ।\ विभूतिग्रहणे वि° ।\ £ मानस्तोके तनये मा न आयौ गोषु 














1 4 व 0. 





देव तद्विष्णोः सम्पूरणं स्यादिति शरुतिः ।! इति विष्णुं नत्वा स्मृत्वाचानेन कर्मणा ` 


 श्रीपरमेहवरः प्रीयतामित्युक्त्वा- गच्छ गच्छ सुरश्रेष्ठ स्वस्थानं परमंश्वर ।\ 


` यत्र ब्रह्मादयो देवास्तत्र गच्छ हृताशन ।। इर्त्यग्नि विसृजेत्‌ ! एवं होमं संपाद्य 


 उत्तरपूजां कृत्वा आचार्यं संसज्य गां दद्यात्‌-यज्ञसाधनमूता या विदवस्याधौघना- ` 
शनी ।\ विद्वरूपधरो देवः प्रीयतामनया गवा ।। इति ।। ततो ब्राह्मणभोजनं 

। संकल्प्य ।) यान्तु देवगणाः सवे पूजामादाय पाथिवीम्‌ । इष्टकामप्रसिदचयथं 
पुनरागमनाय च ।\ इति स्थापितदेवतां विसृज्य पीठमाचार्याय दद्याद्‌ 1 इत्यनि- ` 
मुखम्‌ ।। ध | 


अथ अग्निमलम्‌-आचमन्‌, प्राणायाम करके संकल्प करना चाहिये कि, आन एसे एसे पवित्र दिनिमे ` 


इस कामके.अंग रूपमे कहे गये अमुक हवनको करता हुं । पीछे गोबरसे लोपे हुए शुद्ध स्थलमं शुद्ध मिहरीसे एक ` 
स्थण्डिल बनना चाहिये, ईशान फोणसे लेकर उत्तरकी तरफ बनाना प्रारंभ करना चाहिये, यह स्थण्डिल चार ` 
अंगुल ऊंचा होना चाहिये चारों दामे मिलकर बहत्तर अंगुली परिषि होनी चाहिये, अठारह अंगल्का ` 
विस्तार होना चाये । यदि होम अधिक करना हो तो बड़ा हो सकता है पर कम करनाहो तो छोटा नहींहौ ` 
र सकता किन्तु स्थण्डिल मध्यमे ऊंचा अवश्य होना चाहिये ! उस स्थण्डिलको गोबरसे प्रदक्षिणां क्रमसेलीप 
देना चाहिये । पीछे दक्षिणमें आठ अंगुल तथा उत्तरकी तरफ दो अगुल, पश्चिमम चार अगुख ओर पूरवमं 


आधा अंगुल छोडकर, यज्ञिय शकलके भूलसे दाये हाथसे स्थण्डिल्पर यज्ञिय शकलदारा दक्षिण दिशसे 
कर उत्तरकी तरफ प्रादेकामात्र एक लकीर खींचकर, उस लकीर के दक्षिणोत्तरमं वैसी ही मध्यरेवसि ` 
छिपौ हई हो रेखाएं ओर खीचनी चाहिये । इस तरह तीन उत्तरकौ रेखाएं तथा तीन पूरवकी रेखाएं कुख 
मिलाकर छः रेखाएं होनी चाहिये । उस शकलको उत्तरकी ओर अग्रभाग करके रख देना, पौरे पानीसे प्रोक्षण 
(1 रके उस शकलको अग्निकोणमें तटककर हाथ धो, सौनी हो जाना चाहिये । एर किसी सौभाग्यवती युवा- 
`  . सिनी स्त्रीके हायसे, किसी भी धातुके बने हुए कटोरमे, कटोरेसे ठकी हुई दधकती हुई इतनी अग्नि म गवालेनी 
चाहिये जो कि कुछ देरतक बुते नहीं तथा वेदी कमम सौम्य हो । यह अग्नि या तो किसी वेद पाठीके घरकी होनी 
चाहिये 1 अथवा जपने ही घरकी होनी चाहिये \ जेसी आये, वैसी ही स्थण्डिलसे अग्निकोणमं रखदे । इसके 













५१ र्भान। 4 ~ 0. ।६्ष्दा८।41ध।हत्‌ (^ + ॥ । 


कः . 9 
स 








छन्द है, अग्तिकी मूतिके ध्यानम इसका विनियोग होता है । इस अग्नि देवके चार श्णंग, तीन पाद, दो क्षिर 


ओर सात हाथ हु" तौन तरहसे अथवातीनजगहूरबेधा हआ है, बड़ा भारी देव है, सब कायो का पुरा करनेवाला 1 


दहै, नो यहां मनुष्यो के बीच आविराजा है ।। भगवान्‌ अन्ति देवके सात हाय चार श्युंग, सात जिह्वा दोक्लिर ओर ` 
 तौन पाद ह, सदाही प्रसन्न मुख हःसुखसे बेठे सुन्दर स्मित कर रहै हँ, शई ओर स्वाहा ओर बाई ओर स्वधा 
बेटी हुई हं" दायं हाथ मं शक्ति, अन्न, सरक्‌, ओर सुवा तथा बायें हाथमे तोमर व्यजन ओर धीका पात्रहि, ` 
एसे भव्य अग्नि देव मेरे सामने विराज रहे है । हे मनुष्यो ! सब प्रदिशाओंमें यही अग्नि देव है, सबसे पिके 
` यही हुजा है, यही गभेके बीच मे ह, यही विश्ञेषरूपसेहो रहा है ओर यही होगा, है मनुष्यो ? यद्यपि स्वतो मख 
है पर तो भौ आपके सामने विराजमान हो रहा है । हे शष्डिल्य मोत्री मेषकी ध्वजा वाके एवम्‌ पूरवकी ओर ` 


भूख करके बेठे हुए आप मेरे समान मुद्ध वर देनेवाले हूजिये । अन्वाधान-आचमन प्राणायाम करके, देश्च- ध 
कालका कौत्तेन करकेःकरनेवारेको कहना चाहिये कि परमेव रकी प्रसन्नताके लिये किये इस ब्रतके उद्यापनके 


 होममे, देवताके परिग्रहके लिये, अन्वाधान क्म करता हूँ । इस अन्वाहित अग्निमे जातवेदा अग्निको तथा 


भ्रजापतिको इध्मसे, प्रजापति आधार देवता तथा अग्नि ओर सोम इन दोनोको एवम्‌ नेको आल्यसे इस . ` । 





कमके प्रधान देवताओं को इस हव्य द्रभ्यसे इतनी आहूतियोसे 


तथा ब्रह्मादिक आहृत देवताओं को नाममन््से । 


ह. एक-एक आज्यकी आहतिसे यजन करेगा, बाकी बचे शाकल्यसे स्विष्टकृत्‌ अग्निको तथा समिधके बन्धनसे ` 
खको, एवम्‌ अयासअग्निदेव विष्ण अग्नि वायु सूयं ओर प्रजापति ये जो प्रायश्चिच्के देवता हे इन सबको 
आज्यसे तथा जाने ओर बे जाने हुए दोषोके निवारण के ल्यि अग्नि ओर मर्तको तीनवार आज्यते, विद्वे- = 
, देवताओं को संस्नावसे एवम्‌ जो अंडदेवता वा प्रधान देवता उपस्थित हों मे सबका सांगोपांग कमं विधिसहित = 
। यजन करूंगा ! ग््राहूतियोके परमेष्ठी प्रजापति ऋषि ह ¦ प्रजापति देवता है बृहती छन्द है अन्वाघानकी समि- ` 







चाहिये \ इसके बाद अग्निको चेताकर उसका चारो ओरसे परिस्तरण करना चाहिये । परिस्तरण चारे ओर 


` धाओंके होममे इनका विनियोग होता है ! फिर मूरभुवः स्वः स्वाहा प्रजापतय इदं न मम यह्‌ कहकर अन्नम ` | 
समिध हवनं कर देनी चाहिये । इसके पीछे समिध ओर कुशाओंको सञ्चहनकर अग्निके परिसम्‌हन करना 


( कुशके विछ्ानेको कहते हे । उसका कम यह्‌ है कि, वेदीके चारो ओरं ईशान कोणसे केकर प्रदक्षिणके क्रमसे वीत. ` 





उत्तरम प्रागग्र दभं होनी चाहिये । पुवं ओर पडचातूके होना 
चाहिए । तथा उनके अगाडीके नीचे उत्तर परिस्तरण होना चाहिये । इसके पी अग्निसे दक्षिण ब्रह्याके जास- 
नके चये तथा अग्निसे उत्तर पात्रोके आसनके लिए एक एक प्रागग्र दर्भोको बिखछाना चाहिये, पीछे अग्नि 


1 सेकर ईंशानकोण तक दीनवार पानी छिडक कर उत्तर दिका को ओर बि हुई कुशाजोंपर दोनों 

















५ स्यम रखकर, उसे पानीसे भर, उसमे सुगंधित एूल ओर अक्षतोको 





~, मर 4 द ~ : व 





हआ बैठ जाता है । जिस समय यजमान उनका गंध अक्षत आदिसे पूजन करता है उस समय ब्रह्मा कहता हैष 
कि “ इन्द्रके घरपर बहुस्यतिजी ब्रह्मा बनते हैँ वो ही बृहस्पति इस यज्ञकी रक्षा यज्ञपतिकौ रक्षा करे" मेरी 
रक्षा करे, इस प्रकार जपता हुआ यज्ञम मन लगाकर बैठ जाय । यजमान ब्रह्मासे पुता है कि ब्रह्मन्‌ जलका 
प्रणयन करूंगा \ यहं सुनकर ब्रह्मा, “ ओम्‌ भू: भुवः स्वः बृहस्पति प्रसुता तानो मुञ्चन्तु अंहसः 1" बृहस्पति- ` 
` जीसे आन्ञा पाये हृए बे पानी तुमे पापस छुडादे यह मंत्र धीरे तथा पानीकाप्रणयन करो यह उंच स्वरसे कहकर 
पीछे मौन छोड दे, इसके पीछे कर्ता दोनों हाथोसे प्रणीता पाको नाकके समीप लाकर अग्निके उत्तरमें रब- ` 
कर दूसरी कुश्षाओसे ठक दे, उन दोनों पवित्रोको आज्य पात्र पर रखकर उस पात्रको सामने स्थापित करे 
फिर उसमें घी करके उसे परिस्तरणके बाहिर उत्तरकौ जोर अंगारोपर रखकर जलते हए कुशोगो आज्य ` 
पात्रके चारो ओर धमाकर आगे पटक दे, पीछे दो उल्कोसे प्रधान द्रव्य सहित तीन वार पर्य्याग्नि कर उत्क्को 
फक आचमन करके अंगारोको अग्निम छोड दे ! अंगुष्ठ ओर उपकनिष्ठिकोसे दो पवित्र लेकर, “ जम्‌ सचि- 
तुष्टा" इस मंत्रका हिरण्यस्तूप ऋषि है, सूर्यं देवता है, पुरउष्णिक्‌ छन्द है, आज्यके उत्पवनमे इसका विनियोग  . ` 
होता है । सविताकौ आज्ञामे चलता हुआ में निर्दोष पवित्रे ओर सबके वसानेवाखे सूयं देवको किरणोसितेरा ६ 
 उत्पवन करता हूं । इस मंत्रको एकवार बोल कर तथा दोवार चुषचाप घीका उत्यवन करना चाहिये \ उन 
दोनों पवित्रोका पाणीसे प्रोक्षण करके अग्निम डाल देना चाहिये ! उस समय यह्‌ स्कन्दके लिये स्वाहा है । यह 
मेरा नहीं है \ इस अर्थके ऊपर लिखे हुए मंत्रको मुखसे कहना वेध है । इसके पीछे जपने सामनेकौ भूमिका प्रोक्षण 
करके वहां ही उत्तरकी तरफ अग्रभाग करके वहां बह्कि बधनेकौ रज्जुको बिचछाकर उसपर आज्य पत्र 
` . रखकर वये हाथमे कुशा ओर दायें हाथमे लुक्‌ ले अग्निे तथा दर्वीको रखकर पछ बयं हाथमे सुवाल 
ओर दाये हाथमे कुञ्च लेकर उस सवके बिलको तीनवार शुद्ध करे । इसी तरह अपने सामने तीन वार सुवकौ ` 
पीठको शुद्ध करे, पीछे कुरशोकी जडोसे चछुवोके बिलकी पौठसे लेकर ऊपरके बिलतक तीनवार ुद्ध करके फिर ` 
नीसे उनका प्रोक्षणं करके पौछ उन्हुं अग्निसे तपाकर घृतके उत्तरम रख देना चाहिये, फिर इसी तरह सुचको ` 
करके पीछे उसका प्रोक्षण करके वासे उत्तरको ओर रख दे । दर्भोका पानो प्रक्षालन करके उन्हे भी 
आगमं पटक दे । सुवसे घौ ठेकर होमकी चीनोमे मिला देः पौछ उसे उत्तरकौ ओर उद्वासन करके घी ओौर 
गके बीचमें केजाकर घीसे दक्षिणकी ओर कुशासनके कुहामोपर रख दे 1“ जोम्‌ विद्वान न ”' इत्यादि ` 
ऋचाओंका ष वसुश्रुत ऋषि है, अग्नि देवता है, त्रिष्टुप्‌ छन्द है ! दोका पूजनम तथा एकका उपस्थानम 


एसेपार खगा देते हैनैसे 

























परमाव हद कासि ५3 




























उत्तरम भी इसी तरह हवन करना चाहिये ।“ अग्नये स्वाहा ” इदमग्नये न मम, यह्‌ सेने अग्निके लियि दिया 
अब इसमे मेरा कछ नहीं है । दल्लिणमें “ ओम्‌ सोमाय स्वाहा, इदं सोमाय नमम" ये सोमके व्य है इस पर 
मेरा कोई सत्व नहीं है, इन दोनों आहुतियोके पीछे प्रधान होम करना चाहिये । इसके पौषे विना संत्रके ही 
ब्रह्मादिक देवताओंको एक एक आहति दे “ ओम्‌ ब्रह्मणे स्वाहा” यहांसे लेकर “ ओम्‌ वैनायक्यै स्वाहा " 
यहां तक आहुतियाँ हैँ एक एक पर एक एक आहूति देनी चाहिये । अथ स्विष्टकृद्धोम--"“भमयदस्य कर्मण | 
इस मंत्रका हिरण्यगभं ऋषि है, स्विष्टकृत्‌ अग्नि देव है, अतिधृति्न्द है, स्विष्टकृत्‌ हममे इसका चिनियोग 
होता है! इस कर्मका मुस कुछ बाकी रह गया हौ या उसमे मुञ्चते कुछ न्यूनता आ गयी हौ तो उसे संभालने- 
` बाख ज्ञाता स्विष्टकृतं अग्निदेव, सबको अच्छा कर दे । यह्‌ विधिके साथ किये गये हवनको प्रहुण करनेवाले 
सभी प्रायदिचत्तकी आहूतियोके कामोका समर्थन करनेवाले एवम्‌ अच्छी इष्टी करनेवाले अग्नि देवके ल्यि 
` है! ह अग्ने! हमारी सब कामनाओंको पूरा करिये, यह अच्छी इष्टी करनेवाले अग्निकिल्यिंहै ।मेरेल्यि 
नहीं है । इससे तीन बार सन्धान करके पीछे पश्ुपति खरके चये स्वाहा है यह्‌ पञुपति करके च्यिहैमेरानहीं 
है। इससे एक आहूति देकर पीछे हाथ पेर धो डाले । पीछे सुवेसे सात प्रायर्चित्तको आहुति्या दे । इन सातो 
आहूतियोके भिन्न भिघ्च मंत्र हं । उन्हुं यही मूलम लिखा है । उनके जथ यहां च्खते हँ । “ मम अयाष्च 
इस संत्रका विमद ऋरि वनियोग ` 
होता है । हे अयास्‌ अग्ने, आप हमारी बुराईको दुर करना, कयोरि यो 





कि आप वास्तवमे अयासं हो तथा आप वयस- 
सभी अयास हौ परिपूर्णं हविको देवोमं पहुचाते हो : ।है अयास्‌ । हमारे ल्म मेषजको धारण करो । ' ओमे 
अतो देवा तथा ओम्‌ इदं विष्णुधिचकमे “ इन दोनों मंत्रोके काण्व मेधातिथि ऋषि ह" पहिलेके देव तथा दरस- ` 
रेके विष्णु देव देवता हे, गायत्री छल्द है, प्रायदिचत्तके आज्य हममे इनका विनियोग होता है । हे देवताओं ! 

आप हमारी उससे रक्षा कर जिससे विष्णु भगवान्‌ पुथिवीके सातो धामों पर चठे थे । यह देवोकीहै ।' मेरी 

नहीं है, श्री विष्ण भगवान्‌ अपने लोकसे चके ओर आहवनीय आदि तीनों कुण्डो अंहासे आ विराजे, बाकी ` 

नित्य घाममें रहे 1 थह विष्णु भगवान्‌की है मेरी नही है \ भूः, भुवः, स्वः इन तीनों व्याहृतियोमेसे एक 
 एकके करमज्ञः विदवाभित्र, जमदग्नि ओर भरद्राज ऋषि है, अग्नि वायु ओर सयं देवता ह, गायत्री उष्णुग्‌ ` 
ओर अनष्टुष्‌ छन्द हैँ तथा तीनोके एक साथ रहने पर प्रजापति ऋषि, प्रजापति देवता ओर बृहती छन्दहैः ` 
। |  प्रायदिचत्तके आज्य हममे इनका विनियोग होता है । ओम्‌ भूः स्वाहा अग्नये इदं न मम-~यह अग्निकिल्यि 
| है मेरी नहीं है \ ओम्‌ भुवः स्वाहा वायवे इदं न मम-यह्‌ वायुके लिये है यह मेरौ नही है । स्वः स्वाहा, _ ` 
सूर्य्याय इदं न मम-यह्‌ सूय्येके लिय है मेरी नहीं है । जम्‌ मुभूवैः स्वः स्वाहा प्रजापतये इदं न मम-यह प्रजा- = ` 
 . पिके लिये है मेरी नहीं है । इसके पीठे, बरह्मा कर्ताकौ प्रदक्षिणाकर अग्निसे वायव्य देशमें बैठकर इन सातो 
` आहृति्योको हवन करे जौर यहां आहृति-त्याग यजमानही करे 1“ ओम्‌ अनात्नातम्‌ " इन दोनों मंतरोके हिरण्य- ` 
गर्भं ऋषि है अग्निदेवता है, त्रिष्टुप्‌ छन्द है, जाने ओर बे जाने दोषके निवारणके लिये प्रायदिचत्तके आज्य 
 ' हममे इनका विनियोग होता है । हे अग्ने ! इस यज्ञम जो जानके विनाजाने दोष हज हौ आप सबको यथा- ` 
बत्‌ जानते है, इस कारण आप उसका निवारण करदे । यहं अग्निक लिये है, मेरी नहीं है, पुरुषसे ज्ञ तथा = ` 
यलञसे पुरुष होता है ! हे अग्ने ` यज्ञकी मेरी त्रुटियोको आप जानते हौ आप यज्ञको निर्दोष करदे । यह्‌ अग्निके 
नहीं है ।। ^. न्‌ थ यत्पाकत्रा “ इस मंच्रके आष्त्य य त ऋषि है, अग्नि देवता है, त्रिष्टुप्‌ छन्द है, ` 
































( ५ | ५ | : ` नतस्जं- | 1 | | ९1१ न्ल्‌-~ 





००००७७०५ 


बाद पूर्णाहुति दे । पूर्णाहुति कैसे दी जाती है सो लिखते है-लुवासे बारह वार था चारवार धौ लेकर लुक्ूको' 
भर लेना चाहिये फिर लक्के ऊपर सीधा सुवा रखकर फिर उसे ओंधा रख दे, पौ सुक्के अग्र भागसं 

पुष्य अक्षत ओर ताम्बर रखकर सव्य हाथसेलुक्‌ ओर सवके मूलको रखकर हाये हाथसे शंखमुद्रा पू्वेक 

` सव लकको शे उसीपर दष्टि जमाकर देठ जाय ¦ “ ओम्‌ धामं ते “ इस मंत्रका वाम्देव ऋषि है, अप देवता ` 


जगती छन्द है, पूर्णाहुतिके होममे विनियोग होता है । हे जल देव ! तेरा तेज अखिल विवमं फला हृभाहै, ५ 


समुरफे हृदये भीतर आपका आयु है मीठी जो तेरी रमि पानौके समुदायमें है, मे उसीका भोग करता हूं । ` 


इस संत्रको कहता हज जौके बराबर धारा तब तक अग्निम पडती रहे जबतक किं थोड़ासा बाको न रह जाय, = ` 
जल देवके व्ि बह है मेरा नहीं है, यह कहकर आहुति दे-दे-“ ओम्‌ विष्वेभ्यो देवेभ्यः स्वाहा! ” इस मंत्रसे ` 
 संलावका हवन कर वे, यह विश्वे देवाओके लिये हैँ । पीछे कुशाजपर पणं पात्रको रखकर, उसे दयि हासे 

छते हए कहना चाहिये कि, तू पूणं है मेरा भी पुरा हो, तू सुपणं है मेरा भौ सुपण हो, तु सदृहै, मेराभीसद्‌ 


होः तुसबहै, मेरा भी सब हो, तु अक्षिति है, मुक्ते भौ अक्षय करदे, इस प्रकार जपकर पाच दिक्षाओमें उनके ` 
 . मंसे कुश्च जर छिडकना चाहिये । वे मंत्र ये ह-प्राची दिक्ञामे सुयोग्य ऋत्विजो माजन करं । दक्षिण दिशामं 
भास ओर पितर माजेन करे । परटिचम दिकामें ब्रह ओर पत्र मार्जन करे । उत्तर विदाम आप ओषधि ओर ` 


वनस्पति माजेन करं । ऊध्वं विक्षामे यज्ञ, संवत्सर ओर प्रजापति मार्जन करें । दिश्षाओके माजेनके बाद एक ` 
. स्वरसे नीचे लिखे “ आपो अस्मान्‌ मातरः ” इत्यादि भंत्रोद्वारा कुशजलसे अपना साजेन करना चाहिये! ` 
“मम्‌ मापो अस्मान्‌ ” इस मंत्रका दवश्चवा ऋषि है, आप देवता हँ जिष्टुप्‌ छन्द न, माजंनमं विनियोग होता = ` 








“1 संसारकी माकीसी पालन करनेवाङे आप हमे भोक्षणसे शद्ध करे । जरसे पवित्र करनेवाली जलसे पवित्र 





मापः “ इस मंका सिन्धुदीप ऋषि है, आप देवतः है, अनुष्टप्‌ चन्द है, माजेनमे इसका विनियोग होता हं । ` 
खो ! जो मी कुछ मेरेभे इरित हें उन्हे बहा लेजाभो, जो मेने कि सीसे स्ूढा वैर किया हैःतथा किसीको 
गाली दी है मथवा जो मृक्षसे करते हो, इस पापसे म्न चुंडादे, हमे भाय ओर ओषधियां अच्छे मित्रवाली 
दुखदायौ उसे हो जो हमसे वेर कररता है या जिससे मे वेर करता हुं । वे उसे मारता हूं । यह्‌ सत्र कह कर ` 
नेशऋत्यकोणमें कुशाञोंसपानी छिड़क दे ! इसके पीछे ब्रह्माजी यजमानके बाये पादवंमे बेटी हुई यजमानपत्नीकी ` 
अंजलिमे पुणंपात्रके पानीकौ ^ ओम्‌ माहं प्रजाम्‌ “ इत्यादि मं्रको पूरव की ओर मुख करके कहता हुआ या 
` कहुलाता हज भर दे ! मं्ाथे-मे अपनी उस प्रजाको परे न फक्‌ जो कि, मूष्े प्राप्त हो रही है, हम तुम्हें समु- 
मं सलेजायगे वहां भाप अपना पीना । इसके पौ ब्रह्माको चाहिये कि, उस जलसे पाप निवारणके ल्यि जपि _ | 
पजमानपत्नीका प्रोक्षण मानपत्नी उस पानीको कुक्ञाओं पर छोड दे! अथवा यजमान- ` 
कुशाओपर रखकर सीषे हाथमे पुणे पात्र लेकर “ जोम्‌ माहं प्रजां 





































1 करे, देवी आप, मेरे सब अनिष्टोको दूर कर रही हे, मे पानीसे पवित्र होकर ही स्वगं जागा ।\ “ ओम्‌ इद- ` | 


११.१४६ +}! 4 १ „५२ | ` १८९ चन ११२११९५. 





हमारे क्रोधी बीरोकोही मारियेगा, क्योकि हम आपको सदा ही अपने धरपर बुलाते रहते है, “ ओम्‌ श्र्यायुषं 
जमदग्ने :” इस यंत्नसे ललाटमे “ ओम्‌ कर्यपस्य त्यायुषम्‌ ” इस मंन्रसे कंठमं “ ओम्‌ अगस्त्यस्य व्यायुषम्‌ ” 
इस संत्रसे नाभिमं “ ओम्‌ यदहेवानां च्यायुषम्‌ ” इस मत्रसे दये कन्धेपर “ ओम तन्मे अस्तु व्यायुषम्‌ ” इस्त 





 भंत्रसे वाये कन्धेपर एवम्‌ “ ओम्‌ सर्वमस्तु शतायुषम्‌” इस मंत्से श्िरपर विभूति लगाना चाहिये । अ्थ- | 


 . ओर पानका निवेदन करके भगवान्‌की प्राथना करनी चाहिये कि, जिसके स्मरणसेही यज्ञ दान तप आदिकी 





.. जमदग्नि, कश्यप, अगस्त्य ओर देवोके तीनो आयुष्य हे बे सब मेरे भयुष्य हों सब शतायु हों । विभूति धारणके ` | 
बाद उत्तरम परिस्तणोको छोड़कर तीनवार परिसम्‌हन ओर प्रोक्षण करके पीर एूोसे अल्कृत करि, नैवे 


स्यूनता शीघ्र पुरी हो जाते है, मे उस अच्युतके लिये नमस्कार करता हूं । यज्ञमे कमं करके हुए हमसे प्रमादके ध | 
वज्ञ होकर कोई गरती हौ तो वो विष्णु भगवान्‌के स्मरण से पुरौ हो जाय ) पीछे विष्णु भगवान्‌को नमस्कार | 





। करके कहना चाहिय कि इस करमसे विपु भगवान्‌ प्रसन्न हो जाओ । हे परमेदधर ! ह सुरमरेष्ठ ! आष अपने | 


धामको पघारिये । हे हृताशन ! जहां बरह्मादिकं देवता गये हौ, वहां हौ आप भौ पधार जाइये । इसप्रकार | 
अग्निका विजन करना चाहिये \ इस प्रकार होमका संपादन करके उत्तर पुजा कर तथा आचाय्यको पूजन करके | 
उन गाय देनी चाहिये, “ यज्ञसाधनभूताया :" यह गो दानका सत्र ह कि, जो यत्तको साधनभूत है सरेपापों | 





का नाञ्च करनेवाली है, एेसी गऊके दानसे विङ्वरूपधारी भगवान्‌ प्रसन्न हो जाये । इसके बाद ब्राह्मण भोज- | 


 शिद्ध करलेके लिये तथा फिर आनेके लिये मेरौ पर्थवौ परजा लेकर अपने अपने लोकको जायं ! ( केवल गण ` 


पडकजप्रसूृतेव सा ।। पूर्वोक्ता सुकली या च प्रादेशे निःसृतांगुलिः । व्याको्मुद्रा ` 
`  मुकुला पद्ममुद्रा प्रकीतिता। अगुष्ठो कुञ्चिता ५ 
 उच्चावभिम्‌खौ हस्तौ योजयित्वा तु निष्ट्रा । तजन्यौ कुञ्चिते कृत्वा तथेव च॒ 
` कनीयसी ।\ अधोमुखी दृष्टनखा स्थिता मध्ये करस्य तु\। चतस्रह्चोत्थिताः पृष्ठे ` 
¢  अगुष्ठावेकतः कर ।\ नालं व्यवस्थितौ दौ तु व्योममुद्रा प्रकीतिता ता ।! तन्त्रान्तरे ` 


८ मका संकत्प करके “ यान्तु देवगणाः “ इससे देवोका विसंजेनं करना चाहिये कि, सब देवगणं मेरे इष्ट कामोको ` ~ 














| ८  पतिजी ओर लक्ष्मीजी रह जायं ) देवविसर्जन करनेके पीछे पोछ आचायके लिये दे देना चाहिये ।। यह्‌ अग्नि- ` ५ । 
 मुखका विधान पूराहुमा \ त 
; अथ मुद्रालक्षणम्‌ | 1 ५५ 
हेमाप्रो-संमुखीकृत्य हस्तौ हौ किचित्सकुचितांगुली ।। सुकली तु समाख्याता 





कुञ्चितान्तौ तु स्वकी्यागुल्वििष्टितौ | 


सवेदेवतापुलनसाधारण्येन षण्मुद्रा उच्यन्ते ।। देवताननसंतुष्टा प ष्ट श वेदा संमुखी 


| भवेत्‌ ।\ अगुष्ठो निक्षिपेत्सेयं मुद्रा त्वावाहनी 
स्वासं ५ जनिका 1 अघं 












५ ` क. 


घोमुखी त्विय चेतस्यातस्थापनीमुद्रिका मता ।। उच्छितावुच्छि- ` 





संमुखीकरणी तथा । संकलोकरणी चव महामुद्रा तथैव च \\ दाङ्धचक्छगदापच्च- 
` धेनुकौस्तुभगारुडाः ।। श्रीवत्सवनमाके च योनिमुद्राः प्रकोपिताः । एतामि 
 सप्तदाभिस॒द्राभिस्तु विचक्षणः ।॥ यो राममचयेन्चित्यं मोदयेत्स सुरश्वरम्‌ ।। 


द्रावयेदपि वि्रन्र ततः प्राथितमाप्तुयात्‌ ॥। मलाधारादढादान्तमानीतः कुच + 
` उजलिः । त्रिस्थानगततेजोभिविनीतः प्रतिमादिषु ।\ आवाहनी च सुद्रा स्याह 


` चेनविधौ मुने । एषवाधोमुखी मुद्रा स्थापने स्यतं पुनः, उन्नतागुष्ठयोगेन मुष्टौ- ` 
 कृतकरद्रया ।। सलिधीकरणी मद्रा देवाचनविधो सने ।। अंगुष्ठगभिणी सव कृत्न _ 


 स्यात्सन्चिरोधिनी ।\ उत्तानमुष्टियुगला संमुखीकरणी सता !\ अङ्कैरेवाङ्धविन्यास 


` संकलोकरणो भवेत्‌ !। अन्योन्यागुष्ठसंलग्नविस्तारित करद्वया ।। महास? 
 माख्याता व्यनाधिकसमापनी।। कनिष्ठानामिकामध्यान्तः स्थागुष्ठात्तदग्रत्‌ 


 गोपितांगुष्ठमूलेन सन्निधो मुकुलीकृता ।\ करदयेन मुद्रा स्याच्छ्भा्यय पेयं सुराचन ॥। _ 
 अन्योन्याभिमुखस्पदाव्यत्ययेन तु वेष्टयेत्‌ !। अंगुलीभिः प्रयत्नेन मण्डलीकरण | 

सुनें \\ चक्रमुद्रेयमाखस्याता गदामुद्रा ततः परस्‌ ।। अन्योन्याभिमखाषिलष्टा ५ 
ततः कोौस्तुभसंलिका ।\ कनिष्ठेन्योन्यसंलग्नेऽभिम्‌खं हि परस्परम्‌ ॥ वामस्य ध 
तजेनीमध्ये मध्यानामिकयोरपि ।। वामानामिकसंसष्टा तजेनीमध्यद्योभिता ।। 
पययिणानतांगष्ठदयी कोस्तुभलक्षणा ।\ कनिष्ठान्योन्यसंलग्न विपरीतं तु योजिता। 
1 त॒ ॥ तजम्यंगष्ठमध्यस्था मध्यमानामिका- 






















































प्स्भाका | त - 4.1 हन्ता स्द्ु्त - ~. =. + 








लोतो 


करणी मुद्रा “ होगी \ दोनों हा्थोकी अगुलियां फैलाकर फिर उन दोनों को भिलाकर हदयपरः करनेसे 
८ प्रार्थना मुद्रा ” हो जाती है । उन छं मुद्राओं को सब देवताओके पूजनम दिखाते ! शिवपूजनमे लिगमुदा ए 
करनी चाहिये । उठे हृए दाये अंगूढेको बये अंगूठेसे बाध दे तथा बाँथे हाथको अंगुल्योको दपि हाथकौ 
हाथ की अंगुलियोसे वेष्टित कर दे, उस समय “¶्गसुद्रा" होती है । यहं श्िवका सान्निध्य देनेवाल होती 
है । श्रीकामवाला इस मुद्राको रपर तथा राज्यकामी नेत्रोपर, अघ्नादि चाहनेवाला मुलपर, रोगशन्ति | 
चाहनेवाला ग्रीवापर, सब चाहनेवाला हृदथपर, ज्ञान चाहनेवाला नाभिमण्डल्पर, ज्यकामी गह्यपर | 
ओर राष्टकामी पैरोपर इस मूद्रासे स्पज्ञे करे \ रामपुजनमं १७ मुद्राएं होती ह, एेसाही रामाचन चन्दिकामं 
 अगस्त्यजीने कहा है कि-आवाहनौ स्थापनी, सक्िधौकरणी, सुसंनिरोधिनौ, सन्मुखीकरणौ, संकलीकरणौ, 
महामुद्रा, शंखम॒द्रा, चक्मुद्रा, प्यमुद्रा, गदामुदरा, धेनुमुद्रा, कौस्तुभमुद्रा, गरुडमुद्रा, श्रौवत्समुद्रा, बनमाला ` नि 
अद्रा ओर योनिमुद्रा ये सत्रहमुदराये हँ \ जो बुद्धिमान इन सत्रहो मुद्राोसे देवाधिदेव भगवान्‌ रामका अर्चन = 
` करता है, एवम्‌ उन्हं परस करता है, वा उनके हृदयको अपनेयर दयालुं बना जो चाहता है सोरे केताहें । ९ 
`  मूलाधारसे लेकर द्वादशांततक लाई हई जो कुसुमांजलि है, उससे प्रतिमाके तेजको वृद्धि होतीहै, हैमने! 
देवार्चनविधिमें “आवाहनीमुदरा” ही श्रेष्ठ है, फिर इसी मुद्राको स्थापनके समयम अधोमुखी मुद्रा कहते हँ । 
दोनों अगूोको ऊपर उठाकर मुट्ढौ कर लेनेसे “ सक्तिधीकरणी मुद्रा ” बन जाती है जो कि देवाचेनमे उपयुक्त ` 
है! उत्त किये हृए अंगूढोके साथ दोनों हाथोकी मुट्ठी करनेसे “संनिरोधिनी मुद्रा" बन जायगी, मुट्ठी ` 
ऊँचको दोनों मुट्ठी करनेपर “ सम्मुखी करणी ” बन जायगी, अंगोसे गोका विन्यास करने से ^ संकलीकरणौ ५ 
मुद्रा बनती है, अगरढोको आपसमे लगे रहते हृए भी हाथको फैला देनेसे “ महामुद्रा ” बन जाती है । वह कम ` 
 वेश्षकी पुति करनेवाली होती है ।कनिष्ठिका ओौर अनाभिका ये दोनों अंगुलियां विचली अंगुलियोमेके अन्तम ` ५ 
। आ उपस्थित हुए अग्रभागमें छिपौ हुई हों एेसा ही जिसका संस्थापन हो तथा अंगूठेका अग्रभागं उनमें छिपा न 
हभ हो इसे ^ मुक्ुलीकरण मुद्रा ” कहते हें । देवपुजामे दोनों हाथों मे “. शंखमुद्रा “ बनती है, इसमे अंगु- | 
लियो कौ नोकोको आपसमे वेष्टित कर दे । अंगुलियोको प्रयत्नके साथ गोल करने पर, “चक्रमुद्रा" बन जाती 
है । एक एक के सामने सामने करके मिलाने से “ गदा मृद्रा “ होती है । दोनों कनिष्ठिकां आमने सामने ` 
आपसमें भिलगयी हो तथा बे हाथकी तजंनीके बीचमे एवम्‌ मध्य ओर अनामिकामे दूसरे हायकौ मध्या ` | 
ओर अनांभिका मिल गयौ हों, तजेनी मध्यमे द्ोभित हो, रमसे दोनों अंगूठे जिसमे नमते हो उसे “कौस्तुभम ` 
मृद्रा कहते हं । कनिष्ठिका हो, अगे रुडमुद्रा त र्ते 
ह 1 तजनी ओर अगुष्ठके बौचमें मध्यमा ओर अनामिका दोनों आजानी चाहिये ! कनिष्ठिका ओौर अः 
निका त्जनीके मध्यमे आनी चाहिये, यह ' श्रीवत्समुद्रा” कहावेगौ, कनिष्ठा अनामिका ओर मध्याकी 
एकमूटि बांधनी चाहिये जिसमं तजनी उदी । चाहिये | 
मुद्रा“ बनजाती है । दोनों हा्थोकौ अनामिका दोनो हा्थोकी 
| खः खडी हो, मध्यस्थलमं अंगृठे हो तो “ योनिमुद्रा ” बनतौ श है, यह्‌ पजनमें अतिभरष्ठ ति त श्वेष्ठ मुद्राओके लक्षण 
र्थ दिखाकर उनकी संख्या लिखो है, उसमे ज्यादा कम हो जाते हं तथा कं 





































+ (1 0120 म णा 4 ह 0 प 01 114 ५ 
` 9 2 ० ् 





 पृष्पदानं ततः पुनः ।\ गीतं वाद्यं तथा नृत्यं स्तुतिश्चेव प्रदक्षिणाः \। पुष्पाञ्जलि- 


` नमस्कारावष्टत्रिञत्समीरिताः ।। इत्यष्टनि्ादुपचाराः ।। अन्यच्च-आसनं ` 


स्वागतं चाध्यं पाद्यमाचमनीयकम्‌ \\ मधुपर्कासनस्नानवसनाभरणानि च 


सुगन्धः सुमनो धूपो दीपमल्चेन भोजनम्‌ ।। माल्यानुलपने चव नमस्कारविसजेनं ।। | 
इति षोडशोपचाराः ।\ अर्ध्यं पाच्यं चाचमनं स्नानं वस्त्रनिवेदनम्‌ ।। गन्धावयो 
 नैवे्यान्ता उपचारा दश्च कमात्‌ \\ शारदातिल्के षोडशोपचारा उक्ताः ।\ ते च- ` 
 आसनस्नानवस्तराणि भूषणं च विवर्जयेत्‌ । रात्रौ देवाचेने तेश्च पदा्थदरद्हैः 
कमात्‌ \\ पूजनं कपिलेनोकतं तत्सर्वं च विसजजयेत्‌ \\ गौन्धतेलमथो दद्याहेवस्या- ` 
प्रतिमं ततः ॥ अर्व्यादिद्रघ्याणि ।! दूर्वा च विष्णुक्रान्ता च इयामाकं पदमेव ` 
च|) पाद्याङ्धानि च चत्वारि कथितानि समासतः \) कप्‌रमगुरु पुष्पं द्रव्याण्या- ` ५ 


 चमनीयके ।। सिद्धा्थ॑मक्षतं चे वदूर्वा च तिलमेव च ।। यवगन्धफलं पुष्पमष्टाद्धं ` 
` त्वर््यमुच्यते ।। स्नाने वस्त्रे तथा भध्ये द्यादाचमनीयकम्‌ । उद्रतनपदार्थाः ॥ 
 उद्तेनमपि तच्रैव-रजनी सहदेवी च शिरीषं लक्ष्मणापि च ।। सदाभदरा कुशग्राणि 


 उदतनमिहोच्यते ।। मन्त्रतन्रपरकाशे-अक्षता गन्धपुष्पाणि स्नानपात्रे तथा त्रयम्‌ ।॥ ` 


उपचारदरव्याभावे प्रतिनिधिः ।\ तत्रैव-्रव्याभावे प्रदातव्याः क्षाल्तास्तण्डलाः ` 


तुलस्या कस्य गणाधिपम्‌ ।। न दूवेया यजेदेवीं बिल्वपत्रश्च 
विष्णोवज्यं सदा बुधं ५ । “अक्षतास्तु यवा ताः भो प्रोक्ता 



















: परिभाषा] हिन्दीदीकासहित,  : (५९). 





 वक्तुमहंसि ।। श्रीकृष्ण अवाच ।। साधु साधु महाबाहो कुरुराज युधिष्ठिर 6 
रहस्यानां रहस्यं ते कथयामि ब्रते तव ।। संपु्णता कृता यत्र तत्र सम्यक्‌ फल- 
` फलप्रदम्‌ 1! यच्चीर्णं नरनारीभिभेवेत्संपणेकारकम्‌ !। अवद्यं तच्च कर्तव्यं ` 
 संयूणंफलकांकिभिः ।। किचिद्दुग्नं प्रमादेन यद्व्रतं त्रतिना स्थितम्‌ ।\ तत्संपुणणं 
 भवेत्सवं त्रतेनानेन पाण्डव । उपद्रवे्बहुविधर्महामोहाच्च पाण्डवं \\ यद्भूग्नं | 
किंचिदेव स्यादुव्रतं विघ्नविनारनम्‌ ।! तत्संपुणं भवेत्पाथं सत्यं सत्यं न संशयः।! 
काञ्चनं रूप्यकं रूपं शिल्पिना तु घटापयेत्‌ \\ भग्नत्रतस्य यो देवस्तस्य सूपं 
: विनि्दिशेत्‌।त्रतं स्त्रीपुंसयोः पाथं प्रारन्धं यदुबरतं किल । न च निष्पादितं किचि- | 
।  हैवात्सर्वं तथा स्थितम्‌ ।। द्विभुजं पडकजारूढं सौम्यं प्रहसिताननम्‌ ।। निष्पादितं | 
क्िल्पिना च तस्मिन्नेव दिने पुनः।। तन्मानं तु मनःप्राप्तं ब्राह्मणेविधिना गृहे | 
स्तापयेत्पयसा दध्ना धुतक्षौद्ररसाम्बुभिः।! वस्त्रचन्दनपुष्पेदच पूजां दुर्यात्स- | 
|  माहितः।\ तोयपुरणस्य कुम्भस्य सुने विन्यस्य देवताम्‌ ।\ धूपदीपाक्षतेवेस्त्रे 
रल्नर्बहुप्रकारकेः ।। अर्घ्यं प्रवदयात्तन्नाम्ना मन्त्रेणानेन पाण्डव । उपवासस्य ` 
दानस्य प्रायर्चत्तं कृतं सया ।! शरणं च प्रपन्नोऽस्मि कुरुष्वाद्य दयां मम ।\ ` 
। व्रतच्छिद्रं तपरिच्रं यच्छिद्रं त्रतक्मणि।सत्सर्दत्वत्मरसादेन संपूर्णं यतां मम ¦ प्रसन्नो ` 
। भव भीतस्य भिन्नचयंव्रतस्य च ।। कुर प्रसादं संपुर्ण वरतं संजायतां मम ।। पूर्वेदक्षिण- 
। योः पदचादुत्तरे च बालि हरेत्‌ ।। उषेयधस्तात्सरवेभ्यो दिक्पालेभ्यो नमो 
।  इदमध्यमिदं पाद्यं तेभ्यस्तेभ्यो नमो नमः ।। पादौ च जानुनी चेव कटी शीषेक- ` 
बक्षसी । कुक्षिं तु हदयं पृष्ठं वाक्‌" चक्षुद्च शिरोरुहान्‌ ।। पूजयित्वा तु देवस्य ` 
ततः पश्चत्क्षमापयेत्‌ ।। पुजितस्त्वं यथाशक्त्या नमस्तेऽस्तु सुरोत्तम ।! एेतिहिका- ` 
 मुष्मिकीं देव कायेसिद्धि दिशस्व मे । एवं क्षमापयित्वा तु प्रणमेच्च प्रयत्नतः । ` 
 तन्मूतिं च द्विजातिभ्यो विधिवत्प्रतिपादयेत्‌ \। स्थित्वा पुवेमुखो "विप्रो गृही प 
द र दरभेपाणिना ।। विप्रहस्ते प्रयच्छेच्च दाता च चैवोत्तरा कौन्तेय 






















नमस्कार ओर विसर्जन ये (सोलह) शोडडा उपचार ए काते 


0 ब्रतराज [सामान्य 















१ [नि ०111 11111 निवि धद क ^ 


‰# ` 


 ष्ठाङ्किरसां तथा ।। वचनान्नार दादीनां पूणं भवतु ते त्रैतम्‌ ।! एवं विधिविधानेनं 
गृहीत्वा ब्राह्मणो बजेत्‌ ।\ दाता तत्प्रषयेत्सवं ब्राह्मणस्य गृहे स्वयम्‌ ।\ तत 


 पञ्चमहायज्ञान्कृत्वा वै भोजनादिकम्‌ ।। एवं थः कुरुते भवत्या ब्रतमेतन्नरोत्तम ।॥ 


तस्य संपूणतां याति तद्व्रतं यत्पुरा कृतम्‌! खण्डं संपूर्णतां याति प्रस त्रतदैवते ।। ` 
भग्नानि यानि मदमोहवश्चाद्गृहीत्वा जन्मान्तरेष्वपि नरेण समत्सरेण ।। संपृणे- 
 प्रुजनपरस्य पुरो भवन्ति सवेत्रतानि परिपूणेफलप्रदानि ५ 








अथ उपचार-पदा्थदिन्नीमें ज्ानमालासे जेकर लिखा 


लखा है कि ३८,१६,१० आर पांच (५) ये उपव्वार है ` 


१ इन्हें यहाँ मे अलग अलग दिखारंगा तथा इनके करनेसे क्या फल होता है सो भौ लिखूंगा \ अध्ये, पाद्य, ~ ५ 


` आचमन, "मधुकं, उवटन, स्नान , आरती, वस्त्र, आचमन, उपवीत, पुनराचमन, अलंकार, | 
गंध, पुष्प, धूष, दीप, नैवेद्य, पानीय, तोय, आचमन, करोदरतन, पान, अनुप, पुष्यदान, गीत, वाद्य, नृत्य, | 


: ४ स्तुति, दक्षिणा, पुष्पाजकि नमस्कार, ये अडतीस उपचार ह्‌ ॥ अथ षोडशा उपचार-आासान, स्वागत, अध्य ४. | ॥ | 





. . ८, ओर बस्त्रनिवेदन तथा गंधसे लेकर नवेद्यतक क्रमसे दहडपाचार हीते हं । शरदातिलकमं सोखह्‌ उपचारं 


ते हे । दश्लोपचार-अष्यं, पाद्य, आचमन, स्नान ` 





तिलकम बतायाहैकि, ` 
उदर्ततमे म ग्रहणकी ्णफी जातत है । स्नानपान्रके ` 


किये हृए तेडल लेने चाहिये, १ वहीं ही ह 





परिभाषा] | हन्दीदीकासहित = ` ` (६१) -. 





व स 
नि 





पाता है, अन्यथा नहीं पाता \ त्रत मंगमें संपू्णं करनेकी विधि-हेमाद्रिने भविष्य पुराणको केकर कही है । 
युधिष्ठिर महाराज श्रीकृष्ण परमात्मासे पुने लगे कि , ब्रत कंसे पूरे होते ह ? इस गुप्त विषयको मुञ्चे बत- ` 
लादय ! श्नीकृष्णजी बोले कि, हे महाबाह कुरुराज युधिष्ठिर ! यह्‌ रहस्योका भौ रहस्य है, मं तेरे लिय 
` कहा । जहाँ ब्रतकी संपु्ण॑ता करदी वह ही वहं अच्छे फलका देनेवाला होजाता है । जिसके कियेसे संपुणं- 
` कारक हौ जाता है, सम्पणेताकोचाहुनेवाले स्त्रीपुरुषोको चाहिये उसे अवक्य करें । ब्रत करनेवाखोके प्रमादसे 
 जोव्रत भग्न हज पडादहो वौ त्रत, ह है पाण्डव ! इसके करनेसे पूरा हो जायगा । अनेक तरहके उपद्रवोसे ` 


तथा अज्ञानके कारण जो विघ्ननाक्षकं ब्रत भग्न होगया हो,वो इसके कियेसे परा होजायगा, इसमे कोई भी ` 
सन्देह नहीं है । जिस देवताका व्रत किया हो उसी देवताकी सोने चांदीकी मूति किसी कारीगरसे बनवाक्नौ 
चाहिये, जिस किसीने इस ब्रतको किया हौ पर वो पूरा न कर सका हो दैवात्‌ विघ्न उपस्थितहो गयेहैतो 
 समाधानभी उसौको करना चाहिये । उसी दिन किसौ शित्पीसे एेसी मूति बनवानी चाहिये, जो कमलासनपर =. 
विराजमान हो, उसके दो भुजां हो, सुन्दर हंसता हृभा मुख हो, जितने प्रमाणकी मन चाहे उतने ही बनवाना . । 
चाहिये, फिर घर पर उसे ब्राह्यणोसे स्नान कराना चाहिये । स्नानके पानीमें दही, दूष, घत ओर सहद मिला ` | 
. रहना चाहिये, स्नानके पीछे वस्त्र चन्दन ओर फूलोसे देवताकौ पूजा करनी चाहिये, हे पाण्डव ! निसा | 
 उद्यापन किया जारहा हौ पहिले पणंकुम्भके ऊपर उस देवताको स्थापित करके उसी देवताके नामसत्रसे 
धृष, दीप, अक्षत ओर अनेक तरहके रत्नोसे अर्यं देना चाहिये, उपवासं ओर दानका प्रायष्चित मेने कर | 
दाहः में जपके शरण ह, अब आप मृञ्षे पर दया करं । ब्रतका छिद्र, तपका छिद्र एवम्‌ जो व्रतके कमम 
छिद्र हो, वो सब आपकी कृपासे परे होजारं मं व्रतकी गलतीसे बडा डरा हुं मेने ब्रह्मच्चर्य्यकाभीपालननहीं 
कियाहै, आपम्‌ क्षपर कृपा करें जो मेरा त्रत पुरा होजाय । पुवं ओर दक्षिणके पीछे उत्तरम बलि देउत्तरमं 
बलि दे, पीछे ऊपर ओर नीचे बलिदान करे, सब दिक्पालोको बलि देता हुजा उन्हं नमस्कार करके कहे कि, 
 ीजिये यहु आपका अर्यं है, यह आपका पाद है, जप सबके लिये मेरा वारंवार नमस्कार है । देवताके ` 
चरण, जानु, कटी, ्लीषक, वक्ष, कुक्लि, हदय, पृष्ठ, वाक्‌, चक्षु, ओर वालों को पुजकर क्षमापन करना चाहिये}! 
हि सुरोत्तम ! जेसी मेरी शविति, थी, उसके अनुसार मेने आपका पुजन कर दिया, अब आप इस लोक ओर ` (1 
। परलोक दोनोकी का्येसिद्धि करो \ इस प्रकार क्षमापन कराके प्रयत्नके साथ प्रणाम कर एवम्‌ उस मूर्तिको = ` 
 विधिके साथ ब्राह्मणको देदे.ब्राह्यण भी पुवं मुख करके कुशयुकत हाथसे छे । तथा दाताको देतेवार उत्तराभि- ` 
`: मुख होना चाहिये । मूतिदान करनेतकं यजमानको निराहार करना चाहिये, तथा मंत्र कहते हुए मूत्तिदान = 
देना चाहिये कि, हे टज ! मेने पहिले इस व्रतको खण्डित किया था वो सब आपको मूरति देनेसे पुरा हो जाय, ` 
` है युधिष्ठिर ! भूति लेनेवाखे ब्राह्मण भी भूति हाथमे लकर व्रतखंडकृतं पजा” इस मंत्रको कहता हुमा ले 
कि, जो तुमने अपने व्रतको खण्डित किया था सो इस मूतिके दाने पुरा हो गया, तुम्हारे मनोरथ पूरे होगे । ` 
जिस बातको ब्राह्मण कहते हँ, देवता उस बातको मानते ह । यह जो कहा जाता है कि, सब देवमय ब्राह्मण है 
बात शटी नहीं है । इन महात्मा ब्राह्मणोने समुद्रको खारा, पावकको स्वेभक्षी ओर शक्को सहस्रनेत्र कर ` 
| डाला! ब्राह्मणोके आहीर्वादसे ब्रह्महत्या नष्ट होजाती है, समग्र अवमेधका फल मिल जाता है, इसमें सन्देह ` 
| नहीं है । व्यास, वाल्मीकि, पराशर, वसिष्ठ, गे, गौतम, धौम्य, अत्रि, वासिष्ठ, अंगिरस भौर नारदादिकोके 
चनोसे आपका त्रत पुरा होजाय, इस विधिविधानसे ब्राह्मण मूर्ति लेकर अपने घरको चला जाय । तथा 
देनेवाला स्वयं ही इस सब सामानको ब्राह्मणके घर पहुंचा दे । पंचमहायजञोको करके भोजन करना चाहिये 









































(१) 3 त्रत समिभ्यि 





 कार्तस्वरविभूषितम्‌ ।\ आसनं देवदेवेश प्रीत्यथं प्रतिगृह्यताम्‌ ।। एतावानस्येति 
पाद्यम्‌ ।। गङ्खादिसर्वतीरथेभ्यो मया प्रार्थनया हतम्‌ ।। तोयमेतत्सुखस्यज्ञं 
पाद्यार्थं प्रतिगृह्यताम्‌ ।। न्निपाटू्घ्व इत्यध्येम्‌ ।। नमस्ते देवदेव नमस्ते धरणीधर।। ` 
नमस्ते कमलाकान्त गृहाणार्ध्यं नमोऽस्तु ते \\ तस्माद्विराछेत्याचमनीयम्‌ ।। ` 
 कर्प॑रवासितं तोयं मन्दाकिन्याः समाहतम्‌ ।! आचम्यतां जगच्याथ मयादत्तं हि 
 भवितितः\) यत्पुरुषेणेति स्नानम्‌ ।1 गङ्खा च यमुना चेव नमंदा च सरस्वती ।\ | 
 छृष्णा च गौतमी वेणी क्षिप्रा सिन्धुस्तथैव च !1 तापी पयोष्णीरेवा च ताभ्यः | 
स्नानार्थमाहृतम्‌ ।। तोयमेतत्युखस्पं स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम्‌ ।\ पञ्चामृतस्नानं › 
पञ्चामृतस्नानं पञ्चमन्त्रैः पृथक्कारयेत्‌ ।! तं यज्ञमिति वस्त्रम्‌ ।। सर्वेभूपाधिके 
` सौम्ये लोकलज्जानिवारणे ! मयोपपादिते तुभ्यं वाससी प्रतिगृह्यताम्‌ \\ वस्त्रे | 
च होमदेवत्ये लज्जायाः सुनिवारणे !\ मयोपपादिते तुभ्यं वाससी प्रतिगृह्यताम्‌ ।॥ 
तस्माद्यज्ञादिति यज्ञोपवीतम्‌ ।! दामोदर नमस्तेऽस्तु त्राहि मां भवसागरात्‌ ।॥ ` 
ब्रह्मसूत्रं सोत्तरीयं गृहाण पुरुषोत्तम।। तस्मादयज्ञात्स्वेहुत इति गन्धम्‌ ।\ श्रौखण्डं ` 
चन्दनं दिव्यं गन्धाढ्यं सुमनोहरम्‌ ।! विलेपनं सुरश्रेष्ठ चन्दनं प्रतिगृह्यताम्‌ ` 
अक्षतास्तंड्लाः शुराः कुंकुमाक्ताः सुञ्ञोभनाः ।\ मया निवेदिता भक्त्या गृहाण | 
परमेद्रवर ।! तस्मादश्वेति पुष्पम्‌ ।। माल्यादीनि सुगन्धीनि मालत्यादीनि बं | 
प्रभो 1! मयाहतानि पुष्पाणि पुजार्थ प्रतिगृह्यताम्‌ 11 यत्पुरुषं व्यदधुरिति धूपम्‌ !॥ | 
 बनस्पति रसोः्धूतो गन्धाढ्यो गन्ध उत्तमः !\ आघ्रेयः सर्वदेवानां धूपोऽयं प्रति- ` 























तिभिरा न म्‌ । मरापहम्‌ । चन्द्रमा मनस इति नैवेद्यम्‌ ।। अन्न ष 
: समन्वितम्‌ ।। भक्ष्यभोज्यसमायुक्तं नव्यं प्रतिगृह्य- 


























परिभाषा] हन्दीटीकासहित (६३) ` 





अथ सब त्रतोकौ सामान्यपूजा विधि-“ ओम्‌ सहखशीर्षा इस संत्रसे जष्वाहुन करना चाहिये ओर कहना 
चाहिये कि, ह सुर सत्तम, हे देवेशा ! हे तेजके खजाने ! हे संसारके स्वामी ! आजाओ आजाजो, को हुई 
मेरी पजाको ग्रहण करो ¦ “ ओम्‌ पुरुष एेवदम्‌ ” इस संत्रसे आसन देना चाहिये, कहना चाहिये कि, हे देवदेवेश! ` 
आपकी प्रसंन्नताके लिये अनेक रत्नोसे जडा हुभा सोनेका सुन्दर सहासन रखा हुञा है, आप इसे ग्रहण करं । _ 
“ओम्‌ एतावानस्य इस संत्रसे पाद्य अर्पण करना चाहिये कि, मेने गंगा आदिक सब ती्थेपि प्राथना करके , 
यह क्ञीतर पानी चया है, आष पा्यके लिये इसे ग्रहण करं “ ओम्‌ त्रिषादृध्वं ” इस म॑त्रसे अध्यं देना चाहिये 
कि, हे धरणीधर ! हैं कमलाकान्त हे देवदेवेश ! आपके लिये बारंबार नमस्कार है, अय इस अध्यको ` 
ग्रहण करे, आपके लिये नमस्कार करता हुं \ "ओम्‌ तस्माष्ठिराड्‌ ” इस संत्रसे आचमन करावे कि, यह्‌ कवूरसे 
सुगन्धित हमा पानी मंदाकिनीसे लाया ह, हे जगन्नाथ ! मं भक्तिके साथ दे रहा हूं जप आचमन करं 1 
“ओम्‌ यत्पुरुषेण” इस मंत्रसे स्नान कराना चाहिये कि है देव ! यह्‌ रण्डा पानी, गंगा, यमुना, नमंदा, सरस्वती 
कृष्णा, गौतमी, वेणी, क्षिप्रा, सिन्धु, तापी, पयोष्णी ओर रेवा इन दिव्य नदियोसि लाया हु" आपस्नानके 
लिये इसे ग्रहण करे, पंचामृतसे स्नान तो पांच मंत्रोसे पृथक्‌ कराना चाहिये “ ओम्‌ तं यक्तम्‌ ” इस संत्रसे वस॒ ` 
समर्पण कराना चाहिये कि, मे आपको दो वर्त्र देता हूं, आप इन्हं ग्रहण करं ये सब भूषणोसे उत्तम सुन्दर ` 
है लोकलाजको निवारण करनेवाले ह मेने आपकेही लिये तैयार किये हे \ इन वस्त्रक सोम देवतादहै, 
लज्जाके भके निवारक है , मै इन्हे आपके लिये लायाहुं “ओम्‌ तस्मायन्नात्‌'' इस मंत्रसे यज्ञोपवीत देना चाहिये ` 
किं, हे दामोदर ! तेरे च्य नमस्कार है मेरी भवसागरसे रक्षा करिये, हे पुरुषोत्तम ! उत्तरीय सहित ब्रह्य- 
 सूत्रको ग्रहण करिये । “ ओम्‌ तस्माद्ज्ञात्सर्वहुतः ” इस संत्र से गन्ध निवेदन करना चाहिये, कि, हे सुरभेष्ठ 
यह्‌ धिसा हुजा गन्धसे परिपूणं मनोहारी दिव्य-श्रीखण्ड चन्दन, आपकी प्रसन्नतके ल्यि तयार है, अपडसे ` 
ग्रहण करें । हे परमेश्वर ! कुंकुमसे सने हए सुन्दर अक्षत मैने भक्तिसे गापको निवेदन कर विये हं जाप ङइन्हं = 
 श्रहण करें! “ओम्‌ तस्माददवा ” इस संत्रसे पुष्प निवेदन करने चाहिये \ है प्रभो ! मे आपकी पूजके ल्यि = 
मालां मौर मार्तीके सुगन्धित पुष्य लाया हूँ आप उन्हं ग्रहण कर । “ ओम्‌ यत्‌ पुरुषं व्यदधु " इस स॑त्रसे 
। धूपदेनी चाहिये, हे धूप ! तु वनस्पतिके रससे बना है, गन्धोसे भरा पडा है, उत्तम गन्ध है, सभीदेवेके सूधने ` 
लायक है, है परमेहवर ! इसे ग्रहण करिये ! “ ओम्‌ ब्राह्मणोऽस्य ” इस मंत्रसे दीप देना चाहिये ! घीसेभरा ` 
। | हुमा है, सुन्दर बत्ती पडी हुई है जयादिया यह तीनों लोकों के अन्धरकारका नाशक है, हे देवेश ! ग्रहण करिये । 





“चन्द्रमा मनस ” इस संत्रसे तथा छओ रसो से युक्त भक्ष्य मौर भोज्य से संयुक्त, चारो रकार का अन्न डप 

स्थित है, इस नैवे्यको आप ग्रहण करे । “ओम्‌ इदं फलं मया देव इस मंत्रसे फल निवेदन करना चाहिये कि 

है ३ेव आयके सामने जो फल रखा हुआ है, मे इसे लाया हे, इससे मुदे प्रत्येक जन्मे फलकी प्राप्ति होवे । 

 . “जोम्‌ नाभ्या आसीत्‌ “ इस मंत्रसे ताम्बल निवेदन करना चाहिये कि, हे परमेकवर ! ! जिसमें सुन्दर सुपारी ` 

` पडी हुई है, नागवल्ली का दलभी है, क्पूरादिक भौ पड़ हुये है एसे पानको ग्रहण करो ! “ओम्‌ सप्तस्य! ` 

इस मस्त्रसे दक्षिणा देनी चाहिये । हिरण्यगर्भे गर्भम अग्निका का हेम जीज है, वो अनन्त पुण्यका ` 
है, इससे आप मुने शान्ति दे । चाँद, सुरज, सवैज्योति है आरतीकं 




























(1 (  ब्रतराज  [ सामान्य-' 





अथ प्रतिप्रदादितिथिव्रतानि रिख्यन्ते 
मात्स्थे-बजेयित्वा मधौ यस्तु दधिक्षोरघुतक्वम्‌ ।\ दद्यास्त्राणि सूक्ष्माणि ` 
 रसपातरर्य॑तानि च \) रस पात्रैः--द्ध्यादिपात्रैः \) संपुज्य विप्रमिथुनं गौरी मे 
` म्रीयतामिति ।। हेमाद्रौ पाद्ये च-बजयेच्चत्रमासे तु यस्तु गन्धानुलेपनम्‌ ।। शुक्ति 


 . गन्धभतां दद्याष्धिप्राय इवेतवाससी ।। भक्त्या तु दक्षिणां दद्यात्सवंकामाथेसिद्धये 





` गन्धवस्त्रदानमंतरौ-नन्दनावासमन्दारसखे वृन्दारकाचित ।। चन्दन त्वं प्रसादेन 


 सखानद्रानन्दभ्रदो भव ।! रण्यं सर्वलोकानां लज्जाया रक्षणं परम्‌ ।। सुवे्ाधारित्वं ` 
। | र यस्माद्र शान्ति प्रयच्छ मं) इति मन्राभ्या गन्धवासतस्ी दद्याद \) ए 


प्रतिपदा तिथि कं व्रत लिखे जातेहं क 

मत्स्य पुराणमे लिखा है कि, जो चैत्रके महीने मे दही, दूष, धृत ओर मीठेका त्याग करके रस पाच्रौसे ( 
युक्त सू्ष्मवस्त् देता है \ रस पात्रका अथे रेही आदिके पातर यह हता है । एवं देतीवार ब्राह्मण ॒ब्राह्मणीका ` । 

` पजन करके यह्‌ कहता है कि, गौरो मुक् पर प्रसन्न हौ जाय तो वो ब्रतकरके कल्याणको पाता है । हेमाद्रिमे ` 

` यद्र पुराणको लेकर लिखा है कि, जो तो चैत्रके महीनेमें गंधका अनुलेपन छोड़ कर, ब्राह्मणके विये गंधसे ` 

पी ओर र ठ दो सफेद कपड़ा देता है, तथा सब कामोकी अर्थसिद्धिके लिये मक्तिभावसे दक्षिणा देता 














वस्त्रदानके मंत्र-हे नन्दन बनमे वासकरनेवारे मन्दारके मित्र तथा 1 





यथाक्रमम्‌ ।। मंत्रं संपुजनाथे तु बहुरूपं परिस्पुशञेत्‌ !। संत्रभिति जातावेकवचनम्‌ ।\ 


` नमोऽस्तु 


। १ परिभाषा | 6 हिन्दीटीकासदहित ` । १ (६५) ४ 














करी धनसौभाग्यर्बधिनी ।। मङ्खल्या च पवित्रा च लोकटयसुखावहा ।। तस्याभादो ` 
तु संपूज्यो ब्रह्मा कमलसंभवः! पाद्याघ्यं पुष्पधृपहच इ वस्त्रालकारभूषणेः ।।` 

 होमबेल्युषहारेश्च तथा ब्राह्मणभोजनेः । ततः क्रमेण देवेभ्यः पुजा कार्या पृथ- 
 क्पृथक्‌ ।! कृत्वोऽङकारनमस्कारौ कुशोदकतिलाक्षतेः ।। पुष्पधपप्रदीपाद््भोजने्व ` 


बहुरूपं मत्र नानारूपान्मेत्रान्परिस्पक्षेत्परिगृह्णीयादित्य्थः ।। तेन ““उभ्नमो ब्रह्मण" 
, इत्यादि “विष्णवे परमात्मने नमः इत्यन्तमंत्रवाक्यवृन्दोपात्ता देवताशब्दात्चतु ` 

 ग्यन्ताः प्रणवादयो नमोऽन्ता मंत्रत्वेन ग्राह्याः \। प्राथनामंत्राः-ञ्भ्नमो ब्रह्यणे- 

तुभ्यं कामाय च महात्मने ।। नमस्तेऽस्तु निमेषाय तरुटये च नमोस्तु ते\। 


भ्र ५५९. 


` लवाय च नमस्तुभ्यं नमस्तेऽस्तु क्षणाय च ।। नमो नमस्ते काष्ठायै कलायै ते ` 





स्तु ते ।। नाडिकायं सुसूक्ष्माय मुहूर्ताय नमो नमः ।। नसो निशाभ्यः पुष्येभ्यो ८ 
दिवसेभ्यश्व नित्यशः \। पक्षाभ्यां चाथ मासेभ्य ऋतुभ्यः षड्भ्य एव च\\ 






` अयनाभ्यां च पञ्चभ्यो वत्सरेभ्यद्च सर्वदा !। नमः कृतयुगादिभ्यो ग्रहेभ्यक्च ` 
` नमो नमः।। अष्टाविशतिसंख्येभ्यो नक्षत्रेभ्यो नमो नसः ।\ राक्षिभ्यः करणेभ्यदच | 
 व्यतीपातेभ्य एव च ।। प्रतिवर्षाधिपिभ्यइ्च विन्ञातेभ्यो नमः सदा ।\ नमोऽस्तु = 








स्वदिग्म्यक््च दिक्पाकेभ्यो नमो नमः ।। नमश्चतुदक्भ्यक्च मनुभ्यस्तु नमो नमः।। ` 
नमः परन्दरभ्यश्च तत्संख्येभ्यो नमो नमः ।। पञ्चाशते नमो नित्यं दक्षकन्यामय  । 
एव च ।। नमोऽदित्ये सुभद्रायै जयाये चाथ सवदा । सुशास्त्राय नमस्तुभ्यं सर्वा- ` 









_ वृद्धय निद्राय धनदाय च।\नसः १कुबेरपुत्र त -गृह्यकस्वार हय | र स स्वामिते नर 


 शङ्कपद्याम्यां निदिभ्यामथ नित्यशाः ।। भद्रकाल्यै नमस्तुभ्यं सुरम्ये च नमो नः 















दद) वतरन... {सामान्यः 











न । जक १ =-- न 


नमो नमः ।। नमोस्त्वादि मुनिभ्यङ्च सप्तभ्यश्चाथ सवेदा ।! नमोस्तु 








हमवत्प्रमखेभ्यश्च पर्वतेभ्यो नमस्त्वथ ।। पौराणीभ्यश््च ग्खाभ्यः सप्तभ्यशर्च 
पुष्करावि- 
 भ्यस्तीर्थेम्यरच पुनःपुनः 1। निम्नगाभ्यो नसो नित्यं वितस्तादिभ्य एव च।। 
 चतुदंज्म्यो दीर्घाभ्यो धरणीभ्यो नमो नमः ।! नमो धातरेविधात्रे च च्छन्दोभ्यश्च 
नमो नमः।। सुरमभ्यैरावणाभ्यां च नमो भूयोनमोनमः 11 नमस्तथोच्च श्रवसे 
` ध्रुवाय च नमो नमः ।\ नमोस्तु धन्वन्तराय शस्त्रास्त्राभ्यां नमो नमः । विनायक- ` 
कुमाराभ्यां विष्नेभ्यश््च नमः सदा ।। शाखाय च विशाखाय नगमेयाय नें नमः।। 
नमः स्कन्दग्रहेभ्यदचस्कन्दमातभ्य एव च ।। ज्वराय रोगपतये भस्मप्रहरणाय च ।\ ` 
ऋषिभ्यो बालखिल्येभ्यः केशवाय नमः सदा ।\ अगस्तये नारदाय व्यासादिभ्यो 
नमो नमः । अप्सरोभ्यः सोमपेभ्यो देवेभ्यश्च नमो नमः \। असोसपेभ्यश्च 
 नमस्तुषितेभ्यो नमः सदा ।। दिभ्येभ्यो नमो नित्यं दादशभ्यङ्च सवेदा ।। एकाद- 
 क्ञभ्यो रुदरेभ्यस्तपस्विभ्यो नमो नमः ।! नमो नासत्यदलायामषिवभ्यां नित्यमेव ` 








न 





परिभाषा] ८ 


अथ चेत शक्ष्ला प्रतिपदाको संवत्सरके श्रारभ कौ विधि 


 . ब्रह्म पुराणमें लिला है, इसमें सूर्योदय व्यापिनी प्रतिपद लेनी चाहिये । क्योकि, इसी पुराण से लिखा 
हृ है कि चैत्रमासकी शुक्लप्रतिपदाको ब्रह्माजीने स॒ष्टि रचनाका आरम्भ किया था, उस दिन प्रतिपदा 
उदय व्यापिनी थौ । भविष्योत्तरपुराणमे लिखा हुआ हे कि, मधुमास के प्रवतत होने पर, उदयव्यापिनो प्रति- ` 
 पदाकौ सृष्टि रचनेका प्रारम्भ किया था, यदि दोनों दिनोकी प्रतिपदा उदयव्यापिनी हो, अथवा दोनों दिनों 
उदयव्यापिनी न हो तो पहिली लेनी चाहिये । एेसा-संवत्सरके आरंभकी प्रतिपदा वसन्तके आदिक प्रतिपदा 
` त्या कातिकौ शुक्ला प्रतिपदा सदा पूरवविद्धा ही करनी चाहिये । वुद्धवसिष्ठके वचनसे बहुतसे कहते हः 


ध परन्तु दोनों दिन उदयव्यापिनी न मिली तो संवत्सरके आरंभमे जो काय्यं होताथावोतोहो न सकेगा इस | 


 कारण,पूवमिं कायंका विधान करनेवाला यह वचन युक्त ही है, दोनों दिन ही उदयव्यापिनी होगो, तब तो 
पहिले दिन हौ उदयव्यापिनी मिल जानेके कारण पुर्वाका ही ग्रहण होगा क्योकि, उस समय कब करना | 
चाहिये ग्रह आकांक्षा तो रहती ही नहीं तथा पक्षान्तरभे पूर्वयुतपनेका अभाव भी रहता ही है इस कारण, 
` पूर्वाका ग्रहण होता है यह बात नहीं है कि, इस बचन से हौ पूर्वका ग्रहण हो रहा हो । ब्राह्म पुराणमं लला 
हआ है कि, इसी दिनसे ब्रह्याजीने काकी गणनाका प्रारंभ किया था । ग्रह, अब्द, ऋतु, मास ओर पक्षोको 
सब देवोका समागम होने पर संवत्सर आदिके अधिपोको 











दे दिया । ब्रह्मा की सामं अनिर्देश्य तनुबाठे 9 


` ब्रह्माजीकी सब देवता ओर मुनि आदिकों ने नमस्कार स्तुति करते हए उपासना कौ । इसके पीछे वें सब _ 9 








ऋषि मुनि आदि ब्रह्माजीकौ शुश्रषा कर हिमालय चले गये, वहां जाकर दत्तचित्त होकर अपने अपने कसम | 
कग गये, हे निष्पाप ! उस समय ब्रह्माकी सभा इच्छानुसार रूपं धारण करनेवाली थो, विज्ेष करके वो 

मनोहर निर्दोष अनिरदेश्य रूप धारण किये रहती थौ, उस दिवसे लेकर पहर ओर उनसे भौ पहिलेतेजो 
धमं पालन किया गया है अब भौ बही धम चला आता है, उसे प्रयत्नके साथ करना चाहिये । इस प्रतिपादके ` 
दिन सब पायोके नाक्ञ करनेवाली, सब उत्पातोको शान्त करनेवाली, कल्के दुःखोको नाद करनेवाखी, ` 
 आयुको बढानेवाली, सौभाग्यके वर्धन करनेवाली मंगल्करनेवाली, दोनों लोकोमें सुख देनेवाली ओर परम | 





पवित्र जो महाहान्ति है उसे कर देना चाहिये । चैत्रसुदी प्रतिषदाको पाच, अध्य, पुष्प, धूप, वस्त्र, अलंकार, = ` 


भूषणः, होम, बलि, उपहार भौर ब्राह्मणभोजनसे सबसे पहिले 





चाहिय ब्रह्माजीकी पुजाके पीछे कमसे सब देवताजो की जुदी जुदी पुजा होनी चाहिये । पुजनके 





| ५ ) र 9 विष्णवे परमात्मने नमः' यहाँ तक जो मंत्र वाक्योके चयोर 





टे कमटलसे उत्पश्च होनेवाले ब्रह्माजोकी पुजा ५ होनी 1 


समुदायम्‌ जाय हए चतुध्यन्त्‌ री ग र ६. ¦ १ 1 


के कि, आदिमे ओम्‌ भौर अन्ते नमः लगा हुभा है, बह सब मंत्ररूपसे ग्रहण किये जायेगे यान अ 





(द) तयसः [ सामान्य ` 





तथा उनकी संर्याओकरे लिये नमस्कार है, दक्षकी पचासो कन्याओं के लिये नमस्कार है दिति सुभद्र ओर 
जयाके लिये नमस्कार है । वुक्च सुशास्त्रके लिये नमस्कार है, सब अस्त्रोके जनक के लिये नमस्कार है, पियो 
 करिके सहित बहु पुत्रवाले तुचे नमस्कार है । बुद्धिके लिये, वृद्धिके लिये, निद्राके लिये ओर घनदाके लि ` 
नमस्कार है ¦ कुबेर जिसका पुत्र है एेसे महापुरुषके लिये नमस्कार है । गुह्यकोके स्वामीके लि नमस्कार ` 
है । क्षं ओर पद्म इन दोनों के खजानोके लिये सदा नमस्कार है । है भद्राकाली तेरे लिये नमस्कारहैषहे ` 
सुरभी ! तेरे लिये वारंवार नमस्कार है" बेद वेदांग जौर बेदान्तकी विद्या संस्थाके लिय नमस्कार है । नाग, ` 
यन्न, सुपणं जौर गर्डके लिये नमस्कार है, सातो समुद्र ओर सागरोके लिय नमस्कार है" उत्तर कुरके ल्यि ` 
ओर मेकूके रहनेवालोके लिये नमस्कार है । भेद्रादव ओर केतुमाल्के लिये सब जगह सदाहौ नमस्कारै, 
इलावत्तके लिये, हरिवषेके लिये ओर किंपुरुष वर्षके लिय नमस्कार है । भारतदेशके बडे बडे भेदके ल्थि ` 
नमस्कार है, सातोपातार ओर सातो नरकोके लिये नमस्कार है, कालाग्निरुद्र भौर जिव दोनोके लिये नमस्कार | 
है. बाराहरूपधारी भगवान्‌ के लिये नमस्कार है, सातो लोकोके लिये ओर महाभूतोके लि नमस्कारै, ` 
 संबद्धिके लिये ओर प्रकृतिके लिपिं नमस्कार है पुरुषके लिये ओर अभिमानके लियि एवम्‌ अव्यक्त मूतिके ल्य | 
नमस्कार है, हिमवान्‌से लेकर जो मुख्य पर्वत हैँ उनके लिये नमस्कार है,पुराणोमें आई हई सातो गंगाजके 
लिये नमस्कार है \ सातो आदि मुनियोके लिये सवेदा नमस्कार है पुष्करादि तीथेकि लिये वारंवार नमस्कार | 
है, वितस्ता आदिक नदियोके लियं वारंवार नमस्कार है, चौदह बडी बडी धरणियोके ल्य नमस्कारहैः 
घाता विधाता ओर छन्दोके लि नमस्कार है, सुरभी ओर पैरावणके लिये वारंवार नमस्कार हैः उच्चैः 
श्रवाके लिये ओर ध्रुवके लिये नमस्कार है, धन्वन्तरिजी एवम्‌ शस्त्र अस्त्रोके लिये सावारंवार नमस्कार ` 
है 1 विनायक कुमार ओर विध्लेश्षोके लिये सदा नमस्कार है । शाख विकश्षाख भौर नैगमेयके लिये नमस्कार 
स्कन्दग्रहो ओर स्कन्द मात्कोके लिये नमस्कार है ज्वर रोगपति ओर भेस्मश्रहरणके लिये नमस्कारदहै 
वालखिल्य ऋषियों ओर केदाव भगवान्‌ के लिये सदा नमस्कार है, अगस्त्यजी, नारजी ओर व्यासजौ 
वारंवार नमस्कार है, अष्सराओके ल्य ओर सोम पीनेवाञे देवोके लिये वारंवार नमस्कार है असोम 
पाके लिये एवम्‌ तुषित देबोके लिये सदा नमस्कार है! बारहो आदित्योके लिये सदा स्वका नमस्कारहै, 
तपस्वी ग्यारहो स्के लिये सदा स्वेदा नमस्कार है, नासत्य, दस्र, अरिवनीकुमारोके लिथे नित्य नमस्कार 
पुराणोके कहे हुए बारहो साध्योके लिये सदा नमस्कार है । उनञ्चासों मसतोके लिये नमस्कार है, दिल्पा- 
चायं देव विदवकमकि लिये नसस्कार है, अयने अनुयायियों सहित आलें लोकपालो के व्यि नमस्कार है, ` 


























~ वरस्जिषाः +. - हिन्दीटीकासहित ` व (६९) ८. 





५ चाहिये \ सब ब्राह्यणोको, मित्रोको, संबग्धियोको ओर बान्धवोको सानुःरोध भोजन कराके पीछे आप भोजनं 


छ करना चाहिये, महोत्सव भौ होना चाहिये, यहं नये संदत्सरके आरंभकौ विधि सब सिद्धियों के देनेवाली ५0 । 

है इति संवत्सरारभ विधिः ।। ; 4 ६ ^ 1 ५ 0 
आरोग्यप्रतिपद्‌त्रतम्‌ अथावेत्रव विष्णुधर्मोत्तिरोक्तमारोग्यप्रति 
` पदव्रतम्‌ पुष्कर उवाच । संवत्सरावसानं तु पञ्चदक्यामु- 
 मपोषितः \। प्रातः प्रतिपदि स्नातः कुर्याद्व्रतमनन्यधोः ।। पुजये्धास्करं देवं ` 
` वर्णकः कमले कृते ।! वणेकेः-रक्तनीरशवेतपीतादिभिः ।\ शुद्धेन गन्धमाल्येन 
चन्दनेन सितेन च ।\ तथा कुन्दुरुधूपेन घतदीपेन भागव ।। कृन्दुरः' शल्लकीनि- ` 
यसि: 1) अपूपैः सैकतैदेध्ना परमाचचेन भूरिणा । संकतेः शकंराविकारेः ।। ओदनेन = 
च शुक्लेन सता क्वणसपिषा ।। सता उत्तमेन ।। क्षीरेण च फलः शुक्लबहुन्राह्यण- ५ ५ 4 
 त्पेणैः ।। पूजयित्वा जगद्धाम दिनभागेः चतुर्थके । आहारं प्रथमं कु्यत्सिध॒तं | 
मनुजोत्तम घतहीनं | विवजयेत्‌ ।। भक्त्वा च सक्ृदेवान्नमाहारं | 





 पानीयपानं च कुर्यादित्यथेः ।। ब्राह्यणानुमत्या भुञ्जानोपि धृतहीनं न भुज्जीत ` 
 धुतहीनं त विवजेयेदिति निषेधात्‌ \। संवत्सरमिदं कृत्वा ततः साक्नात्रयोदकम्‌ ।! 


पूजोपकरणं प्रतिमादि । ज्ञ 
गति तथारथायशस्त 1्यान्विपुलाश्च जो भोग 








स 


न 








(७० 





[ सामान्य 





करोति राजन्‌ स वेदवित्स्यादभुवि धर्मनिष्ठः ।\ कृत्वा सदा द्वादकश्षवत्सराणि 
विरिञ्चिलोकं पुरुषः प्रयाति । इति विद्याप्रतिषद्‌त्रतम्‌ ।। तिलकव्रतम्‌ ।\ 
अयात्रैव भविष्योक्तं तिलकव्रतम्‌ ।। श्रीकृष्णउवाच ।। वसन्तं किुकाश्ोक- 
शोभिते प्रतिपत्तिथिः ।। श्क्ला तस्यां प्रकुर्वंति स्नानं नियममाश्चितः ।। अनेन 
सामान्यतो वसन्तसम्बन्धिश्ुक्लप्रतिपल्लाभेपि तया व्रतमिदं च्रे गहीतं द्विज 








संनिधावित्यग्रिसवचनानुरोधाच्चत्रशुक्लप्रतिपदेव ग्राह्या नारो नरो वा 


क; ङ्क 





` राजेन्द्र संतप्य पितुदेवताः ।। नद्यास्तीरे तडागे वा गृहे बा तदलाभतः ।। पिष्टात- ` 
केन विलिखेद्त्सरं पुरुषाकृतिम्‌ ।। पिष्टात्तकः पटचासको गन्धद्रव्यचूणंविशेषः ।\ ` 
 ततह्चन्दनचूर्णेन पुष्पधूपादिनाऽ्चंयेत्‌ । मासर्तुनामभिः पचाच्रमस्कारान्त- 
योजितः ।। मासतुनामभिः-चेत्रवसन्तादिनामभिः ।। पजयेदब्रह्मणो विदान्‌ मंत्रे 


वेद्‌ ४५०४ शुभैः ।\ संवत्सरोसीति पठन्मन्तरं वेदोदितं द्विजः ।। नमस्कारेण मंत्रेण 














 परिमाषा] _ _  हि्ीटीकासदित (७१) 


न 
नभमन ०५२ 









धक 











पावे स्थितां चित्रलंलां तिलंकालकृताननाम्‌ ।।दृष्ट्वा प्रनष्टसंकल्पाः परावृत्य ` 

गताः पुनः \! गतेषु तेषु स नृपः पुत्रेण सह भारत । नीरुजो बुभुजे भोगान्‌ पूवं 
 कर्माजिताञ्दछभान्‌ ।\ जक्रूरंण समाख्यातं मम पूवं युधिष्ठिर ।। एत्त्रिलोकीतिलका 

` छ्यभूषणं पुण्यत्रतं सकलदुष्टहरं परं च ।। इत्थं समाचरति यः स सुखं विहृत्य 

भत्यः प्रयाति पदमच्युतमिन्दुमोलेः ।। इति तिलकव्रतम्‌ ।\ अस्यामेव नवरात्रारम्भः . 
तत्र परायुता ग्राह्या ।॥ अमायुक्ता न कर्तव्या प्रतिपच्चण्डिकाचेने ।। मुहर्तमात्रा 

कर्तव्या द्वितीयायां गुणान्विता ।। अत्रेव प्रपादानमुक्तम्‌ ।। अतीते फाल्गुने मासि ` 
` प्राप्ते चव महोत्सवे ।। पुण्येऽद्भि विप्र कथितं प्रपादानं समारभेत्‌ ।। ततश्चोत्स- 

` जंयेद्िद्रान्‌ मन्त्रेणानेन मानवः ।। प्रपेयं सवंसामान्यभतेभ्यः प्रतिपादिता ।। अस्याः 

 प्रदानात्पितरस्तुप्यन्तु हि पितामहाः ।! अनिर्वायं ततो देयं जलं मासचतुष्टयम्‌ ष्टयम्‌ ।! 


ध # विनि 















(५२). 1 तराजः 2 ध [ सामान्य- ` 





मतलब पहिले ग्राससे है, घत हीन चाहे पहिला ग्रास हो, चाहे दसरा हो, उसे छोड दे \ एकहीबार अच्को ` 
` खाकर यानी एकी ्रासको खाकर, चकौ को छोडदे ब्राह्यणोकी सलाहसे फिर बाकी आहारका भोजन करके ` 
पानी पीना चाहिये, ब्राह्मणों की आज्ञासे भोजन करता हुमा भी घत हीन वस्तुका भोजन न करना चाहिये । ` 
मयो कि ऽधृतहीनको न खाय, यह निषेध है ! हे भागेव ! एक साल तक इस त्रतको करते हृए तेरह प्रतिष- 
 . दाओंकी देव देवका जन्‌ करना चाहिये । शुक्ला प्रतिपदका प्रतिमास संवत्सर ब्रत करना चाहिये । बयोकि, ` 
`  च्रयोदहा यह्‌ लिखा हु है \ इसके बाद वस्रसहित सोना ओर पुजन के उपकरण प्रतिमा आदिकों को ब्रह्मणको ` 
दे देना चाहिये, इस व्रतके प्रभाव से व्रती अपने सब रोगोको नष्टकर देता है" चाहे पुरष हो चहं स्वीहो इस 
भ्रतसे जो जगत्‌ प्रधानको पजता है वो आरोग्य प्राप्त करता है तथा उत्तम गति यश्च ओर अनेकं भोगं उसे 
` ` श्राप्त होते हं । यहां जगत्‌ प्रधान सर्थको कहते हे ! यह चेतर शुक्ल प्रतिपदाका आरोग्य दायक ब्रत पुराहं । | 
॥ अथ विद्याप्रतिपद्ब्रतम्‌ 
इसी चत्रदुक्ला प्रतिपदाको विद्याब्रत. हीत है ! यह मदनरत्नमं विष्णुधमंमे सिखा हज है । भाकण्डेयजो | 
` बोले कि, सुस्दर रंगोसे अष्टदलकमल बना, ब्रह्माजौफो उसकी कणिक्रार विठाकर उनका पूजन करना | 
चाहिये । पूवं पत्रपर ऋग्वेद, दक्षिण पत्रेपर यजुवद, पदिचम पत्रपर सामवेद तथा उत्तर पन्नपर अथर्ववेद । 
` लिखना चाहिये ! केदाद्धोको जाग्नेयमे तथा धर्महास्त्रोको नैकस्य कोणके पत्रपर तथा वायव्यकोणक्ते प्रपर | 
पराण मौर ईश्ानमे न्याथका चिस्तार लिख घर्मके जाननेवालोको चाहिये कि उपवास पूवकं पूजन करे! 
हि यादव चेत्र शुक्ला प्रतिषदासे लेकर उपवास करता आौर जितेद्िय रहता हज प्रत्येक मासकी प्रतिपत्‌को ` 
ति । एक सालतक इस ब्रतको करे, सफेव गन्धोका अनुलेयन करे, आलस्यरहित भूषणोसे धूषदीषसे 
मनाता रहे । संवत्सरके पीछे त्रत पूरा होजानेषर ब्राह्मणको गऊ दान करे, हे राजन्‌ ! जो पुरुष इसं 
व्रतको करता । है बो वेदोक्रा जाननेवाला धाभिक बनता है, बारह वषे इस्‌ ब्रततको करके त्रह्मलोकमें चला जाता 
तिलकव्रत-भविष्युराणमे कहा है ! भरी कृष्ण बोले कि डाक शुक ओर अकशोकसे कोभित हुए वसन्तमे ` 
त ३४ तिथि आती है, उसमें नियम ठेकर स्नान करना चाहिये । इस वाक्ते सामान्य रूप से वसन्तकी ` 

































। परिभाषा ] इ हिन्दीदीकासहित ध 9 व (७३ ) । 





१ पा ण 90 
१ 











आते जानेकषे लिये अपना संकोच ओर विका कर सेते हो } इस सृष्टिकी उत्पत्ति भौर प्रलय आप्ते | 
ही होतेह । यहां चल रहौ मेरी रक्षा करो । नमस्कार मंत्रसे यानी ओम्‌ संवत्सराय ते नमः इत्यादि मंत्ोसे + 
` पजन करना चाहिये ! फिर वस्चोसे उसे वेष्टित कर देना चाहिये । फिर सामयिक मल फल नैके्य ओर 
` भोदकोसे संवत्सरका पजन करना चाहिये । हे पाथं ! फिर सामने बैठ दोनो हाथ जोडकर करना चाहिये कि, 
` है भगवन्‌, आपकी कृपासे यहं मेरा वषं भर क्षेम रहे, एवम्‌ इस साल्के मेरे विष्न नाज्ञको प्रप्तहो जाये, ` क 
. पीर अपनी शक्तिके अनुसार दान देना चाहिये । जैसे चन्द्रमासे नभस्तल सुशोभित रहता ह उसी तरह उसी 
। दिनसे मुख भी चन्दुनसे अलंकृत रहना चाहिये प्रति दिन माथेयर चन्दनका तिलक करना चाहिये । हे पुरुष ` ॥ 
व्याघ्र स्त्री हौ, अथवा पुरुष हो, जौ इस त्रतको एक सार तक करता है, बो भूमंडलमं दिव्य भोर्गोकी भोगता = ` 
। | है भत, प्रेत, पिक्षाच ओर एसे वैरी तथा ग्रह जिनका निवारण ही न हौ सके वे इस तिलक को देवते ही 
। तिरक दहो जाते हे! निरथेक यानी प्रयोजन शून्य, जो किसी तरह भौ अनिष्ट न केरसकं } पहिले एक शत्रुनय 
नामक जयी राजा था उसको चित्ररेखा नामक स्त्री थौ, जो परम चरित्र ज्ञालिनी थौ । उसने यह्‌ व्रत चेत्र" ` 1 
मासमे ब्राह्मणों के सामने ग्रहण किया था तथा संबत्सरका पूजन करके भगवानृका ध्यान किया । जो कोई = ` ( 
। उसे भारनेके लिये भौ आता था वहं चि्ररेखाके तिलकको देखकर उसका शुभे चिन्तक बनकर जाताथा। 
, इसके सामने सोतोका अभिमान चूण होता था, सब इसके वडा थे, यह्‌ अपने पतिका मुख देखकर प्रसन्न रहती ` 
। द्मे कोई आकुरुता नहीं थी, जितने में मत्त हाथीने इसके पतिको मार डाला उतनेमें सुहदोका सुलदेवेवाखा = 
पुत्र क्षिरकौ पीडासे मर गया, वहाँ सब भूतोको ठेजानेवाले धर्मराजे पुरसे प्राप्त हृए । हे महाराज ! उसी 
ण धर्मराजके किकर चित्रलेखा द्वारपर आये ओर ज्र घर धुसगये ये काल मृत्युके अगाडी चलनेवाठेथे, ` 
शत्रुजयको लेनेकेलिये आये भे, पर उसके पाश्वमे तिलक गाये हुए चित्ररेखा बैठी हुई थी, उसे देखकर उनका ` 
संकल्य नष्ट हो गया आर वापिस चले गये । हे भारते ! उनके चरे जानेपर राजा पुत्रके साथ रोगरहितहोगया, ` 
तथा पू्वकर्मसे संग्रह क्रिये हुए पवित्र भोगोको भोगनें लगा, है युधिष्ठिर ! पहिले यह्‌ मुने अक्रूरजीने कहा थाः. 1 
यह्‌ तिलक्र धिलोकी तिलकं है सकल दुष्टोका हंरनेवाङा परम पुण्यव्रत है, इस प्रकार जो कोई इस वतको ८ 
करता है बह इस लोकम सुखभोगकर अन्तम न नष्ट होनेवाले इन्दुमौलिक पदको चल जाता है, यह तिक्क- ` 
व्रतकौ कथा पूरी हूर । नवरात्र-इसीमे ही नवरात्रका आरंभ होता है, नवरात्रमं प्रतिपद्‌ द्वितौयासे युक्त 




























इ १ मतरस प्याऊ दिवे कि-यह्‌ प्याऊ स प्राणिमाच्रके ४ दानमे { 
तृप्तही माहुतक हत उसका पानो न टूटने पाये, जौ प्याऊ देनेको तं शक्ति न 





(७४) 





[ सामान्य | 





दो ब्राह्मण के लिये तथा एक देवके लिये देकर दोनोका स्वयम्‌ भोजन करके इस प्रकार पाँच वषंकरके पी 
वक्ष्यमाणं उद्यापनं विधिसे उद्यान करना चाहिये , 


अथ सवंशिववृतेषु पूजा 


आयाहि भगवञ्छम्भौ शवं त्वं गिरिजापते ।! प्रसन्नो भव देवेश नमस्तुभ्यं हि 
शंकर ।। त्रिपुरान्तकरं देवं चन्द्रचूडं महाद्युतिम्‌ ।\ गजचमपरीधानं सोममावाह्‌- ` 
 याम्यहम्‌ ।। आवाहनम्‌ ।। बन्धूकसलिभं देवं त्रिनेत्रं चन्द्रशेखरम्‌ ॥\ चिशल्धारिणं 
देवं चारुहासं सुनिमंलम्‌ \\ कपालधारिणं देवं वरदाभयहस्तकम्‌ ।। उमया सहितं ` 
शम्भं ध्यायेत्सोमेहवरं सदा । ध्यानम्‌ 1! विषवेश्वर महादेव राजराजेश्वरप्रिय ! ` 
आसनं दिग्यमीश्ान दास्येऽहं तुभ्यमीरवर ।। आसनम्‌ । महादेव महेशान ` 
` महादेवे परात्पर ।। पाद्यं गृहाण मट्‌त्तं पावेतीसहितेरवर ।। पाद्यम्‌ ।। त्यंबकंश ` 
सदाचार जगदादिविधायक ।! अर्यं गृहाण देवेश साम्ब सवर्थिदायक ।। अर्ध्यम्‌ ।, 











































परिभाषा । हिन्दीटीकासहित = (८५) ` 
हषीके सयाकारि व्रतं दानमनंकधा \\ ्नोतुमिच्छामिदेवेा तरतं सस्प 
 ॥१॥। येन व्रतेन देवे पुना राज्यं लभामहे ।। तथा तरतं ठु. न नहि यादवानां 
` कृपाकर । २। श्री भगवानुवाच ।\ वदामि शुभदं पाथ लक्ष्मीवृदधिप्रदायकम्‌ ।। ` 
 धर्मार्थिकाममोक्नाणां निदानं परमं ब्रतम्‌ \। ३ \\ यधिष्ठिर उवाच ।। केन चाद 
पुराचीर्णं मस्ये केन प्रकाशितम्‌ ।। विधिना केन कतव्य तत्त! मूहि कंशव ॥\४।। 
 जसगवानवाच \। आसीत्‌ सौम्यपुरे राजा सोमो नामेति विश्रुतः ।\ क्षात्रध्मेऽति- 
कुशलः प्रजापालनतत्परः ।। ५.।। तस्य राज्यं प्रज सौम्याः सर्वधमेपरायणाः।। ` 
तस्य राज्ञस्तु चामात्यः सोऽपि सौम्यशुभावहः ।। ६।\ तस्मिन्सरस्तु सोम्यं च सदा 
 साम्याम्बना प्लुतम्‌ 1 अभूत्सोमेश्वरो देवो लोकानां पालनान न ।। ७ ।। तत्रा 0 
` भवत्सोमशार्मा ब्राहमणो वेदपारगः \ वेदार्थविच्छास्त्रविच्च शुद्धाचारोऽति- 
दभः ॥\ ८ ।। तस्या भार्या ज्ुभाचारा पुरन्धी चारभाषिणी !। भतं शुश्रूषणरता ` 
कल्याणी प्रियवादिनी \1 ९ ।। सोऽकरोच्च कुटुम्बाथ कणयत दिनेदिने । नकेभे 
| चाधिकं तेन धनधान्यं तथैव च ।\ १० ।। अतीव खेदलिन्नस्तु विचायं च पुनः 
पुनः 1! क्व करोमि क्व गच्छामि सभार्योऽहं महीतले ।। ११ ।। कन कमेविपाकेन 
इदं लभ्यते फलम्‌ \। अथवा्थकरं धर्म देवपुजादिकं शुभम्‌ ।\ १२ \। स सोमे- 


` शओेऽकरो क्ति देन्यनाशाय पाथिव 1! ८ कदाचिदतिविन्नः सन्‌ स जगाम सरोवरम्‌ 


तस्मिन्सं म्सौ तम्यसरोवरे ।। वृद्धनराह्यणरूपेण ! श कृपया 























(द) ल व्रतत [ सामान्य- 





1 ई ;; (1 1 त 
मिति पिनि पिति तोम सि 5 ५ 


अद्यारभ्य व्रतं देव रोटकाख्यं मनोहरम्‌ \\ करोमि परया भक्त्या पाहि मां जगतां 
गुरो ।। २६ ।1दिनेदिने प्रकर्तव्या पूजा देवस्य शूलिनः \ कथां विना न मोक्तव्यं 
प्रत्यहं च पुनः पुनः ।। २७ ।! उपोषणं चतुदंहयां कतंव्यं विधिपूवंकम्‌ ।। शुचिर्भूत्वा 
दिने तस्मिन्‌ कतेव्यं रोटकव्रतम्‌ ।। २८ ।¦! अथ उपोषणप्राथनामन्त्र :-चतुद्दयां ` 
` निराहारः स्थित्वा चैव परेऽहनि ।। मोक्षयामि पार्वतीनाथ सवेसिद्धि प्रदायक 
 ॥ २९६) कृत्वा माध्याह्लि कं कर्मं स्थापयेदव्रणं घटम्‌ \\ पञ्चरत्नसमायुक्तं ` 
 पवित्रोदकमुरितम्‌ । ३० ।। सर्वोषधिसमायुक्तं पुष्पादिभिरल्डकृतम्‌ ।। वेष्टितं. 
 इवेतवस्परेण सर्वाभरणभूषितम्‌ ।। ३१।। तस्योपरिन्यसेत्पात्रं तारं चैवाथ वैण- ` 
वम्‌ ।! विरच्याष्टदलं तत्र पुजयेदरुमया शिवम्‌ ।। ३२।। कत्वा सायाद्धिकं कम॑ 
 नित्थपजादिकं तथा ! तस्यां रात्रौ तु क्तेव्या पूजा देवस्य शूखिनः ।1३३॥ शुभे ` 
चैव प्रदेशे तु कर्तव्यः पुष्पमण्डपः 1। पुज्यस्तत्र शिवो देवो धर्म॑कामार्थसिद्धये। 
11३४1 क्षीरादिस्नापनं कुर्याच्चन्दनादि विलयनम्‌ ।1 कृष्णागुरसकर्पूरमृगनाभि- ` 
विमिभितम्‌ 1 ।३५।। पूष्ेर्नानाविधे रम्यैः पूज्यो देवो महेश्वरः । धनकामेन 
कर्तव्या पूजा देवस्य शूलिनः ।\३६।। बिल्वपत्रेरखण्डेहच तुलसीपत्रकंस्तथा ।। 
धनी ।! ३७ ।। कल्हारकमलैचैव कुमुदेश्चा- . 
शोभनं मनेः ।॥ चस्पकर्मालतोपुष्पेम॑चुकुन्देः श्युभावहैः ।\ ३८ \\ समन्दारह्चाकं- ` 
व पुला्हर्च शिवप्रियैः \\ अन्येरननाविधैः पुष्यचछतुकाल्ोद्धुवेस्तथा ।३९॥ 













न 





 परिमाषा} _______हियीटीकासहित _______ (७७) 


च शिषप्रियम्‌ ।\५२।। दारिद्र्नाशानं पुष्यं लक्षमीवृदधिप्रदायकम्‌ ।। कर्तव्यं विधि- ` 
 बद्धक्त्था श्रोतव्यं तु कथानकम्‌ ।। ५३।। गौतवाद्यादिसहितं कर्याञ्जागरणं ` 
निश्चि ।) ततः प्रभाते विमले. स्नात्वा पूजां समापयेत्‌ ।। ५४।। परूवाक्तेविधिना 


न = द न ~ = ` न= 


चिप्र 
पयेत्‌ \\ ५६।। यन्न्यूनं कृतसंकल्पे ब्रतेऽस्मिन्‌ ब्राह्मण प्रभो ।। तत्सवं पुणतां यातु | 
 युष्मद्दृष्टिविलोकनात्‌ ।! ५७।। एवं यः कुरुते पाथे शास्त्रोक्तं रोटकव्रतम्‌ । || 
| अनायासेन सिद्धयन्ति हृद्याः सर्वे मनोरथाः ।।५८।। सभतेका महानारी करोति || 
|  विधिवद्द्रतम्‌ ।। पतित्रता सा कल्याणी जायते नात्र संशयः ।\ ५९।। इति शिव- 


लिये नमस्कार है, आप प्रसन्न हृजियेः। त्रिपुरका अन्त करनेवाे गजचमको पहिने हए महाचुति चन्द्रचूडदेब 
श्रीसोभेश्वरकां आवाहन करता हं । इस मंत्रसे आवाहन करना चाहिये ।। बंधूक्षके समान कान्तिवाले तीन = 
नेव्रधासी निसके कि, शिखरे चन्द्रमा है एेसे न्रिशुख धारण करनेवाले, सुन्दर हासवाले, अत्यन्तं स्त्र 
` वराभय मुद्रा युक्त रहनेवाखे, कपाल्धारी जो उमासहित सोमेदवर शिव हे उनका मे ध्यान करता हुं । यह 
` ध्यान है 1) हे महाराज ! विष्वेहवर ! हे राजेश्वर ! ह ईश्वर } हे प्रिय ! ईशान ! मे जापको दिष्य 
` देता हं । इस सं्रसे आसन दे \। हे परसे भी षर ! हे महादेव ! हे महेशान ! हे ईदवर ! मेरे व्िहृए पा्यको 
उमा सहित ग्रहण करिये । इससे पाचका प्रतिपादन करे 1! हे व्यंजकेश ! सदाचार ! हे जगतूके आदि विधायक 
है देवेश ! हि शर्वंक ! हे प्रयोजनके सिद्धकरमेवाके! अंबासहित अरध्यको ग्रहण करिये । इस संत्रसे अर्घदेना = 


 आचभनीयको ग्रहण करिथे } इससे आचमनीय देनी लौ चा चाहिये हये 





















५१।। रात्रौ जगरणं कुयत्पुनज्यो देवो महुश््वरः ।। पणन विधिना विप्र कतव्य 


तेनं कतव्य श्िवयपुजनम्‌ ।। तत्सवं दापये-डुक्त्या ब्राह्मणाय कुटुम्बिने ॥\५५ 





य वेदविदुषे वस्त्रालंक्ारभोजनैः 1 सपत्नीकं गरं पुज्य ततो भक्त्या क्षमा- || 








अथ पूजा-हे भगवन्‌ ! शंभो ! है गिरिजापते ! हे शवं ! आप आइये, हे देव देवेश ! हे शंकर { ! आपके 








] हे शादवत ! पविन्र पानीसे तयार की हई ` 
मे ॥ क्षीर, आज्य, दधि, मयु, वराकंरा इः 





चाहिये ।। हे तरिूरान्तक ! हे दौनोके वुःख नाशक ! हे श्रीकट 












(०८) 4 {4 श्रतसजं त , सामान्य 





प्राणिमात्र का पति हिरण्यगर्भं हुजा उसीसे जमौन आसमानको धारण किया, हेम उसी प्रजापतिके लिये 

करते है । इससे दक्षिणा देनी चाहिये \ अग्नि रवि ओर विभु नारायण ये तीनों ज्योति हं) मेँइन दीपोतस्े 
सुरेश्वर देवेश्को नीराजन करता हं । इससे नीराजित करना चाहिये । जगतके हैतु एवम्‌ संसारसमुत्रकेसेतु ` 
तथा सज विद्याओं के प्रभव, गर शंभुके लिये नमस्कार है, इस मंत्रसे नमस्कार \) “~ यानि कानि च“ इससे 
प्रदक्षिणा करनी चाहिये \! इसका अथ पहिले हौ लिख चुके है । हे हर ! है अखिल चिदवके आधार ! ओौर ` 
` स्वयं निराघार निराश्चय ईक सोमेवर ! पुष्पांजलि ग्रहुणकरः, तेरे ल्य नमस्कार है । इस मन्त्रसे पुष्पांजलि ` 
 , निवेदन करना चाहिये ।\ सुव्णसे भली भोति बनाया हुभा निदयूलकेसे आकारवाला यह मेरा बिल्वपत्र 
हे, हे शंभो! इसे ग्रहण करिये, ; इस संत्रसे बेलपत्र चढाना चाहिये ।\ अथ कथा-युधिष्ठिर बोले कि, है 
हषीकेडा ! मेने अनेक तरहके वरत ओर दान किये हे देवेडा ! मे जापसे उस्‌ व्रतको सुनना चाहता हूं जो संपत्ति 
देनेवाला हौ) १\) हे देवेश! जिस व्रत. के करने से मुञ्चे फिरराज्यमिल जाय, हियादवों के ` 
कृपाकर ! उस ब्रत को सु किये ॥ २॥ भगवान्‌ बोले कि, हे पार्थं ! भे अप्को एक 
ब्रत कहता, जो श्रुभ का देनेवाला, लक्ष्मी की वृद्धि करनेवाला एवम्‌ धमे, अथे, काम ओौरं मोक्ष का ` 

` परम कारण है \\३।1 युधिष्ठिर बोले कि, पहिले इसं ब्रतको किसने किया था, कौन इसे प्रकाशमे लाया भा, ` 
` एवम्‌ किंसतरह इसे करना चाहिये, हे केशव ! सब कुछ मुञ्च किये !\ ४।\ श्रीभगवान्‌ बोले कि-पहिले ` 
एक बडा अच्छा सोमनामका राजा था, वो क्षात्र धर्ममे कुराल था प्रजा पालनमें तत्पर था ।\५।। इसके राज्यम 
। . उसकी प्रजा धमं परायण तथा सज्जन थी, उस राजाके जो संत्रीलोग थे वे भौ सोम्य भे ओर सुख देनेवाले 1 
६।\ उसके नगरमे एक सुन्दर सरोवर था जिसमें बडा स्वच्छ पानी रहा करता था, वहाँ लोकोके पालनके ` 
लिय सोमेश्वर शिव विराजा करते थे \॥७।\ बह एक बेदवेदान्तों का जाननेवाला, सकल शास्त्रोकावेत्ता = 
अत्यन्त सदाचारी वेसा कि कहीं दंढनेनेसे भी न मिल सके,एेसा एक सोमशर्मा नामका ब्राह्मण रहता था । ` 
उसकी स्त्री अत्यन्त सदाचारिणी, मिष्ट ओर भ्रियभाषिणी परमसुन्दरी पतिकी सेवा करनेवाली ओर कल्याणी, 

५1 नही, इस कारण वो प्रत्यह्‌ कुटुम्बके कण यज्ञ किया 
करता था ।\१०।। एक दिन अत्यन्त चिन्न होकर विचारने लगा कि में क्या कर्‌, स्त्री समेत कहां चला जाऊ 
1 कौनसे कर्मसे मुन्ञे ठेसा फल मिले अथवा देवपुजादिक ही शुभ अथं धमकर धमं है ।\१२।। हे पाथिव ! = 
 कंगाखीके नाश करनेके सिये सोमेदामे भक्ति करनेलगा, कभी अत्यन्त चिच्च होकर सरोवर पर पहुंचा ॥1१३।। ` 
सौम्य ! उस सुन्दर सरोवरपर परमकृपासे युक्त श्रौ सोमेहवर भगवान्‌ वद्ध ब्राह्मणके रूपम उसे प्रत्यक्ष ` 
४।। उन्होने बो उत्तम आह्यण सोमन्स्माको अत्यन्त दुःखी देख बोले कि, आप इतने बड़े विद्यावान्‌ ` 
हो रहे हे ।\१५५। सोमशर्मा बोरा कि, मेने पहिले कुछ दान नहीं किया था इस कारण मेरौ , ` 































तथा तुलसीदललोसे 


 पर्भिषा | 1 हि्वीदरीकासति 9 





` उपोषणकी प्रा्थनाके मत््-हे सब सिद्धियोके देने हारे पार्वतीनाय ! चवु्दशीको निराहार रहकर दसरे दिन 
भोजन करूंगा । २९१! मध्याह्न कारके सन कृत्य करके एक सावित घट स्थायन करना चाहिये, बो पंचरत्तेसे 
 य॒क्तहो तथा षवित्र पानीसे भरा हभ हौ ।\३०।। बा सब भौषधियोसे युक्त हो तथा ए्लोसे अलंकृत हो, श्वेत 
 चस्त्रसे वेष्टित हो तथा सज आभूषणोसे मूषित हो ।\३१।। उस कलकाके उपर तांतरेका अथवा वेणुका पत्र 
हो तहँ अष्टदल कमरुको वनाकर पवेती सहितं शिवजीका पुजन करना चाहिये ।। ३२ ।\ सायंकालका ` 
 नित्यकमं तथा नित्यपुजा करके उसी रातको शल्धारी हिवकी पूजा करे ।\ २३ ।। सुन्दर जगहमं पुष्य मंडप 
करना चाहिये । वहाँ धमे, काम ओर अथेकौ ४ 
स्नान कराकर चन्दनादिका केप करना चाहिये, उसमें कृष्ण अगर कपुर जौर कस्तुरी मिली रहनी चाहिये = ` 
॥३५।। तथा अनेक तरहके कूलोसि धनकौ कामनावालेको पजा करनी चाहिये ।।३६।। अखण्ड विल्वपत्र | 
५ सीदलोसे तथा नीके कमरोसे कौ हुई पुजा अत्यन्त पुण्य बढाती है । \\३७।) कल्हार, कमल एवम्‌ | 
सुन्दर कुमुद ओर शुभावह चंपक, चमेली ओर म्‌ चुकुन्दके एूलोसे \।३८।। मन्दारके पुष्य तथा शिवजी के | 
` प्यारे आकके फूलोसे तथा ऋतुकालके अनेक तरहके पुष्पोसे शिवाचन करना चाहिये ॥।३९॥। पुण्य वडानेके , | 
साधन जो अनेक तरहके धूप हें, उन्हं पुनम लाना चाहिये तथा घीसे भरे हए सुन्दर दीपक करने चाहिये | 
| रिवजीके भोज्यो तथा अनेक तरहके सुन्दर जन्य उपचारोसे ।*४१। | 
नैवेद्य करना चाहिये, पर विशेषकरके तो रोटोकाही नैवे हो । पुरषके आहारक पांच रोट हो ।४२।१इन 
 रोटों में चावल ओर हका आटा बराबर हो, दो तो ब्राह्मणको देदे तथा रोका अपना भोजन हौ ।४३।। 1 
समन्नदारको चाहिए कि, सदा एक रोट देवके लिये, नैवेद्ये देदे फिर शिवके लिए सुन्दर ताम्बूलदे ।४४।। | 
त ` पीछे धनसंपत्ति देनेवाला अध्य दान करना चाहिये । जंबीर, नारियल, ऋमुक, बीजपूरक\\४५।) अखरोट, ` ¢ 
५ 9 खजूर अच्छी द्राक्षाएं ओर मनोहर मातुलिद्ध, अनार ओर सुन्दर नारंगियां ।\४६।। तथा सुंदर ककंटी मी 





सिदिके लिये शिवका पुजन करना चाहिये \\३४।। क्षौरादिसे 











1 ४०।। शिवं 


के प्यारे स्वादिष्ठ लह्य, पेश ओर भोज्यो 








(८ ०) 01 नेत राजं | [समान्य ` 





श्राद्धं मातामहं कुर्यात्‌ सपिता सद्भवे सति 1! जतमाजोपि दोहित्रो जीवत्यपि हि ` 
मातुर \ प्रातः सद्धबयोमध्ये याऽदवयुक्प्रतिपःडूवेत्‌ ।) अत्र सपिता इति विलेष- 
 णाञ्जीवत्पितक एवाधिकारी पिण्डरहितं कूर्यात्‌ ।। मुण्डनं पिण्डदानं च प्रेतकमं 


च सवशः \। न जीवत्पितृकः कृर्याद्गुविणीपतिरेव च ।\ इति पिण्डनिषेधात्‌ । ( 
 अनघ्रेव नवरात्रारम्भः \। तत्र परविद्धा ग्राह्या ।\ तदुक्तं गोविन्दाणवें माकण्डय- 


 देवीपुराणयोः-प्वेविद्धा तु या शुक्ला भवेत्मतिपदार्विनी ।। नवरात्रव्रतं तस्यां न॒ 


कार्यं ज्ुभमिच्छता \\ देशभङ्धो भवेत्तत्र दुभिक्षं चोपजायते ।! नन्दायां द्क्- ` 
 य॒क्तायां यत्र स्यान्मम पूजन्‌ ।। तया देवीपुराणं-न दश्कल्या यक्ता प्रतिपन्च- ` 1 


. ण्डिकाच॑ने ।! उदये द्विमुहर्ताऽपि ग्राह्या सोदयकारिणी ।। यदा पूर्वदिने संपूर्णा ` 


शुद्धा भूत्वा परदिने वर्धते च तदा संयुणत्वादमायोगामावाच्च पूवव ॥। यानि तु ` 
 दित्तीयायोगनिषधपराणि वचनानि श्रुतानि तानि शुद्ाधिकनिषेधपराण्येव ।॥ ` 
परदिने प्रतिपदसत्वे तु अमायुक्तापि ग्राह्या ।। तदाह लल्लः-तिथिः शरीरं 






। तिथिरेव कारणं तिथिः प्रमाणं तिथिरेव साधनम्‌ ।। इति ।। यानि त्वमायुक्ता 
 प्रकरतैग्येति नसिहप्रसादोदाहूतवचनानि तान्यप्येतद्विषयाण्येव ।! अत्र देवपूजा 
धा अष्टम्यां ध । च नवम्यां च जगन्मातरमम्बिकाम्‌ ।। 


च च्चण्डिका्च॑ने ।। तयोरन्ते विधातव्यं कलशस्थापनं गुह ।। इति ।! यदा तु 

ृत्यापि २ हिता प्रतिपन्न कभ्यतं तदोक्तं कात्यायनेन-प्रतिपद्यारिविनं मासि ` 

वेषर्ति चत्र योः ।। आच्चयादौ परित्यज्य प्रारभेन्नवरात्रकम्‌ ।! इति ।! सद्रया- ` 
तपरेव चित्रायुक्ता यदा भवेत्‌ ।। वेधत्वया वापि युक्ता स्यात्तदा 








~ -- --- -- ~ क ~ -- = ~ र~ ८ = = <~ ठ घ 3 4 ध 


 ज्तानि)  ह्ीदीकासहिति (८१) | 


अथञआद्िवन शुक्ल प्रतिपदाको मातामहका श्राददौहित्रको करना चाहिये यह हैमाद्रिमे है किजन्म ठेतेही दौहित्र ` 
उचित है कि मामाके जिन्दे रहते हृए भौ आश्िवन शुक्ला प्रतिषदाको नानाका श्राद्धे करे ! यह्‌ प्रतिपदा संगव ` 
कार्तक रहनेवाली लेनी चाहिये; यह निर्णय दीपमें कहा है कि पिताके जिन्दे रहते हए दौहितरको चाहिये; ` 
कि आद्िवन शुक्ला प्रतिपदाके संगव काल मं मातामहका श्राद्ध करे । जातमात्र भी दौहित्र मामकेजीवित ` 
रहते हए भी प्रातःकाल ओर संगवके मध्यमे जो आश्िवनक प्रतिपदा हो तो अवद्य श्राद्ध करे । यहां दौहि्रका || 
जो “ सपिता" यह्‌ विकेषण किया है, इससे पिताके जिन्दे रहते ही अधिकारी हे 1 श्राद्धमी पिण्ड रहित करना || 
चाहिये, क्यो कि, जिसका | 
स्त्रीके पतिकोहीये काम करने चाहिये ।। इसमें ही नवरा्रका आरंभ होता दै-दसमं द्वितीया- ` 
सेविद्धा प्रतिपदाखेनी ॥ 
` विद्धाजो आदिन प्रतिपदा हो तो, शुभ चाहनेवालेको उसमें नवरात्रका प्रारभत करना चाहियेएेता करनेसे = 
अहां देश भंगभौ होता है तथा अकाल पडता है, जो दायुक्त नन्दाम मेरा पूजन होयतो । एसे ही देवौ पुराणम ` 


है \ षराउदय दय कालमें दो घडी भी प्रतिपदा हो तो बह उदय करनेवाी है उसमे दर्ग पूजन करना चाहिये! = ` 
भब प्रतिषदा पूवं दिनम सपुणं शुद्ध होकर द्वितीयामे बढती 
 चास्याका योग न होनेकेकारण पर्वाही करनी चाहिये । 








सका बाप जिन्दा हो, उसे मुण्डन, पिण्डदान ओर प्रेतकमं न करना चहिये न गभिणी  । 





चाहिये येही सोविदाणेवमे देवोषुराण भौर माण्ड पुराणके बचन कहे है कि पूवस ` 





स 


लिखा है कि, जिस प्रतिपदा अमावसकरी एक कला भौ मिलीगई हो वो चंडिकाके पूजनम उपयुक्त नही = ` 
















१ हो तो उसं समय संपूणं होनेके कारण तथाजमा- = 
"९ जं जो तो द्वितीयके योगम निषेध करनेवाले वाक्य ध । | | ॥ 
सुनेगये है वे शुद्धे अधिक के विषयमे निषेधपर है । पर दिन प्रतिपद्‌ न हो तो अमा युक्तका भौ रहण कर ` 











कना । यहौ लल्ल कहते हं कि-तिथि ही शरीर है, तिथि कारण है भौर तिथि ही प्रमाण है । जो नररसिह्‌ ` 1 
 भ्रसादने बचन उद्धत किये हँ कि अमायुक्ता करनी चाहिये वे भौ पर दिन प्रतिपद्‌ न हो तो अमायुक्तमं ही 
करो, इस विषयके ही हे \ इसमें देवौ पूजन प्रधान है, उपवास आदिक उसके अंग हँ । क्योकि, हेमागरिमं भवि- 








(1 अन (तिप 


ध 


प 


दुर्गापूजा कूमारीयूजादि करिष्ये ।इति संकल्प्य तद द्धः गणपतिपुजनं पुण्याहवाचनं `: 
 मातुकप्पूजनं नान्दीश्राद्धं च करिष्ये इति संकल्प्य गणपतिवुजादि कृत्वा ततो ` 
 सहीद्यौरिति ममि स्पृष्ट्वा ओषधयः संवदंत इति यवालचिक्षिप्य आकलशेष्विति ` 
कुम्भं संस्थाप्य इमं मे द्धे इति जलेनापुये गन्धद्रारामिति गन्धम्‌ ।। ओषधयइति ` 
 सर्वोषधीः।\ काण्डात्काण्डादिति दूर्वाः \\ अश्वत्थे व इति पञ्चपल्लवान्‌ ।\ ` 
 स्थोनपृथिवीति सप्तमृदः ।। यः फलिनीरिति फलम्‌ \ स हि रत्नानीति पंचर- ` 
त्नानि ।। हिरण्यरूप इति हिरण्यं क्षिप्त्वा ।। युवा सुवासना इति वस्त्रेण सूत्रेण ` 
 वाऽ्वेष्टच पूर्णादर्वीति पुणेपात्रं कलशोपरि निधायतच्र वरणं संयुज्य जीर्णायां 
 नूनाधां वा प्रतिमायां दुर्गामावाह्य पूजयेत्‌ ।। नू्‌तनमूतिकरणेऽन्नयुत्तारणं कुर्यात्‌ ` 
अयं पूजा ।\ आगच्छ चरदं देवि देत्यदपकनिबदनी \\ पज; गृहण सुमुखि नमस्त ८ 
 शंकरभ्रिये ।। स्वेती्मयं वारि सवेदेवसमन्वितम्‌ ।\ इमं घटं समागच्छ तिष्ठ ` 
देवि गणैः सह \! दुगे देवि समागच्छ सान्निध्यमिह कलत्वय ।। बलिपूजां गृहाण ` 


 त्वमष्टभिः शक्तिभिः सहं ।। शंखच र दाहस्ते शुभरवर्णे शुभासने ।॥ मम देवि 








र क ध ॥ या प क प 1 2 
एावयातायनाा----------------------------- , . ( ॥ त 5 स 0 1 9 
ष 4 र < ¢ र 
¢ 0 ५: (व ~ 


(८३) 








ह | मनसः काम० पुष्पाणि \। अहिरिव भोगेः० ऋक्‌ \ परिमलद्रव्य। णि }) अथाङ्घ- 
पूजा ॥। दुगि नमः पादौ पूजयामि । महाकाल्ये° गुल्फो प्रु । मङ्गलाय ° जानु 


 नीपु० 1 कात्यायन्ये° ऊरू प° । भद्रकाल्यं० कटी पू० । कमलाय नाभि पू... 
 किवायै० उदरं पु० ! क्षमायै हदयं पु० \ स्कन्दाये० कंष्ठं प° । महिषामुर- 
मदिस्ये० नेत्र पू० । उमाय श्चिरः पू० ¦ विन्ध्यवासिन्य० सर्वाद्धः प° । दशाद्ध 
 गग्गलं धपं चन्दनागरसंयतम्‌ । सया निवेदितं भक्त्या गृहाण परमेश्वरि \॥\ ` 
यत्पुरुषंव्य० कदमेनधरनाभू० धूपम्‌ । आज्यं च वतिसयुक्तं वह्धिना योजित लया ॥। | 
। दषं गृहाण देवि स्वं त्रैलोक्यतिभिरापहे ।। ब्राह्मणोस्य ० आपः सुजन्तु° दीपम्‌ ।॥ 
अन्नं चतुर्विधं स्वादु रसैः षड्भिः समन्वितम्‌ ।। भक्ष्यभोज्यसमायुक्तं प्रीत्यथं 
प्रतिगृह्यताम्‌ ।। चन्द्रमा० आद्रा पुष्क० नेवम्‌ । आचमनीयम्‌ ।\ मलयाचल 
संभूतं कस्तूर्या च समन्वितम्‌ ।। करोद्र्तनकं देवि गृहाण परमेदवरि ॥! करो्- = 
` तनम्‌ ।। इदं फलं मया देवि स्थापितं पुरतस्तव ।! तेन से सफलावाप्तिभवेज्जन्सनि ` 
| जन्मनि । नाभ्याजा० आ्द्रायःकरि० फलम्‌ ।।! पुगीफलम्‌ महदहिव्यं नागवल्ल्या = 
 वलर्बुतन्‌ \\ कर्प्रेलासमायक्तं ताम्बलं प्रतिगृह्यताम्‌ ।! ताम्बूलम्‌ हिरग्यगभेति ` 
दक्षिणाम्‌ ।। यज्ञेनयज्ञं यः शुचिःप्र° 1! संत्रपृष्पाञ्जलिम्‌ ।॥ अहवदाये गोदाय 
इत्यादि प्राथयेत्‌ ।। ॐ भ्ियेनातः नीराजनम्‌ ।। श्रसुक्तं संपुर्ण पटित्वा पुष्पाञ्जन ` 
 लिम्‌ । मंवहीनं क्रियाहीनं भवितहीनं सुरेश्वरि ।\ यत्पुजितं सया देवि परिपुणं 
तदस्तु मे \\ महिषध्नि सहामाये चामुण्डे मुण्डमालिनि \\ यशो देहि धनं देहि 
सर्वान्कामांइच देहि मे ।! नमस्कारम्‌ ।! अथ कुमारीपुना ।। ॥ एक्वर्षातुया | 












न्या पूजार्थे तां विवजंयेत्‌ ।\ गन्धपुष्पफल्गदीनां प्रौतिस्तस्या न विचय 





सीं मातृणां रूपधारिणीम्‌ ।। बनदुर्गात्मिकां साक्षात्कन्यामावाह- ` 
इति । तासां पृथंड नासान्याह-दिव्षकन्यासारम्य दशवर्षां + | ५ 














1 ब्रतराज प्रतिषद्‌- 





जननीं नित्यां कल्याणो पूजयाम्यहम्‌ ।।! ३ ॥ अणिमादिगुणाधारामकारा- ` 
 चक्षरात्मिकाम्‌ ।। अनन्तशक्तिभेदां तां रोहिणीं पजयाम्यहम्‌ ।। ४ ।) कामचारी 
 कामरात्रीं कालचक्रस्वरूपिणीम्‌ ।! कामदां करणाधारां कालिकां पूजयाम्यहम्‌ ` 


 ॥५। उग्रध्यानां चोग्ररूपां दुष्टासुरनिब्हिणीम्‌ ।। चार्वद्खी चण्डिकां लोके ` 
 पुजितां पूजयाम्यहम्‌ 1\ ६ 1 सदानन्दकरीं शान्तां सवेदेवनमस्कृताम्‌ । सवै- 
` भूतात्मिकां लक्ष्मीं ज्स्भवीं पुनयास्यहम्‌ 11७ ।! दुर्गमे दुस्तरे युद्धे भयदुःखविना- ` 
 किनीम्‌ ।। पूजयामि सद्य भक्त्या दुर्गा दर्गात्िनाशिनीम्‌ । ८ ।! सुन्दरीं स्वणे- ` 


क. =, 


वर्णाभा सवेसौभाग्यदायिनीम्‌ 1! सृुभद्रजननीं देवीं सुभद्रां पूजयाम्यहम्‌ ॥९।॥ ` 
इति कुमारीपूजनम्‌ ॥। प्रारम्भोत्तरं सूतकप्राप्तावाह ।। सूतके पुजन प्रोक्तं जपदानं ` 
 विक्ञेषतः ।! देवीमुहिर्य कर्तव्यं तत्र दोषो न विद्यते ।\ इति ।\ अनारब्धे त्वन्येन 


। ` कारयेत्‌ \। रजस्वला तु ब्राह्मणैः पूजादिकं कारयेत्‌ : सूतकवद्विशेषवचनाभावात्‌।। ` 
 सभतं कस्त्रीणां नवरात्र गन्धादिसेवनं न दोषाय ।। तदुक्तं हेमाद्रौ गारुडे-गन्धा- 





` कुंडकारताम्बलयुष्पमालानुलेपनम्‌ \। उपवासे न दुष्यन्ति दन्तधावनमञ्जनम्‌ \॥ ` 


अथ नौरा के धट स्थापन कौ (नतित के दिन प्रातःकाल उबटना करम 
` कालको कहकर मेरे इसी जन्म मे दुर्गा के पुजन के प्रभाव से संगूणं आपत्तियों के 























 ब्रतानि]  दिनदीं 





तं भागं चित्रमीमहे" वे सर्वेश्वय्यंारी सूयं देव जयमानके लिये रत्न देते हँ, हम उनसे चाहने कायक भयको 
मांगते हैं । इस मंत्रसे पंचरत्न डालकर “ओम्‌ हिरण्यरूपा उषसो विरोक, उभाविन्रा उदिथः सूर्य॑श्च, आरोहतं 
` वरुणमित्रगतं ततश्चक्षाथामरतिथि दिति च । मित्रोऽसि वरुणोऽसि !\--हे सुवणेके समान स्यवाले इन्र ओर ` 
सूयं, आप दोनो उषा कालके समाप्त होते ही प्रकट होते हो, आप दोनो इस कलमे विराजमान हं अदिति ` 
ओर दिति दोनोको देखो ! इस मंत्रसे उस कलश्चामं सुवणं डालना चाहिये । “ओम्‌ युवा युवाकस्षाः परिवीत 
1 | आगात्‌ सड स्रेयान्‌ भवति जाय भानः \! तं धीरासः कवय उच्यन्ति स्वाध्यो मनसा देव यन्तः |} यदि अच्छे ` | । 
` कपडे पहिननेवाला युवा परिवौती होकर आता है तो वो अच्छा ल्यता है उसको विचारलील कान्त दर्श ८ 
विदान्‌ पवित्र मनसे विचार करते हुए उत्पन्न करते हँ । इस मत्रसे कश्च पर वस्त्र डाल सूत्रसे वेष्टित केर ौ 
` “ओम्‌ पूर्णां दि परापत, सुपूर्णा, पुनरापत, वस्नेव विक्रीणावहे इषमूजं ˆ शतक्रतो 1! हे पू्णयन्र ! त ` 
इक्छृष्ट होकर इस पर बैठ जा, सुपुणं होकर फिर ज, हे शतक्रतो ! मूल्य देकर खरीदके ने समान इस ओर ` ` 
(व है । इस मंत्रसे पूणपात्रको कल्ठा पर रखदे फिर उसपर वरुणका पुजन करके नूतन मू्िहो वा ` 
पुरानो मति हो, उसमें दुर्गाका आवाहन करना चाहिये । यदि नयौ मृति हो तो पूर्वकौ तरह अन्नयुत्तारण ` 
करना चाहिये । अथपुजा-हे वरकेदेनेवाली देवी ! हे दैत्योके अभिमानको नाराकरनेवाली आ, हे सुमुखि ! =: 
समन्वितहैःहे | 


लिये नमस्कार है । सब ती्थमय जल सब देवे २ 
वि! अपने ते गणोके साथ इस घरपर आकर बैडो । हे गदिवि ! यहाँ आकर मृञ्ने सन्निधि हो एवम्‌ आोकषवित- = | 
1 र साथं पूजा ओौर अक्िको ग्रहण करिये । हे शंखचक्र भर गदाको हाथमे लिये हुए, है सुन्दरवणं ओौरशुभ- | 

` मुखवाली, हे सवं एहवर्योको देनेवाली देवौ, मुके वर दे “ओम्‌ सहस्र शीर्षा" इस मंत्रसे तथा “हिरण्यवर्णं ` 
हरिणी सुवणंरनतस्रजाम,. ! चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मी जातवेदो ममावह \\" हे जात वेद ! तेजस्दल्पिणी, सब 


` दुखोको हंरनेवाली, सोने चांदीको रचनेवाली एवम्‌ सथको आत्हादिक करनेवाली, तेजामय लक्ष्मीक 



























॥ ५ ( लक्ष्मीमनपगाभिनीम्‌ । यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामद्वं पुरुषानहम्‌ 1 हे जात वेद ! उस न जानेवाली लक्ष्मौको 
 । ५ सादे, जिसमें मै मो, अडव, हिरण्य आर पुरुषको पां, इससे आसन देना चाहिये \ गंपाआदिकि सब तीर्थे | 



















५ 4 0) वि “भ 9 4. ५ 01 ४ 01041 पप (भो ॥ 
(0 (0 2 | 4. ८ भ ध 


(इसको पंचगव्य प्रकरणम सिख चुके है । तथा घूतम्मिलिक्षे घृतमस्य योनिधृते मिश्चतो घृतमस्य धाम, अनु 
 ष्वधमादह मादयस्व, स्वाहाङतं वृषभवक्षि हव्यम्‌” मं इस देवको घुतसे सीचनेको इच्छा रखता हूः इसकी ` 
 धृतही योनि है, चृतमे ही भित है, घृतकी घाम है, तू पवित्रता ला, हमें परसच्च करदे, है कामोकेपुरे करनेवारे, = । 
 स्वधके अनुसार स्वाहाकूत हव्यके तथा-ओम्‌ मधुवाता ता ऋतायते मधु श्रन्ति सिन्धवः माध्वीर्नः सन्त्वौ- ` 

षधीः 1)" सत्य देवके लिये वायु मधु लारहा है, नदियों मधु बह रहीं ह, हमारे लिये भी जोषधी सघुमयहों। 
` तथा “ओम्‌ स्वदुः पवस्व दिव्याय जन्मने, स्वादु रिन्रायसुहवीत नाम्ने, स्वादुः मित्राय वरुगाय वायवे, ` 
४ बहस्पतये मधुमां अदाभ्यः \! आप्‌ दिव्य उदयके लिये स्वादिष्ठ हो जायं तथा इन्रके लि स्वादिष्ठहोकर ` 
सुहव करे, भित्र वरुण वायु ओर बहस्पतिके लिये नहीं दब स्कनेनारीरे मीठे स्वाद्ष्ठिहो जायं, इन पचो 
भंत्रों से पंचामृत स्नान कराना चाहिये । हे ज्ञानमूर्ते ! हे भद्रकालि ! हे दिव्य मूते ! हे सुरेष्वरि ! हैनारा- 
` यणि! हे देवि! तेरे लिये नमस्कार है, स्नान ग्रहृणकर इससे, तथा-“ओम्‌ यत्पुरुषेण" इस मंत्रसे तथा ` 
"आदित्यवर्णे तयसोऽधिजातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽथ बिल्वः ! तस्य फलानि तपसा नुदन्तु सायान्तरायश्च | 
` बाह्या अलक्ष्मीः 1“ हे सूयेके समानवणेवाल आपके तपसे वनस्पति हुमा आयका फल तो बिल्व है, उसके ह 
८ ` फल तपके फल तपके प्रभाव से मेरी बाहिर भीतरकौ अलक्ष्मीको नष्ट कर देँ । इस मंत्रसे उत्तरीय देना चाहिये । ` + ५ 
दे देव देवि ! अनेक प्रकारके रत्नों से जडे हए महादिव्य जलंकारोको ग्रहण कर ओर प्रसन्न हो । इसमंत्रते! | 
अलंकार देने चाहिये \\ यह चन्दन मल्यगिरिका है कर्पूर भौर मगर इसमें डाले गये हं । मे परम भक्तिसे ` 
आपको निवेदन करता हु, आप इसे ग्रहण करिये, इस संत्रसे तथा “ओम्‌ तस्माद्यज्ञा इस मंत्रसे तथा-'गन्ध- ` 
द्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम्‌ \ ईङवरी सवभूतानां तामिहोपह्वये धियम्‌ 11" जिसकी प्रप्तिका =` 
हार सुगन्धि है, जिसको कोई डरा नही सकता, जो सदा पुष्ट करती है, जिसे अनेकों गाय मादि आजाती ` 


जो सन प्राणियों की स्वामिनी है, उसे म बुलाता हू, इस मंन्नसे गन्ध समर्पण करना चाहिये । हे सुरश्रेष्ठे 


करने चाहिये ।। हे देवि 1 में जापक पुजाके लिय मंदार, पारिजात तथा पाटलो पंकज लाया हु, _ 
हण करिये । इस संत्रसे तथा-'ओस्‌ तस्माददवा'' इस संत्रसे तथा-मनसः कासमाक्ति वाचः सत्य- ` 






व्रतानि] 


है तीनों लोकों के अन्धकारको नष्ट केरनेवष्ली दीपकको ग्रहण कर ।! इस म॑त्रसे तथा^ओम्‌ ्राह्ममोऽस्छ' = 
मंसे तथा “आपः सृजन्तु स्निग्धानि चिल्कीत वसमे गृहे । निच देवीं सातरं भियं वासय े कुले)! ” हेसमुद्र ! = | 
` आप लक्ष्मी जैसे ही पदार्थोको पैदा करे, हे लकष्मौके पुत्र चिक्लीद ! मेरे घरमे रह्‌, देवी मलताश्रौकोमेरे | 
` .कुलमे वसा ।। इस मंतरसे दीप देना चाहिये॥चारो तरफका स्वादु अच्च जिसने छौं रस मिले हृएहेः भक्ष्यमौर = 









` ममावह 1\" जिसका अभिषेक दिग्गज करते हैँ तथा सबको पुष्टि देती है, पिद्धल दर्घकी है, कमल्कौ मालये 
पहने ह सबको प्रसन्न करनेयारी है, दथा्रेचित्त है स्वयं तेजोमय हैः एसी लक्ष्मीको हे जातवेद ! मुन्ने ला 
` वे 11 इस मत्से नैवेद्य निवेदन करना चाहिये । पीछे आचमनके मंसे आचमन कराना चाहिये । यह सख्या- ` 
न पेदा हआ है, कस्तुरी इसमें भिली हई है,तुम्हारी प्रसन्नताके लिये यह्‌ करोहतंन तयार हैः ग्रहण करयं ! 
इस मंत्र से करोर्तन देना चाहिये । । हे देवी ! यह फल मेने आपके सामने स्थापित किया है, इस्ये सुक्षे इस ` 
 जन्मसे जन्ममे सफल प्राप्ति हो 11 इस मंत्रसे, तथा-भोम्‌ ना भ्या आसीदन्त' इस संत्रसे । तथा- ` 
॥ ६ क करिणीं य्टि सुवर्णा हेममालिनीम्‌ । सूर्या हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो ममावह ।1' भक्तोपर ` 
1 जिसका कि, दिग्गज अभिषेक करते रहते हें । जो स्वयम्‌ सब प्रयत्न करती है, सुन्दर वणवासमी सोने की मालां ४ 
(६  पहिने हुई है, जो सूर्यके भीतर भी बिराजमान रहती है, एसी तेजोमयी लक्ष्मीक है जातवेद तूला} इश् | 
भंत्रसे फल समपित करना चाहिये ।। बडा सुन्दर पान है । सुन्दर सुपारी, इलायची ओर कपुर पड़ा हुंजा 5 
| हैः इसे आप ग्रहण करिये, इस मंत्रसे ताम्बूल देना चाहिये 1 ! ओम्‌ हरिण्यगभ' इस मंत्से दक्षिणा दे, "मोम ल 
| 
























यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवाः" इससे, तथा-'यः शुचिः प्रयतो भत्वा जृहुयादाभ्यमावहम्‌ । श्रियः पञ्चदशर्चं 
श्रीकामः सततं जपेत्‌ ! जिसे धनकौ इच्छा हौ वह्‌ पयित्रतपूर्वेक सोवाधन होकर रोज हैवन वरता हुमा 

 श्वीसुक्तकी प्रह ऋचाओंका निरन्तर ऊप करता रहे ।। इससे मंत्रपुष्पाञ्जलि दे । तथा-अइ्वदाथे गोदायै 
` धनदात्रे महाधने \ धनं मे जुषतां देवि सर्वकामाश्च देहि मे ।“ अदव, गौ ओर घन देनेदालीके च्वि नम- 
स्कार है) हि महाधनवाली देवि ! मेरे सब कामोको मुने दे तथा देनका भो सेवनकरे } अथवा है महाधनवाली 
| देवी अश्व, गौ ओर धन देनेके लिये मुक्से प्रेम कर तथा धन ओर सब कामोको दे । इस मंत्रसे प्राना करनी 
चाहिये । 1 ˆ ओम्‌ श्रिये जतः धिय आनिरीयाय श्रियं बयो जरितृभ्यो ददाति शभ्ियं वसाना अमृतत्वमाय- 
नभवन्ति सत्यासमिथामितद्रौ । श्रीके लिमे पैदा हुमा शरौके लि ही प्राप्त हृभा है स्तुति करनेवालोके च्वि. 
` -शभीञरकः 






























मी ओर वयस देता है, भ्रौको रखनेवाले अमृतत्वको प्राप्त होते ह, बेह संप्रामके वीर, मित चलनेवाे, सत्यः र 
साबित होते है । इस मत्रसे आरती करनी चाहिये \ संपुणं भरसूक्त पडढकर पुष्पांजलि देनी चाहिये वे ¦ ५ | 











० कामको दे । इससे नमस्कार करला चाहिये । . ~ 
जब कुभारी पुजा-एकं वंको कन्याको पूजनम ग्रहण न करे, क्योकि उसको प्रीति गन्ध 4४ पुष्प ७ मौर फल ` 
भनी रण दो वषकीसे लेकर दशवष षं तक की ही पुज्या हु, अन्य नहं हु । सामान्य पजा 





क (1 [ प्रतिपद्‌- 





ह ।॥१॥ लेग जिसे त्रिपुरा कहते हँ, जो तीनों गुणोकी आधार है तीनों सा्गके ज्ञानको रूपवाली है, एेसी ` ॥ 
तीनों खोकोद्वारा बन्दित त्रिमूति देवीको मै पुजता हं \२।। जो कालात्मिक है कलासे अतीत है, करणा भरे क | 
 हदयकी है, शिवा है कल्याणकी जननी है, नित्य है, एेसी कल्याणी देवीको मे पुजता हें ।\३ ।। अगिमादिक ` 


 - भु्ोकौ आधार है अकारादि अक्षरात्मिका है" जनन्त शव्तियोके भेदवाली है एसी रोहिणीका में पूजन करता 


हं ॥\४।\ जो कामचारिणी कामरात्री तथा काल्चक्तके स्वरूपवाली है, कार्मोको देनेवाली है, जिसमे करुणा | | | 
भरी हुई है, एसी कालिकाको मं पूजता हूं । ५1} उग्र ध्यानवाली । उग्र रूपवाली, दुष्ट असुरोको भारनेवाली, = | 
सुंदर शरीरवाली तथा लोकम पूजिता श्रीचंडिका देवीजीकौ मे पजा करता हूं ।।६ ।\ जो सदा आनंद करने- | ` 


घाली, शान्त है, जिसे सब देवता नमस्कार करते हँ, जिसकी सब प्राणी आत्मा ह, एेसी लक्ष्मी श्ांभवीको भं 41 
भै पूजता हं 1\७।\ जो दुगेम तथा दुस्तर युद्धमं भय ओर दुःखका नार करतो है, उस कठिन आपत्तियोका | ` 





 नाह्यकरनेवालो दुर्गाको मेँ भवितके साथ सदाही पूजत हँ ।\८।। परम सुंदरो तथा सोनेके रंगकीसी आभा- ˆ ` 
वाली, सव सौभाग्योको देनेवाली, सुभद्रकौ जननी, देवौ सुभद्राको मेँ पुजता हं ।\९।। इति कमारी पुजनम्‌।। 1. 

 भ्रारंभे करने पर सूतक हौ जाय तो-उसमे कुछ विशेष कहते हें कि, सुतकमे देवीका उदे लेकर पूजन ओर ` 9 
विक्ेष करके जप दान करने चाहिये । इनम कोई दोष नहीं है । पर प्रारम्भ न कियाहोतोदृसरोसिहीकरने | ` 


चाहिये । जो रजस्वला हो उसे तो ब्राह्मणोसे पजादिक कराने चाहिये । क्योकि, सुतककी तरह इसके ल्ि . 
कोई विहेष वचन नहीं है । सुहागिन स्वरया यदि नवरात्रि गन्ध आदि सेवन करे तो उन्हं कोई दोव नहँ है, 
ा हेमाद्विमं गरुडपुराणका वचन कहा है कि गंधः अलंकार, पान, फूलमाला, अनुलेपन, दंतधावनं ओर | 1 






4 बलिरज्ये ८ 


बलिराज्ये तथेव च \। तलाभ्यज्मकुर्वाणो णं ` नरकं प्रतिपद्यते ।! इति वस्तिष्ठोक्तेः 
अत्र कृत कतेव्यमाह्‌ ॥ प्रातर्गोवद्धन पज्यो द्यत चापि समाचरेत \\ भूषणीयास्तथा 
पुज्यारचावाहदोहनाः ! अथ द्यूतप्रतिपत्कथा ।। वालखिल्या ऊचुः ॥ 
चयुदयेऽभ्य्धः कृत्वा नीराजनं ततः \\ सुवेषः सत्कथागीतेदनिद्च दिवसं ` 

१।। शङ्कर स्तु तदा चूतं ससजं सुमनोहरम्‌ ।। कार्तिके शुक्लपक्षे तु 




















 सामदानादिकं कृत्वा आनय 


















‡ ५ | ता ४ न्‌ [शि ह ४ [स „~ ४ ‰ ६५५ ट १8 ॥ ॥ ॥ ४ ॥ ॥ 
"तामि ` - ~ ह॒न्दाट गेकासहित म्‌ {£ ) ५, 
, “ "~" ` श ४ श 94 ५२ 2 ५ ए ४ 





 तथेत्यक्तः क्वचिदगच्छाम्यहुं ततः ।। १२।। स्कन्द उवाच ।। मा गच्छ त्वं 
महादेव चतमार्गं प्रदश्ञंय !। आनीयते मया जित्वा सवं तव धनाधिकम्‌ ।1१३।। = 
 क्िवेनापि तथेत्युक्त्वा दयतमार्ग प्रदकितः \! स्कन्दोपि गृहमागत्य पार्वतीं वाक्य- | 
 मन्रवीत्‌ ।। १४ 1! स्कन्द उवाच ।। देवि देवो गतः क्वाऽसौ वृषभोज््रव संस्थितः! = | 
 ज्ञीषे चन विधुः कस्मान्मातः सत्यं वदाद्य मे \\ १५ ।। देव्युवाच \। स्वयमेव कृतं 
यतं स्वयमेव पराजितः ।। स्वयमेव गतः कोधासप्रा््य॑तां स कथं मया ।।१६॥ | 
स्कन्द उवाच ।! मया सह ऋीडितन्यं कथं तत्कीडनं त्विति ।! देव्यक्रीडत्तेन सद्धं | 
ततः स्कन्देन निजितम्‌ 1! १७ \} मयूरेण वृषस्तस्याः शक्त्या पन्नगबन्धनस्‌ ।॥ ` 
 वृषेणेन्दुस्ततोऽर्धाद्धः तत्सवं तेन निजितम्‌ \! १८ ।! कौपीनं निजितं चम॑ गृहीत्वा | 
तदु ययौ ।। गद्धातीरे यत्र शिवस्तत्रागत्य न्यवेदयत्‌ ! १९ ।। ततो देवीसमीपे ` 

तु विघ्नराजः समाययौ ।! किमर्थं स्लानवदना देवी जातासि तद्द ॥ २०।॥ ` 
देव्युवाच ।। मया जितो महादेवः स तु गोहाद्विनिगेतः ।! आयास्यति वृषादर्थमिति _ ` 
संचित्य संस्थितम. । २१।। तव भ्रात्रा तु तज्जित्वा सवं तस्म निवेदितम्‌ ॥\ 
 नायास्यत्यधुना देव इति चिन्तापरास्म्यहम्‌ ।\ २२ । गणेश उवाच ।\ देवि शिक्षय 















र इहि त्‌ पुत्रवचः श्रुत्वा तस्म यतमशिक्षयत्‌ ।! स गहीत्वा पायुं सारिकाः शीघ- 1. 
 माययोौ ।।२८६।। पृष्ट्वा पृष्ट्वा थत्र देवाः स्कन्दो यत्र व्यवस्थितः ।। गणेश उवाच ।। | 
 मयानीताविमौ पाश्लौ सारिकाः पट एव च ।। २५।। क्रीडात्वंतुमयासद्धं | 
वस्याग्रे समा 1 ।। इति स्रातुवचः श्रुत्वा हचुभाभ्यां कोडितं तदवा २६) | 

। मयुर लि स्य च तथैव 














५ १ गणेशं वाक्यमब्रवीत्‌ ।! २८ । सम्यक कृतं त्वः व्या पुत्र ते ना नीतोसौ महेश्वर ५. 
1 ¦ यात्र महश्वरम्‌ ।\२९ त्युक्त्व ऽस 
 र्ह्य च मूषकम्‌ ।\ त्वरितं चाययो तत्र गृहं नेतुं महेश्वरम्‌ । 








। (९०) । (1 त्रतराज 4 [ प्रतिपद्‌- 





व 
यथय 


, महादेवं विनयानतकन्धरः \। ३९ ।। गणेश उवाच \\ आगम्यतां देव गेहं देवी 
 भानपुरःसरम्‌ \ यदि नायासि गेहं त्वं प्रारणास्त्यक्ष्यति चाम्बिका) ३७ ` 
` त्वय्यागते पया सर्वं कायंमेतदुषायनम्‌ ।। महादेव उवाचं ।। एषा त्यक्ता मावि- 
 व्याऽधुना गणपर्निमिता ।। ३८ ।। अनया क्रीडते देवी आगमिष्ये गृहं तदा \ 
गणक उवाच ।। सर्वथैव करीडातव्यं देव्या नास्त्यत्र संशयः ।। ३९ 11 आगम्यतां 
गृहं देव भरात्रा सह्‌ हि मा व्रज ।। इति तस्य वचः श्रुत्वा ईश्वरः सगणो ययौ 1४०११ 
 नारदोष्यागतस्तत्र महोतुरपि चागतः \\ उपविष्टास्तु केलासे देवास्तत्र समागताः 
 ॥४१।\ इष्ट्वा देवीं प्रहस्थादौ महेश्षो वाक्यमन्रवीत्‌ ।। च्यक्षविद्या महादेवि 
 गङ्काष्टारे विनिर्मिता ।! ४२।। अनया जयसे त्वं चेत्तदा त्वं सत्यभाषिणी। ` 
देव्युवाच ¦} दषादि तव सामग्री मयेयं कापिता शिवा ।४३ 1! त्वया कि लाप्यते 
बूहि क्शैयस्व सदोगतान्‌ \\. इतिश्रुत्वां वचस्तस्याः प्रक्षताधोमुखं हरः ॥।४४।। ` इ 
, ` तस्मिन्‌ क्षणे नारदेन स्वकौपीनं समपितम्‌ !। वीणादण्डदचोपवीतमनेन करीडता- ` 
भिति ।)४५।। सदाशिवः प्रसन्नोभूत्कीडनं संप्रचक्रतुः ।। यद्यद्याचयते स्रस्ता 
विष्णुः प्रजायते ।\४६।। यद्यद्याचयते देवी विपरीतः पतत्यसौ ।। स्वकीया- 
भरणादचं च महादेवेन निजितम्‌ ।। ४७ ।। स्कन्द लड्कारिकं सर्वं पुनराप्तं हरेणच।। 
ततो गणेशः प्रोवाच वाक्यं सदसि गवितः ।\४८ ।। न कीडितव्यं है मातः पाश्लो 
लक्ष्मीपतिः स्वयम्‌ ।। कृतो हरेण स्ेस्वं ते हरिष्यति मत्पिता ।। ४९।। इति 
पुत्रवचः शरुत्वा पादेती कोधमू्िता ।! तथाविधां तामालोक्य रावणो वाक्यम न म~ 
























~ 









 यथोचितामृतिशष्वानङ 





 सर्वेषामादिमायेयं यथायोऽ्यफलभ्रदा \। नायं शाप इयं देवी स्मतेष्या तु विचक्षणैः 
 ॥६१ गङ्ख सदा तिष्ठतु सद्रमस्तके बलमा बा नयतु क्षपाचरः ।। जायाहरस्याथ 
ध तृष्मारहितः कुभारः ।। ६२ ॥! अहं असामि धरणी न | 
स्थातव्यं तपोधनैः ।\ सध्यण्देवि त्वथ प्रोक्तं श्युण्विदानीं वचो सम \} ६३ | 
 सर्वक्रोधापनुत्पर्थं ननत॑मुनिपुद्धवः ।\ कक्षानष्दं चकारोच्चरहाहिहीहीति चह | 
. वीत्‌ ।६४।। तस्य चेष्टां विखोक्थाथ सवं हषेमवाप्नुयुः \। देव्युवाच भोभो ५ 
`  विहूषकश्वेष्ठ कृतङृ्योति नारद । ६५ ।। वरं वरय भद्रं ते यद्यन्मनसि रोचते! = , 
नारद उवाच ।\। याचयन्तु वरं सर्वे कोकीं याचयिष्यति ।। ६६।। सर्वे तेयाच- | 
|  यिष्यन्ति यथाचेष्टं बरुवन्तु तत्‌ ।। शिवं उवाच ।। सवं सक्षम्यतां देवि नितंय्द्र- 
।  षभादिकम्‌ ।। ६७ ।! तन्ममास्तु चयूतश्नतेनं ग्राह्यं जगदम्बिके ।। देव्युवाच ॥ ` 
। मास्तु त्वया समेनाथ स्वप्नेपि मम चान्तरम्‌ ।! ६८ ।! एतदेव वरं मन्ये कोधो ` 
 भाभन्ममोपरि 1) कातिके शुक्लपक्षे तु प्रथमेऽहनि सत्यवत्‌ ।। ६९ 11 जयो ल्न्धो 
मया त्वत्तः सत्ये नैव महेश्वर ।। तस्माददयतं प्रकर्तव्यं प्रभाते तच्च मानवे: ।॥७०। = 
` तस्मिन्दते जयो यस्थ तस्य संवत्सरं जयः । विष्णुरुवाच ।। अहं यं यं करिष्यामि 
श्रेष्ठं वा लघुमेव वा ।\७१।। तथातथा भवतु तद रमेनं वदाम्यहम्‌ ।। स्कन्द उवाच।। 
| । सदा मनस्तपस्याथां मम तिष्ठतु देवताः ।। ७२।। कदापि विषये मास्तु 
| एष वरो सम ।! गणेश उवाच ।। संसारे यानि कार्याणि तदादौ मम पजनात्‌ ।।७३।! 














[ प्रतिपद्‌ 





^-^ ~~ 1 9 श 


कृते होमे ्विजेनद्रेश्व बध्नीयान्मागं पालिकाम्‌ ।\ नमस्कारं ततः कुर्यान्मत्रेणानेन 
सुव्रत ।। ८५।। मार्मपालि नमस्तेस्तु सवेलोकसुखप्रदे ।। विधेयैः पुत्रदाराद्यैः 
 पुरयेहां वृतस्य मे \! ८६।। नीराजनं च तत्रैव कार्यं राष्टूजयप्रदम्‌ ।। मागेपालोत 
 तकेनाथ यान्ति गावो वृष गजाः \\ ८७।१ राजानो राजयपुत्रारच ब्राह्यणाः शूद्रजा- ` 
तयः \) मार्गपालीं समुल्लंघ्य नीर्नास्तु सुखान्विताः \1 ८८ ।। तस्मादेतत्प्रकुर्वोत 
तादय विधिपूर्वकम्‌ \। ८९।। इति सनत्कभारसंहितायां द्यूतविधिः ।\ ५ 


अथ कात्तिकश्ुक्लाम्रतिषदा-पुरवा ग्रहणकरनो क्योकि पदयपुराणमं लिखा हुभा हेःक्िवरात्रि ओर कातिकलुक्ला १ 
प्रतिपदा पू्वविद्धाही करनी चाहिये, इसमे उवटन करना जरूरी है, क्योकि वत्सरके आदिमं, वसंतके आदिमं ` ८ 
तथा बलिके राज्य मेंजो तैलाभ्यद्धः नहीं करता वो नरकमें जाता है यह वसिष्ठजीने कहा है ) इस तिथिम्‌ 
 क्याकरना चाहिये ? सो कहते हे कि -प्रातःकाल गोवर्धन का पूजन करे तथा ज्‌ भौ खेले तथा गऊओंका ` 
पूजन ओर शरुद्धपर भी करना चाहिये । अथ कथा-बालखिल्य बो कि, प्रतिपदाके दिन प्रातःकाल उबटन ` 
स्थान करके अपना श्युंगार करना चाहिये \ फिर अच्छी कथा वातं में इस दिनको पूरा करना चाहिये ।१॥\ ` 
श्रीमहादेवजीने का्तिकलशुक्ला प्रतिपदाको सत्यकी तरह सुंदर जूमा रचा था ।॥२।। सदारिव भगवातूने 
देवीजीसे कहा किहे देवी! किसी के कालक्षेपके लिये तथा किसीको घन पानेकेछिए 11२! एवम्‌ किसके ` 
धनके नाशके लिये मेने जमा बना दिया है,इस जुएके खेलको आप देखे मे एक भुवन को दावपर लगाता हुं ।\४।। ` 
` एकं भुवन दावपर रख दिया ओर दोनों ज॒मा खेलने लगे पर पाव॑तीजोने उस दावको जीत लिया । महादेवजीने ` 
दूसरा भुवन दावपर रखदिया श्रीसतीने वह भी जोत लिया ।\५।\ महादेवजौने तीसरा भुवन भी दावपर 
रख दिया, उसे भी अम्बाने जीत लिया, फिर नादिया, इसके पीडे चमे, फिर साँप दावपर लगादिया ।\६ 
शशिलेखा, इसके पीछे डमरू दावपर रखा, इन सबोको पावंतीजीनें जीत चया } शिवजौ सन कुछ हारकर 
वल्कल वसन पहनकर धघरसे चले गयं ।७।। शिवजी गंगाकिनारे चरे आये ओर गहरी चिन्तासे व्याकुल 
























. । ध | | व्रता नि 1 








भह सुनकर गणेश बके कि, हे देवी ! मुकने जू खेलना सिखादे में भाई ओर वको जीतकर सबकुछ लादू ` क 
तो तेरा बेटा, नहीं तो नहीं ।\२३।} पुत्रके एेसे वचन्‌ सुनकर उन्हुं ज॒मा खेलना बतादिया, चो दो पासे ओर | 


भ, क 


भोर लेकर खेलने चलदिये ।।२४।। पृते युते वहाँ चङे आये, जहाँ स्वामिकातिकजी बेठेये । स्वामिकातिक- ` 

जीसे बोले कि, मे दो पासे गोट ओर कपडा केकर चला हूं ।\ २५।। हे बड़े भाई ! आयमेरे साथद्षिवजीके | 
| सामने खेल, भाईके वचनसुनकर स्कन्द खेलनेको तयार होगये, फिर दोनो भादयोमे जञ मचा ॥२६।॥ । 
 गणेहाजीने मूसेसे वृषभ ओर मयूरको भौ जीतलिया तथा शिवजी ओर स्कन्दकी सब कुछ ।२७ ।। जीतकी | 
। चीजेलेकर गणे पार्वतौके पास अये पा्वतीजीभी जयी पुत्रसे बोलीं कि 11२८।1 पुत्र ! यह तोतनेटीक | 


५ । | | किया पर शिवजीको न लाया । जाः सामि दामादिक करके हिवजोको यहु संञा ।\२९। गणेक्षजीने कंहा कि । | । | | | 
अच्छी बात हैः अभी लाता क्ञट मूसेपर सवार हो श्री घ्रही शिवजौको धर लानेके च्वि चलदिये ।३०॥ = | 
`. शिवजी वहसि उठकर हरिद्वार चङे आये, नारदजीने यह सब समाचार विष्णुभगवान्‌से कहा, विष्णुभगवान्‌ ` | 


0  शिवजीके पास पहूंचे ।।३१।! विष्णु भगवान्‌ हिवजीसे बोले, कि शिव महाराज ! व्यक्न विद्याकरिये, मेँ ` । ध 
एक अक्ष हो जाञंगा, रावण वहाँ सुनरहा था बोला कि अच्छी नात है, आप काने हो जाइये ।1३२।। यह सुन 1 





देखते 


@ ५ मन्‌ गे तुम मेरे ओर विावकी तरह देखते हो इस कारण आप विल्ले होजाओ । नारदजी 











`! अब बडा कायं सिद्ध होगया, वो गणेदवर आ रहा है ।\३३॥ आपका समाचार जाननेको ` ` 





५ हे रावण ! तुम उनके मूसेको डरा दो । श्रीदेवधिके एते वचन सुनकर रावण अगाडीसे ।।३४।। बिावकी ` 





तरह शब्द करने लगा, जिसको सुनकर मूसा भाग गया 


ग, गणेशजी मूसेको छोड धीरे धीरे पैदर चे आये ॥1र५।॥ = ` | 


गणेशजीने दूरसेही देवलिया कि, विष्णुभगवान पासा बन गये हँ, महादेवजीके सामने प्रणामकरके नस्रतासे = ` ध 


अंबिका प्राणोको छोड देगो ।\३७।। आप जब धर चरू आवेगे तो म॑ वहां सब भेट कर दगा, यह्‌ सुन कश्िवजी 
बोले कि हे गणेशा ! इस समय मेने त्यक्ष महा विद्या निर्माण की ह ।\३८।। यदि इनसे मेरे साथ पावेतीजी 
तो मं आ । यह्‌ सुनगणेशजी बोले कि आपके साथ मां अवद्य खेरेगी, इसमे कोई सन्देह नहीं है \१३९। . ` 





| #  भार्ईको साथ केकर आइये जाइये न गणेशके एसे वचन सुनकर गणोसहित शिवजौ घरको चरुदिये ।[४०। ` 


पवतीजीको वतै ह १ ह्पडे २५ स हे महादेवी ! मेने इस गरयक्ष विद्याको 
भाष सृक्षे जीत लगौ तोभाप सच बोलनेवाली हे यह्‌ सुनकर 


हौ पडता थ, इस तरह किवजीने ५. > हारे हृष्‌ सब 


7 रावणभी आगया, वहाँ केलासपर सब देवता भी आये हृए 


(1 क [ प्रतिषद्‌- ` 
पन कियाहै, इस कारण तु सदा बारूक ही रहेगा, न युवा होगा जौर न ब्ढाही होगा ।\५६।। तुके स्वप्नमे ` 
भी स्त्री सुख न मिलेगा यह्‌ सुनकर गणेडाजी पावतौजीसे बोर कि, माँ ! इसने बिल्ला बनकर मेरे मूसेको ` 

` भगा दिया था 1५७11 इसने सेरे मागके बीचमं विघ्न किया था, इस कारण इस अधम राक्षघको तो शाप दे । ४ ॥ 
देवी बोली कि, है दृष्ट ! तूने मेरे पुत्रके सागेमं विघ्न किया था ।५८।।। इस कारण, यह्‌ तेरा वरी विष्णु तुक्च ` 
 मारेगा, देवीके एेसे वचन सुनकर सबको मनमें ऋोध आया ।\५९।} इन्होने देवीको शाप देनेका विचार 
किया कि, नारदजी बोरे-हे देवो ! आष क्रोध न करो, यह्‌ किसी तरह भी श्चाप देने योग्य नहीं है ॥\६०।॥ ` 
यहु दबकी आदिमाया है, यथा योग्य फलकौ देनेवाली है, यह ज्ञाप रहीं है, यह्‌ तो सदा विद्रानोके यादकरने ` 
. योग्य है ।६१।। गंगा का सदाही क्िवके श्षिरपर रहना अच्छा है, बलात्‌ भरे ही रमाको राक्षस हरेपर ` 
` चिष्णुके हाथसे इसकी मत्यु उचित ही है, कुमारका काम तुष्णासे अलग रहनः ही अच्छा है । ६२१ मे भूमिपर ` 
 धूमता ही रह, क्योकि, तपोधर्नोको कभी एक जगह न रहना चाहिये, ह देव ! आपने ठीक ही कहा हैः जनमे 
कर सो सुनो ।।६३।। यह कह मुनिपुंगव श्री नारदजी सबके कोधको दुर करनेके लिये नाचने लये, कक्षानाद . ` 
| करते लगे,हाहा हह आदि अनेक शब्द करने लगे ।\६४।। नारदजीकी चेष्टाओंको देखकर सब प्रसन्न होये, = 
इतनेमे देवौ कहनेलगी कि, भो भो विदूषक श्रेष्ठ नारद ! आप कृतछृत्य हों \ तुम्हारा कल्यणहोः जो जापको ` 
`  अच्छालगे वो वरदान मंगला, यह्‌ सुन नारदजीौ बोखे किं, है देवो ! सब वरदान मग लो, कौन क्या मगिगा ` 
11६६1 जो वरदान मांगना चाहते है उनको जो मांगना हौ सो कहं । यह्‌ सुन क्षिवजी बोले कि, जो वृषभे 
लेकर जो भौ कुछ आपने जोता था, उसे जप क्षमा करिये ।\६७।} है जगदम्बिके ! मेरी वस्तु मुकषपर ही ` 
. रहनी चाहिये चाहं आप्र सौ बार जीती परमेरी चीजे मुक्ञे मिक, यहं सुन पाबेतीजी बोलो कि, मेरा आपसे 
कभी स्वप्लमँं मी वियोग न हो ।\६८॥। मे यह्‌ भी माँगती हं कि, आपका कोच मृज्ञपर कभी न हो । कर्यातिक 
शुक्ला प्रतिपदाके दिन मेनं सत्यके समान ही ।\६९।। हें महेश्वर ! सत्यसे ही मं जायसे जीती हु" इस कारण 






















 होनेपर होनेपर ।७२।) सिद्धि हो मेरी कृपाविना सिद्धि न हो । रावण बोला कि! वेदक क | र : सतनो ह 
सामथ्यं हो जाए । तथा स ह ध सदाशिवमे मेरी सदा अव्यभिचारिणी भक्ति बनी रहे नारजी 





६ ४) : ॥ मः 
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॥ ् व क ५. ¢ धन ध द: ४ ५४१ क म्‌ 




















| है, हे सब लोकोको सुख देनेवात्ठी ! विधेय, पुत्र, दार आदिकोमे मृञ्ञे परयुणे कर दे 11 ८६।\ वर्ह राष्टरको ५ 
| `. जयदेनेवाली आरती करे, मागेयालीके नीचेसे जो गञ, वष, गज आदि 1! ८७ ।। तथा राजा, राजपुत्र ब्राह्म ` 


| क ^ | । ओर श्र जातिके लोग निकल जाते हव नीरोग एवम्‌ सुखी हो जाते हं । ८८।।।) इस कारण द्यूत आदिक ` | | ् । 6 
।  विचिपुरवंक करना चाहिये ।८९।। श | 


` यह्‌ सनत्करुमारसंहिताकौी द्यूतविधि समाप्त हुई । र 





ह अथ बरिपूजागोक्रीडनवष्टिकाकषणानि ५५. 
। तत्रैव-वार्खिल्या ऊचुः \) पूर्वेविद्धा प्रकर्तव्या प्रतिपद्रलिपुजने ।\ वधे ष ^ 
+ मानतिथिर्नन्दा यदा साद्धंत्रियासिका । द्वितीया वृद्धिगामित्वादृत्तरा पत्र चोच्यते! | 
| बलिभालिर्य देत्येनरं वेकः पञ्चरङ्धकः ।। गृहमध्यमक्ञालायां विन््पावल्या 
। समन्वितम्‌ ।। जिह्वा च ताल्वक्िप्रान्तौ करयोः पादयोस्तले ।। रक्तव्णेनास्य ` 
, केज्ञान्‌ कृष्णेनैव समालिखेत्‌ 1 सर्वङ्खं पीतवर्णेन शस्त्रा्यं नील्वणेतः । क्सत्रं च 
` इवेतवर्णेन यथाशोभं प्रकल्पयेत्‌ ।। सर्वाभिरणक्लोभाठचं द्विभुजं नुपचिह्धितम्‌ ।॥ | 
लोकौ लिखेद्‌ गृहस्यान्तः शय्यायां शुक्लतण्डुलैः । मन्त्रेणानेन संपूज्य षोडशेर | 
 पचारकैः ।! बलिराजनमस्तुभ्यं दैत्यदानवधुलित ।।इनद्रश्रोऽमराराते विष्णुसाल्नि ` 

` ध्यदो भव ।! बलिमुदिश्य दीयन्ते दानानिमुनि पुद्धवाः ।\ यानि तान्यक्षपाणि 
स्युमयेतत्संप्रदशशितम्‌ ।। कौमुत्प्रीतिबेलयस्माहीयतेऽस्यां युधिष्ठिर ।। पाथिवेद्ध- 
भुनिवरास्तेनेयं कौमुदी स्मृता ! यो यादृशेन भावेन तिष्ठत्यस्यां युधिष्ठिर ।\ 

























 विल्याःअचुः \\ का्तिकस्य सिते पक्षे ह्यद्चकटं समाचरेत्‌ ।। गोवद्धंनोत्सवङ्चेव 
श्रीविष्णः प्रीयतामिति ।।१।। ऋषयं ऊचुः ।\ कोऽसौ गोवद्धंनो नाम कस्मात्तं 
 परिपृजयेत्‌ \ कस्मात्तदुत्सवः काथः कृते किच फलं भवेत्‌ ।।२।। वालखिल्या ऊचुः।। 
एकदा भगवान्‌ छृष्णो गतो गोपालकैः सह॒ । गृहीत्वा गाः प्रतिपदि कात्तिक्स्य 
सिते बने ।\३।। तत्र नानाविधा लोका गोप्यहचापि सहस्रशः ।\ गोवद्धंनसमीपे ` 
वु दुर्वनतयुत्सवबमादरात्‌ ।।४।। खाद्यं छेयं च चोष्यं च पेयं नानाविधं कृतम्‌ ।। ` 

` कृता नगास्तथान्नानां नत्यन्ति च परे जनाः ।\५।। नानापताकाः संगरह्य केचि- ` 
 दावन्ति चाग्रतः ।) केचिद्गोपाः प्रनत्यन्ति स्तुवन्ति च तथापरे ।\६।! तस्ततो 
वितानानि तोरणानि सहस्रशः ।। दृष्ट्वेतत्कौतुकं कृष्णो वाक्यमेतदुवाच ह्‌।१७।१\ ` 
करुष्ण उवाच ।।! उत्सवः कियते कस्य देवता का च पुज्यते ।! पक्वान्रलादनार्थय 
कल्पितो वोत्सवोऽधुना ।८।\ न भक्षयन्ति ये देवास्तेभ्योऽन्नं तु प्रदीयते ॥! प्रत्यक्ष ` 
भोजिनो देवास्तेभ्योऽच्रं न तु दीयते ।\९\ दृष्ट्‌ वेदज्ञो भवदूर्बद्ध गोपाला वेधसा 
` कृताः ।॥। गोपाला ऊचुः ।। एवं मां वद्‌ कृष्ण त्वं वृत्रहन्तुमहोत्सवः । वार्षिकः 
` क्रियतेऽस्मामिर्दवेन््रस्य च तुष्टये ।\ १०।। इन्द्रं जय भद्रं ते भविष्यति न संशयः ।\ 
अद्य कूर्वेति देवेन्द्र महोत्सवमिमं नयः ।\ ११।। दुभिक्षं च तथाऽवृष्टिदेशे तस्यन 
जायते ।। तस्मात्त्वमपि कृष्णात्र कुरूत्सवमनेकधा ।\ १२।। कृष्ण उवाच ।\ अयं 



















































व्रतानि] 


(९७) 





८ नः 0. ४ 
त नाता माामरनणि 


शथः ।\२४।। गोवर्धन धराधार गोकूलत्राणक(रक ।। बहु- ५ 








भोक्तव्यं स्वेलश्नं न ३ ^ 
 बाहूकृतच्छाथ गवां कोटिप्रदो भव ।। २५ ।। लक्ष्मीर्या लोकपालानां षेनुह्पेम | 
 संस्थित्ता ।। घतं वहति यज्ञाय मम पापं व्यपोहतु ।\२६।1 पटित्वैवं सन्त्रयुमं सवं ` 
मुद्रितलोचनाः ।\ कृष्णो गोवद्ध॑नं विद्व सर्वमन्नमभक्षयत्‌ ।(२७।। भक्षणाव्सरं | 
` कंटिचनज्जनेदेष्टो गिरिस्तथा !। अतीवाभूत्तदाश्चर्थं तच्चेतसि मुनीहवराः ।।२८।॥ 
` ततो नाडीदयात्‌ कृष्णो गोपान्वाक्यमुवाच सः ।। अहो गोवद्धनेनात्र क्षणाद्मुक्त- | 
भिदं स्फुटम्‌ ॥२९।। पश्यन्तु सर्वे गोपालाः प्रत्यक्षोऽयं न संशयः ।। यथ्स्ति युल- | 
वाञ्छा वः कु््वध्य महोत्सवम्‌ ।।३०।। इति शरुत्वा वचस्तस्य सर्वे विस्मित. ` | 
` मानसाः ।। गोवद्धनोत्सवं चक्ुरनराच्छतगुणं तथा ।\३१।। इनदरोत्सवं द्रष्टुकामः | 
समागच्छत नारदः! गोवद्ध॑नोत्सवं दृष्ट्वा देवेस्य समां ययौ ।३२।। वेवेद्रेण 
` छृतातिथ्यो वारंवारं प्रणोदितः 1} नोवाच वचनं किचिहैवेनरः प्रत्यभाषत ॥३३। | 
इन्द्र उवाच ।। युष्माक कुशलं विभ्र वतते वा ननेति वा ।। मद्रे कथ्यतां दुःखंमुनी- | 
` इवर हराम्यहम्‌ ।।३४।। नारद उवाच ।! अस्माकं कर मुनीन्द्राणामिन्दर दुःखस्य | 
कारणम्‌ ।) परं गोवद्धंनः हलः शक्रो जातो विलोकितः ३५1} त्वहत्सवे पुज्य- 
तेऽसौ गोषा लरगो्कुलस्थितैः ।! अतःपरं यज्ञभागान्‌ ग्रहीष्यति स एव हि ।\३६ 
नदरासनं तथेन्ाणीं क्रमान्सवं हरिष्यति ।। यस्थ वीयं च शस्त्रं च तस्य राज्यं 
प्रजायते 11३७1} किमस्माकं मुनीन्द्राणां य एवेन््रासने वसेत्‌ ।\ वषा मास्रषट्‌- 
` काद्र द्रष्टन्योऽसौ समागमः ।\३८।। इत्थमुक्त्वा च देवेन्द्र प्रययौ नारदो भुवि ॥ ` 
इत्थं नारदवाक्यं स शरुत्वा शक्रोऽभ्यभाषत ।\ ३९।। अहो जावर्तसंवर्ता द्रोणनौलक- ` 
पृष्कराः ।\ सवे मेधा जलं गृह्य करकाभिः समन्विताः ।\४०।। प्रयान्तु गोकुले 
शीघ्रं मारयन्तु च गोपकान्‌ \! गोबद्धेनं स्फोटयन्तु वजपातेरनेकशः. 






























।  क्िमकाण्डमुपस्थितम्‌ ।। ४३ हपानीयं करकास्मितदा 

ज ॥ नना वी व 
गोपालाः कुपितोऽयं हि बासवः नमौल्याक्षीणि भौ 

 सोवर्धनो भिरिः \॥ ४५ ।। रकाकं 










८) ॥ ताज - -.{अतिषद्‌ 





नाम्नैव कृष्णो नित्यं प्रयच्छति ।। ४९ \। पक्वाच्नानि च गोपेभ्यस्त्र ते सुखमाव- ` 
सन्‌ ।\इत्येवं कौतुकं दष्ट्वा सत्यलोकं थयो मुनिः ।\ ५० ।। ब्रह्यस्त्वं कि प्रर 





जायते सुष्टिनाकनम्‌ ।। तस्माच्छीघ्रं गोकुले त्वं गत्वा वृष्टि निवारय ।। ५१ ` 
ब्रह्मोवाच ।! किमथं जायते वृष्टिः कथं सूष्टिविनाशनम्‌ ।।कच्चिहेत्यः समुत्पन्नः 
 स्वंमाख्याहि मे मुने ।! ५२ \। नारद उवाच ।। नोत्पन्नो देत्यराद्‌ कष्िचिच्यव्तः ` 


प्तोऽसि ` 





 श्क्रोत्सवो भुवि ।\ गोयकरिति संक इन्द्र एवं प्रवषति ।। ५३ ।। इति तस्य वचः ` 


श्रुत्वा हंसमारुह्य वे विधिः ।! आगतो यत्र शक्रोऽस्ति कोधदेव प्रवर्षति । ५४।। 
ब्रह्मोवाच ।। कथं व्यवसिता बुद्धिरीदृशी ते सुरेहवर ।। त्रैलोक्यनाथो भगवाक्ि- 
 जंतव्य कथं त्वया ।। ५५ ।। एकयेव करागुल्या पद्य गोवद्धेनो धृतः ।। ईर्ष्या कथं 

तेन साकं त्वया शक्र विधीयते । ५६ ।) इति ब्रह्मवचः श्रुत्वा मेघान्संस्तभ्य ` 


वासवः ॥ प्रणिपत्य च तं कृष्णं शक्रो वचनमब्रवीत्‌ ।! ५७ ॥। इन्द्र उवाच ।॥ ` 


क्षन्तव्या मल्कृति्विष्णो दासोऽहं श्ञरणागतः ॥। यद्रोचते तत्प्रदेयमपराधापन्‌- ` 


0 लये । ५८ ।। कषण उवाच 1 जन्ञातत्वा कव्व चथथ्य गोपालरराचतं त्विदम्‌ ।॥ | | 








एषां दण्डस्तु योग्योऽयं सम्यगेव त्वया कृतः ।! ५९ ।। अहं कनीयांस्ते भराता ` 
तवाज्ञापरिपालकः ।\ शरणागतजातीनां रक्षणं तु मया कृतम्‌ ।।! ६० ।! य 
पसन्द देवेश उत्सवोऽ्यं भ्दयताम्‌ गोवद्धनाय गिरये गोकुलं रल्ितं यतः. 


नेचितानि 















व्रतानि]  हिन्दीटीकासहित ` (९९). 





अथ बलियुजा, गोक्रीडन, वष्टिकाकषंण-बकिकी पूजा, गऊभोके साच खेल ओर वष्टिकाका कर्षण 


 (रस्सी लीचना) भी इसी दिन होता है, सनतकुमारसंहितामेही कहा है ! वारुखित्य ऋषि बो कि, बल्कि = | 
` . पुजनमे पुवेविद्धा प्रतिपदा करनी चाहिये, यदि वधंमाना प्रतिपदा साढे तीनपहर को । द्वितीयामं वृद्धिगामी | 
 होनेके कारणं उत्तरा प्रतिपदा लेनी चाहिये ! पंचरंगके दैत्येन बक्िको विन्ध्यावलीके साथ घरके बीचकी | 


` शालासे काठतीवार जीभ, तालू, आंख ओर हाथ, पावोके तङ लालरंगसे लिखने चाहिये तथा केश काले ही 


रंगसे बनाने चाहिये । सारा श्रौर पौतबणेका ही शरस्त्रादिकं नीके रंगके बनाये जायं, वस्त्र हषेत रके जेषे 1 । | | 
शोभित लगे वैसे ही बनाये जाये, सब आभरण पहिनाये जाये, जिनसे कि, सुन्दर लगे, दुमुज एवम्‌ राज | 


। विहवे वि्वित होना चाहिये ! घरके भीतरकी शग्यापर तंडलोसे इसके सोकको लिख दे, तथा इस निम्न | 


` लिखित मंत्र समुद्यते सोलहो उपचारो सहित पूजे \ हे दैत्यदानवपुजित बिराज ! तेरे लिये नमस्कारहैषहे | 
 अमरोके अराते । एवम्‌ इन्दरके शत्रु ! विष्णुके साक्निध्यको देनेवाला हो, है मुनिपुंगवो ! बक्ति उेकसे 

जो दान दिये जाते हे वे अक्षय हो नाते हे \ यह्‌ मैने तुम्हें बतादिया है । है मुनिवरो ! इस प्रतिपदके दिन इस | 

 भूमिपर राजालोगोद्वारा किये हुए पुजनसे बलिको प्रसत्नता होती है, इस कारण इसे कौमुदी कहते है, है | 





~ 4 त युधिष्ठिर ! जो मनुष्य जिस भावसे इसमें रहेगा चाह उसे हषं हो बाहं उसे शोक हो बे ही सालभरतक बराबर 
` चलता रहेगा गोक्रौडन करना चाहिये । जिस दिन कि, गोक्रौडनमें रातको 





` चता रहेगा ।। इस प्रकार अलिपुजा करके पीछ गोक्रीड रं 
 चीदका प्रकशि ही तो सोमराजा उन पश्च तथा सुरभि 











। £ ६ पदा भौर दके योगम गोक्रीडन होना चाहिये । जो द्वितीया युक्त प्रतियदाके दिनं गोक्रीडन ओर गोनर्तन ` ` 1 । 
- | ५4 कराता है उसके पुत्र शरका त्न होता है । गोक्रौडनके दिन गञओंको खिला पिलाकर सजाना चाहिये, गीतं प 1 


नहीं लौ जाती । कुशकाशकी एक सुन्दर नई सुदृढ रस्सीको देवद्वारषर या नुपद्वारपर अथवा चौराहेपर म ५. 


; | । तरफ राजकुमार आदिं उच्च वणक लोग खौं वथा एक ओर हीन वणेके लोग खच जसतक वत्‌ धकः तबतक । | । 
 खीचते ही रहं । लीचनेवालोकी दोनोही तरफ बराबरकी संख्या रहनी चाहिये, जो इसमे जीतेगा उसको ` 





` एक सालतक बराबर जीत रहती है । दोनों ही ओर हहकौ रेखाएं रहनौ चाहिये, जो अपनी ओर २ चकर 
 हहृतक लेजाये उसकौ जीत होती है, अन्यथा नहँ ।\ राजाको चाहिये, कि राजा इस जीते चिह्वको प्रयत्नके 
साथ बनावे यह बलिगरजा, गोक्रीडन ओर वृण्टिकाकर्षणकी विधि पुरी हई! ` 


८ र नोल कि, कातिकके जुकलयक्षमं मन्कूट मौर गोव्षनोत्सव 


ऋषि लोग बोले कि, यह्‌ गोवधेन कौन हैः किस कतार उस पूजे, क्यो उसका उत्सव किया म द ¢ कियेपर र 
होता प्त है १।।\२ त ।। बालखिल्य मोरे कि, एकसमय भगवान्‌ ` ॥ कुष्ण कतिक हि श 








¢ (४ ।  [प्रतिषद्‌- | 





अनावृष्टि नहीं होती, इस कारण हे कृष्ण ! आप मी इस उत्सवको अनेक तरसे मनायें ।\ १२ ।\ यह सुन | 
कृष्ण बोले कि, देखो यह साक्षात्‌ देवता गोवधेन हैँ यह वृष्टि ओर सौभिक्ष्य करनेवाला है, मथुरावासी मौर ` 
` व्रजवासियोको प्रयत्लके साथ इसका पुजन करना चाहिए ।। १३ ।। इसके पुजनको छोडकर लोकमें इच्क्यो | 
` वृथा पुना जाता है ! इसका उत्सव करो, यह्‌ प्रत्यक्ष खायगा ।) १४ ।। खेती अच्छी करेगा, विघ्नोका नान्न ` 
करेगा, जबे जब मुश्चे कोई बडा भारी संकट आ जाता ह ।! १५ ।। तब तब मं इसी प्रत्यक्ष देव गोषर्धनको 
परूजता हं यह्‌ सुन गोष आपसमे काना एससी करने लगे कि, क्या करे 1} १६ 1\ उन गोपोमेसे कुछ्एक कहने 
` लगे कि, कृष्णकी कही मानों, यदि यह खा रेगा तो इसे केवल पहाड न समश्च कर गोवर्धन देव समञ्चना ॥। १७ = ` 
त्ब जो कुछ कृष्णं करता है बो सत्य ही होगा, इस प्रकार सब्र सोय निष्िचित करके कृष्णसे बोले !\ १८ 1! ` 
। कि, जिससे हमें निशवय हो सो करिये ।\ तथा सबके आगाडी होकर गोवर्धनोत्सव सनवादये ।! १९! | 
 भगवानने भी उत्सवका निचय करके कहा करि, अच्छी बात है, फिर कृष्णजीने जो सामग्रियां कराना चाही | 
 गोपोने सब तयार करदी ।! २० ।! अनेक तरहके वस्त्र ओर बडे बडे पात्र गोवर्धन सामने रख दिये तथाबहां ` 
` एकं गोवर्धनके बराबरकासा अन्नपुञ्ज लगा दिया \! २१ ।। भात, कटी, दाल, श्चाक, कांजी, बडे, रोचयां, 
परिया, लड्ड्‌ ओर मांडे आदिक \\२२।। दुध, दही, घौ, सहद, चटनी, चूसनेकी चीज तथा विना मांसकी ` 
 . संब चीजें देकर \\ २२ ।। कृष्ण बोले कि, हे गोपो ! मन््रको पठकरः आंखं मीचलो, इतनेमे ही गोवर्धन सब 
खालेगा, इसमे कोई संदेह मत करना ।! २४ ।। हे गोवधेन ! हे धराधार ! हे गोकुले जाग एवम्‌ ! अनेकों | 
भुजाओंसे छाया करनेवाले ! हमे करोड ग दे \\ २५ \\ जो लोकपालोकी लक्ष्मी षेनुरूपसे स्थित हो यज्ञके  । 
। लिये घृत देती है, वो मेरे पा्योका दूर कर !\ २६ \} इन दोनों मन्तरोको पठकर सबने आंखें मीचली, इतनेमे 
गोपाल कुष्ण गोवर्धनमें प्रविष्ट होकर सब अन्न खा गये ।। २७ ।। कोई गोप जो आंख विना मिचे वैठेथे ` 




























इसके दो नाडीके बाद, भगवान कृष्ण गोपोसे बः बो कि देलो-गोवधनने एक क्षण भरम हौ सब खा 
२९ \ है गोपालो ! देखो यह प्रत्यक्ञ देव है, इसमें कोई सन्देह नहीं है, यदि आवको सुलकौ इच्छा ` 
तो सब मिलकर इसका उत्सव करिये \\ २० 1) भगवान्‌ कृष्णके एसे बचन सुनकर सबने बडे ही आचयेके ` 
इद्रे उत्सवसे सौग्‌ ना, गोवर्धन का उत्सव किया ।\ ३१।। नारदजी आये तो ये इन्द्रोत्सव को देखने पर 
उत्सव देखकर इन््रकौ सभाम दाचिल जा हए ।! ३२ \\ वेवेन्ने आतिथ्य करके बार वार पृछा, 
नारवजीने कछ न कहा तो इन्द्र बोला कि, \\ ३३ 1\ हे विप्र ! आप प्रसन्न हँ या नहीं कहे ? मेँ जापके 
दुगा ।\ ३४ )। यह सुन नारद बोले कि, है-इनद्र ! इससे ज्यादा जौर मेरे दुःलका कारण क्या ` 
इको भी मने दूसरा इन्द्र बना देखा \\ ३५।। आज आपके उत्सवमे बह गोकुलके वालो 
बाद वह यज्ञके भागको कभी न कभी र्गा ही ।३६।! धौरे धीरे व! ह इ न््रासन ओर ` 


















| यह भौ गोवर्धनस्वरूप इृ्णके सिये दोनो मत्क अकूटे 
शरीकष्णके लिये निवेकन करता है, वो विष्णु लोकको पाता है ।। ७२ 1। ये सनत्कुमारसंहिताके के हए भ्रति. 
षदाके ब्रतादिक पूरे हृएु \ ~ ^ 


` वरतानि] 2 हिन्दीटीकासहित ` (१०६१) | 


ने जगह देदौ ! यहां सब आ जासो ।! ४७ \} इस समयकौन स्थर दे सकता है,इसीने दिया है'यह्‌ उत्तम नग ` 
 श्रत्यक्ष देव है ! सात दिनतक मूसरधार पानी बरसा ।। ४८ ।\ उस समय बे अनेक देश नष्ट हो गये जिन्हने 
 क्षरणागति नहीं कौ थी, पर शरणगोप नष्ट न हुए, गोवर्धनके नामसे भगवान कृष्ण रोज देते थे ।! ४९ 11 
 गोपोके लिये पक्वालके दाता थे जिससे गोप वहां सुखुवेक रहे आये, नारदजी यह सब कौतुक देवकर सत्य- 
चमक चलं गये ।। ५० ।\ वहां जा कर ब्रह्माजौ से बोले कि, हैवरहमन्‌ ! आप सोरहै हे क्या { सष्टिका नाह हो 
रहा है, इस कारण श्रीश्न गोकुलमें लाकर वष्टिका निवारण करिये ।\ ५१ ।। यह सुन ब्रह्माजी बोले किःकिस ` 
ल्व वृष्टिहोरहीहै, सुष्टिका नागकंसेहो रहा है ? है मुने ! क्या कोई दैत्य पैदा होगया ? मुन्ने सवबता ` 
दें ।। ५२ \) नारद बो कि, दैत्यरार्‌ तो कोई नहीं हुआ है पर भूमिमंडलपर गोपोने इन््रोत्सव छोखदियाहै, ` 
इससे इन्र नाराज होकर वरस रहा है ।\ ५३ ॥ ब्रह्माजी यह सुनकर हंसपर चटे आर वहां 
आये जह इन्र कोधित होकर सूसलाधार वरस रहा था ।। ५४ ॥ ब्रह्माजी इन्धते बोले कि, हे 
इन्द्र! तेरी एसी बुद्धि कंसे होग्द, क्या तु त्रिलोकनाथ भगवान्‌को जीत सकता है? । ५५ 0 
देख, एकी चिटली उंगलीसे इसने गोवधेन उठा रला है, दैदन्द ! तु उसके साथ व्यो ईर्ष्या कर रहाहै 
1 ५६ \। इन्नेब्रह्माजौके एसे वचन सुनकर मेघोको रोक दिया, एवम्‌ भगवान्‌ कष्णके चरणोमे पडकर ` 
बोला \। ५७ ।) किं-भगवन्‌ | मं आपका शरणागत दास हूं । मेरे कारनामं क्षमा किये जाये. यदि फेसीही ` 
` इच्छा हो तो अजपराधको दुर करनेके लिये दण्डही 1: 
तेरी ताकतको जाने विना इन गोपात्मोने यह पुजडाला, इनको जो तुमने दण्ड दिया वह्‌ ठीकहीदियाहै।।५९॥ 
` मं जापक आज्ञा माननेवाला, भायका छोटा भाई हुं, मेने शरण आपे हभोका रक्षण किया है ।। ६०।१ यदि | 
आप्‌ प्रसन्न हैँ तो आप इस िरिगोव्धनको अपना उत्सव देदे, जिससे कि, मेने गोकुलकी रक्षा की है।॥६१॥ ` 


५ ` उत्सव करना \। ६३ ।। इसी गोवर्धनने सारी भूमि धारण कर रखी है, पहिले आपने इसकी कदितको न जान, 
कैसा खेल किया था । ६४ ।। यह्‌ पर्वत सब कुछ मृद्से कह देता है, इसको सेवके प्रभावते ही इतनाभारी 
बल मुकने मिला है ।। ६५ ॥। इससे आप हरसा अघ्नकूट करना, जिससे गौओंका कल्याणं होगा भौर ' त्र 
| पौत्रादि सन्ततिं प्राप्त हंगो ।। ६६ ।\ गोव्नके उत्सवसे ेश्वय्यं भर सदा सौख्य भराप्त होगा, का्तिकके = ` 
` महीनामें जो भी कु जप होम अ्चेन किया हो ।६७। वो विना गोवर्धनके उत्सव किये, निष्फल हो जाता है । 

।  भेगवानृने गोपोसे कहा तथा गोपने उसे सत्य मान लिया ।\ ६८ ।। नौमे दिन कृष्णादिक 

। बारखिल्य बोरे कि, है मुनीक््वरो ! हमने सब आपको सुनादिया है !। ६९ ।। भगवान्‌ कृष्णको | प्रसन्न 
लिये अन्नकूद करना चाहिये, देशकारके अनुसार अनेक तरहके विततः 







































इही दे दीजिये ॥ ५८ ॥ भगवान्‌ छृष्ण बोलते कि, हे इत्र 


वारछिल्य बोर कि, इन्द्रभी एवमस्तु कहकर वह अन्तर्धान हो गया, इन्रके चले जानेपर भगवान पर्वतको 









न तमु देवि, 











तरहसे पक्वान्न बनाने चाहिये, सब अनोके पवेत बनाकर श्रौकृष्णके र के लि लिये निवेदन कर ० ६॥ 
ग पठकर निवेदन होता है, जो कोई इस प्रकार अनल्नकटको 











 भा्रपदे परा \! तृतीयाहवयुजे मासि चतुथी कातिकी भवेत्‌ ।! श्रावणे कलषा 
नाम्नी तथा भाद्रे च निमंला ।। आहवन प्रेतसंचारा कातिके याम्यतो मता।॥ ` 
` ॥ इति ।\ चतस्रो द्वितीया उपक्रम्य प्रथमायां किचित्प्रायदिचत्तं द्वितीयायां 
सरस्वतीपूजा तृतीयायां श्राद्धमुक्त्वा चतुर्थ्या 

तु हितीयायां युधिष्ठिर ।\ यसो यमुनया पुवं भोजितः स्वगृहेऽचतः \! अतो यम- 
` द्वितीयेयं त्रिषु लोकेषु विश्नुता ।। अस्यां निजगृहे षाथं न भोक्तव्यमतो नरः ।। 
यत्नेन भगिनीहस्ताडोक्तन्यं पुष्टिवद्धंनम्‌ ।। दानानि च प्रदेयानि भगिनीभ्यो ` 











यमपुजनमुक्तम्‌ ।। कार्तिके शुक्लपक्षे 





 वि्ञेषतः ॥! स्वर्णालंकारवस्त्रा्पूजासत्कारभोजनेः । सर्वा भगिन्यः संपूज्या ` 
अभावे प्रतिपन्नकाः \। प्रतिपत्नकाः-मित्रभगिन्य इति हेमाद्रिः ।। पितृव्यभगिनी 


` हस्तात्रथमायां युधिष्ठिर ।। मातुलस्य सुता हस्ताद्द्वितीयायां युधिष्ठिर 






हस्तत व परम्‌ ।। सर्वासु भगिनीहस्ताड्धोक्तव्यं बलवर्धनम्‌ ।\ धन्यं यक्ञस्यमायुष्यं ` | 
 धर्मकामाथसाधकम्‌ ।! यस्यां तिथौ यमुनया यमराजदेवः संभोजितो निजकरा- 





स्वसुश्चेव तृतीयायां तयोः करात्‌ ।! भोक्तव्यं सहजायादच भगिन्या ` 



















व व्रतानि ] 





 मदृदारं न स पश्यति भानुजं ।। १३ ।। वीरेशशानदिग्भागे यमतीथं प्रकीतितम्‌ \\ ` 
तत्र स्नात्वा च विधिवत्संतप्यं पितृदेवताः । १४।। पठेदेतानि नामानि अआमध्याह्लं 
नरोत्तमः ।। सूर्यस्याभिमुखो मौनी. दृढ चित्तः स्थिरासनः ।\ १५. ।। यमो निहन्ता = ` 
 पितुधमंराजो ववस्वतो दण्दधरह्च कालः ।। भूताधिपो ठत्तकृतानुसारी कृतान्त 
एतदृक्नेनामभिजेपेत्‌ ।॥ १६ ।। एतानि च तानि दच्च तेः नामदह्केनेत्यथंः । ततो 
।  थमेहवरं पुज्य भगिनीगृहसात्रजेत्‌ \। मन्त्रेणानेन च तया भोनितः;पुवेमादरात ` 
।  ॥ १७ ।। मरातस्तवानुनाताहं भुंक्ष्व भक्ष्यमिदं श्रुभम्‌ ।। प्रीतये यमराजस्य यमु- 
नाया विशेषतः \ १८ ।\ सन्तोषयेचो भगिनीं वस्त्रालंकरणादिभिः ॥। स्वप्नेऽपि 
यमलोकस्य भविष्यति न दश्ञेनम्‌ ।। १९ ।! न॒पेः कारागृहं ये च स्थापितामम 
वासरे \! अवश्यं ते प्रेषणीया भोजनार्थं स्वसुगृहे ।। २० ।। विमोक्तव्या मयापापा 
 नरकेभ्योऽद्य वासरे ।\ येऽद्य बन्दीकरिष्यन्ति ते दण्ड्या मम स्वेधा ।\ २१।॥ 
 कनीयसौ स्वसा नास्ति तदा ज्येष्ठागृहं ब्रजेत्‌ ।। तदभावे सपत्नीजां तदभावे ` 
पितुव्यजाम्‌ ।। २२ ।। तदभावे मातृस्वसुर्मातुलस्यात्मजां तथा ।। सापत्नगोत्र- ` 
 सम्बधैः कल्पयेत्तु यथाक्रमम्‌ ।! २२३ ।। सर्वाभिवे माननीया भगिनी काचिदेव 
हि ।। गोनद्याद्यथवा तस्या अभावे सति कारयेत्‌ ।! २४ ।। तदभावेऽप्यरण्यानीं 
` कल्पयेत्तु सहोदरीम्‌ ।! अस्यां निजगृहे देवि न भोक्तव्यं कदाचन }। २५ ।। थे 
| भुञ्जन्ति दुराचारा नरकं ते पतन्ति च ॥\ स्नेहेन भगिनीहस्ताद्धूोक्तव्यं पुष्टि- ` 
,  बद्ंनम्‌ ।। २६।। दानानि च प्रदेयानि भगिनीभ्यो विशेषतः ।। श्रावणे तु पितृव्यस्य ` 
 कन्याहस्तेन भोजनम्‌ ।! २७ ॥ मातुलस्य सुताहस्ताम्धोक्तव्यं भा्रमासके ।। 








तकर म ममननम न 























हि भाेण्डज षाहाहस्त यान्तकालोकधरामरेश \। भरातृषितीयाकृतदेवपजां ` 
` गृहाणं च्य भगवनत 





£ (1) 
५ न <लः ५१, 
पा 
ट , +. | 
प ५५६४ 





मस्ते \ धर्मराजं नमस्तुभ्यं नमस्ते यसुनाग्रज ।। जाहिमां 4 


करैः साद्धं सूयं पुत्र नमोऽस्तु ते ।\ लेद्धे-कातिके तु द्वितीयायां जुक्लायां 


 भ्मातयजनम्‌ 





या न कुर्याष्टिनद्यन्ति शरातरः सप्तजन्मसु ।। पाद्ये उ्तरखण्डे-भद्रे ` 


भगिनी भो जातस्त्वदंधिसरसीरुहम्‌ ।। श्रेथसेऽ्य नमस्तुभ्यमागतोश्हं तवाल्यम्‌ \\ 
 भृदुवाक्यं ततः श्रुत्वा सत्वरं कियते तया ।) अद्य भ्रातुमती श्रातस्त्वया धन्यास्मि 
मानद ।। भोक्तव्यं तेऽद्य मद्गेहे स्वायुषे मम मानद ।\ कातिके शुक्लपक्षस्य ` 
द्वितीयायां सहोदरः ।\ थमो यमुनया पूर्वं भोजितः स्वगृहेऽचतः ।! अस्मिन्दिने 
 यमेनात्र नारी बा पुरषोपि वा 1! अपविद्धाः कर्मपाक: स्वेच्छया ये पचन्तिहि ।॥ 
पापेभ्यो विप्रमुक्तास्ते मुक्ताः कर्मनिबन्धनात्‌ ।! तेषां महोत्सवो वृत्तो थमराष्टू- ` 


सुखावहः ।। तस्माद्न्धोऽत्र मद्गेहे भोजनं कुर काके !। आशिषः प्रतिगृह्याथ ` 
नमर क थ समचंयेत्‌ ।। सर्वा भगिन्यः संपूज्या ज्यष्टास्तत्र तु सस्मृताः ।। वस्क्रदिना ५ 








































वरतानि 1 





न ५ ४ त-प मौ ८3 (न 5 ५ 
 ' “जोन = मानतात मअ णाति जनाजा मो)" थोक 


हसे तथा दूसरी द्वितीयाको मामाकौ बेरीके हाथसे खाना चाहिये तथा क्वार शुदीद्वितीयकेदिन भृआको 
घा मौसौकी बेटीके हाथसे तथा कात्तिक शुक्ला दितीयाके दिन अपनी बहिनके, हाथसे सपत्नीक भोजन करना 
चहिये, यदि एेसा न हये सके तो सभी द्वितीयामौको अपनी सगी बहिनके हाथसे धन्य एवम्‌ यडाके देनेवाला, 
अका बढानेबाला भौर धमं, अथं, कामका देनेवाला बलव्धक भोजन करना चाहिये ! जिस तिथिको भगिनी 
ग्रमे इवी हई यमुनाजीने अपने हाथसे यमदेवको जिमाया था, उस दिन जो मनुष्य अपनी बहिन्फे हासे 
जीमता है वो अपूर्वं रत्न तथा धनधात्योको प्राप्त होता है । यह हिमाद्रिमे भविष्यके अनुसार यमद्वितीयकी = 
| यमष्ितीयाकी कथा-वालखिल्य ऋषि कटने लगे कि कासिकके शुक्लपक्षकी द्वितीयाको यमद्वितीया = 
( ६ कहते है, उसमे सा्ंकारके समय यमका पुजन करना चाहिये \\ १।। प्रति दिन श्रीयमुना महारानी आकरयम- = ` 
देवकी प्राथेना करने लगीं कि, है माई ! अपने संब इष्ट मित्रों को लेकर मेरे घर भोजनके ल्यि आओ ।)२।॥ 
| ध यमका भरी यह काम रहता था कि कठ आगा या परसो आजासगा क्योकि हम कामम्‌ लग रहत ह्‌ दसं कारण . ॥ | 
 अवकाञ्च नहीं मिलता ।\३।) हे मुनीदवरो ! एक दिन जबरदस्ती निमन्त्रण दे दिया, तथा यह भी का्तिकिके ` 
 शुक्छपश्षकी हिततीयाको ययुनाजीके घर भोजन करने गया ।।४।। जातसार रविसुत यममे अपने पाहासे सब ` 
 लोगोकोम्‌वत कर दिया था एवम्‌ अपने इष्ट गणोको लेकर यमूनाजीके घर गया था तथा यसुनाजौने यमका ` 
` । प्रियं आतिथ्य किया ओर पाकं भौ अनेके तरहके बनाये ।\५।। यमुनाजीने सुगन्धित वेले यमका अभ्यद्ध ` 
किया, पीछे उवटने करके स्वच्छ जलसे स्नान कराया ।1६।। पीछे यमके लिये अलंकार करनेके अनेक तरहके ` 
` सामान वस्त्र ओर चन्दन माला आदिकं दिये जो कि, मके नपानेके ही होते थे 1\७। अनेक तरहके पक्वाप्ोसे ` 
`  सोनेके थालोको सजाकर अत्यन्त प्रसन्नताके साथ यमको भोजन कराया ।८।! भोजन करनेके पीठे यभनेभी, ` 
` अनेक तरहक वस्त्रालंकारोसे बहिनका पुजन करके बहिनसे कहा क्षि, ए बहिन ! आपकी जो इच्छा हौ सो 
मांगो ।\९।! यमके एसे बचन सुनकर यमुनाजी कह्ने गीं कि, आप प्रतिवर्षं आजके दिन मेरे घरपर भोजनं ` 
करनेके लिये पधारा करे ।१०।) तथा जिन पापियोने आजके दिन आपकौ तरह जपनी बहिनके हाथसे भोजन ` 
किया हो, उन पापियोको आप अपने पासे तदा मुक्त करते रहे एवम्‌ जो बहिनके हाथमे इस प्रकार भोजन ` 
` करे ॥\११।। आप उन्हँं सदा सुख पहुंचावे, यही मे आपसे वरदान मांगती हूं, इतनी सुनकर यम कहने लगा कि, = 
जो तुक्षमे स्नान पर्पण करके ।१२।। बहिनके घर भोजन करे उसका पूजन करेगे हे सूरयपुत्रि ! बे मनुष्य क १ 
` भी मेरे दरवाजे कोन देखेगे ।) १२)! वीरे महादेवकी ईशानी दिशामें एक यमतीथं है, उनसमें स्नान करके 
| विधिके साथं पितर ओर देवताओंका तर्पणं करके ।\ १४।। जो मनुष्य श्रेष्ठ, एकाग्र चित्तसे मौनपुवंक स्थिरा- ` 
|  सनसे सू्येके सामने मध्याह्न कालमे इन नामको पड़ता है 1 १५।॥ वे नाम ये ह कि यथम, निहन्ता, 
` पितुराज, धर्मराज, वैवस्वत, दण्डधर, काल, भूताधिप, त्तङृतानुसारे ओौर कृतान्त तथा इन द्य नामोका 
जप करता है} १६॥। लोकम जो “एतदृश्ञभिः" यह्‌ पद माया है, इसका ग्रन्थकार अथं करतेहैयेवेद्दा 
नाम हुः इन दडच नामोके हारा यमका जप करता है ।। इन दशानामोसे यमेडवरका जप पुजन करके बहिनके = ` 
॥ ० धर आजायं तथा बहिन भी इस मंत्रसे ५ आदरके साथ भारईको के, हे तेरी 


























 सम्बन्धकी भी वहां कोई न हो तो मानी हुई बहिनके घरही भोजनं करना चाहिये, नहीं तो गौ, नदी जादिकोही ` 
अहिन मानकर, उनके पास ही भोजन करना चाहिये \। २४ ।! यदियेभीनप्राप्त हों क्स वनीकोही 
अपनी बहिन मान ले, हे देवि ! इसमे अपने घरपर कभी भौ भोजन न करना चाहिये ।। २५।।जो दुराचारी 
लोग थम द्वितीयाके दिन अपने घरयर भोजन करते है, बे नरकमं पडते ह, इस दिन तो प्ेमके साथ बहिनके ` 
ही हासे पुष्टिकर पदाथ खाने चाहिये \। २६1। इस दिन बहिनको विरोषं रूपसे दान देने चाहिये, श्रावणकी ` 
द्वितीयाको तो चाचाकी बेटीके हाथसे भोजन करना चाहिये । २७ \\ भादोकी द्वितौयाको मामाकी बेटीके ` 
हसे, तथा कारकौ द्वितीयाको मौसीकी बेटी अथवा भूमाकी बेटीके हाथसे भोजन करना चाहिये ।\ २८॥ 
पर कािकलुकल द्वितीयाको जरूर ही अयनो बहिनके हाथसे भोजन करना चाहिये, ठेसा कहकर, धर्मराज 
थम संयमनी नासकी अपनी पुरीको चले गये 1! २९ ।\ इस कारण हे कातिकके ब्रत करनेवले ऋषिवरो ! ` 
यमं द्वितयाके दिन बहिनके घर पहुंचकर, उनके हाथसे भोजन करो जो कुछ कहा गया है, इसमें सन्देह न ` 
करना, यह सत्य है ।\ ३० ।। श्रीसूय भगवानने तो यहांतक कहा है कि, जो मनुष्य यमद्वितीयाके दिन बहिनके ` 
हाथका भोजन नहीं करता, उसके सालभरके किये हुए सब सुकृत नष्ट हो जाते हे \। ३१ ॥\ जो कोर्दस्त्री 
यम द्वितीयाके दिन भारईको अपने घरपर भोजन कराकर उसे पान लिलाती है बो कभी विधवा नहीं होती ` 
` ॥३२॥ न उसके भार्दकी आयुक्त ही क्षय होता है, अपराह्तक रहनेवाली जव द्वितीया हो तबही भाईको ` 
भोजन कराना चाहिये \। ३३ । यदि अन्ञानसे अथवा मोहुसे या विदेशमें रहनेके कारण वा बन्दी होनेसे ` 
सने बहिनके हाथसे भोजन नहीं किया हो वो यमद्वियाकी कथाको सुनकर बहिनके हाथसे भोजनका फल ` 
 पाठेता है 1\ ३४॥ यह्‌ सनत्कुमारसंहिताकी कही हई यम द्ितीयाकौ कथा पूरी हई ॥। भैया दौज-अब ` 
तिथितत्त्वके अनुसार. भैया दौजकौ विधि कहते हे । इस ग्न्थमें लिखा हु है करि, बहन ओर भाई दोनों मिलकर 

चित्रगुप्त ओर यमके दु्तोका पूजन करं तथा सबको अघं दे । इस इत्मोकर्मे जो सहज दयेः' यह पद याहे 
इसका बहिन भाई अथे है ! इसीमे अध्यंका मंत्र लिखा हभ है \ जिसका अथं होता है कि, हे सूयक सुत ! पाड 
्थोमे रखनेवाठे अन्तकं ! सब लोगोके धारण करनेवारे यम ! आओ, आभो, इस भेया दजकी पूजा ओर 
अर्धक ग्रहण करो, आपके ल्यि वारंवार नमस्कार है । हे धर्मराज ! तेरे च्वि नमस्कार है तथा हे यमुनाके ` 
बडे भाई ! तेरे लिये नमस्कार है अपने किकरोके साथ भेरी रक्षा करो, हे सूर्यसुत ! तेरे व्यि वारंवार नम- ` 
` स्कार है । लिगपुराणमें लिखा हुआ है कि, जो स्त्री इस्‌ भैया दूनके दिन भाईका पूजन नहीं करती, वो सात 























कमलोको प्राप्त हुआ हूं, अयने शरेयके प मे तेरेघरञआया ` 
वारमा ष सुनकर बहिनको भौ शी रहौ कह देना चाहिये कि, जज सें तेस भरईवाली 





नमोऽस्त 





| | 1 ( ५ ५4 
(11 । ९२१९।८।५२।९11 ६५ 4.८0) + 
४ मिनि नमिन न ् ८ ध ४ व 4 प ‡ 





अथ तृतीया्रतानि 





ध क्लतृतीयायां सौभाग्यशयनव्रतम्‌ । मस्स्ये 
मत्स्य उवाच ।! वसन्तमासमासाद्य त॒तीयायां जनप्रिय \! सौभाग्याय सदास्त्रीभिः ` 
कायें पुत्रमुखेष्सुभिः ।\ शुक्लपक्षस्य पुर्वाह्ले तिलः स्नानं समाचरेत्‌ ।। तस्मिघ्रहनि 


सा देवी किल विष्वा्मना सती ।\ पाणिग्रहणिकेमन्त्ररुदढा बरर्बाणनी ।\ त्या ` 


भ (५ 


सहव देवेशं तृतीयायां समचयेत्‌ \। फलर्नानाविधेधुपर्दपिनवेद्य संयुतः ।। प्रतिमां ` 
पञ्चगव्येन तथा गन्धोदकेन च ।! पञ्चामृतंः स्नापयित्वा गौरीं शंकरसंयुताम्‌।! | 
तु पाटलायै च पादौ देव्याः शिवस्य तु ।। शिवायेति च संकीत्यं जयाये 
गुल्फयोस्तथा ।। त्रिगुणायेति रुद्रस्य भवान्ये ज॑घयोर्युगम्‌ ।! शिवं स्द्रेहवरायेति | 
जयाय इति जानुनी 








| संकीत्यं हरिकेशाय तथोरू वरदे नमः ।। ईशा 








हंकरायेति शंकरम्‌ ।। कुक्षिदयेच कोयं शूलिनं श्ुलपाणये ।। मङ्कलाये | 


 नभस्तुभ्यमुदरं चापि पुजयेत्‌ ।। स्वत्मिने नमो रद्र मीशञान्ये च कुचढयम्‌ । शिवं | 


। वेदात्मने तद्रदुप्राण्ये कण्ठमचेयेत्‌ ।। त्रिपुरष्नाय विदवेशमनम्तायै करद्यम्‌ ।। ॥ 1 





04. 4.7 ध 4 101 






(1 
पिनिम 





 भा्गहीषे गोमत्रं पौषे संप्रारयेदघतम्‌ ।। साघे ङष्णतिलांस्तहत्पञ्चगव्यं ` ५ 
च फाल्गुने \ ललिता विजया भद्रा भवानी कुमुदा शिवा \! वासुदेवी तथा गौरी ` 
इ भङ्खला कसला सती ।\ उमा च दानकाले तु प्रीयतामिति कोतयेत्‌ \\ सल्लिका- ` ध 
श्लोक कमल्कदम्बोत्पलमालती ।! कृष्नकं करवीरं च बाणमल्लानकुंकूमम्‌ ॥ ` 
सिन्दुवारं च सर्वेषु मासेषु करमशः स्मृतम्‌ \। बाणस्‌-नीलकुरण्टकः ।। अम्ला- 
` नम्‌-महासहापुष्पम्‌ सिन्दुवारम्‌-निगुण्डोपुष्पम्‌ जपाकुसुसकौसुंभमाल्ती- 
 क्ञतपत्रिकाः ।। यथालाभं प्रशस्तानि करवीरं च स्वंदा ।। एवं संवत्सरं थावदुपोष्य ` . 


विधिवन्नरः \) स्त्री वा भवत्या कुमारी वा श्षिवावभ्यच्येशक्तितः । व्रतान्ते शयनं 
 दद्यात्सर्वोपस्करसंयुतम्‌ ।। उमाममहेश्वर हेमं वृषभं च गवा सह ।। स्थापयित्या च 4 


शयने ब्राह्मणाय निदेदयेत्‌ ।\! अन्यान्यपि यथाशक्त्या मिथुनान्यम्बरादिभि 


 धान्यालंकारगोदानेरभ्यच्यं धनसञ्चयः ।। वित्तक्ाठयेन रहितः पूजयेद्गत- 





पदमानन्त्यमदनते ।। फखस्यैकस्य च त्यागमेतत्कुवन्‌ समाचरेत्‌ ।} यत्रं कोति 









सम प्नोति प्रतिमासं नराधिप ।\ सोभाग्यारोग्यरूपायुवस्त्रालकारभूषणः ।\ न 
वयुक्ता भवेद्राजन्नब्दाबुदशषतत्रयम्‌ \\ यस्तु दशवर्षाणि सौभाग्यशयनव्रतम्‌ ।\ 
करोति सप्त चाष्टौ वा श्रीकण्ठभवनेऽ सरं: \! युज्यमानो वसेत्सम्यग्यावत्कत्पायु- 


विस्मयः ।\ एदं करोति यः सम्यक्सौभाग्यशयनव्रतम्‌ ।\ सर्वान्कामानवाप्नोति ` 





ध सर्वात्मने नमः इस मंत्रसे शिवके उदरको पुजे \।ओम्‌ ईशान्ये नम : इस मंत्रसे पा्वेतीके कुचोको तथा “ओवे- - 


` इस संत्रसे 


(व्रता 4 य : : < हन्द कस्ादहत्‌ 





” इस संत्रसे क्षिक्की सोनो कोलोका पूजन करे ।।ओम्‌ मंगलाय नमः" इस संत्रसे गौरीके तथा “ओम्‌ 


 दात्मने नमः" इस मंत्रसे शिवके दुचोको पूजना चाहिये \ “जभ्‌ खराण्ये नमः इस मत्से गौरीसे तथा आम्‌ = 
 क्निषुरण्नाय नमः” इस मंसे शिवके कंठका पुजन करना चाहिये ¦ “ओम्‌ अनन्तायै नमः इस मंत्रसे 
श्री गौरीके तथा ''भोम्‌ त्रिलोचनाय नमः इस मंत्रसे शिवके करोका पुजन होना चाहिये \ “ओोम्‌ ` 
` कालानलप्रिये नसः" इस मंत्रसे गौरीके तथा “ओम सोभाग्यभुवनाय नमः” इस मंत्रसे शिवके दोनो 
` बाहुभोकी पजा करनी चाहिये । “ओम्‌ स्वाहा स्वधायै" इ स म॑त्रसे गौरीके तथा “ओम्‌ ईदवराय नमः 
इस मंत्रसे शिवके मुखकी पुजा करनी चाहिये । “ओम्‌ जोक सथुवासिन्धे नमः इस मंत्रसे = 
` गौरीके भौर “ओम्‌ स्थाणवेनमः” इस मंज्से क्षिके होठोका एजन होना चाहिये “ओम्‌ चन््मुखप्रियाय _ 
नमः” इस मंत्रसे गौरीके तथा “ओम्‌ अर्धनारीडायनमः इस ॒संत्रसे शिवके मुखका दुबारा पूजन ` ` | 
करना चाहिये । “भम्‌ असिताङ्खाये नमः” इस मंत्रसे गौरीको तथा “जम्‌ उग्राय नमः ` 
इस मंत्रसे शिवजीकी नासिकाका पुजन होना चाहिये) “ओम्‌ ललितायै नमः” इस मंत्रसे गौरीकौ तथा = . | 
“ओम्‌ शर्वाय परहन्त्रे नमः इस मंतरसे शिवकी भोहोका पुजन करना चाहिये । “ओम्‌ वासुदेव्यैः नमः = ` 
ध  गौरीके तथा “ओम्‌ श्रीकण्ठाय नमः इस मंत्रसे शिवके केगोका पजन करना चाहिये । “ओम्‌ | 











 भीग्रसौम्यरूपिण्ये नमः” इस मंत्रसे गौरीके भौर “ओम्‌ सर्वात्मने नमः” इस मंतरसे शिवके करका पूजन ` 
रना चाहिये । इस प्रकार दोनोका पूजन कर. लेनेके बाद, इनके सामने सोभाग्यकौ आठ वस्तुभोकानिवेदन = | 
करर चाहिषे । मटर, कसम, दूध, जीरा, तालपत्र, ईखका गाडा, लघण जौर कस्तुम्बुर इदको सौभाग्याष्टक = 


` करप) फयोङि, यें वस्तु सौभाग्यके करनेवाली हुं । अरिन्दम ! इस पकार दोनो के सामने सोभाग्याष्टकष्ा ` | 







( चाहिये । इसके प्राशन ओर दान-मंत्रोमे जो कुछ विरोषताए ह उन्हे भौ कहते हँ । गोष्छगमात्नतो पानी पहिलीमें 


`. श्रावणमे थोडासा दही, भादोमे कुदाका पानी, क्वार में दूध, कातिकमें गायका आव्य, सार्गशीषेमे 


ध ५ निवेद वेदनं कर्के, पीठे गीष्पुगके परिमाणसात्र पानी पकर भूमिपर शयन करना चाहिये । दूसरे दिने प्रातःकाल 0 | 

नेत्य क्मसे निवृत्त होकर साखा वस्त्रं जौर जभूषणोसे ब्राह्मण दम्पतियोका पजन करे, पौरे सौभाग्याष्टकके ` | 
` साथ गौरी पार्दतीकी बनीहूई सोनेकौ त्रतसू्तिको उस ब्राह्मणको दे दे ओर कहे कि, इस दानसे कलिता देवौ 
 सुञ्षपर प्रसन्न हो जाय इसीतरह चैत्रदुक्ला तृतीयासे केकर प्रतिमासकी शुक्ला तृतीयाको यह ब्रत करना 










तथा वैज्ञाखको थोडासा गोबर लाकरही रहूजाना चाहिये, च्येष्ठमे मल्दारके फूल तथा आषाढमे वेलपत्र 


कलिता, विजया, भद्रा, भवानी, कुमुदा, क्षिवा, वासुदेवी, गोरी, मंगला, कमला, सती ये स देवियां याइ 


 उसीके लिये (४ कहना चाहिये । चैत्रमे मट्लिकाके, वैशाखमे अकषोकके उयेष्ठमे कमलके भ आषाढसें 


पौन अम्लानके न कुकुमके, भर फागुनमं (9 ए्लोके फूलोको 












र  दानसे परमप्रसस्च होजाये, पीछे दान देना चाहिये । इन नामोमेसे हरएक नामको लेकर उसके पीछे ' प्रीयताम्‌” ` 
` लगाना चाहिये तथा पहिकेमे पहिली ओर इुसरेसे दूसरी देवीकी प्रसत्नतके लिये दान देना चाये, तथा 








मे मारतीके, ववारमे कुक्जकके, कातिकरमे करवीरके, अगहनमे बाणके," 








नीले कुरटकका है ~ महासहाको भम्त्ानं कहते हँ । निर्गृण्डीकः सिन्धुवार कहते त अ 
 अवदयही बदन चाहिय \ सत्र हौ अथवा कुमारी हो, इस प्रकार एक सालतकं व्रत करती 
श्िवपुजन करती रहे, ्रतकी समाप्तिपर सब उपकरणोके साथ शार 




















यनीका त्रत करेगी जथवा ७ वषं आठ वषेतक इस व्रतको करती रहेगी वौ देवतोसे पुजित हुई तीस हजार 
कंस्य कलासमें निवास करेगी । है राजन्‌ जो स्त्री वा कुमारी भवितके साथ इस व्रतकौ करती है बह भी भग- ` 
बतीके अनुग्रहसे पूर्वोक्त फलको पाती है । जो कोई इस त्रतको कथाको सुनेगा अथवा जो कोई इसत्रतके ` 
` करनेकी सलाहदेगा बहुभी विद्याधर होकर चिरकालतक्‌ स्वगैमें वास करेगा ! गौरीके दोलाका उत्सव-इसी ` 
. ` तुतीयाको गौरीके ईहिडोलेका उत्सव होता है । इसौ विषयपर हेमाद्रिमे देवीभागवततको लेकर कहा है कि, 
जिस स्त्रीको अपने शुभकी इच्छा हौ उत्ते चेत्शुक्ता तृतीयाके दिन गौरी पावेतीका पुजन करके डोलेका ` 
५ न उत्सव करना चाहिये | 1 ध 


~ 1 =-= ~ ~ = ० 


0 अत्रैव गौर्या दोरोत्सवः 1 
तदुक्तं हेमाद्रौ देवीपुराणे-चेत्रशुक्लतुतीयायां गौरीमीहवरसंयुताम्‌ ।। संपूज्य ` 
 दोखोत्सवकं कुर्यान्नरो शुभेप्सुका ।। तथा च निणेयामृते-तृतीयायां यजेहेवी 
शंकरेण समन्विताम्‌ ।। कुंकुमागुरुकपूरमणिवस्त्रसर्गाचताम्‌ \! सुगन्धिपुष्पधूपेक्च ` 
 दमनेन विशेषतः ।। तत आगन्दोल्येदत्स लिवोमातुष्टये सदा ।। रात्रौ जागरणं ` 
 _ कुर्यातप्ातर्देया तु दक्षिणा । सौभाग्याय सदा स्त्रीभिः कार्या पुत्रसुखेप्युभिः इय 
च परा ग्राह्या ।। मुहूतेमात्र॑सत्वेपि दिने गौरीव्रतं परे । इति माधवोक्तेः ।! इय ` 















विङ्वभोक्तारो विदवमान्यास्त एव हि ॥ ये त्वां विदवभुजामत्र पूजयिष्यन्ति ` 
मानवाः ॥\२।। विशवे विदवभुजे विश्वस्थित्युत्पत्तिलयप्रदे \। नरास्त्वदचेकार्चात्र ` 
भविष्यन्त्यमलात्मकाः ।\ ३ ।। मनोरथतुयायां यस्ते भव्ति विधास्यति ।। तन्म- | 
नोरथसंसिद्िभेवित्री मदनुग्रहात्‌ ॥।४। नारौ वा परुषो वापि त्वदतरताचरणा- 






त्परिये ।\ मनोरथानिह प्राप्य ज्ञानमन्ते च लप्स्यत ।\ ५ ।। देव्युवाच । मनोरथ 
त्तं कोदृक्कथानकम्‌ ।। किंफलं कंः कृतं नाथ कथयेतत्करृषां कुर ।\ ६ । 
























॥ १२ ॥ सर्वदेवेषु यो मान्यः सर्वदेवेषु सुन्दरः ॥। यायजुकेषु सर्वेषु यः श्रेष्ठः | 
सोस्तु मे पतिः ।॥ १३ ॥ यथाभिलषितं स्यं यथाभिलषितं सुखम्‌ । 
यथाभिलषितं चायुः प्रसन्नो देहि भे भव । १४।। यडा यदा च पत्या मे स्कः 
 स्याद्धत्सुखेच्छया । तदा तदा च तं देहं त्यक्त्वाञन्यं देहमाप्तुयाम्‌ ।। १५ ।। 
संदा च लिङ्खपजायां मम भक्तिरनुत्तमा ।\ भव भूयाद्ूवहर जरामरणगहारिणी ` 
 ॥ १६॥।\ धर्तुव्येयेपि वैधव्यं क्षणमात्रमपीह न ।। मम भावि महादेव पातित्रत्यंच ` 
यातु मा \। १७ ॥ स्कन्द उवाच ।\ इमं मनोरथं तस्याः पौलोम्याः पुरसूदन ।॥ ` 
` समाकर्यं क्षणं स्थित्वा प्राहेश्षो विस्मयान्वितः ।} १८ ।\ ईक्वर उवाच ॥। पुलोम- ` 
कन्ये यश्चैष त्वयाऽकारि मनोरथः ।। लप्स्यसे ब्रतचर्यातस्तत्कुरष्व लितेन्दिया = ` 
॥ १९ ।। मनोरथतृतीयायाश्चरणेन भविष्यति ।\ तत्प्राप्तये द्रतं वक्ष्ये तद्विधेहि ` 
यथोदितम्‌ ।\ २० ।) तेन व्रतेन चीणन महासौभाग्यदेन तु ।। अवश्यं भविता बाले ` 
तव चैवं मनोरथः ।! २१ ।। पुलोमकन्योवाच ।। कारुण्यवारिधे शम्भो प्रणत- ` 
 भ्राणिसवंद ।। कनामा चाथ का शक्तिः का पज्या तत्र देवता ।\ २२॥ कदाच 
` तद्धिधातव्यमितिकतेव्यता च का \। त्याहकण्यं शिवो वाक्यं तां तु प्रणिजगादह ` 
 ॥२३।।ईकबर उवाच ।। मनोरथततीयाया व्रतं पौलोमि तच्छुभम्‌ ।। युज्या चिषव- ` 
भुजा गौरी भुजविशतिशालिनी।\ २४1) बरदाभयहस्तश्च साक्षसुत्रः समोदकः ।। 
देव्याः पुरस्ताद्ब्रतिना पुज्य आश्ाविनायकः ।।२५।। चतुभृजइचारने्रः सवेसिद्धि- 
। करः प्रभुः ।। चेत्रलुक्लद्धितीयायां कृत्वा वें दन्तधावनम्‌ ।! २६ ॥। सायन्तनीं च 
|  नि्वेत्यं नातितृप्त्या भुजिक्रियाम्‌ \। नियमं चेति गृह्णीयाञ्जितक्रोधो ? ष ५ ८ 





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ब 1 = - 












 ॥ २९ ॥। ज्ञौचमाचमनं कृत्वा दन्तकाष्ठं समाददेत्‌ \। ३० ।! अशोक त 
५ शुभ स्वंसोकनिशातनम्‌ ।। नित्यन्तनं च निष्पाद्य विधि विधिविदां बर} ३१॥। 


(११२) द्तरजि [ तृतीया- ` 





 देव्याश्चापि शुभन्रते ।\ अन्नानि चेकभक्तस्य च्छम्‌ तानि फलरप्तये ॥ ३७ ।- 
 जम्ब्वपमा्गखवदिर जातीचूतकदम्बकम्‌ 1! प्लक्षोदुम्बरलनज्‌रीवीजपुरीसशडिमी 
 ॥! ३८ ॥\ दन्तकष्ठद्रमा एते व्रतिनः समुदाहूताः ।! सिन्दूरागुरकस्तूरी चन्दनं 
 रवतचन्दनम्‌ ।! ३९ ।! गोरोचनं देवडारं पद्याक्षं च निशायम्‌ \। प्रीत्यानुलपन 
बाले यक्षकर्हमसंभवम्‌ ।! ४० 1) स्वेवामप्यलाभे च प्रज्ञस्तो यनललकद्मः ।। कस्त्‌- ` 
 रिकायाह्नौ भागौ द्रौ मागो कुडडमस्य च \) ४१ ।। चन्दनस्य त्रयो भागाः किः ` 
 नस्त्वेक एव हि ।\ यक्तकर्दम इत्येष समस्तयुरवल्छभः ।1 ४२ ।। अनुचव्वाथ = | 
 कुसुमेरचयेहच्मि तान्यपि \} पाटलामल्लिकपद्यकतकीकरबीरकः ॥! ४३ ॥ | 
 उत्यलेराजचंपैडच नन्यावतेश्च जातिभिः ।। कुमारीभिः कणिकारेरल मिं तच्छदैः ` 
सह ।॥ ४ \। सुगन्धिभिः प्रसुनोघेंः सर्वालाभेऽपि पूजयेत्‌ ।! करम्मो दधिभक्तं ` 
च सचूतरसमण्डकाः ।\ ४५ ।। फेणीका वटकादचेव पायसं च सशकंरम्‌ ।! समुद्गं ` 
सघृतं भक्तं कात्तिक विनिवेदयेत्‌ ।! ४६ ।। इन्देरिकाहच लड्डका माघं ल्पसिका 
शुभा ।\ मुष्टिका शकंरागर्भाः सपिषा परिसाधिताः ।\ ४७ ।। निवेद्याः फाल्गुने 

व्यै सादं विष्नजिता मुडा ।1 निवेदयेदयक््ं हि एकभक्तेऽपि तत्स्मृतम्‌ ।\ ४८ ।\ 
अन्यन्निवेद्य सम्मूढो भुञ्जानोत्पतेदध प्रतिमासं ततीयायामंबसाराध्य 
म्‌ ।। ४९ ।॥। व्रतसंपुर्तये कुर्थात्स्थण्डिलेऽग्निसमचेनम्‌ ।! जातवेदससंत्रेण ` 
 तिलाज्यद्रविणेन च !। ५० ।। दतमष्टाधिक होमं कारयेदिधिना व्रती । सदेव 
नक्ते पजोक्ता सदा नक्ते तु भोजनम्‌ ।! ५१ ।। नक्त एव हि हौमोऽयं 
क्षमापनम्‌ ।। गृहाण पुजां मे भक्त्या मातविष्नजिता सह्‌ \\ ५२ ।। नमोस्तु ते. 
` विश्वभुजे पूरयाश्ु मनोरथम्‌ \\ नमो विच्नकृते तुभ्यं नम आशाविनायक ५ १ ३। ५। | 




































सुभगा स्याच्च धनाढचा स्याहरिद्रिणौ ।। ६५ ।\ विधवापि न वैधव्यं पुनराप्नोति ५ 


चिन्तितं लभते शरो व्रतस्यास्य निषेवणात्‌ ॥ धर्माथौ धर्ममाप्नोति धनार्थी धन- | 























व्रतानि | हिन्दीटीकासहित ` ् (१९) 1 





 अभ्यच्यं गन्धमाल्याचैर्ादशापि कुमारिकाः ।\ ६१ ।1 एदं संपूर्णतां याति ब्रतमेत- 
` त्सुनिमलम्‌ ।! काय मनोरथावप्त्ये सर्वेरेतद्व्रतं शुभम्‌ \\ ६२ । पत्नीं मनोरमां | 
कुल्यां मनोवृत्त्यनुसारिणीम्‌ ।\ तारिणीं दुःखसंसारसागरस्य पतिव्रताम्‌ ।\ ६३। | 
 कृर्वच्ेतद्ब्रतं वर्षं कुमारः प्राप्तुयास्स्फुटम्‌ ।\ कुनारी पतिमाप्नोति स्वाठचं स्वं- | 
गुणाधिकम्‌ ।। ६४ ।। सुवासिनी लभेत्पुत्रान्‌ पत्युः सौख्यमखण्डितम्‌ ॥। दुर्भगा | 


कुत्रचित्‌ \! गुविणो च शुभं पुत्रं लभते सुचिरायुषम्‌ ।\ ६६ \।्राह्मणो लभते विद्यां | ८; 
 स्वसोभाग्यदायिनी ।\ राज्य्मष्टो लभेद्राज्यं वश्यो लाभं च विस्दति | ६७ । । 





माप्नुयात्‌ । ६८ ।\ कामी कामानवप्नोति मोक्षार्थी मोक्षमाप्नुयात्‌ । योयो ` 
मनोरथो यस्य स तं तं विन्दते ध्रुवम्‌ ।। ६९ ।। मनोरथतृतीयाया व्रतस्य चरणा- | 
` इत्रती ।\७०।। इति श्रीस्कन्दपुराणे काशीखण्ड उत्तराधं अज्ञीतितमेऽध्याये चत्र- | 
` श्ुक्लतीयायां मनोरथतृतीयाव्रतास्यानं सपुणम्‌ ।। 0 
निणेयामृतमे भी लिखा हमा है कि, चैत्र शुक्ला तृतीयाके विन, कुंकुम, अगर, कर्पर, 


| ् मणि, वस्त्र, माला, सुगन्धित पुष्प, धूप ओर कस्तुरीसे गौरीसहित शिवका पूजन करना चाहिये, पीछे शिवके 
सहित पा्वंतीजीका डोला निकालना चाहिये, इनकी भ्रसन्नताके लिये रातको जागरण करके भक्तिपूणं द 





भाने चाहिये, प्रातःकाल दक्षिणा देनौ चाहिये, जो पूत्रसुखकी इच्छा करती हों अथवा जो सोभाग्य चाहं | 
उन्हें अवश्य ही इस व्रतको करना चाहिये । यहां उदयव्यापिनी तूतीयाका ग्रहण है क्योकि, माघवाचा्यका | 
एला मत है किं चौथमे; उदयकालमें यदि एक मुहूतं भी तृतीया हो तो, उसीमें ये सब कायं करने चाहिये 








मन्वादि तिथि हे, इसके ल््यि लिखा हृञा है किं, मन्वादि जौर युगादि तिथिमे विधानके साथ किया हभ ध 
( ` श्राद्ध दोहुजार वषंतक पिन्नीहवरोकी तप्ति करताहै अधिमासमें भौ इते करे, पर अधिमासः ` मासमे पिण्डदानका 








भात्रा आदिसे परिपुणं था \। १० ॥। सें प्रसन्न होकर बोला कि, क्या मांगतौ है, मांग । मं तेरी ल्गयपुजा जौर | 
इस गानेसे परम प्रसन्न हभ हं \\ १९१ \! पुलोमाकौ पुत्री बोली कि, ह पावतीके प्यारे महादेव { यदिञआप 
मुञ्च पर प्रसन्न है तो मेरे मनोरथोको पुराकरो \\ १२ ।। सब देवोमें जो मान्य हो तथा सब देवों जो सुन्दर॒  । 
दह्ये तथा यज्ञ करनेवालोमें जो सर्वश्ेष्ठ हो, बो ही मेरा पति हो ।। १३ ॥ हे भव ! आप प्रसन्न होकरमृन्ने  , 
जैसा मे चाहं वैसा रूप सुल ओर आयु प्रदान करं \। १४ । हदयके सुख पहुंचानेकौ इच्छासे, जब जबमेरा ` 
` पतिक साथ संम हो, तब तब मे, उस देहको छोडकर दुसरे देहको पाजाऊ ।। १५ ।। है भव हर ! ! जराञओर | 
`  भरणको नाञ्च करनेवाली मेरौ तो अलौकिक भक्ति, आपकी किगपुजामे हो ।। १६ ॥। हे महादेव ! पिके ` 
व्यय होजानेषर भी मे एकक्षण भरभौ विधवा न होऊं तथा भविष्यका मेरा पतिव्रतं भी अक्षुण्ण बनारहे  , 
। ॥ १७ ॥। इतनी कथा सुना कर स्कन्द कहने लगे कि, पुरसरुदन शिबयुलोमजाके इन मनोरथोको सुनकर | 
विस्मयके मारे एक क्षण तो रुकेरहे ।\ १८ ॥ फिर बोले-हे पुलोमजे ! जो तूने मनोरथ कियाहै वहु अवदय । 
हौ तुके प्राप्त होगा पर प्राप्त होगा ब्रतकरनेसे \! १९ ।! इस कारण तू जितेन्द्रिय होकर त्रत कर, मनोरथ 





` तृतीयके ब्रत करनेसे वो होगा में उस त्रतकी विधि बतलाता हं, जैसी बताऊ वैसीही करना ।1 २० १ है | 
` बा ! उस सौभाग्यके देनेवाले ब्रतके करनेषर तेरे मनोरथ अवश्य ही पुरे होजायंगे ।। २१ ।। यहं सुनकर 
पुलोमाकी कन्या कहनेलगी कि, हे करुणाके खजने ! हे शरणोके रक्षक ! सवेस्वके दाता किव देव ! उस 
ब्रतका क्या नाम है, उसमें व्या शवित है, उसमें किस देवताका पुजन होता है ।। २२ ।! कब उस ब्रतको एवम्‌ 
से करना चाहिये ? पुलोमजाके एसे वचन सुनकर शिव कहने खगे कि \! २३ ।। हे पुलोमजे ! मनोरथ 
तीयाका व्रत बडा अच्छा है इसमे चारो ओर वीस भुजावाली गौरीका पुजन करना चाहिये ।। २४ ॥। ठीक ` 
देवीके सामने ही आशया विनायक गणेशका पूजन करना चाहिये, ये गणेश वरके देनेवाले, हाथमे अभय लिये 
अक्षसूत्र पहने हए लड़. हाथमे लिये हृए आया विनायक ह इनका देवीसे पहिले पूजन करना चाहिये 
२५ ।\ ये चार भुजावारे ओर सुन्दर नेत्रवाले हं एवम्‌ सब सिद्धिके करनेवाले हू । चेत्र शुक्ला दितीयाको 
वार दातुन करे \। २६।! तथा सायंकालको हल्का भोजन करके क्रोध रहित जितेन्द्रिय होकर, नियमको 
ग्रहण करे ।। २७ ॥। द्वितीयाकी रातको ही अस्पृश्योके स्पर्शंको छोड़ पवित्रताके साथ भगवतीम मनको 
लगाकर वः करे कि, हे अनघे ! विरवभुजे माता मे प्रातःकाल तेरा व्रत करगा 11 २८ ।\ आव मेरे मनोरथ सिदध ` 


























भी सुगंधित फूल हौ उसीसे पुजन कर देना चाहिये ।। करंभ, दही, भात, मका रस, माड, 1} ४५ ।।फेमीका = । 


॥ सामनं निवेदन करना चाहिये, यही एकं मक्त्वा कभी ल्यं है ।} ४८}! जो व्रती अपने नवेयपे इतरका ८. 
भोजन करता है तो उसका अषःपतन होता है. कही हई विधिसे प्रत्येक मासक तृतीयाका ब्रते करना चहिये ` 


ध सदा रातको पूजा ओर रातको ही भोजन करना चाहिये ।\ ५१ ।। रातको ही हुवन करना चाहिये 


। काय प्रहुण कर ५२ ॥। हे विदवभूजे ! तेरे लिये नमस्कार है, मेरे मनोरथोको शी हौ पूरा कर, हे-विष्नेश 


व्रतानि) 1 हिन्दीटीकासदहित र (११५) 




















 बनजाता है, जिसे सब देवता प्यारा समन्ते हें \\ ४२ ।। इन वस्तुओंका लपन करके पुष्पको चवि उन 

 फूलोको भौ बताये देते ह-पाटल, चमेली, कमल, केतकी, करवीर \} ४२ ।; उत्यलराज, चम्पा, जुही, जातौ, 

कुमारी ओर क्णिकारके कूलोसे चैत्रादि मासमे रमसे पुजन करे } यदि फूल न मिले तो उनके पत्रोसेहौ ` 
पूजन कर लेना चाहिए । \\ ४४ ।\ यदि बताये हये वृक्षोके न तो फूल ही मिलं ओर न पतते ही मिङं तो कोई 





बडा, शक्कर पडी हुई खीर, मृग ओर घीसहित भात, ये सब कात्तिक मासके नैवेयं 11४६1) जलेबी, लडड्‌ ` 
 हृख्वा, तथा घीके मौमन दी हुई पेमा पडी ।\ ४७ ॥ यह्‌ नेक्दयं फागुनके महीनेमं विनायक मौर मतके ` 


` इस प्रकार एक सालतक करना चाहिए ।। ४९ ।! व्रतकी पूतिके लिये तिल, आज्य आदिसे “ओम्‌ जातवेक्से" | 
इस मन्त्रसे स्थण्डिल पर अग्निहोत्र करना चाहिये \\ ५० ।\ “ओम्‌ जातवेदसे सुनवाम सोमम्‌, अरातीयतो ` 
निदहाति बेदः \\ स नः पषदति दुर्गाणि विद्वा नावेव सिन्धु दुरितात्यग्निः ।\ मे जातवेदा अग्निक ल्यं | 
सोमका सेवन करता हूं, वो मेरे वैरियोके धनको जला रहा हैःएवम्‌ सृके मेरी आपत्तियोसे इसप्रकारपारलगा | 
रहा है, जैसे चतुर मल्लाह समुदरमेसे नावको पार लेजाता है \। विधिक्े साय १०८ वार हवन करना चाहिये | 
पे \ एवम्‌ | 
रातकोही क्षमापन करना चाहिये \। हे~मातः ! भक्तिके साथ जो मे तेरी पूजा कर रहा हु, उ [ताग ५ 













` है आदशाविनायक ! तेरे लिये बारम्बार नमस्कार है ।। ५३ ।। हे विनायक ! आप विद्वभुजके साथमेरे | 


भनोरथोको पूरा करो । इन मन्त्रोको कहकर गौरी ओर विनायककी पूजा कर देनी चाहिये \! ५४ ।। ब्रतके 
 अपराधोको क्षमा करानेके लिये ब्रतीको चाहिये कि, सर्वोपरकरणसहित श्ग्यादान करे, जिसपर तकिया 
दर्पण आदि सबकुछ हूं )। ५५ ।! यहभी ब्रतीका कतेव्य है किं, आचाय्ये ओर उनकी पत्नी दोनोको पलङ्कपर 





| इष देनेवाली गौ ओर दक्षिणा ये सब चीजें आनन्दके साय व्रतकौ पूतिक लिए दे \। ५७ ॥। तैसे ही उपभोगकी ` ८ 
 . अन्य वस्तुं छत्र, जूते, कमण्डल्‌ इनको भौ जाचा्यको देना चाहिये, इसके पीछे आचाय्यपे पुना चहियेकि, ` 
मनोरथ तुतीयाका जो मेने व्रत किया है ।\ ५८ ।। इसमे जो कमी वेशी हुई हो वो जापके वचनो से पूरी होजाय । ` 















` बिठाकर, वस्त्र तया हाथ ओर कानोके आभूषणोसे उनका पुजन करे ।! ५६ । सुगन्ध चन्दन मारणं एवम ` 





| आचाय्यंको भी चाहिये कि, कह दे कि, आपका ब्रत सबतरहते पुरा होगया \\ ५९ \। अयनीसीमा तक आचा 
कोविदा करने जाय, दूसरे जो याचक आदि बैठे हों उन्हं भी यथाशक्ति दान दे, पौरे अपने अनुजौवियोको 


सुनिल ब्रत पुरा म 1 जिन्हुं मनोरथ पुरा करनेकी 
 ॥ ६२ ॥ मनको ४ 7 अनन्द देनेवालो तथा मनके अनसार 

















ढक्र गन, माल्यस नन करके यन मोजन कराना चाहिये ॥ ९१ । इस भकार यह्‌ 
करनेकी इच्छा हो उन्हं चाहिये कि, वो इस शुभेव्रतको करे ` 
छी चल्नेवाल दुःलसंसारके समुद्रसे पार लमानेवालै = ` 
ता पतिद्रेताको वं ग.) ६३ \ (3) करभार प्राप्त करता है, जी एक साख तक इस व्रतको करता हैः तथा | ४ 





















.. .  - अथ अरन्धतीव्रतम्‌ | 
अथ चेत्रशुक्लतृतीयायां मध्याह्वव्यापिन्यामरन्धतीनत्रतम्‌ । तच्र स्त्रीणामेवा- ` 
धिकारः-अवेधन्यादिफलश्रवणात्‌ ।। तत्रादौ संकल्पः मम इह जन्मनि जन्मान्तरे 
च बालदेधव्यनाक्ाथेमनेकसौ भाग्यपुत्ररूपसंपत्तिसमृदढचथेमरन्धतीव्रतमहं करिष्ये । ` 














देवेशि अरुन्धति नमोस्तु तें ।। वस्त्रम्‌ ।। कञ्चुकौमुपवस्त्रं च नानारत्तेः सम- 
न्वितम्‌ ।\ गृहाण त्वं मया दत्तमरुन्धति नमोस्तु ते ।\ उपवस्त्रम्‌ । कपूरकुडकुम- . 


नम्‌ ५ । हस्रा कुर्कुस्‌ तव सिन्दूरं कजञ्जलान्वितम !\! मया निदेदितं भक्त्या गहाण 
रमेक्वरि ।। सौभाग्यद्रव्यम्‌ ।। माल्यादीनि सुगं ° पुष्पम्‌ ।। वनस्पतिरसोद्भूतो ‹ १. 





ध 1 निविध्नतासिद्धयथं गणपतिपूजनं करिष्ये इति संकल्प्य धान्योपरि कललस्थ-  , ५ 
 पुणपात्रे हैमीं वसिष्ठं ध्‌.वं च संस्थाप्य पुजयेत्‌ ।! तद्यथा-अष्टकणिकया मुक्ते 
मण्डले पजयेत्तु ताम्‌ ।\ अरुन्धतीं महादेवीं बसिष्ठसहितां सतीम्‌ ।। आवाहनम्‌ ।॥ ` 
अरुन्धति महादेवि स्वसौभाग्यदायिनि ।! दिव्यं सुचारवेषं च आसनं प्रतिगृह्य- ` 
ताम्‌ । आसनम्‌ ।। सुचारू ज्ञीतलं दिव्यं नानागन्धसुवासितम्‌ ।। पाद्यं गृहाण ` 
देवेशि अरुन्धति नमोस्तु ते ! पाद्यम्‌ ।\ अरुन्धति महाभागे वसिष्ठत्रियवादिनि !॥ 
अर्घ्यं गृहाण कल्याणि भर्त्र सह पतिव्रते ।\ अर्घ्यम्‌ \\ गङ्धातोयं समानीतं सुबणे- ` 
कलक स्थितम्‌ ।! आचम्यतां महाभागे वसिष्ठसहितेऽनघे ।। आचमनीयम्‌ । 1 
` ` शङ्ख र ्ासरस्वतीरेवापयोप्णीनमंदाजलेः ।। स्नापितासि मया देवि तथा शान्ति ` | 


== 1 ए 


व्रतानि ल" दादीकासाहतः ८. (१२७. -- 





; | र मुलस्‌ 9. . 1. सनवथ शिर षू 9 । सकटपियाय 9 लिखापु ० । वसिष्ठपरियाय © | । 0. | 
 वसिष्ठध्‌ वसहितं सर्वद्धिं प° । नमो देव्ये इति नीराजनम्‌ ।! पुष 


पाञ्जलिम्‌ 





वायनं दद्यात्‌-वंशपात्रे स्थितं पूर्णं॑वाणकं घृतसंयुतम्‌ ।। अरुन्धती प्रीयतां | 
च ब्राह्मणाय ददाम्यहम्‌ ।\ वायनम्‌ ।! सुवणेमूतिसंयुक्तां बसिष्ठध्‌ बसंयुताम्‌ । | 
अरुन्धतीं सोपचारां ब्राह्मणाय ददाम्यहम्‌ ।। मूतिदानमंत्रः ।। गच्छ देवि यथास्थानं | 
सर्वाठिंकारभूषिते ।। अरुन्धति नमस्तुभ्यं देहि सौभाग्यमुत्तमम्‌ \) इति विसजेनम्‌।। | 
अथकथा-स्कन्द उवाच ।। पुरावृत्तमिदं विप्राः श्युणुध्वं व्रतमुत्तमम्‌ 1! आसीत्क- | 
श्चत्पुरा विप्र सवेशास््रविशारदः ।\ १ \\ तस्यका कन्यका जाता रूपेणाप्रतिमा | 
भुवि ।} ततो विवाहं सम्यग्वे पिता तस्थाकरोदद्विजः ।! २।। कुलकश्षील्वते दत्ता 
साकन्या बरर्वाणिनौ ।! अचिरेणव कालेन भर्ता तस्या मृतो द्विजः | ३।। बाल 
 रण्डातु सा जाता निर्वेदादगमद्गृहात्‌ ।। यमुनातीरमासाद्य चकार विपुलंतपः | 
। ` ॥ ४ ।। एकभुक्त्यादिकंश्चेव कृच्छचान्द्रायणेस्तथा ।। मासोपवासनियमेरात्मानं ` 
|  पावयत्सतौ 11 ५ ।। कदाचिदागतस्तत्र भ्रमन्‌ गौर्या सदाशिवः ।। यमुनातीर- 
: मासाद्य वनितां तां ददक्ञं सा।। ६ ।। कृषया च शिवा गौरी महादेवमुवाचसा।॥ 
देव केनेदृशी प्राप्ता बाल्वैधव्यताद्श्ाम्‌ ।। ७ 1 वद मां कृषया देव कृपां कुर्‌ ` 
दयानिधे \। महादेव उवाच \! अयं विप्रः पुरा गौरि कुलक्ञीलयुतो भुवि ॥ ८ ॥ ` | 

` तेन कन्या परिणीता सुरूपा युवती सती \। स तां विवाह्य तरुणीं विदेशमगमदद्विजः 
। ॥\९।। ततो बहुतिथं कालं सापदयूतुरागमम्‌ ।। नागतस्तु तदा विप्रो यावज्जीवं  । 









ठ म तेन कमंविपाकेन सा नारी विधवा भवेत्‌ ।\ १५ ।। स्वपत्नीं कुल संभूत १ पति ५. ५ 


अनुकूलं परित्यज्य परां यो याति स्वेच्छया ॥। १६ \। स पापौ जाय 








२१६) + ्रतरार्ज, [ ततीया- 








0 निति 


भवत्‌ ।। पप्रच्छ तं महादेवं गौरी सा करुणान्विता । २० ॥। केनेदं महत्पापं 


 बालवेधव्यदायकम्‌ ।। न्यते कर्मणा देव तन्मां वद कृपां कुर । २१ ।। महादेव 





उवाच ।! श्युणु देवि प्रवक्ष्यामि बालवधव्यनारनम्‌ । अरुन्धतीव्रतं पुण्यं नारी- ` | 


 सौभाग्यवायकम्‌ ।\ २२ ।। यत्कृत्वा बाल्वेधव्यान्मच्यते ना संशयः ।! श्तमे- ` 


तत्तदा विप्रा गौर्या शंकरतो त्रतम्‌ ।\ २३ ।\ यमुनातीरमासाद्य उपविष्टं तदा ` 
द्विजाः ॥ तस्यै नार्ये महादेव्या कारितं व्रतमुत्तमम्‌ ।! २४ \ तेन पुण्येन महता 
 ब्रतजेन मुनीदवराः ।। सा नारौ चागमस्स्वगेमुक्ता वेधव्यतस्तदा । २५ ।। इत्थं ` 
तरतं शरुतं सम्यगुपदिष्टं मुनीहवराः । कृतमन्येर्च बहुभिस्तेऽपि मुक्ता म॒नी- 


 हवराः । २६ ।! अरुन्धतीव्रतमिदं सदा कायं मुनीडवराः ।। नारी वैधव्यतो ` 


 मुच्येत्सोभाग्यं प्राप्नुयात्परम्‌ ।। २७ ।\ इति श्रीस्कन्दपुराणे अरुन्धतोव्रतम्‌ ।॥ ` 
अथ उच्चापनम्‌ ।! युधिष्ठिर उवाच ।। उद्यापनवि्धि ब्रूहि अरुन्धत्याः सुरेश्वर ।॥ ` 








भक्तितः श्रोतुमिच्छामि व्रतसंु्तिहेतवे ।। कष्ण उवाच ।! अरुन्धतीव्रतं वक्ष्ये ` 











 नारीसौभाग्यदायकम्‌ ! येन चीर्णेन वे सम्यक्‌ नारी सौभाग्यमाप्नुयात्‌ ।\ जायते ` 
 रूपसंपच्ना पुत्रपौत्रसमन्विता ।। वसन्ततुं समासाद्य तृतीयायां युधिष्ठिर ॥ माघे 
7 माधवे चेव श्रावणे कातिकेऽथवा ।\ स्नानं कृत्वा तु वे सम्यक्‌ त्रिरात्रोपोषिता 





लवणानि लवणान्वितम्‌ ।\ लोष्टकन समायुक्तं वस्त्रयुग्मेन वेष्टितम्‌ ।। आावाहयेदरन्धतीं 
सिष्ठप्राणसंमिताम्‌ ।। पतिव्रतानां सर्वासां 
चारल्वाङं कमण्डलुम्‌ ।। प्रतिमां काञ्चनीं कृत्वा नामभिः परिपुन- 

वं चैव "प्रतिमां पुजयेदृव्रती ।। देववन्द्ये नमः पादौ जानुनी | 








देव्रभार्या यथा स्वगे ऋषिभार्या यथेव च ।। राजते च महाभागा सर्वकामसगृदधिभिः।। = | 


अधिकार स्ति 





 भूषणच्छादनादिभिः ।। नानाविधोपचारङ्च चरतुवरातिसंख्यया ।\ आचाय रा ॐ 
च गां दद्याटस्तण्याभरणानि च ।। शय्यां सोपस्करां दद्यात्कांस्यपात्रं सदीपकम्‌ ।॥ 
आदं चामरं चेव अदवं दद्यात्सुशोभनम्‌ ।\ यथाव दोजयित्वाथ स्त्रियः शूषात्स- | 
मोदकान्‌ ।। मोदकान्काञ्चनं चेव तथा वस्त्रं यथाविधि ।! पोलिका चतपुपांश्च ` 
 पुरिकाऽ्च विशेषतः ।\ सोहालिकाषच दातव्या एकंकं द्विगुणं तथा ।! भोजनद्रय- ` 
पर्याप्तं दीनानाथांरच पूजयेत्‌ ।\ अनेनैव विधानेन भामिनी कुरते व्रतम्‌ ।! अवेध- = 
 व्यमवाप्नोति तथा जन्मसहस्रकम्‌ ।! पुत्रपोत्रसमायुक्ता धनधान्यसमावृता ।॥ 
 जीवेषशतं साग्रं सहभर््रा महाव्रता ॥। एवमभ्यचेयित्वा तु पदं गच्छेदतामयम्‌ ।॥ = | 








१ इति श्रीस्कन्दपुराणे अररन्धतीत्रतोद्यापनम ।। 


अरंन्धतीका ब्रत-मध्याह्न व्यापिनी चेत्रशुक्ला तृतीयाको अरुन्धती व्रत होता है । इस ब्रतके करनेका ५ 
। स्त्रियोको ही है । क्योकि, इसके अवेधव्य आदिक फल सूने जाते है । व्रतक्रे आदिमे संकत्पहैकि, ` 
अपने इस जन्मके ओर जन्मान्तरोके वैधब्यको नाह करनेके लिये तथा अनेक सौभाग्य भौर पृर्रल्पसमृदधिके 
। चये अरन्धतीके ब्रतको में करती हुं ।। यहं वरत निषिघ्न समाप्त हो जाय इस कारण गणपतिजोका प्रजन भौ | 





करती हं ।। पीछे घान्योके ऊपर कला रखकर, उस कलक्ञपर पूरणमपात्रकौ स्थापना करके, उसपर सोके = । 


गौरी, वसिष्ठ ओर ध्रुवको स्थापित करके पुजन करना चाहिये । पुजनकी विधि यह्‌ है कि आढ कर्णिकके 
 भण्डलपर वसिष्ठजीसहित सती अरुन्धतौको विराजमान करे पूजना चाहिये । देवी, अरुन्धतीके लिपि 










५ नमस्कार है, मे अरुन्धतौका आवाहन करता हूं । इत्यादि आवाहनके मत्र है । हे महदेवी ! हि स सौभाप्योके ` 


। ` देनेहारी देवौ अरुन्धती ! आप इस मेरे सुन्दर सुहावने असनको ग्रहण करो । इसते आतस्तन देना चहिये ।1 (1 
| है ३वोकी मालिका अरन्धती ! इस सुन्दर शीतक ओर अनेक सुगन्धोसे सुगन्धित पाद्यको ब्रहण करो । आपके 
। | चये नमस्कार है। इससे पाद्य देना चाहिये । अधंका मंत्र है बसिष्ठको प्यारी बोलनेवाली महाभागकल्याणी ` 
` दैवि! अरुन्धति ! आप वसिष्ठजीके साथ आचमन करिये, मंगाया हुभा गंगाजल सोनेके 
दहै ॥\ स्नानका संत्र-है देवि ! आपको, गंगा, सरस्वती, रेवा, पयोष्णो ओर नमेदाके जलसे मेने जैसे स्नान 
| कराया है तेसेही आप भौ मुक्षे शान्ति दें । वस्त्रका मंत्र-है देवेशि ! अरुन्धति ! सुल्दर मनोहर दिव्य 


¦ ४ हय करिये इसमें कपुर, कुंकुम, हलदी ओर कस्तुरी पडी हई हे । सोभाग्य द्रव्यका मंत्र-हलदौ कुकुम जौर 
कज्जल समेत सिन्दूरको में भक्तिभावसे निवेदन करता हुं, है परमेवरि ! ग्रहणकरं । पुष्योका मंत्र- । माद्या 
0; नि ८ (1 सुगन्धोनि मालन्यादीनि वेप्रभो । मयाऽऽ्हतानि पजार्थं पुष्पाणि प्रा ह (> नि 















अपने पतिके साथ मेरे अधेको ग्रहण कर, तेरे लिये नमस्कार है ।\ आचमनका मंत्र-है निष्पाप 





के कलमे रला हुआ 





स अनेक ` गोका रंगा हा वस्त्र ग्रहण करिये, आपके लिये नमस्कार है \ उपचस्त्रका मंत्र-हे देवि ! अहन्धति ! ` 
` तेरे लिये नमस्कार है, अनेक रत्नोके साथ कंचुकी ओर उपवस्त्र देता हु ग्रहण करिये । चन्दनका मंत्र-चन्दन _ । 

















1 2 | 





इसमे कपुर इलायची सुपारी ओर नागवल्लीके पत्तं पडे हए हँ" इससे ताम्बलनिवेदन कर दे \ हे देवि ! यह 1 

` फल मेने आपके सामने रखा है, इससे मुञ्चे जन्म जन्मभे सफला अवाप्ति हो । इससे फला० । अन्निकाहिम ` 
बीज हिरण्य गभके गभस्थ है अनन्त फलका देनेवाला हैः उससे मूक्ने शान्ति दे । इससे दक्षिणा० हे सुव्रते! = ` 
` मूषे सौभाग्य दे, धन दे ओौर पुत्रादिक दे तथा ओर भौ सब कामको दे, तेरे लिये नमस्कार है । इसमे प्रा्थना ` 
करे । हे बसिष्ठकी प्रियवादिनी महाभागे अरुन्धत देवि ! सौभाग्य दे ! ओर सदा धन तथा पुत्रादिकदे, | 
इससे उत्तर अधं दे । सुन्दर शरीरवाली तथा अक्षसूत्र ओर कमण्डलृसे युक्त दो मूर्जोकी सोनेक प्रतिमा 
बनाकर नाम मन्त्ोसे पूजन करना चाहिये । देववन्दके लिये नमस्कार है, चरणोको पुजता हूं । लोकवन्के ` 
` लिये नसस्कार है, जानुओंका पूजन करता हं ! संपत्तिदायिनीके चयि नमस्कार है, कटीको परुजता हं । गंभीर- 
` नाभीबालीके लिय नमस्कार है, नाभिको पुजता हं । लोकधान्निके लिये नमस्कार है, स्तनोको पूजता हूं । 
` जगद्धात्रीके किये नमस्कार है । कंठको पुजता हूं \ शंतिके छे नमस्कार है, बाहुका पूजन करता हं । ` 
 वरग्रदाके व्यि नमस्कार है, हाथोको पुजता है । धृतिके लिये नमस्कार है मुलको पुजता हुं ! अरन्धतीके ` 
 ल्ि नमस्कार है शिरका पूजन करता हूं \ सकल प्रियाके लिये नमस्कार है, शिखाको पजता हूं ।। वसिष्ठ 
भ्रुवके सहित सर्वाङ्कको पुनता हं । देवीको पजता हुं इससे नीराजन करना चाहिये । ऊपर “ओम्‌ देव ` 
` बन्द्ाये नमः इत्यादि मन्त्रौसे छिखित अंगोका पूजन करे । सबके आदिमं ओंकार लगादे, अंग पुजनके पीछे ` 
पुष्पांजलि दे, पीछे वायन दे । “ वंश्षपात्रे स्थितम्‌ ” यह इसका मन्त्र है कि, वंशपात्रमे रखे हए धृत संयुक्त 
. वाणकको भें ब्राह्मणको देता हूं, इससे अरुन्धतौ श्रसन्न होजाय ? सुबणेकौ मूतिसे संयुक्त तथा वसिष्ठजी ओर ` 
धवके साथ अरुन्धतीकी सूतिका सोपचार दान करता हूं इससे मूतिदान करना चाहिये । हे सब अलंकारोसे ` 
विभूषित अरुन्धती ! तेरे ल्यि नमस्कार है, मुने उत्तम सौभाग्य दे ओर यथास्थान पधार, इस मंत्रसे विसजेन 

गता है । अथ अरन्धतीके ब्रतकी कथा-स्कन्द बोरे कि, हे बराह्मण ! पुराने जमानेकी एक अच्छी बात सुनो । 
एकं ब्राह्मण जो सब शस्त्रोमे निष्णात था ।। १ ।। उसके एक अद्वितीय सुन्दरी लडकी थी, उस ब्राह्मणने 
उसका बडी अच्छी तरह विवाह किया ।! २1! उस वरर्बाणनी कन्याको एक कुलीन पुरुषको दे दिया पर थोडेही 
दिनमे उसका पति स्वरगवास कर गया \\ ३ ।! वो बारविधवा हौ गयी, इसी दुःखसे पिताके घर चली आई ' 
ओर यमुनाजीके किनारे घोर तपस्या करने लगी 1\ ४ ।। वहां उसने अनेकों एकभुक्तं अनेकों कच्छ तथा- 

















































पावती सहित रसा हत महादेवजी घूमते हए प्च गये ओर ) र र यमुनाजोके किनारे तप करते हुए उस बाल्विधवाको 
गौरीजौको दया आई वह शिवजीसे पुने लगीं कि, हे देव ! किस कारणते इसे बाल वैधव्य 
कृपा करिये. मसे बताये । स बोले कि, हे गौरौ ! पहिले यह एक कुलीन ब्राह्मण 





व्रतानि । 





(१२१) ` 





। कौनसे कमेसे यह बालवेधेन्य देनेवाला महापाप नष्ट हौ, यह कृपा करके बतादीजिपे ।। २१ ।। यह सुन 
। महादेवजी बोरे कि, है देवि ! मे बालवेधन्यका नाक्ञ करनेवाला एक अरुन्धती त्रत कहता हुं । यह्‌ सौभ्यका 
देनेवाला भी है ।। २२।। इसको सुनकर बालवैधन्यके पापसे छट जाते ह, इसमे कोई सन्देह नहीं है \ हे ब्राह्यणो | 
उस समय गौरीजीने इस ब्रतको शिवजीसे सुना धा ।। २३ \) हे ब्राह्मणो ! इस ब्रतको गौरीजीने क्िवजीसे ` 
सुनकर उस स्त्रीसे इस त्रतको कराया ।\ २४ ।। हे मुनौश्वरो ! इस व्रतकं पुण्ये वो स्त्री स्वगं चचली गई 
ओर वैषव्यसे छटगरई ।\ २५।। हे मुनीहवरो ! मेने जेसे सुनाया वैसाही कर दिथा, इते दूसरे भी बहुतोन ` 
किया, वे भी सब आत्माएं मुक्त होगडं ।! २६ ॥। हे मुनीहवरो ! इस अरन्धतीके ब्रतको संका करना चाहिये, 
इसके करनेसे स्त्री वेधव्य योगसे छूटकर परम सौभाग्यको प्रप्त होती है \। २७ \\ यह स्कन्द पुराणकीञअर- | 
६ 1 ` न्धती व्रतकी कथा हुई \। भथ उद्यापनम्‌-युधिष्ठिरजी भगवान्‌ कृष्णजीपे बोले कि, हे सुरे्र ! अरुन्धती | 
ब्रतकी उद्यापन विधि किये, भें व्रतकी संयुते लि भक्तिसे युनना चाहता हूं ।। भगवान्‌ इष्ण बोले कि, ` 
~ ५ |  नारियोको सौभाग्य देनेवाठे अरुन्धतीके व्रतके उदयापनको कहूगाः जिसके मलोभाति करनेपे नारौ सौभाग्यको प ४ | ध 
 पाजाती है । रूपसे संपन्न भौर पुत्र पौत्रोपे समन्वित होतो है । हे पुधिष्ठिर ! वसन्त ऋतुरी तृतीयकोचाहु | 
माघ हो, चाहें वैशाख हो, अथवा श्रावण ओर कतिक हो, स्नानादि कर तीन रात उपवास करके, ब्रत करने- 
, बारी, चार दम्पतियोको बुलाकर पुष्प, तांबूल, चन्दन ओर अक्षतोंसे उनका पुजन करे तथाद्ुकम अगर, 
कस्तूरी, कपुर आदिसे पुजे, शिलापटूपर लवण सहित जीरको लोके साय रलकर दो वस्त्रो वेष्ठितिकरदे। 
 वुसिष्ठजोके प्राणोकी प्यारी अरन्धतीक! आवाहन करे, जो संब पतिव्रताभोे मुस्य, देव भामिनी है । सर्वाद्ध- ` । 
।  ुन्दरी दो मृजाकी, अक्ष सूत्र, कमंडल युक्त सोनेकी मति बनाके नामंतरसे पुने 1) व्रती, वसिष्ठजी ध्रुवजी ओर = | 
प्रतिमा तौनोंको ही पूजे । “ओम्‌ देववन््े नमः" इस मंत्रे चरण “ओम्‌ लोकवन्दिते नमः” इससे जानु \ | 
ओम्‌ स्वेसंपत्तिदायिनी नमः" इससे कटि “ओम्‌ गंभोरनाभ्यै नमः" इसमे नाभि “जोन्‌ लोकधकत्चै नमः; 
इससे स्तन “ओम्‌ जगद्धाश्ये नमः" इससे स्कंद “ओम्‌ शान्त्ये नमः” इससे बाहु “ओम्‌ वरदाय नमः" इससे 
हस्त “ओम्‌ धृत्य नमः" इससे मुख “ओम्‌ अरन्धत्ये नमः” इवसे शिर तथा “ओम्‌ सकलप्रिये नमः इससे 
सेर्वाङ्धका पुजन करना चाहिये । देववन्द्ा, लोकवन्दिता" सवं संपत्तिके देनेहारी, मोढीनाभिवाली.लोकधान्रौ- = । 
जगद्धात्री, शान्ती, वरदा, धृति, अरुन्धती भौर सेकल प्रिया जो तु है तेरे लिये नमस्कार है । इसप्रकार गन्धो, = 
| पच्ारसे सती देवौ अरन्त का.पुजन करके अधं देना चाहिये । है महाभगे ! अद्न्धती]) है वपिष्ठकीप्यारी 
। 4 बोलने वालो { है देवी ! हे सृत्रते मुके सदा सौभाग्य ओर घन पुत्र दे) पुत्रोको दे, घन ३ ओर सौभाग्य प ह ५ 























होम चस्त्राच्छादनोसे तथा अनेक तरहके उयचारोसे, चौवौस दम्पतियोका पुजन करके, आचय्यंको गः 
ओर वस्त्राभरण दे! उपस्कर सहित शय्या दे तथा दीपक सहित कप्रेसका पात्र दे, वेण मौर 





रचभरदेतथा | 
सुशोभन अदव दे । स्त्रियोको यथावत्‌ भोजन कराकर, लु. भरे हुए सुप एवं विधिकर साथ मोदक, काचन, 1 1 
1 कसय, पोलिका घृत, पुष, पूरौ ओर सुहालिका देन चाहिये ये चोज एकः एकको दो दो दे दीन ओर अना्थोकोः 
 इतनादेदेजो दो दो भोजन करसके, जो भामिनी इस प्रकार व्रत करती है उसे हजार जन्मतक वैषनव्यनहीं | 
प्राप्त होता । उसने यथेष्ठबेटा, नाती ओर धन, धान्य मिलता है वो महब्रता पतिके साय सौवर्षतक जिन्दी । 
रहती है, इस प्रकार पूजन करनेसे मोक्षपदकी प्राप्ति हो जाती है स्वमे देवभाय्या ओर ऋषि भारव्याएं 




















(१. ध व्रतराज ` + | [ त॒तीया- 





त र > ५ 0 णा 
(2 4 ६ ध 443 4144... प 


मासि कुर्वति मधुसूदनतुष्टिदम्‌ ॥ तुलामकरमेषेषु प्रातः स्नानं विधीयते !॥ ` 


हविष्यं ब्रह्मचर्य च महापातकनाशनम्‌ । वलाखस्ताननियम ब्राह्यणानासनुज्ञया ।\ 


 मधसूदनमभ्यच्यं कुर्यात्संकल्पपू्वकम्‌ \! वेशाखं सकलं मासं मेषसंक्रमणं रेः! ` 
प्रातः सनियमः स्नास्ये प्रीयतां मधुसूदनः ।\ मधुसूदनसन्तोषाद्ब्राह्यणानामन्‌- ` 


५ € 


ग्रहात्‌ ।\ निविघ्नमस्तु मे पुण्यं वशाखस्नानमन्वहुम्‌ ।! माधवे मेषगे भानौ मुरारे ८ 


मधुसूदन ।। प्रातः स्नानेन मे नाथ फलदः पषपहा भव ।। यदा न ज्ञायते नामतस्य 
तीर्थस्य भो द्विजाः ।। तत्र चोच्चारणं कार्थं विष्णृती्थमिदं त्विति ।\ अपि सम्यग्वि- 
धानेन नारी वा पुरुषोऽपि वा \ प्रातः स्नातः सनियनः सद॑पापेः प्रमुच्यते ।! `: 
ष  वेश्ाखे विधिवत्स्नात्वा भोजयेदूब्राह्यणान्दश् \। कृत्स्नशः सवेपपेभ्यो मुच्यते नत्र 


संशयः ।) इति वेन्ञाखस्नानविधिभविष्येयं \। इयमेव तृतीया परशुरामजयन्ती ।\ ` 
साच प्रदोषव्यापिनी ग्राह्या ।। तदुक्तं भागंवाचनदीपिकायां स्कन्दभविष्य- 


 योः-वेशाखस्य सिते पक्षे तृतीयायां पुनवेसो ।।! निशायाः प्रथमे यामे रामाख्यः ` 
समये हरिः ।! स्वोच्चगे: षडग्रहूर्युक्ते मिथुने राहुसंस्थिते ।। रेणुकायस्तु यो 
` गर्भाववतीर्णो विभुः स्वयम्‌ ।! दिनद्रये तद्व्याप्तावंशतः समव्याप्तो च परा ॥। 


रया ।) सा च पूर्वाह्वन्यापिनो ग्राह्या 1 दिने तदुव्याप्तौ तु परेवेति \\ इयं 
दरपि । या मन्वाद्या युग(द्याश्च तिथयस्तासु मानवः ।। स्नात्वा हृत्वा च 






| देवताः \।एकभुक्तं तदा कुर्यद्ासुदेवं प्रपुजयेत्‌।।तस्यां कार्यो यव्होमो यवरविष्णुं | 
1 ४ समचयेत्‌ ।\ यवान्दद्याद्हिजातिम्यः प्रयतः प्राक्षयेद्यवान्‌।। उदकुम्भान्सकनकान्‌ । ५ | 
सान्नान्सवेरसेः सह ।\ यवगोधूमचकान्सक्तु दध्योदनं तथा।। ग्रेष्मकं सर्वमेवात्र 1 
सस्यं दाने प्रज्ञस्यते ।! तृतीयायां तु वेशाखे रोहिण्य॒क्षे प्रपूज्य च।। उदकुम्भप्रदानेन 
श्जिबलोके महीयते ।। तत्र मन्त्ः-एष धर्मघटो दत्तो ब्रह्मविष्णु 
८ अस्थ 


व्रतानि] , :.: िन्वीटीकासहित (१२३) 





तत्सर्वं स्यादिहाक्षयम्‌ ।\ आदिः कृतयुगस्येयं य॒गादिस्तेन कथ्यते ।) सवेषापप्रशमनी 


सवं सौख्यप्रदाथिनी ।\ पुरा महोदयः पाथं वणिगासीत्पुनिमेलः ।। प्रियंवदः सत्य- ` 


 वृत्तिदेवन्राह्मणपुजकः ।। पुण्याख्यानेकचित्तोऽभृत्‌ कुटुम्बव्याकुलोपि सन्‌. ॥ तेन 


श्रुता वाच्यमाना तृतीया रोहिणीयुता ।। यदा स्याद बुधसंयुक्ता तदासातुमहा ` 
` फला ।। तस्यां यदीयते किचिदक्षयं स्यात्तदेव हि ।। इति श्रुत्वा च गङ्धायां सन्तप्यं | 
पितुदेवताः ।! गृहसागत्य कारकान्‌ साल्नानुदकसयुतान्‌ ।\ अ्नपुणान्बहत्कुम्भा- = 


 ञ्जलेन विमलेन च \। यवगोधूमलवणान्‌ सक्तु दध्योदनं तथा ।। इकूक्षीरविका- | 


 रांहच सहिरण्यांश्च शक्तितः।। शुचिः शुद्धेन मनसा बाह्यणेभ्यो ददौ वणिक्‌ ॥ | 
 भायेया वाय्यमाणोऽपि कुटुम्बासक्तचित्तया ।। तावत्तस्थौ स्थिरे सत्त्वे मत्वा 





स्वं विनहवरम्‌ ।! धर्मासक्तमतिः पाथं कालेन बहुना ततः ।। जगाम पञ्चत्वमसौ ध | 


वासुदेवमनुस्मरन्‌ ।! ततः स क्षत्रियो जतः कुशावत्यां युधिष्ठिर।। बभूव चाक्षया- 0 
तस्य समुद्धिधमसंयुता 1! ईजे स च महायज्ञः समाप्तवरदक्षिणेः ।।स ददौ गोहिर 





 ण्यानि दानान्यन्यान्यहनिशषम्‌ ।। बुभुजे कामतो भोगान्दीनान्धांस्तंयज्छनैः ।॥ ` 


इत्येतत्ते समाख्यातं श्रूयतामत्र यो विधिः।। तृतीयां तु समासाद्य स्नात्वा संतप्य ` 








 प्रदानात्तप्यन्तु 








गोभूकाञ्चनवाससाम्‌ ।। यद्यदिष्टं केशवस्य तदेयमविदंकया ।! एतत्ते सवं- ` 





माख्यातं किमन्यच्छोतुमिच्छसि । अनाख्येय न मे किञ्चिदस्ति स्वस्त्यस्तु 
तेऽनघ ।। नास्थां तिथौ क्षयमुपैति हृतं च दत्तं तेनाक्षयेति कथिता मुनिभिस्तृतीया तीय या।॥ 
उद्य दैवतपिप्न्‌ क्रियते मनुष्यस्तच्चाक्षयं भवति भारत सर्वमेव 1 इति भ- 








तथाप्यक्षयमेवास्य क्षयं याति न तद्धनम्‌ ॥\शनद्धापूर्वं तृतीयायां दृततं विभवं विना! | 







वष्णुशिवात्मकः ॥ ` 
पितरोऽपि पितामहाः ।। गन्धोदकतिलमिधं सान्नं कुम्भं 


सदक्षिणम्‌ ।। पितृभ्यः संप्रदास्यामि अक्षय्यमुपतिष्ठतु ।\! छत्रोपानत््रदानं च॒ ` 











` संस्छृतां्चेव हत्वा चैव तथाक्षतान्‌ । विप्रेषु दत्वा तानेव तथासक्तृन्सुसंस्कृ- ` 

तान्‌ ।\ पक्वान्न॑तु महाभाग फलमन्नय्यमहनुते ।। एकामप्युक्तां यः कृर्यात्तितीयां 
भृगुनन्दन ।। एतावत्तु तृतीयानां सर्वासां तु फलं लभेत्‌ ।! इति अक्षय्यततीयातव्रतं ` 
संपूर्णम्‌ ॥ | | 








अथ अक्षय तुतीया बरतम्‌-वेसाख शुक्ला तृतीयाके दिन भविष्यपुराणमं अक्षय तृतीयाका ब्रत कहा है | 


कि, इस दिन तीथं स्नान जौर तिलोसे पितरोका तपण करे, धमं घटादिकोका दान ओर मधुसुदनका पुजन ` 
करे, क्यो कि, वैसाखमें भगवान्‌क! तुष्टिदेनेवाला पूजन अवदय कर्तव्य है । तुत, मकर ओर मेषराहिमे ` 
_ प्रातः स्नानका विधान है, इसमें हविष्यान्न भोजन ओर ब्रह्मचय्यै, महापापोका नाकच करनेवाला है । भगवानूका ` 

` प्रजन करके संकल्पपुवैक ब्राह्मणोकी आन्न प्राप्त करके वेसाखके स्नानका नियम लेना चाहिये । हे मुरारे! 
हे मधुसुदन ! वैसाखके मासमे मेषके सूर्यम हे नाथ ! इस प्राप्तः स्नानसे मुञ्चे फल देनेवारे हो जाओ ओर 
 पापोका नाह करो ! हे ब्राह्मणो ! जो तौथका नाम पता न हो तो उसको विष्णुतीर्थं कहना चाहिये । चाहे 
स्त्री हो चाहे पुरुष हो जो नियमपू्वक प्रातः स्नान करता है । वो सब पापोसे छटा जाता है । वेसालमं विध्कि ` 
सच स्नान करके दह ब्राह्यणोको भोजने कराना चाहिये,वह्‌ सब पापोसे छट जाता है ईसमं कोई सन्देह नहीं ॥ 
है, यह्‌ भविष्यकी वैशाखस्नानकी विधि होगरई । परश्ुरामजयन्ती-इसीतृतीयाको कहते हं ! परशुरामजयंती ` 
व्यापिनी लेनी चाहिये । यही भागेवार्चनदीपिकामें स्कन्दं ओर भविष्यपुराणका प्रमाण दिया है क्रि, 


४ दोनों दिन हो ते, परा ग्रहण करनी चाहिये, नहीं तो पूर्वाही चनी यही बात वहां ही भविष्यपुराणसे 
हैकि, वेसाख शुक्ला त॒तीया शुद्धाको ब्रत करे, यदि दोनों दिन हौ तो, रातके पिरे पहरमं रहे तो इसरी 


जो कुछ उसमें दान दिया जाता है उसका अक्षय फल होता है ! एेसा सुन वो वै्यगंगा किनारे पहुंचा. वहां 


परानोके भरे हुए बडे २ घडे, यव गोधूम, लवण, सक्तु, दध्योदन, ईख ओर दुधके बने पदाथ, शुद्ध मनसे शक्तिके . 


फल था । यह मे तेरे लिये कंहदिया यहां जो विधि है उसे सुन । तृतीयाके दिन स्नान तथा देवत्प॑ण 


रतानि 1 ८ हिन्दीटीकासहित ` ५ | १ (१२५) 


















0 व (1 ध 1 ४. 
रि 


| ओर ब्राह्मणोका पूजक, सुनिल महोदय नामका बनिया था । उसकी पुण्याख्यान सुननेमं रचि रहती थी, यवि । ॥ ध 
सबके कामम भौ वो व्याकुल होता था, तब भी उसका मन शस्त्रम ही रहता था । एक दिन उसने रोहिणी 
नक्षत्र ज्ञालिनी अक्षय तृतीयाका माहात्म्य सुना कियदि बो बुध सयुक्त हौ तो महा फलवाली होती है । _ 


उस्ने पित देवताओंका तपण किया, पीर घर आकर, अन्न ओर पानीके साथ ओले,तथा अच्च ओर स्वच्छ 


अनुसार सोनेके साथ ब्राह्मणोको दान दिये ¦ स्त्रीका चित्त कुटुम्बमं आसक्त था इस कारण उसे बहुत रोका | 
पर जबतक वो वासुदेवका स्मरण करके मत्युको प्राप्त नहीं हुमा हे पाथं ! तब तक बो धमेमे आसक्त मतिवाला = ` 
क वैश्य बहुत कालतक सबको विनहवर मानकर स्थिर सत्वमं रहा \ है युधिष्ठिर । इसके पीछे वो कुशावतीपुरीमे ॥ : । 
क्षत्रिय हुमा, उसकी घर्मसंयुक्त अक्षय संपत्ति हुई, उसने बडी लंबी चौडी दक्षिणाके साथ बडे बडे यज्ञ पुरे | 
` किये, तथा रात दिन गौओके सोनेके तथा अन्यभी अनेकों वस्तुओके बहुतसे दान दिये 1 उसने इच्छानुसार ` 





भोगोको भोगा तथा धीरे २ अनेकों दीन ओर अन्धोको तृप्त किया, इतना करने परभ इसका धन अक्षयं | 
था, नष्ट नहीं होता था, क्योकि इसने अक्षय तृतीयाके दिन विभवको छोड कर श्रद्धापूवक जो दियाथाउसकाही ` 
` वार भोजन करता हुमा वासुदेवका पुजन करना चाहिये । इसमें यवोकरा होम ओर वासुदेवका पुनन होताहै। ` 
 आह्यणोकि ख्ये जौओंको दे भौर पवित्र होकर जोओका ही भराह्यन करे । कनकसहित पानीके भरे हुए घडे, 








, ` सब रस अन्न, यव, गोधूम, चणक, सतु ओर दध्योदनका दान [करना चाहिये । इसमे ग्रीष्म ऋतुके स्य॒ | 






इसकोदानसे पितर ओर पितामहं तृप्त हो जायें । गन्धोदक मौर तिलके साथ तथा अन्न ओर दक्षिणासहित, 
॥ ५ घट देता हु, यह दान पितरोके लिये अक्षय होय जाय । छत्र, जते, गो, जमीन, सोना ओर वस्त्र जो भी कोई ८ 
ध (1 | । भगवानकौ प्यार वस्तु श्रीकृष्णापंण की जायगी महू सब अक्षय होगी यहु सब मने करू दिया ओर क्या ५: 1 


दान किया जाता है बो कभी नादाको प्राप्त नहीं होता । इस कारण इसे अक्षयतृतीया कहत है 










दान कियेहुए्‌ अच्छे होते है । वैसाख तृतीयके रोहिणी नक्षत्रम शिवपुजन करनेके बाद उदकरुभदान करके ` 
 क्ििवलोकमे चखा जाता है । यह घट दानका मंत्र है कि, ब्रह्मा विष्णु ओर रिवरूप यह धर्मघट मेने देदिया हेः 











घुनना चाहते हो ।.हे निष्याय ! तेरेसे मसे कुछ भी गोनीय नही है । हे भारत ! इस तियित्रको जो ५ भीहवन 1 


अक्षय तृतीयाका ब्रत पुरा हुमा तथा- 










दै कि वैशाल शुक्ला तृं १ यवास करके सब 1 सुङतका ता है 
नकषत्रसे युक्त हो तो जधिकभेष्ठ है, इसमे जप, हवन किया सब अक्षय हो जाता है, इसीसे अक्षया तिथि कहते ` 
इसमे सुकृत इत जय होजाताहै, इसको अक्षय कहनेका एक जौर कारण भी है कि, इसमें अक्षतोसे ` 








यिति निमि 


दिकं तु हेमाद्रौ संवत्सरकोस्तुभादो द्रष्टन्यम्‌।। इति रम्भाव्रतनिणयः ।। नवुलन। । 
अथ श्रावणदुक्छत॒तीयायां सधुसख्रवाख्य। गुजेरेषु प्रसिद्धा ।। तस्या अस्नहय- 
प्रसिद्धत्वाष्विधिर्नक्ताः ।\ सा परयुता ग्राह्या ।। स्व्णगौरीत्रतम्‌ \। जयत्वा रना 
श्रावणशुक्लततीयां स्वर्णगौरीव्रतम्‌ ।\ एतच्च कर्णाटकदेकञे ाद्रपदलुक्ल तृतीयाया 
प्रसिद्धम्‌ \! तत्र संकल्पः-मम इह जन्मनि जन्मान्तरे च अक्षय्यसौभा्यप्राप्तिका- 
मायः पुत्रपोत्रादिधनघान्यश्वप्रायप्त्यथं श्रीपरसमेहवरप्रीत्यथ स्वं गेगोरीव्रतमहं 
करिष्ये ।। तत्र पुजा-देवदेवि समागच्छ प्राथयेऽहुं जगत्पते।। इसा सया इता दूना ` 
गृहाण सुरसत्तमे ।! आवाहनम्‌ ।\ भवानि त्वं महादेवि स्वसौभाग्यदाधिकं जनक 
रत्नसंयुक्तमासनं प्रतिगृह्यताम्‌ ।। आसनम्‌ ।! सुचारु शीतलं दिव्यं नानागन्ध- 


मुवासितम्‌ । पाद्यं गृहाण देवेशि महादेवि नमोऽस्तुते ।। पाद्यम्‌ ॥! श्रीपारव॑ति ` 
महाभागे शेकरग्रियवादिनि ।\ अर्घ्यं गहाण कल्याणि भर्व सह पतिन्रते\) अघ्यम्‌ ।\ ` 
गङ्कातोयं समानीतं सुव्णकलज्ञे स्थितम्‌ 1 आचम्यतां महाभोगे भवेन सहिते- ` 


गङ्धासरस्वतीरेवाकावेरीन्दाजलैः।। स्नापितासि मया ` 


तथा ज्ञाति कुरुष्व मे ।\ स्नानम्‌।\\ सवेभूषाधिके सौम्ये लोकल्ज्जानिवारणे 1} 

















 नियममे तत्पर होकर रंभानामके उत्तम त्रतको करे ¦ इसमें पुर्वविद्धा तिथि ग्रहण करनीचाहिये । उसमें 1 
 न्नतभी करना चाहिये क्योकि, कृष्णाष्टमी बृहत्तपा, रंभा, भूता मौर वटपैतृकी सावित्रीके त्रतोमे पूवं समुखी 
तिथि वं विद्धाः करनी चाहिये । यदि व्रतकी विधि तथा दूसरे विधान देखने होतो, हेमाद्रि तथा संवत्सर 
 कौस्तुभादिकमं देने । यह्‌ रंभके व्रतका निणय हभ ।! | 
८ अथ मधुलवः ब्रतम्‌-श्रावण शुक्ला तृतीयामें मधुलवा नामका त्रत गुनरातमे होता है पर वो व्रत हमारे | 
देक्षमे प्रसिद्ध नहीं है इस कारण नहीं कहा । उसे जब तृतीया चौथे युक्त ह्ये तब ग्रहण करना चाहिये ।॥ = ` 
स्वर्ण, गौरीब्रत-अवब आचारसे प्राप्तं जो श्रावण शुक्ला तृतीयामें स्वणेगौरीव्रत होता है उसे कवते हँ । इसे ` 


` कर्णाटक देयम भाद्रपद शुक्ला तुतीयाको करते हे, इसका संकल्प तो मेरे इस जन्म ओर जन्मारतमं अक्षय 


सौभाग्य ओर पुत्र पौत्रादि धन धान्य ओौर एेदवर्यकी प्राप्तके ल्यि तथा श्रौपरमेर्वरकी प्रसन्नताके ल्य 
 स्वर्णगौरीब्रत मे करता हू, यह्‌ है । स्वणंगौरीकी एना कहते है-है देवि ! हे देवि ! आजा, हे सुरसत्तमे ! = | 
मेरी की हई पूजाको ब्रहणकर ¦ इससे आवाहन । तथा-आाप भवानी ओर आही महादेवौ हँ जपही सब =` 
सौभाग्यकी देनेवाली ह-इस अनेक र्नोसे जड हृषु जसनको माप ग्रहण कर, इस मन््रते जासन । तथा- = ` 
अच्छी तरह छण्डा एवम्‌ अनेक तरहकी सुगन्धियोसे सुगन्धित हुमा पादय-ग्रहण करिये, हे देवेशि ! हे महा- = ` 
देवि! तेरे लिये नमस्कार है! इस मन्तरसे पाद्य । तथा शंकरकौ छ 
कल्याणि ! पतिसमेत अर्ध्य ग्रहण करिये, इस मंत्से अध्यं ! तथा गङ्गानल लाया हं बो सोनेके कल्शमे रवा (श 
हा है है महाभागे ! अनघे ! श्िवके साथ आचमन केर, इस मन्त्रसे आचमनीय । तथा गङ्ख, सरस्वती, | ४ 
| रेवा, कावेरी ओर नरम॑दाके पानौसे मेने आपको स्नान करायाहै तंसेही आयभी मृद्े शांतिदे, इस म॑त्रसेस्तान। ` ` 
 तथा-ये युन्दर वस्त्र सब आभूषणोसे बढ़कर हैँ खोककी लल्जाका निवारण इनसे ही होता है मं इन्दं जापको ` (9 
। दता हूं भाप ग्रहण करिये, इस मन्त्रसे वस्त्र देकर कंचुकी भौर आचमनीयको देना चाहिए ।। कर्पूर, कुंकुम, = ` 
हल्दी ओर कस्तूरी इसमे पडी हई हं एेसे चन्दनको ग्रहण करिये, इस म॑त्रसे चन्दन । तथा हरिद्रा, कुकुमर्िहुर = ` 
| ओर कज्जलको सौमाग्यद्रव्योकि साथ ग्रहण करिये । इसमे सौभाग्य द्रव्य । तथा-“माल्यादीनि" इस मनत्रसे 
„पष्य । तथा-देवदरुमके रससे बनया गया, जिसमे कि, कालागुर मिले हए हं एसे घूपको सूधिये, हे भवानी ! 4 
| इसमें बडी सुन्दर सुरभि आ रही है, इस मन्त्रसे धूप । तथा-“अज्यं च वतिसंयुक्तम्‌" इस मन्त्रसे दीय । = | 
 तथा-“अन्नं चरतुविधं स्वादु” इससे नैवे निवेदन कर, आचमन कराना चाहिये ।\ इसमे कुर, एला, लवंग, ॥ 

ताबूलीदल जौर सुपारी पडी हुई है पान लीजिये, इस संत्रसे पान । तथा-'“इदं फलं मया देवि" इसे फल । ` 
तथा-“मोम्‌ हिरण्य गभः" इस सन्त्रसे दक्षिणा, पीछे नीराजन नमस्कार ओर “यानि कानि च पापानि 
इस मन्त्रसे प्रदक्षिणा, तथा-पुष्पाञ्जलि; एवम्‌ हे सुबरते ! पत्र दे, धन दे, सौभाग्य दे तथा भौर भौ सबं 
कामनाये पूरी कर, तेरे लिये नमस्कार है । इस सन्त्रसे प्राथना करनी चाहिये  तथा-त्रव संपतते व्यि जौर ` 
महादेवी भवानीकी प्रसन्नता के लिये, ब्राह्मणको वाणक देता हं । इस मन््से वाणक देकर, पीछे ब्रती पुरुषको 
लह बेणपात्रोमे दरनदंपतियोको बलाकर, ब्रतके उद्यापनको सिद्धिके लिए उन्हं 
ीवार यह्‌ कहना चाषठिये-हे पातित्रत्यसे भूषित त स्वलक्ृत सुवासिनिथो ! मेरी मनोकामनाको 











गात्रे सुहा भर, विनदंपतियोश 





हिन्दीटीकासहित = (१२७) 


प्यास बोलनेवाली महाभगे पावेति! 


२ ॥ 
. 
1 ; 
ह { 

























































 बालमगेक्षणे \\५॥\ तयोः प्रियतरा ज्यष्ठा तस्यासीन्नपतेमेता ।\! स कदाचिनं 
` भेजे म॒गयासक्तमानसः ॥। ६ ।। ततर शार्दल्वाराहवनमाहिषकुञ्जरान्‌ \\ हत्वा 
बभ्राम तष्णातः स तस्मिन्‌ विपिने महत्‌ ।\ ७ \ चको रचक्रकारण्डखञ्जरो 
ठश्षताकुलम्‌ ।! उत्फ्ल्लहल्लकोदमकुमुदोत्परुमण्डितम्‌ । ८ । अपूवेमवनी 
ज्ञोऽसौ ददाप्सरसां सरः । समासाच्च सरस्तीरं पीत्वा जलमनुत्तमम्‌ ।\ ९ ।। 
भक्त्या मौरीनचयन्तं ददर्घ्ण्सरसां गणम्‌ \\ किमेतदिति पप्रच्छ राजा राजीव- 
लोचनः ।\! १० 11 अप्सरस ऊचुः ।\) स्व्मगोरीब्रतमिदं क्रियतेऽस्मःभिरतमम्‌।। सव 
संपत्करं नृणां तत्कुरुष्व तपोत्तम ।\ ११ 11 राजोवाच ।\ विधानं कोदुशं ब्रूत 
[क्िफलं 'वरतचारणात्‌ ।। ता अचुर्योषितः सर्वा नभोमासि तृतीयकं ।। १२ \\ 
प्ररन्धव्यं व्रतमिदं गौर्याः षोडजश्वत्सरान्‌ ।\ तच्छत्वा सोऽपि जग्राह व्रत नियतः 
मानसः ।। १३ ।। गुणे; षोडक्ञभिर्युक्तं दोरकं दश्िणं कर ।। बबर्धान॑न मन्नण 
भक्त्या गोरी प्रपूज्य च ।\ १४ ।\ दोरक षोडशगुणं बध्नामि दक्षिण कर ।' त्वत्प्री 
तथे महेशानि करिष्येऽहं व्रतं तव ॥1 १५ ।। ततः कृत्वा व्रतं देव्या अगमन्निज- 
मन्दिरे \1 विालाक्ष्या ततो दृष्टो राजा गौय दोरकं 
दष्टा च पतिकोपना ।! न कर्तव्यं न कर्तव्यमिति रा 

































ज्ञि वदत्यपि ।। १७ ।। 





गतः ।। १८ । तदद्वितीया ततो दृष्ट्वा विस्मयाकुलिताभवत्‌ ।\ तन्मूले दोरक 
छन्नं गृहीत्वा सा बबन्ध ह्‌ ।\१९।। ततस्तद्व्रतमाहात्म्यात्पतिप्रियतराभवत्‌।! 
खिता वने ।\२०॥ प्रययौ सा महादेवीं ध्यायन्ती 



































हिन्दीदीकासहित 


भान्‌ \। अन्ते श्जिवपुरं प्राप्तः कान्ताभिः सहितो नृपः ।। ३० 1\ यच्छोभनं ततमिदं ` 
कथितं शिवायाः कुर्यान्मम प्रियतरो भवता च गौर्याः ॥। प्राप्य लियं समधिकां 
भूवि शात्रसंघोिजित्य नि्मल्पदं सहसा प्रयाति । ३१ ।। इति श्रीस्कन्दपुराणे ` 
गौरीखण्डे सुवर्णणोरीब्रतकथा ।। अथोद्यापनम्‌ ।।युधिष्ठिर उवाच।। उद्यापनर्विधि 
ब्रूहि ततीयायाः सुरेश्वर ।। भक्तितः श्रोतुमिच्छामि ब्रतसंपुतिहेतवे ॥५१ ॥\ कृष्ण 
उवाच ।। उश्यापनविधि वक्ष्ये सावधानेन वे श्णु ।) विादण्डम्रमाणेन प्रमितं ` 
दक्षिणोत्तरे ।\२ ॥। प्रत्यकप्रागपि राजेन्द्र नव गोचमं इष्यते ।। गोचमेमात्रं संक्ष्य ` 4 
 सोमयेनं विचक्षणः ।। २ ।। मण्डपं कारयेत्तत्र नानावणं सुशोभनम्‌ ।।ग्रहमण्डल- ` 
 पाडवं तु पद्ममष्टदलं लिखेत्‌ ।! ४।! तन्मध्ये स्थापयेत्कुम्भमव्रणं मृन्मयं शुभम्‌ ।॥। 
 तास्रपात्र ्रकुर्बौत पलैः षोडशाभिस्तथा ।। ५।। तदधर्धिन वा कुर्याद्ित्त लाव्यं | 
 विविर्जयेत्‌ ।\ ववेतवस्त्रयुगच्छन्न श्वेतयज्ञोपवीति च ।।६।। भाजनं च तिलः पूर्णं | 
कलज्लोपरि विन्यसेत्‌ ।} क्षेमा्रसुवर्भन प्रतिमां कारयेद्बुधः ।।७ ।। तदधं मध्यमं _ | 
प्रोक्तं,तदर्धं तु कनिष्ठकम्‌ ।! कृत्वा रूपं प्रयत्नेन पावेत्याश्च हरस्य च ॥\८ ॥! ` 
वेदोक्तेन प्रतिष्ठा च कतंव्या तु यथाविधि ।। अथ तास्रमये पात्रे प्रतिमां तत्र॒ 
विन्यसेत्‌ ।\९।। पावेत्यास्तु युगं+ दयादुपवीतं शिवस्य च ।। पञ्चामृतेन स्नपनं ` 
कृत्वा देवस्य चोत्तमम्‌ 11 १०।। स्नानं च कारयेत्पश्चात्ततः पजां समाचरेत्‌ । | 
चन्दनेन सुगन्धेन सुपुष्येश्च प्रपूजयेत्‌ ।॥११।। धूपं च कल्पयेद्गन्धं चन्दनागुस्स- = ` 
युतम्‌ । नानाभ्रकारेनेवेचं तथा दीपं च कारयेत्‌ ।॥१२ ।। अचंयेतपुजये इक्या ` स 
गन्धपुष्पैः फलाक्षतेः ।। आवाहनादि कर्तव्यं पुराणागमसंभवः ।१३ । काथ । 
विधानतः पूजा भक्तिश्रद्धासमन्वितम्‌ \\ देवदेव समागच्छ प्राथयेऽहं जगत्पते ` 
 ॥ १४ ॥। इमां मया कृतां पूजां गृहाण सुरसत्तम । एवं पुजा प्रकर्तव्या रत्रौ ` 
जागरणं ततः । १५।। गीतनत्यादिसंयुक्तं कथाश्ववणपूर्वकम्‌ ।\ अचंयेत्पुववहेवं ` 
मं समाचरेत्‌ ।\ गृह्योक्तविधानेन कृत्वाग्निस्थापनं ततः । 











































कृताम ।। सवत्सं सवर्णां भद्रां धेनुं रद्यल्प्रयत्ततः \\२२ ।। बुवणन समायुक्ता- 

 भाचार्याय च साधवे ।! षोडक्भिः प्रकारंइच पक्वाघ्चः प्रीणयेच्च तस्‌ ।\२३ 

 षोडकप्रमिते्द्यादब्राह्मणेभ्यः प्रयत्नतः 11 वंकपात्रस्थितेः पचात्पक्वाल्र्वायनं 
` शैः ।! २४।। अन्येभ्यो ब्राह्मणेभ्यश्च दक्लिणां च प्रयत्नतः ।।\ बन्धुभिः सह 
 भृञ्जीत नियतश्च परेऽहनि ।। एवं कृत्वा भवेत्पा्थं परिपुणत्रती यतः ।\२५ 
इति श्रीस्कन्दपुराणे कृष्णयुंधिष्ठिरसंवादे स्वणेगौरीव्रतोद्यापनम्‌ ।\ 


व अथ कथा--पहिले समयमे सिद्ध यन्धरवेसि सेवित केलासके शिखरपर, उमा सहित अव्यय क्िवजीसे ` 
` श्रीस्कन्दजी पुने लगे \\ १ ।। है करूणाके सागर ईजान ! है-देवेश ! एक एसा त्रत किये जिससे कि, ` 
नातीयोकी वद्धि हो \! २१ शिवजी बोले कि, है महाभाग षडानन ! तुमने ठोक पुछा. नुरष्योको सवेसंपत्‌ =` 
देनेवाला स्वर्णगौरी व्रत है \\ ३ \। पहिले सरस्वती नदीके किनारे एक विमला नामकी महापुरी थौ वहां ` 
करवेरके समान चन्द्र्रभा नाम का राजा था ।1 ४ 1। उसकी महादेवी ओर शिवालाक्षी दो स्तनरयाँयींनोरूप . ` 
लावण्य सौन्दयं जौर स्मररविश्रममे अषितीया थी, आख हिरणके बच्चेको सी थं 1} ५! उसे बडी स्ते ` 
ज्यादा प्यारी थी, एक दिन वो दिकार खेलने गया 1 ६ ।। वहां वो शेर, शूकर, जद्धलीभेसे मौर हाथि- ` ^ 
शोको मारकर, प्यासका मारा बनमरं घमने र्या 11 ७ 1 सेकडों ही चकोर, चक कारंडव जौर खञ्जरीटोसे 
आकुल तथा उत्पल ओर हल्लोसे व्याप्त एवम्‌ कुमुद ओर उत्पलं से संडित ।\ ८ ।\ एक अपुवं जप्सरा्ओका ५ 
सर देवा, उसके पास पहुंचकर उत्तम पानी पिया ।! ९ \। वहां भक्तिभावके साथ गौरीका पुजन करते हुए 
 , अप्सराओके सम्‌हको देख राजाने उनसे युदा करि, आप व्याकर रही हें ? ।\ १० \\ अप्सरायें बोली कि, हम 
` उत्तम स्व्णगौरी व्रतकर रही हँ इससे मनुष्योको सब संपत्तियां मिल जाती ह, हे नृपोत्तम जापभी करं ।! ११.।। 
राजा बोला कि, उसका विवान कंसा है तथः व्रतके करनेसे क्या फल होता है ? कहूं तब वे स्त्रियां बोलीं कि 
भाद्रपद शुक्ला तृतीयाके दिन ।१२। इस ब्रतका प्रारंभ करना चाहिये, यह्‌ घोडा वत्सरका है, यह सुन 
 राजाने भौ उस त्रतको नियसके साय ग्रहण किया ।। १२ ।\ राजाने भक्तिभावसे गौरीजोकापूजन करके | 
निम्नलिखित ंत्रके साथ सोलह तारका भागा बांधा 1\ १४ \। करिह महेशानि ! तरी प्रस्तके ल्एिमे 
| दये हाथमे सोलह घागोका एकं वरन वांधता हूं, मे तेरा ब्रत करूंगा \! १५ ।! वो देवीका ब्रत करके जपने 
मकान आया, विल्चालाक्षीने देखा कि, राजा गौरीका पुजन करता है 1! १६ \। हाथमे उस डोरेको बघा हुजा 
देखकर पतियर नाराज हई राजा कहते ही रहे किं, न तोडिये न तोडियें 11 १७।। पर उसने उस डोरेको तोड, 
क दिया, उस डोरेके च्‌ जानेसे सुखा पेड हरा हो गया !! १८ \। दूसरी यह देल विस्मित हौ ` 










































| ० ध 1 हिन्दोटीकासहित | । व ५ | (१३१) ५ (८ ध 





यहु राजाकौ प्यारी स्त्री होकर एकदम प्रसन्न हुई ।। २९ ।। इस प्रकार, गौरीकी कुषासे, आराधन करते हृष्ट ` 
 विह्ञालाक्षने एसे भोगोको भोगा जिनसे कोई उत्तम ही न हो, अन्तमं स्त्रियों सहित बो राजा शिवपुर चला 
गया ।! ३० ।। यह मेने गौरीका सुन्दर व्रत कहा है, जो इस ब्रतको करता है वो मेरा जौर गौरीका प्यारा ` 
होता है तथा लोकोत्तरश्ीवाला हौ, वेरिथोके सम्‌दायोको जीत, सहसषही नि्मेरपदको पाजता है ।। ३१।४ ` 
` यह्‌ स्कन्दपुराणमें गौरीखण्डके स्व० दलकी कथा पुरी हई ।। अथोद्यापनम्‌-युधिष्ठिरजौ भगवान्‌ कृष्णजीसे 
बोल कि, है सुरेदवर ! तृतीयाके उद्यापनकौ विधि कहिये, में व्रतकौ संमूतिके लिये भक्तिसे सुनना चाहता 
हूं ।\ १ ॥। श्रौकृष्ण बोलते कि, मे तुकने उद्यापनकी विधि कहता हू, सावधान मन करके सुन, जो तीस दण्डके ` 










(१२० हाथके) प्रमाणसे दक्षिणोत्तरे नपी हई ।। २ ॥ तथा पूर्वसे पद्चिममें ३६ ह्य हो वो गोचमे नात्र ` 0 


| कहाती है है राजेंद्र ! चतुर व्रती, कहे हए गोचमं मात्रको गौबरसे छीप कर ।! २३ ।। उसमे अनेक रगोसे 






सुशोभित एकं मण्डप करा, ग्रहुमण्डलकी बगलमे एक अष्टदल कमर लिखाये ।! ४ ।! इसके बीचमें एक ` ५ 


४ साबित शुभ मिदटरीका कलश्ञ स्थापित कर दे, सोलहपलोका एक तामेका पात्र बनावे ।।५।।यह नहो सके तो ` | 
इसके आधेका ही बनवाले, इसमं लोभ न करना चाहिये उसे दो सफेद कपडोसे ठककर सफेद ही जने उारुकर 






 ॥1६।। उसमेतिल भर कर कलक्ाके ऊपर रख दे । समन्नदारको चाहिये कि, एक क्षभर सोनेकी मति बनवार ` ॥ 


कर्षकी ८. 


1 ॥ ।। ७ ॥। आसे कषवं ४. 
। ५ ८ ॥ वैदिकविधिसे उसकी यथावत्‌ प्रतिष्ठा करके उसे ताबेके पात्रपर रख देना चाहिये ।! ९ ।\ पावतीजीको 
दो चस्त्र तथा हिवजीको जनेय देकर, देवका पंचामृतसे उत्तम स्नान कराकर ।। १० ।। पीछे शुद्ध पानीसे 









१ मूत्ति मध्यम तथा चोथाईकी कनिष्ठ कही है, वो हृवहू गौरी पावंतिकी होनी चाहिये 


 स्तान कराके परजा प्रारंभ करनी चाहिये, सुगन्धित चन्दन भौर अच्छे खिले हुए पुष्पो पुने ।॥ ११।। चन्दन 


| । | ४ 2 जर अगर जिसमें पड हं एसी धप दे तथा अनेकं तरहुके नवके निवेदन करके दीपकः कराये ।। १२।४ | 1 









गन्ध, पुष्प फल ओर अक्षतोसे वेदोक्त ओर पुराणोक्त मंत्रे आवाहनादिक करने चाहिये ।! १३ ॥ भदः | | ८ 
ओर भक्तिके साथ विघानसे पुजा करनी चाष्टिये कि, हे देव ! हे देव ! आयो, हे जगत्पते! मे आपकी प्रार्थना 


। करता हूं १४1 ह सुरसत्तम ! मेने जो यह पुना कौ है इसे ग्रहण करिये पुजा करके रातको जागरण करना = | 


चाहिये \\ १५ ।} उसमे गाने बजानेके साथ कथाका भी रवण करे, पहिकेकौ तरह देवका अर्चन करके पौः ` 





| होम करना चाहिये \! १६ । अपने गृहयसूतरके विधानके अनुसार नवग्रह पूजनके साथ अग्निस्यायन करके = | 





। ।  हवनकरना चाहिये ।। १७ ॥। वेदका जानेवाला, घीसे भिगोये हुए तिल जोओंका 









।  मौकी दक्षिणासहित गक दे जो दूष देनेवाल हो, सु्ीलहो, जिसके 








भौ देनी चाहिय, ह्‌ कडा उदाई हई अचत होनी चाहिय ॥२२।॥ गऊकते साथ कुछ सोना भीदेना चाहिये, 
यह सब साधु आचा्यको दे, उसे सोलह प्रकारके पक्वानोसे उत्पन्न करना चाहिये \\ २२ \\ सोलह सपत्नीक 0 व ८ 












तिल जौभका ख मंचोसे ओर गोरोमत्रसे = ` 

। हवन करे 1 १८ । एकसौ आठ आहति मथवा अट्ठाईस आहुति दे, होम समाप्त करके जचायंका पूजन 

| करे ।॥। १९।। अघे दे, षएूल चढावे तथा ओर भी वस्त्रालंकार दे, गौसे अधिक मृल्यकी दक्षिणादे !\ २०।४ 

6 सोने मढे सींग जर खुरोमं वांदीहो अथवा 
 सोनेके सीम ओर चांदीके खुर भो उसके साथ दे, कासेका एक दोहना दे 1 २१।। रत्नोकी पृछ तविकी पीठ ` ` 





 ब्रतराज 





















लोकानां हितकारम्‌।कथायामि ब्रतं दित्यं योषितां पलदायकम्‌।\२॥। कृष्णस्या- 
वरजा साध्वी सुभद्रा नाम विश्रुता 11 रूपलावण्यसपच्रा सुभरा चारुहासिनी 
।\ ३ ।। गाण्डीवधन्वनश्चासौ योषितां च वरा प्रिया ।\ चैलोक्याधिपतिः कष्णस्त 
स्याहं भगिनी प्रिया ।। ४ ।\इति गर्वसमाविष्टा न किचिदकरोच्छभम्‌ \\। कालेऽपि 
यस्य चाज्ञा व क्षिरसा धारयेत्सदा । ५।! स मे माता सखा कृष्णो दनुजानां 
नक्ृम्तनः ।। इति संचिन्त्य मनसि न किचित्साकरोत्तदा ।\६ ।\ सवं ज्ञात तदा 
तेन देवबदेवेन शगाङ्धणा ।। इति संचिन्त्य मनसि भरातुत्वान्मम गौरवात्‌ \)७ ।। 
अवाल्धितारणं किचिन्मृढत्वान्न करिष्यति ए ध्यात्वा मुहूतं मनसि श्रीकृष्णो 
भक्तवत्सलः ।! ८।\ सुभद्रानिकटे गत्वा वचनं चेदमन्रवीत्‌ ।' परलोकनिगीषा्थ न 
{चिदपि ते कृतम्‌ ।। ९।। ब्रतं कुरुष्व मनसा सर्वान्कामानवाप्स्यसि ।' स्का 

























` संयक्षः \\ भुक्तिमुवितप्रदं चाप 
 सुृतस्य पलाप्तये ।\ कालो दोऽहं स | 
| च मूलं हि ऋतवः स्कन्ध एव च।\ मासा दादशसंख्याकाश्चोपशाखा ह्यनुक्रमात्‌ 
५ वे ¶ दिवसास्तथा ।। पर्णानि घटिकाः 











नतानि ^  हिन्दीरीकासहित ` (१३३) 





तारं विधानेन समन्वितम्‌ ॥।२८।1 पल्लवश्च हिरण्यंशच वस्त्रयुग्मेन वेष्टितम्‌ ।\ ` 
तन्मध्ये मां प्रतिष्ठाप्य उपचारेः प्रपुजयेत्‌ ।।२९।। ततः पुष्पार्जाल दचातक्षसप्य 
च पुनः पुनः ।। वाणकं हि प्रदद्याच्च त्रतसंपूतिहेतवे ॥।३० ।॥। लक्ष्मीनारायणो 















देवो ह्यस्मात्संसारसागरात्‌ ।। रक्षेद सकलात्‌ पापादिह सर्वं ददातुमे ॥३१।५ 
अच्युतः प्रतिगृह्णाति अच्युतो वे ददाति च ।\* अच्युतस्तारकोभाभ्यासच्युताय 


नमो नमः ।। ३२।। रात्रौ जगरणं कर्याद्गीतवादि्रमङ्कलेः ।! पुराणश्रवणेनेैव 
[चरिल्ेषं ततो नयेत्‌ ।३३ \! प्रभाते विमले स्नात्वा नित्यकमं समाप्य च ।\ 








विष्णोर्नुकं सक्तुमिव होममन्त्रं स्मृतम्‌ ।\३४ ।\ अष्टधिकदिहतं च तिल्होमं . 


तु कारयेत्‌ । कलशं प्रतिमायुक्तमाचार्याय निवदेयेत्‌ ।३५ ।\ गां दद्यात्कपिलां 


चैव सालंकारां सदल्लिणाम्‌ ।\ आचार्यं पूजयेःडूक्त्या वस्त्रराभरणेरपि ।३६ ।। 


` ब्राह्मणान्भोजयेत्पश्चाच्चतुविशतिसंस्यकान्‌।।आशिषो वे गृहीत्वाथ स्वयं भुञ्जीत 


वाग्यतः ।॥\३७।। इति तस्य बचः रत्वा तत्सवं हि चकार सा ।\ मुक्त्वा भोगान्यथा- 
काममन्ते स्वर्गं जगाम सा ।\ ३८।। इतिश्रीभविष्योत्तरपुराणे सुकृतन्रतकथा । 





अथ सृकृततृतीयाव्रतम्‌-अब सुकृत्य त॒तीयाके व्रतको कहते हं । श्रावण शुक्ला त॒तीयाको सुकृतव्रत 


होता है, पर तृतीया मयाह्न व्यापिनी होनी चाहिये । अथ कथा । शौनकादिक ऋषि गण बोले कि, जयने सब ८ 
 कामनाञंके देनेवाङे ब्रत तो कहदिये अब प्रयत्नके साथ उन ब्रलोको कहिये जिनसे हमं श्रेय मिक 1 १।४ 













ध ` सुतजी बोखे कि, हे महाभाग ! आपने अच्छा पूछा इससे लोकका हितहै कि एसे दिव्यत्रतको कर्हुगा जो ` 1 


स्तियोको फरुदायकं है । २ \। भगवान्‌ कृष्णको छोटी बहिन, सुभद्राके नामत प्रसिद्ध थो । वो स्प लावण्यसे = ५ 


। संपन्न, सुन्दर हसनेवार सुमुलौ थी 1\ ३ ।। गाण्डीवं धन्वा अजनकौ प्यारी पटरानी ओर तीनों रोकोके 
स्वामी कृष्णकी में प्यारी छोटी बहिन हूं ।। ४ ।! इस अभिमानसे उसने शुभका कुछ भी संचय नहीं किया, ` 





| जिसकी आज्ञाको कार भौ अपने शिरपर सदा धारण करता हे \\ ५ ॥। वो मेरा भाई सखाङ्ष्ण हैजोरक्षसोका ` 
संहार करता है । एसा मनम शोचकर उस समय उसने कुछ भी नहीं किया ।\ ६ 1। देवदेव कृष्णने यह सब 





















जान लिया मौर यह श्लोचकर कि, मे इसका भाई हु, मेरे गौरवसे ।\ ७ ।। संसार सागरसे तरनेका कुछ भी ` ¢ 





उपाय न करेगी वयोकि 
कि, पर लोकको जीतनेकी इच्छासे तेने कुछ भी नहीं किया है ।\ ९।) तू मनसे ब्रतकर सब कामोकोषाबेगी 
गेकमे रक है, लोकोका व्रतको स करके सब पापोसे छट जाता है, इसमे 











ह मूढहै यह थोडी देर शोच भक्तवत्सल शनो्ृष्ण 11 ८1 सुभद्ाके समीप जाकर बोले ` 


८ 1 पि ५ ५ : 1 






























(२४) ~ र 1 व्रतराज.- 4 , +, ततीया- 


नितिन वे किति 0 0 0०00०000 ।०।०।।।।।।।।1।।0ििििििििेििििििििििििि । 





वीरि 





४ भण ४ णी मीं तानक मा्‌. ०य क. क 











-नेहुए तथा शकंरा भिले हुए, गृलरके फलके बराबर बनाले ।\ २१ ।। उन्हं बांसके पात्रमं सोना ओर पानके 
` \प्नाथ रखकर, उस बाणकको विधिके साथ ब्राह्मणके च्य दान कर दे ।।२२॥। वायनका मंत्र-पुत्र पौ्नोकी 
` समृद्धि तथा सौभाग्यकी प्राप्तिके लिये तथा व्रतकी संपुत्तिके लिये वाणकका दान करता हूं ।\ २२ 1 पिष्टकी 
ओर फरोकी क्षीर बना श्रात॒स्वरूपी मुञ्षे भोजन कराकर 1} २४ ।4 इस्‌ प्रकार विधिके साथ ब्रतको समाप्त ` 
` करके इसके बाद, तीसरे वषमे उद्यापनं करे ।! २५ ।\ वेदवेदान्तोके जाननेवाले, स वेधसंन्ञ, युश्ील, शान्त, 
दान्त ओौर कुटुम्बी जआचाय्येका वरन भक्तिं भावके साथ करके }} २६ }) स्वस्तिवाचनयुवेक नान्दीश्राद्ध 
करा, निष्ककी हौ, चाहं आधे निष्ककी हो, एकं सोनेकी प्रतिमा करावे ।\ २७ ।। वो मृति लक्ष्मीनारायणकौ 
` दौ, ठकनेके साथ नया तोबेका कलक । २८ ।! जो पंचपतल्लवोसे हिरण्यसे जर दो वस्त्रोसे वेष्टित हौ, उसके 
 बीचमे मृष प्रतिष्ठित करके उपचारोसे भली प्रकार पूजना चाहिये ।। २९।। इसके पीछे पुष्पांजलि दे 
यारंदार क्षमापन कर, व्रतकौ संपुतिके ल्यं वाणक देना चाहिये ।। ३० \। लक्ष्मीनारायण देव ही इस संसार 
` सागर ओर सव पापोसे मेरी रश्नाकरें तथा यहां मुषे सब दं ।। ३१ ।। अच्युत ही देते लते हँ, दोनोसे अच्युतही 
धार करते ह, अच्युतके लिये ही वारंवार नमस्कार है ।\ २३२ ।। इसके पीछे गाने बजानेके साथ रातको जागरण 
करता चाहिये, बाकी रात तो पुराणकौ कथा सुनकर, बितानी चाये ।! ३३ ।। निमंल प्रभातमं स्नानकर, ` 
 नित्यकमेसे निवृत्त हो “ओम्‌ विष्णोर्नुकं वीर्य्याणि प्रवोचम्‌ पाथिवानि विममे रजांसि ! यो अस्कमाय दुत्तरं ` 
` सधस्थे विचक्रमाणस्तरेधोरुगायः" भगवान्‌ श्रीकृष्णन्नारायणके पुरुषार्थको कौन वर्णन करसकता है, जिस 
 ऋन्त दर्चोनि पंचतत्त्वके बने हुए, तथा शुद्ध सत्व अथवा अप्राकृत तत्त्वके बने हुए, खोकोका निर्माण कियाहै।! ` 
ओ तोन डगमें बलिका राज्य ले उपेन्द्र बनकर बेठ गया । तीनों विधानोसे जिसकौ बडी बडी स्तुतियाँ गायी ` 
-जाती हं । इस मंत्रसे तथा “ओम्‌ सक्तमिव तितउना पुनन्तो यत्र घीराः मनसा वाचमक्रत ।। अत्रा सखाय 
 -सर्यानि जानते भद्रैषां लक्ष्मीनिहिताधिवाचि ।}“ इस संत्रका महषि यतंजलिजीने दूसरा ही अथं किया है 
` थरं पहिला हवन विष्णु, भगवानका है तथा प्रयोगभौ लक्ष्मीनारायण मगवान्‌कौ पुजाके बाद हवनमं होता है 
तन इस संत्रका लक्ष्मीपरक अथं होना अत्यावहयक है । जसे सतुओंको चालनीसे छानकर पवित्र वना 
सेते इसी तरह धीर पुरुष मनसे लक्ष्मोके पवित्र मंत्रोको विशुद्ध कर ठेते ह । इस अवस्था एसे पुरुष लक्ष्मीका ` 
` -साक्षातुकार कर ठते है, एसे पुरुषोकी भद्रा लक्ष्मी वेदके मंत्रोसे यहां प्रतिष्ठित की गई है । दोनो मत्रोसे 
|. जाति एक होती, पर ध्यान दोनोका किया जाता है ! चाहं दोनों मंत्रोके अन्तमं आहूति देतीवार यह भावना 
 . कर छेनौ चाहिये कि, यह्‌ आहुति लक्ष्मीनारायण भगवानृकी है मेरी नहीं है \\ ३४ ॥। ४ कहे हुए मंत्रे दोसौ 


































हवे।१३५॥ ` 


पो ब्राह्मणों भोजन करा, उनके आक्तीवदि लेकर, आप मौन होकर भोजनं करे ।\ ध डे ७ । 
कृष्णक एते वचन सुनकर सुभद्राने वैसाही किया, इस लोकमे भोगोको भं | 








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१; 


व्रतानि, हिन्दीटीकासहित (१३५) 





करिष्यं ।। तत्रादौ गणपतिपूजनं करिष्ये । इति संकल्प्य गौरीयुक्तं महेहवरं पूज- 
येत्‌ ।\ अथ पुजा\ पीतकोकञेय वसनां हेमाभां कमलासनाम्‌ ।! भक्तानां वरदां 





नित्यं पावंतीं चिन्तयाम्यहम्‌ ।। मन्दारमालाकुलिताल्कये कपालमालाकितः ` 


` शेखराय।। दिव्याम्बरायै च दिगम्बराय नमः शिवाये च नमः शिवाय । उमामहे- 
इवराभ्यां नमः ध्यायामि ।। देवि देवि समागच्छ प्रथयेऽहं जगन्मये।। इमां मया 
कृतां पजा गृहाण सुरसत्तमे! उमामहुश््व राभ्यां नमः । जावाहुनम्‌ ।। भवानि त्वं 
महादेवि सवेसौभाग्यदाथिके ।। अनेकरत्नसंयुक्तमासनं प्रतिगृह्यताम्‌।। आसनम्‌ ।। 
सुचारू दीतलं दिव्यं नानागन्धसमन्वितम्‌।। पाद्यं गृहाण देकेश्नि महादेवि नमोऽस्तु 
` ते?। पाद्यम्‌ ।। श्रीपावेति महाभागे श्ञंकरभ्रियवादिनि।। अर्व्यं गृहाण कल्याणि 
भर्त्रा सह पतिव्रते ।। अघ्यम्‌ \। गद्धाजलं समानीतं सुवणेकलशे स्थितम्‌ ।। 
आचम्यतां महाभागे स्द्रेण सहितेऽनघे \! आचमनीयम्‌ ।। गङ्धासरस्वतीरेवाप- 

 योष्णीनमदाजलेः \। स्नापितासि मया देवि तथा शन्ति कुरुष्व मे।। स्नानम्‌ ।। 





1 दध्याज्यमधसंयक्तं मधपर्क मयाऽनघ ।। दत्तं ग हण देवेशि भवपाशविम्‌क्तये ।। 


` मधपर्कम ।! पयो दधि घतं चेव हाकंरामधसंयतमं ।, पञ्चामृतेन स्नपनं परीत्यथं 


` म्रतिगृह्यताम्‌ पञ्चामृतस्नानम्‌ 11 किरणा धूतपापा च पुण्यतोया सरस्वती ।। 


 मणिकर्गोजलं शुद्धं स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम्‌ ।! स्नानन्‌ ।\ सर्वेभूषाधिके सोम्ये 
 खोकलज्जानिवारणे ।।! मयोपपादितं तुभ्यं वाससी प्रति गृह्यताम्‌ ।। वस्त्रम्‌ 1 


मन्त्रमयं मयादत्तं परब्रह्ममयं शुभम्‌ ।\ उपवीतमिदं सूत्रं गृहाण जगदम्बिके ।। 


उपवीतम्‌ \\ कंचुकीमुपवीतं च ननारत्नेः समन्वितम्‌ ।। गहाण त्वं मया दत्तं पाव्य 


च नमोऽस्तु ते ।। कंचुकीम्‌ ।। कुकुमागुरुकपूरकस्तूरीचन्दनेर्युतम्‌ 1 विलेपनं महा- ` 


























देवि तुभ्यं दास्यामि भक्तितः ।। गन्धम्‌ ।। रञ्जिताः कुंकुमोघेन अक्षताह्चाति- ` 


कुकुमं चेव सिन्दुरं कज्जलाचितम्‌ ।\ सोभाग्यद्रव्यसंयुक्तं गृहाण परमेष्वरि ष ॥ 







शोभनाः ।। भक्त्या समपितास्तुभ्यं प्रसन्ना भव पार्वति ।। अक्षतान्‌ । हरिद्रां ` 


तेजसां तेन उत्तमम्‌ ।। आत्मज्योतिः परं धाम दीपोऽयं प्रतिगृह्यताम्‌ ।। दीपम्‌ ।1 
अन्नं चतुविधं स्वादु रसेः षडभिः समन्वितम्‌ ।। भक्ष्यभोज्यसमायुक्तं नवे प्रति- 


 करोदतनकं चारु गृह्यतां जगत १: पत ।। करोद्रतनम्‌ ५ 1 
फलम्‌ । पगीफलं महदिन्यं ० । ताम्बूलम्‌ ।। हिरण्यगभस्थं ° । दक्षिणाम्‌ ।। वच्- 
माणिक्यवेदूर्यमुक्ताविदरुममण्डितम्‌ ।\ पुष्परागसमायुक्तं भूषणं प्रतिगृह्यताम्‌ ॥ 
भूषणम्‌ ।। चन्द्रादित्यौ च धरणी विद्युदग्निस्त्वमेव च ।। त्वमेव सवेज्योतींषि 
आतिक्यं प्रतिगृह्यताम्‌ ।। नीराजनम्‌ । अथ नामयुजा ।। उमायनमः गौय ० 


१४६, 


पार्वत्ये ० जगद्धात्रे जगत्प्रतिष्ठाये° शान्तिरूपिण्यै० हराय० महं 








व्रतानि | हिन्दीटीकासदहित 





बाच ।! कथं कृतं सया नाथ व्रतानामुत्तमं व्रतम्‌ ।।तत्सवं श्रोतुमिच्छामि त्वत्स- 
कारान्महेदवर ।। १२ ।। किव उवाच ।। अस्ति तत्र महान्दिव्यो हिमवाच्म 
उत्तमः ।। नाना भूमिसमाकीर्णो नानाद्रुमसमाकुलः ।। १३ ।। नानापक्षि सम~ ` 


युक्तो नानामृगविचिचत्रकः 11 यत्र देवाः गसन्धर्वाः सिद्धचारणगुह्यकाः ।\ १४ 


विचरन्ति सदा हृष्टा गन्धर्वा गीततत्पराः ।। स्फारिकैः काञ्चनैः श्द्धैमणिवे- ` 
१५ ।। भृजल्खिचिवाकाश्चं सुहृदो सन्दिरं यथा ।\ हिमेन पूरितो 


 दर्थभूषिते 
नित्यं गङ्खाध्वनिविनादितः \! १६ ।। पावेति त्दं यथा बाल्यं परमाचरती तप 


 अब्दद्रादशकं देवि धूख्रपानमधोमुखी ।। १७ ।1 सम्बत्सरचतुःषष्टि पक्वपर्णाशनं 
कृतम्‌ ।\ माघमासे जले मग्ना वेशाखे चाग्निसेविनी ।। १८ ।। श्रावणे च बहिर्वासा 
 अ्नयानविवजिता ।\ दृष्ट्वा तातेन तत्कष्टं चिन्तया दुःखितोऽभवत्‌ ।! १९ । 
कस्म देया मया कन्या एवं चिन्तातुरोऽभवत्‌ ।। तदवाम्बरतः प्राप्तो ब्रह्मपुत्रस्तु 
 धमंवित्‌ ।\ २० ।। नारदे मुनिज्ञाद्लः शेल्युत्रीदिद्क्षया ।। दत्त्वार्ध्यं विद्ष्टरं 
पाद्यं नारदं प्रोक्तवान्‌ गिरिः ।! २१ ।\ हिमवानुवाच ।। किमथंमागतः स्वामिन्‌ ` 
` वदस्व मुनिसत्तम ।। महाभाग्येन संप्राप्तं त्वदागमनमुत्तमम्‌ ।\ २२! नारद ` 
उवाच ।। श्युणु शेटेन्द्रमदाक्यं विष्णना प्रेषितोऽस्म्यहम्‌।। योग्यं योग्याय दातव्यं ` 
` कन्यारत्नमिदं त्वया ।\ २३ ।। वासुदेवसमो नास्ति ब्रह्यविष्णुशिवाषु ।॥ ` 
` तस्मे देया त्वया कन्या अत्रार्थे संमतं मम ।! २४ ।\ हिमवानुवाच ।। वासुदेवः ` 
स्वरं देवः कन्यां प्रार्थयते यदि ।। तदा मया प्रदातव्या त्वदागमनगौरवात्‌ । २५। 





1 ५ 


इत्येवं गदितं श्रत्वा नभस्यन्तर्दधे मुनिः ।। ययौ पीताम्बरधरं हंखचक्रगदाधरम्‌ = ` 
,  ॥ २६। कृताञ्जक्िपुटो भूत्वा मृनी्रस्तमभाषत ॥। नारद उवाच ॥\ श्यणु ` 
देव भवत्कायं विवाहो निदिचितस्तव ।! २७ ॥ हिमवास्तु तदा गौरीमुवाच वचनं ` 
न मुदा ।\ दत्तासि त्वं मया पुत्रि देवाय गरुडध्वजं ।। २८।। शरुत्वा वाक्यं पितुर्देवौ 
। सखिमन्दिरम्‌ ।। भूमौ पतित्वा सा तत्र विलालापातिदुःखिता ।\ २९ ॥ 











पाल्‌ त्थ ५५. 


(१३७) 






















स 


व 


स 









३६ ।। हाहा कत्वा प्रश- 

च्छहितु गिरे वद ।\२७।। गिरिर्- 

वाच ।! दुःलस्य हेत्‌ श्यणुत कन्यारत्नं हृतं मम्‌ ।! दष्टा वा कालसपण सिहुव्या- 
त्रेण वा हता \\! ३८ ।! न जाने क्व गता पुत्नी केन दृष्टेन वा हृता \\ चकम्पे 
शोकसंतप्तो वातेनेव महातर ।\! ३९ ॥। गिरिवेनानं यातस्त्वदालोकन कार- 
णात्‌ ।। सिहव्याघ्रेश्व भल्लेश्च रोहिभिश््च महाधनम्‌ ।\ ४०। त्वं चापि विपिने 
धोरे व्रजन्तौ सखिभिः सह ।। तत्र दष्ट्वा नदीं रम्यां तत्तीरे च महागुहाम्‌ \1 ४९ ।। 
तां प्रविष्य सखीसादधंमन्नभोगविर्वाजता \\ संस्थाप्य वालृकालिद्धः पावेत्या सहितं 
मम्‌ ।! ४२।। भ्रशुक्लतृतीयायामचयन्ती तु हस्तभे ।। तत्र वाद्येन गीतेन रात्रौ 
जागरणं कृतम्‌ 1! ४३ \\ व्रतराजप्रभावेण आसनं चकितं मम ।। संप्राप्तोऽहं तदा 
तत्र यत्र त्वं सखिभिः सह 1} ४४ ।। प्रसन्नोऽस्मि मया प्रोक्तं वरं बूहि वरानने ।। 


प्रसुप्तं कन्यकाट्रयम्‌ ।। ४८ ।\ उत्थाप्योत्सङ्कमा 
[सिहव्याध्राहिभेल्ल्‌केवंने दृष्टे कुतः स्थिता ।\! ४९ ।\ पावेत्युबाच । 
मया ज्ञात त्वं दास्यसीइवराय माम्‌ ।\ तदन्यथा कृतं तात तेनाहं वनमागता 








व्रतानि ] = हिन्दीदीकासहित (१३९) 





तस्था ।¦ बीजपूरः सनारिङ्धः फल्डचान्येश्च भूरिशः 1! ६१ ।! ऋतुकालोद्धुूवे- 
` भूरिप्रकारेः कन्दमूलकेः ।। नमः क्िवाय चान्ताय पञ्चवक्राय श्लिने ।! ६२१ ` 
` नन्दिभृद्धिमहाका्गणयुकेताय शम्भवे ।1 क्षिवाये हरकान्ताये प्रकृत्यै सष्टिषटेतवे 
1! ६३ \\ शिवायं सवंमाद्धल्ये शिवरूपं जगन्मये \। रिदे कल्याणे नित्यं शिवसूपे ` 
` नमोऽस्तु ते ।। ६४ ॥! शिवरूपे नमस्तुभ्यं शिवाये सतततं नमः ।\ नमस्ते बरह्य- ` 
 चारिण्य जगद्धाच्यं नमो नमः ।\ ६५ ।। संसारभयसन्तापात्राहि मां सिहवाहिनि ।\ ` 
येन कामेन देवि त्वं पुजितासि महेश्वरि ।\६६।। राज्यसौभाग्यसंपात्ति देहि मामम्ब ` 
 पावंति ।। मन्त्रेणानेन देवि त्वां पूजयित्वा मया सह ।। ६७ ।! कथं शरुत्वा विधानेन 
 दद्यादघ्लं च भूरिशः \\ ब्राह्मणेभ्यो यथोक्षक्ति देया वस्त्रहिरण्यगाः ।! ६८ ।! 
अन्येषां भूयसी देया स्त्रीणां वै भूषणादिकम्‌ ।। भरा सह कथां श्रत्वा भवित- ` 
 थक्तेन चेतसा ।। ६९ 1! कृत्वा ब्रतेश्वरं देवि सर्वपापेः प्रमच्यते \। सप्तजन्म भवे- 
प्राज्यं सौभाग्यं चैव वद्धेते ।\ ७० । तृतीयायां तु या नारी आहारं कुरुते यदि \। 
सप्तजन्म भवेहन्ध्या वैधव्यं जन्मजन्मनि ।। ७१ ।1 दारिद्र पुत्रशोकं च कका 















इःखभागिनी ।1.पच्यते नरके घोरे नोपवासं करोति या ।। ७२ ।। राजते काञ्चने ` 


` ताम्रे वैणवे वाथ मृन्मये ।। भाजने विन्यसेदन्नं सवस्त्रफलदक्षिणम्‌ ।! दानं च 
 द्िजवर्याय दद्यादन्तेश््च पारणा । ७३ ।\ एवं विधि या कुरते च नारौ त्वया 















समाना रमते च भर्त्रा ॥। भोगाननेकान्‌ भुवि भुज्यमाना सायुज्यमन्ते लभते हरेण ` 
७४ ।। जहवमेधसहल्राणि वाजपेयशतानि च । कथाश्रवणमात्रेण तत्फलं ` 


। प्राप्यते नरैः ॥ ७५ ॥ एतत्ते कथितं देवि तवाग्रे व्रतमुत्तमम्‌ ।\ कोषियन्ञकृतं ` 





ब्रहि तृतीयायाः सुरेश्वर ।। भक्तितः श्रीतुमिच्छामि व्रतसंपूतिहेतवे ।। १ ॥ ` 
^ उवाच ।} उद्यापन्विधि वक्ष्ये ब्रतराजस्य शोभने ।। यस्यानुष्ठानमात्रेण 








पृण्यमस्यानुष्ठानमात्रतः ।। ७६ ।। इतिश्रीभविष्योत्तरपुराणे हरगौरीसंवादे 
हरितालिकात्रत, कथा संपूर्णा ।\ अथोद्यापन ।। पार्वत्युवाच । उद्यापनविधि ` 



















समये कृतस्नानादिकं च ।\ ९ ।। पूवेवच्चा्ंयेहेवीं पश्चाद्धोमं समाचरेत्‌ ।। 
वधानेन कृत्वाग्निस्थापनं ततः ।\ १० ॥! प्रारभेच्च ततो होमं नव~ 
।  ग्रहुपुरःसरम्‌ ।\ तिलांश्च यवसंमिश्वानाज्येन च परिप्लुतान्‌ ।। ११ ।। जुहुया ~ 
| मंत्रेण गोरीमन्त्रेण वेदवित्‌ \॥\ अष्टोत्तरशतं चापि अष्टाविशतिमेववा ।\ १२।। 
एवं समाप्य होमं तु तत्राचार्यं प्रयुजयेत्‌ \\ सुवभेरत्नवासोभिर्गा द्याच्च यथा- = 
विधि ।। १३ । श्यां सोपस्करा दद्यादाचार्याय प्रयत्नतः ।\ षोडङद्िजयुग्मानि 
सुपक्वान्नेदच भोजयेत्‌ ।। १४।\ सौभाग्यद्रव्य वस्त्राणि वंहापात्राणि षोडकञ।। दात- 
व्यानि प्रयत्नेन ब्राह्मणेभ्यो यथाविधि । १५ ।! अन्येभ्यो द्विजव्येभ्यो दक्षिणां च॒ 
प्रयत्नतः ।। भूयसीं परया भक्त्या प्रदद्याच्छिवतुष्टये ।! १६ ।! उदिश्य पावतीङं 
च सर्वं कुर्यादतन्दिता ॥ बन्धुभिः सह भुञ्जीत नियता च परेऽहनि ` 
।\ १७ ।। एवं था कुरते नारी ब्रतराजं मनोहरम्‌ ।। सौभाग्यमखिल तस्याः सप्त॒ 
जन्म न संयश्ञः ।! १८ ।। इति श्रीहरितालिकात्रतोद्यापनं संपुणम्‌ ।। 




































शतोनीको कवारी 



















रतानि = हवीटीकारहिति (१४९) 





उपवीत । तथा-अनेकरत्नोके साथ कंचुकौ ओर उपवस्त्रोको में देता हुं, जप ग्रहण करिये, हे पार्वति ! तेरे 
लिये नमस्कार है । इससे उपवस्त्र ओर कचु कौको । जिसमे कुंकुम, अगर, कपुर, कस्तुरी ओर चन्दन है ठेे ` 
 विकेपनको हे महादेवी ! मे भवितिभावके साथ समर्पित करता हं ।\ इससे गन्ध । तथा-घुन्दर अक्षत, करकमते | 1 
रे हृए हैः मेँ मक्तिभावके साथ सर्मात करता हं, हे पावेती ! प्रसन्न हो जा । इस संतरसे अक्षत । तथा- = ` 
हरिद्रा कुंकुम सिन्दुर जौर कज्जल्के साथ सौभाग्य द्रव्य ग्रहण करिये । इस म॑त्रसे सोभाग्य द्रव्य } तथा- १ 
 सेवम्तिका, बकुल, चंपक, पाटल, कमल, पु्लाग, जाति, करवीर ओर रसालके एूलोसे तथा बिल्व, प्रवाल, 
तुलसीदल ओर माल तीसे तेरा पुजन करता हूं : हे जगदीदवरि ! प्रसन्न होजा 1 इस संत्रसे पुष्प चने चाहिये । 9 
अब भगवतीके अंगोंका पुजन कहते हँ ओम्‌ उमायै नमः पादौ परुजयामि-उमाके लिये नमस्कार है पादोको 1 
यूनता हं । ओम्‌ गौय्ये नमःनंवे पु०-गौरीके लिये नमस्कार है जंधा्ओंका पुजन करता हूं इससे जवा ` 
तथा-गोम्‌ पार्वत्यै नमः जानुनी पु०-पारवतीके लिये नमस्कार है, जानुओंको पुनता हं, इससे जानु, तथा- ` 
` ओम्‌ जगद्धाच्यै नमःऊरू पू०-जगत्‌की धारण करनेवालीके लिये नमस्कार है ऊरुभोको पुजता हूं ! इससे ` 
। ॐर, तथा-अोम्‌ जगत्प्रतिष्ठाय नमः कटी पूजयामि-जगत्की जिससे प्रतिष्ठा हे उसके ल्यि नमस्कारै, 
, कटीको परूजता हं, इस मंत्रसे कटि, तथा-ओम्‌ शान्ति रूपिण्ये नमः । नाभिपुजयामि-शान्ति रूपिणीके लिये 
नमस्कार है नाभिका पजन करता हूं । इससे नाभि, तथा-भोम्‌ देव्ये नमः उदरं पुजयामि-दवीके किये नम- | 
स्कार है उदरका पुजन करता हूं इससे उदर, तथा-ओम्‌ लोकवन्दितायै नमः स्तनौ पु०-लोक जिसे वन्दन 
करता है उसके लये नमस्कार है, स्तनोका पुजन करता हुः इससे स्तनोंका, तथा-भोम्‌ काल्ये नमः कण्ठं - ८ 
 पु०-कालीके लिये नमस्कार है, कंठको पुजता हुं ! इससे कंठ तथा-भोम्‌ शिवाये नमः मुखं पुजयामि । शिवाके ` 
लिये नमस्कार है, मुखका पूजन करता हुं इससे मुख, तथा ओम्‌ भवान्यै नमने पु०-भवानोके लिये नमस्कार ` 
है नेत्रोका पूजन करता हूं । इससे नेत्र तथा-ओम्‌ रदरा्ये नमः कर्णौ पू ° -ददराणीके क्ये नमस्कार है, कानोका ` ` 
पूजन करता हं । इससे कान; तथा-अओम्‌ शर्वाण्यै नमः ललाटं प०-श्र्वाणीके लिये नमस्कार है! ल्लाटका ४ 
शनन करता हूं इससे ललाट, तथा ओम्‌ मंगलदाच्यै नमः किरः पू०-मङ्धल दायिकाके चिषे नमस्कार है 
इससे क्षिरकी पुजा करनी चाहिये ।। देवदुके रससे तयार किया तथां छृष्णागुरं भिलाया हज धूप मं लाया ` 
ह" हि भवानि! ग्रहण करिये ! इस संत्रसे धूप, तथा-तु सब देवोकी ज्योति ओौर तेजोका उत्तम तेज है ही 1 
| आत्माकी ज्योति ओर परंधाम है, इस दीपकको प्रहण करिये \ इस संत्रसे दीपक तथा-जिसम्‌ चार तरहका ५ 
स्वादिष्ठ अच छः रसोसे समन्वित तथा भक्ष्य भोज्य आदि विभागोमे विभक्त मौजूद है, एसे नेवेचको ग्रहण ` 
` करिये । इससे नैवेद्य, तथा-मलयाचलका चन्दन कपुरे साय धिसा हभ है, यह आपका सुन्दर करोढतनक ¦ ८; 
है । हे जगत्पते ! ग्रहण करिये ! इस मंतरसे करोदरतन, तथा-“इदं फलं मया देवि" इस संतरसे फल निवेदन, = | 
 तथा-“पूगीफलं महहिव्यम्‌” इस मंत्रसे ताम्बूल तथा-““हिरण्यग्भगभस्थम्‌'' इस मंत्रस दक्षिणा, तथा-पह 
व्र माणिक्य वैद्यं मुक्ता ओर विदरुमोसे मण्डित है, इसमे पुष्परागमणि लगौ हुई है इस भूषणको ग्रहण 
करिये । इससे भूषण, तथा-चोद, सुरज, घरणी, विच्युत ओर अग्नि तूही है, सब ज्योतिवालो तृही हैः आरतीको ध ४ + 
र निवेदन तक करना चाहिये \ अथ नाम पुजा-उमाके लिये नमस्कार, गोरीके 














स ~ 










































ब्रतराज. 





देता हूं । सोभाग्य ओर आरोग्य प्राप्त होने तथा सब कामोकौ समृद्धके लये एवं गौरी जौर गौरीकश्नकी प्रस- 
चरताके लिए तेरे बायनको दान करता हूं ! इन दोनों सन्नोसे दान करना चाहिये \\ पूजाविधि पूरी हुई ।। 
अथ कथा~सुतजौ शौनकादिकोसे कहते ह, कि, एकके अलक तो मन्दारकौ मालाओंसे अकलित हौ रहे हें तो 
दसरेका शेखर कथालोकौ मालासे अंकित हो रहा ह, एकके पास दिव्य चसन हँ तो एक विलकुल कपडा ही 
नहीं रखता, उन दोनों शिवा ओर किवजौके लिये नमस्कार है ।। १ 11 कंलास्से शिखरपर गोरीजी धिवजीसे = ` 
प रही हँ कि, जो गोप्यसे भी अत्यन्त गोयनीय गोप्य हो हे महेश्वर ! उसे मृज्ञे किये \\ २ ।६है नाय } | 
यदि जप प्रसन्न हों तो मेरे सामने कहो, जो सब धर्मोक्ा सर्वस्व हो, जिसमें परिश्रम थोडा ओर फल्यधिक 
हये ।! ३ ।। भने एेसा कौन सा तप, दान, ब्रत किया धा जो जाप जादि, मध्य तथा अन्तसेरहित्त एवम्‌ जग्तक्रे = 
स्वामी, मक्षे भतकि रूपमे प्राप्त हुए ।! ४ ।। दिवजी बोर-है देवि ! सुन मं तेरे जगे एक उत्तम तरत कहता ८ ५ 
हृ, वो मेरे सरवस्वकी तरह गोप्य है हे प्रिये ! में तुके कहुंगा ।\ ५ ॥ जैसे उड्गणमे चन्द्रमा, प्रहोमे सू्ये, वर्णोमिं ` 
ब्राह्मण, देवों मे विष्णु \\ ६ ।! नदियोमें यङ्का, पुराणोमें भारत, वेदोमें सामवेद, ओर इन्द्रियोमे मनक्रेष्ठ 
है ॥1! ७ ।। एसे ही यह पुराण वेदका सर्वस्व, जसा कि आगमने कहा है उसे एकाग्र मनसे सुन जसा कि, मने यह्‌ 
प्राचीन वनत्तान्त देखं रखा है ।\ ८ ।। जिस ब्रते प्रभावसे तुमने मेरा आधा आसनयाया, तुम मेरी प्यारी हौ 
इस कारण सब मे तुमे कहंगा \\ ९ 11 भाद्रपद शुक्ला हस्त संयुक्ता तृतीयाके दिन, उसका अनुष्ठान मातर 
करनेसे सब या्पोसे छट जाता है ।\ १०11 हे देवि ! सुन तुमने जो पहिले बडा भारी व्रत किया थानो सब 























कहग जेसा कि, हिमाक्यपर हु था \! ११ ।\ पा्वतीजौ बोलीं कि, हे नाथ ! सेने कंसे सब व्रतोका श्रेष्ठ 


षडे 





व्रत किया, हे महेश्वर ! यह्‌ सब 


ं आपसे सुनना चाहती हूं ।\ १२ ।। शिव बोले कि, एक हिमवान्‌ नामका 
दिष्य उत्तम पवत है, जो अनेक तरहको 













प्रप्त हुए . ॥ २० । मुनि शर्दूल नारदजौको जञलयुत्रीके देखनेकी इच्छ थो, हिमाक्य नारवजीको अध्य, 




















व्रतानि] क ध ॥ ` हिन्वीटीकासहित छ 1 ८: । 


४ ॥ किया था कि, महादेवको अपना पति बनाऊंगी पर पिताने कक जर ही कर दिया । ३२ \\ हे प्यारी सखि ! 
1 इस कारण अब मं देह परित्याग करूगी, पादेतीके एसे वचन सुनकर सखी बोली फि ।\ ३३ ।\ जिसको पिता = 
नहीं जानते उल वनको चखेगी, शिवजी पावेतीजीसे कहने लगे कि, एसा निश्चय करके तुमह तुम्हारी सखी ` 
 बनको ठे गयौ ।। ३४ ।\ आपके पिता हिमवानृसे अषको घर घर देखा कि, मेरी बेटीको देव, दानव ओर ` 
ष  किल्लरोमेसे कौन लेगया !। ३५ ।} मचे नारदके सामने सत्यकह्‌ दिया था अब विष्णको क्या दगा इस प्रकारक ` 
चिन्तासे मूच्छित होकर वे भूमिपर गिरगये ।। ३६ ।1 उस समय लोग हाहाकार करके भगे ओर बोरे कि, 
गिर्विर 1 च्छित क्यों हो रहे हो, बताभो तो सही ।। ३७ 11 भिरि बो कि, मेरे दुःलके कारणको सुनो, = 
मेरा कन्यारत्नं हूरलिया गया है, या तो उसे कालसरपने ला लिया है अथवा व्याघ्नने मार डालाहै\\३८१॥ 
नजाने बेदी कहां चली गई, कौन दुष्ट चुरा लेगया ? शिवजी पावेतीजीसे कहते हँ कि, इस प्रकार आपके पिताजी ` 
 . श्लोक सन्तप्त होकर, एसे कांपने लगे जसे कि, आंधीसे भारी वृक्ष कापा करता है ।! ३९11 ओर आपकोदेखल- = ` 
नैके कारण वन वन फिरने लगे जो कि, व्याघ्र भल्ल ओर रोहियोमे सोमे महाघनेहो रहेये।\ ४० 
| आष भी घोरवनमं सखियोके साथ घूमती हुड एक रमणीक नदीको देख उसके किनारेकी सुन्दर गफामे \\ ४११. | 
सखीके साथ घुस गयो, अश्नका परित्याग करदिया ! पा्व॑तीसहित मेरा बालका लिग स्थापित करके \ ४२।१ ` 
` पुजतेहुए भाद्रपद शुक्ला तृतीयाके हस्तनक्षत्रमे ब्रतादि करके, राच्रिको गानेबजानेके साथ जागरण किया _ 
 ॥१४३\। व्ररातजके प्रभावसे मेरा आसन हिलगया उसी समय मे बहां पहुंचा जहां कि, आप सखियोके साथ ` 
| विराजमान थीं \\ ४४ \। मेने कहा किः मे प्रसन्न हु, हे वरानने ! बर मांगना हौ सो भांग यह सुन पावती बोलीं 
। : : कि, हे महेश्वर ! यदि भाप प्रसन्न हं तो मेरे पति हो जाइये 11 ४५ ॥। मेने कहा अच्छी बात है फिर कैलास चला 
आया आपने इसके बाद प्रभातकाल नदीमे प्रतिमाका विसर्जन किया \। ४६ \! आपने सखियोके साथ पारण ` 
। किया तथा हिमवान्‌भी उस जगह चले अगे जो कि, आपकी गहावता महावन या ।! ४७।। वहां चारो दिशम ` 
को देख विह्वल हौ जमीनपर गिर गया, पीछे नदीकिनारेपर देखा तो दो लडकिर्यां सो रहीं है 1 ४८ ।\ उन्हे 
उठा गोदीमें बिठाकर रोने लगा कि, बेटियो ! सिह, व्याघ्र, सपं ओर भल्लृकोसे दूषित इस वनम कहासे ` _ ` 
आबेरीं ।\ ४९ ।\ यह सुन पार्वती जी बोखीं कि, मुञ्चे यह पता था कि भाप मुदे शिवजीको वेगे, पर जब यह ` 
पता चला कि, आपने अन्यथा किया है तो मे बन चली आई ।। ५० ।। यदि आप मुभे महादेवजीके लिये ` 




































प क सोभाग्यसिद्ध ल ६ ६ किया वो ब्रतराज आजतक भेने किसके सामने नहीं कहा ।\ ५३ । इन व्रतराजका नाम हरि- ` 
तालिका | क्यों पडा ? सो सुन ! आली सहेलियोने जिसका हरण किया इस कारण वौ तुमं हरितालिकाहृदं 
 ।} देवी बोली कि, प्रभो ! आपने यह तो मेरे हरितालिका इस नामका निवंर्चन किया, इस ब्रतका ` ५ ॥ ५ (८ 





व्रतराज 


तथा जगद्धाजीके ल्व नमो नमः है ।1 ६५ ।। हे सिहपर चढनेवालो संसारके भयके सन्तापसे मेरौ रक्षा कर, 

महेदवरि देवि ! जिस कामसे सेने तेरा पुजन किया है उसे पुराकर !\ ६६ ॥\ हे अंब ! हे पावेति ! वो 
राञय, सौभाग्य ओर सम्पत्ति दीजिये, इस मंत्रसे मेरा ओौर देवीका पुजन करके \\ ६७ ।। कथा सुने ओर 
विधानके साथ बाह्मणोको बहुतसा अन्न दे तथा शक्तिके अनुसार वस्त्र, हिरण्य ओर गऊभी कान करे \1 ६८ 11 
ओरोको भी बहुतसी दक्षिणा दे तथ स्त्ियोको आभूषण दे. भवितियुक्त चित्तसे पतिके साथ कथा सुने । ६९ ।, 

देवि इस प्रकार व्रतको करके सब पापोसे छट जाता है, सातजन्मतक इसका राज्य होता है तथा सौभाग्य 
बहता है \\ ७० 1) इसं तृतीयके दिन जो स्त्री आहार करती है वो सातजन्मतक अन्न, तथा जन्म २ विधवा 
होती है ।1 ७१ ।। यहो नहीं किन्तु जो उपवास नहँ करतीं वो दुःख भागिनी ककंशा हो, दारिद्र ौर पुत्र्लोकं 
देखती है तथा घोर नरकमं दुःखपाती है ।\ ७२ ।1 चांदीके सोनेके ताबेके कसिके अथवा मिह्ीके पात्रमे अस्र 
रख कर वस्त्र फल ओर दक्षिणाके साथ एक अच्छे ब्राह्मणको देकर पौर पारणा करे ।। ७२ 11 इस प्रकार 
जोस्त्री व्रत करती है वो तेरे समान पतिके साथ रमण करतौ है, अनेक भोगोको भोग कर अन्तम हरका 
सायुज्य पाती है ।\ ७४।। एक सहस्रं अद्वमेध तथा एकसौ वाजपेयका जो फल होता है बो फल कथाके 
सुनने मात्रसे मिल जाता है \\ ७५ ।। है देवि ! यह मेने तुमह कह दिया तथा उत्तम त्रत भी कहु दिया इसके 


करनेसे कोटि यज्ञका फल होता है \\ ७६ ।। यह्‌ भविष्योत्तरपुराणके हर गौरीको संवादपुवेक 





हमेन्दुतुहिनाभासां मुक्तामणिविभूषिताम्‌ ।। पाशाडकुकषधरां देवीं ध्यायेत्‌ ` 
सिद्धिदाम 11 कमण्डलधरां सूक्ष्मां पानपात्रं च विभातीम्‌ ।! ध्यायामि ॥ ` 


त्रिगुणे परमेकवरि ।\ आवाहयामि भक्त्या त्वां प्रसत भव 
देवि आसनं ते विनिर्मितम्‌ । पाल्ाडकुशधरा 
धारिणि ।। 


मया देवि दुकूलं तव निमितम्‌ ।। भक्त्या समपितं मातगृ ह्यं 
। हि ` सिन्दूरं कज्जलान्वितम्‌ ।। सौभाग्यद 





व्रतं वक्ष्यामि कन्यके । मासि भाद्रपदे कृष्णे तृतीयाय १ 
रीं ्ाखाम्‌लफलैः सह ।। रगिणीवृक्षं समूलमानयेत्‌ ।! निक्षिप्य देवतां 
सिकतां श्च॒भाम्‌ ।। २ ।! न्यसेच्चनद्रोदयं दृष्ट्वा स्नात्वा धौताम्बरा- 
वता ।! सखीभिः सहिता सम्यगलंकृत्य प्रपुजयेत्‌ ।\ ३ ।\ गोरीमावाह्य विधिव- 
त्सिकतामण्डले शुभे ।\ गन्धपुष्याक्षतैरिव्यैर्धृषदीपे रनेकशः ।। ४ ।! सर्वोपचार- 
युक्तां पञ्चभिर चंयेत्‌ । एवं पुज्य यथाशक्त्या कृत्वाचेव प्रदक्षिणाम्‌ 

न दोरकं कण्ठे 


त्वदधकत्य बदूक्त्या त्वत्परायणा ।! ६ ।। आयुर्देहि यशो देहि सौभाग्यं देहि मे शिवे ॥। 


अनेन दोरक बद्ध्वा चनद्राया्यं समपेयेत्‌ ।॥७।। क्षेमसंपत्करे देवि सर्वसौभाग्य 
दायिनि ।! स्वंकामप्रदे देवि गृहाणाध्यं नमोऽस्तु ते । ८ । गगना ङ्णसंदं 


मेतां च श्युणुयाद्गौ्तरे तन्मनाः 









च विधिवन्मोनी भूत्वा व्रतं चरेत्‌ ।\ २५ 1। सर्वसंपत्करं चैव स्त्रीणां पुतराचरसौर्य- ` 
हरण्यादिदानानां सर्वेषामधिकं ब्रतत्‌ । २९ ॥ पञ्चवषं विधातव्यं 


















-इक्त्या सौवर्णं बृहतीफलम्‌ ।। षष्टचुत्तरचतुरभिश्च शुभेबीजिर्युतं तु तत्‌ ॥॥२८।। 
व्याः पुरस्तु संस्थाप्य पूरववत्प्रतिपूजयेत्‌ ।\ आचाय पूजये डूक्त्या विप्रान्‌ पञ्च ` 
तथैव च ।। २९ ।। सुवासिन्यः पञ्च पज्या वस्त्रालंकारभूषणैः ।\ कचुकंश्चेव ` 
ताटंकैकण्ठसुतरेहेरिव्रया ।३०।। वंक्षपात्राणि पञ्चेव सूत्रैः संवेष्टितानि च ।) सिन्दूरं ` 
जी धूमपिष्टजातं च बुहतीफल्पञ्च- 







हू \ इस मत्रसे स्नान, तथा- 
गौत वस्त्रका दुकूल, आपके लिये बनाया गया है, म भक्तिभावसे सर्मपित करता हः है जगदम्बिके मातः 
ग्रहण करिये । इस मंत्रसे वस्त्र, तथा हरिद्रा, कुंकुम तथा कज्जल सहित सिन्दरर ये सब अन्य सौभाग्य दरव्योके 
साय हे परमेश्वरि ! ग्रहण करिये \ इस मंत्रसे सोभाग्य द्व्य, तथा पांच सत्रका बनाया हुजा डोरा अपेण कर 
दे, हे देवि ! मख्याचल्पर पेदा हआ सुगन्धित सुन्दर घनसार उपस्थित है, ग्रहण करिये हे बृहद्गौरी ९॥ 
नमस्कार है 1 इससे गन्ध, तथा शुभकरवीर,. जाति, कुसुम, चंपक, बकुल, शतपत्र ओर कहलारोसे 


ए है न सबके सूघनेलायक है, देवद्र्‌ मके त त रसते बनाया है । (8 इससे धूप, द तथा-हे तीनों लोकोके 
वाली वेशि ! जलायेहुए्‌ दीपकको ग्रहण कर, है बृहद्‌ गोरी ! तेरे चि नमस्कार है । 























सुनो । पहिले छृतयुगके आदिमे सब प्राणियोके हितैषी ।। १४ ॥ शंभुने यहं व्रत गौरीके ल्य कहा था, 
उसे कहता हु" कभी बटहुए शिवजीसे पावंतोजीने पुछा था ।। १५ ।! हे कररणाकर ! शंकर ! शंभो ! मेँ 
आपसे पुती हं कि, सब बाधाओंको शमन करनेवाला तथा सभी इच्छामोको पूरी करनेवाला । १६. 


सब देनेवाले बरतो जो सर्वोत्तम त्रत हो सो कहिये \ बो आयु,आरोग्य तथा पुत्रःपौतरोका देनेवाला हो ।। १७१ ` ॥ 






अत्यन्त गोपनीय परमदुरलभ त्रत सुनाता हं ! पहिले द्वापरके अन्तमें पाण्ड्की प्यारी सुन्दरी सोलह वर्षंकी 
अवस्थावाली नवीन यौवना कुन्ती सन्तानके न होनेके कारण पतिसे बोली कि,कौनसे कर्मं विपाकके कारण 
दुःखी हू \\ २० ॥ इस दोषका प्रतीकार यथाथं रूपसे कषिये।यह सुन पाण्डुराजा बोक्ते 













॥ 








उठकर नित्य 


॥ ३२३1! इसके बाद प्रातःकाल 





ततान 


(१५०) 

पड्गवः।। दुःशीला दुभा दीनाः परक्मकराः सदा ।। ३ ।। एवं मे हृदि सन्तापं संशयं 
छत्तमहंसि ।, ब्रह्मोवाच ।। भ्टणु वत्स प्रवक्ष्यामि त्वंभवतोऽसि प्रियोऽसिमे \\४॥। 
। जायन्ते सुरूपाः सुखिनो 


चैव अभक््याणां च भक्षकाः ।। ७ ।। मल्लो नरकान्‌ भुक्त्वा जायन्ते कुत्सिता 
नराः ।! दरिद्राः पड्धवो मूकाः काणादा दुभेगास्तथा ।\ ८ ।। नारदवं स्वकर्मोत्था 
नरा नार्यश्च दुःखिताः नारद उवाच ।। उपायं ब्रूहि भगवन्येन कर्मक्षयो भवेत्‌ 


।} ९ ।। तपो दानं व्रतं तीर्थं शरीरस्य च शोषणम्‌ ।। दुःखसन्तापतप्तानां जीवितान्म- 
रणं वरम्‌ ।। १० ।। ब्रह्मोवाच श्रृणु नारद यद्‌ गृह्यं त्रतानामुक्तमं व्रतम्‌ ।। सव- 


इःलप्रशमनं व्याधिदापि रे्रनारनम्‌ 9, ।। सुखसोभाग्यजननं पुत्रपौत्रप्रदाय 


।। सुरूपदं च सौभाग्यकारणं 
















( 1 ३० ॥। ब्रह्मोवाच ॥! बरतस्यारम्भणं चादौ मागंशीषेऽथ माघके ।। दवितीयावेध- ` 
रहिता तृतीया याऽसिता भवेत्‌ ।\ ३१ । । चतुर्थी योरि गनी किचिच्छदा वापियदा 
` भवेत्‌ ।\ उपवासं प्रकुर्वीत दन्तधावनपूर्वकम्‌ ।। ३२ !\ अयामा्गेण कुर्वीत दन्त- ` 
शुद्ध तदा व्रती \\ उमे देवि नमस्तुभ्यं शंकरस्याद्धंारिणी \। ३३ ।\ नियमन्तरः \\ 
परसीद श्रीमहेशानि करिष्ये व्रतमुत्तमम्‌ ।! सान्निध्यं कुर मे देवि व्रतेऽस्मिन्‌ हर- 






























पुष्यश्च सभ्युज्या दाडिमं चाघ्यहेतवे ।। 
। सर्वासु च ततीयासु विधिरेष उदाहृत 





लावण्यसुभर्गाथनी ॥ ५७ । मल्लिकाकुसुमेः 


सुन्दरीं पुजयेत्ततः ।\ ५८ ।। : 
पीत्वा लावण्यसुभगा 


।। प्रातरुत्थाय 


।। ६० ।। नियमं तत्र कुर्बोत 


|} ६३ ।\ श्रावणे मासि संप्राप्ते 


ज्ञोभनैः ।\ ६४ ।। 


0 01 


१, १ ॥.. 
विः 








 दुभग्यि श प तथा सदा दूसरेके काममें लगे रहनेवाके आपके ही बने हुए हँ \। ३।। यही मेरे हव्यम संताप है 

कि, आपके बनाए हए एसे क्यों हो गये हँ? आप मेरे इस संदेहको भिटाकर मक्षे शांति प्रदान करिये । इतना ` 

सुनकर ब्रह्माजी कहनेलगे किं, हे वत्स ! तुम मेरे प्यारे भक्त हो, इस कारण मं तुम्हं सुनाता हं, तुम सावधान 
होकर सुनो ।\ ४।। यह पञ्चभूतों से बना हुभा शरीर कर्मरूपी बीजका पौदा है, जिन्हे शः 

सुन्दर ओर सुखी होते हं ।। ५॥। तपके प्रभावसे बली ओर सुभग होते हँ पर जिन्होने दान नहीं दिया है 
इसरोको नौकरी करकेही अपना जोवन बिताते हं ।\६ । इसरेकी बुराई करनेवारे, दूसरेके घनको हरने- 

वादे, प्राणियोके मारनेवारू एवम्‌ अभक्ष्यफे खानेवाले धणित जीव ।\७।! अपने २ | र नरकरोको 


इस कारण ये प्राणी अपने २ कर्मोसि एप ली हो रहे ह । इतनी सुनकर नारदौ महाराज ब्र्माजीसे कहने 
लगे कि है भगवन्‌ ! कोई एसा उपाय बताइये जिनसे इन दुःखी जौवोके अशुभ कर्मोका | 


लगे कि, हे महाराज यह तो बताये 


1 





ले दियाही नहीं थाइसकारण इसे इसं त दियाहौ नहं या.इसकारण इसे इस योनिम मोगनेके लिये भौ कुड न मिला, पर शरत प्रायसे सुर योनि भोगनेक {लये मौ कु न मिला, पर ्रतके प्रभावसे सुरूप 
ओर पतित्रता हुई ।\२७।। महासौभाग्यसे संयुक्त यह ॒एेसौ मालूम होती थी मनो दूसरी लक्ष्मी है 


र णः ( 


।\२८।। हे देवषं {† यह्‌ सब कामोकाफल देनेवाला है । नारद बोर कि, इस व्रतकी विधि किये, कैसे 
।\२९।। कौनसे मासमे करना चाहिये कौन इसका देवता है, इसका पुण्य क्या है, नवेद कौन २ 





।। ६४ ।। सरवेदवय्यंसंपस्न सौभाग्य सुर्दरीका पूजन करना चाहिये 
।। ६५ \। कदली फलका अघं दे, राजतपयका प्राहान करे; इस त्रतके प्रभावसे 


।1७५।। अखरोटके ¦ 
पति, भाई ओर पुरोके वियोगको कभी 
पे । जो सव शास्मोका पाहः 


1. ^ ५ 
लि ५९ | ह 


५ प 
प 





| 
1, 9. 
1 पा ॥ 4 


1 


































सुशोभितः 1! मया निवेदिता भक्त्या गृहाण गणनायक ।। अक्षतान्‌ 11 सुगन्धि. 
च गृहाण गणनायकं ।\ विनायक नमस्तुभ्यं शिवसूनो नमोस्तु 
माल्यादीनि सुगन्धी० तस्मादश्वा विघ्ननाशिने नमः पुष्पाणि 

























कष्ठेपु० । स्कन्दाग्रजाय० स्कन्धौपु० । पाल्ञहस्ताय० 
ध प° । गजवक्राय वक्रपु० । विष्नहत्रे° ललाटपू° । सवेरवराय० शिरः पुज: 


म । श्रीगणाधिपाय० सर्वाद्धपु 

















न्यघनाशन । आनीतानि 


४ 
1 








।। चतु््ये° अर्ध्यम्‌ ।। वायनमंत्रः-विप्रवयं नमस्तुभ्यं मोदकान्वे ददाम्यहम्‌ ।। 
रकान्सफलान्पञ्च दक्षिणाभिः समन्वितान्‌ ।। आपदुद्धरणार्थाय गृहाण ष्िज- 
सत्तम ॥! प्राथेनाअबुद्धमतिरिक्तं वा द्रव्यहीनं मया कृतम्‌ ।। सत्सवं पुणंतां यातु 
 विप्ररूप गणेकवर ।। ब्राह्मणान्‌ भोजयेहेविं यथाच्रेन यथासुखम्‌ ।) स्वयं भुञ्जीत 
पञ्चेव मोदकान्फलसंयतान्‌ ।) अशव्तषश्चकमन्ं वा भृञ्जीत दधिसंय॒तम्‌ ।। 


अथवा भोजनं कार्यमेकवारं हिमागजे \! प्रतिमां गुरवे दद्यादाचार्याय सदक्षि- 
मन्त्रमिमंजपेत्‌ ~ नमो .हरम्ब मदमोहित 


मेकवि्तिवारं जपेत ।! विसजस- 














। संकष्ट चतुरथौब्रत-श्नावण कृष्ण चतुथोकि दिन संकष्ट चतुरथौका व्रत होता है इस त्रतको 4: 
करना चाहिये जो कि चनद्रभाके उदयम व्याप्त हो । क्योकि, संकट चतुर्थीकी त्रतकथासे, श्रावण शुक्ला चौथको ` ८ 
` चन्द्रमा उदय होने पर गणेशजीका पुजन करके चन्द्रमाको धं देना चाहिये 1 यह चन्द्रोदय व्यापिनी ` 1 
` चतुर्थो वतक पूजाका विधान किया है ! यदि दोनों ही दिन चन्द्रोदय व्यापिनी हो तो तृतीयासे विद्ापू्वा ` 
| चाहिये क्योकि गणेदवरके द्रतमे मात्‌ (तृतीयासे) विद्धा ग्रहण कौ नाती है यह्‌ वचन मिलता = ` 














व्रतकं विधि कहते है-सबसे पिके संकल्प करना चाहिये मास, अः 
पुत्र, पौत्र, प्रप्तिके छ्ये तथा समस्त रोगोते मुक्त होनेके लिये श्नीगणेदाजीकी प्रस्नताके लियेः 
। मे करता हूं तथा पहिले स्वस्तिवाचन गणपति पुजन एवम्‌ कल्शका 










पाप या दुःखोके दल- नीलकण्ठ 
दविराडजायत विराजो" इस संत्रसे तथा उमासुताय नमः आचमनीयं समपये उमादुतके 


नाथ हे मूषकवाहन ! मे आपकी प्रसन्ताके 
सहत मि हुए हें आप ग्रहण 


स्नान कराता हं इसे कह कर शुद्धजलसे स्नान कराना चाहिये । “रक्तं वस्त्र, है लम्बोदर 
देवताओंकोभी दुलंभ इन सुन्दर लालरद्धवाल भव्य दोनों वस्त्रोको धारण करिये इस्‌ २ 
इस मत्रसे तथा शपेकर्णाय नमः । वस्त्रं परिधापयामि सूरपकणेके लिये प्रणाम 


[। ०५८५८) 
ध 
( 











हाथौके 
पुजयामि-विघ्नोके नाञ्च करनेवालेके लिये नमस्कार है रुलाटका पजन करता हूं । इससे रला, तथा-भोम्‌ 


सर्वेदवरायः नमः शिरः पुजयामि-सर्वेदवरके ल्यं नमस्कार ह । शिरका पुजन करता हूं \ इससे शिर, तथा~ ` 
पुजयामि भीगणेशजीके लिये नमस्कार है सब अंगोका पूजन करता हूं, इससे 










इस संत्रसे एवम्‌ विकटाय नमः, धूपमाघ्रापयामि विकटमूति गणपतिके लिये नमस्कार है, धृपका गन्ध अपित 
करता हँ इससे धूप देना चाहिये । “स्वजन सर्वेरत्नाठच'' हे सर्वज्ञ हे सब प्रकारके रत्नोसे सम्पश्च है सके 























वाङ ताम्बूलको ग्रहण करिये इससे तथा विघ्नहरं नमः मखशद्धचथं ताम्बलं समर्पयामि विष्नोके रहनेवारके 
ताम्बल समर्षणकरे । “सवेदेवाधि” 





मिनित 1 पिद 
[क = = न = = (न स 


है । ृष्णपक्षकी चौथके दिन चन्द्रमाके उदय हौ जानेषर पूजन करके शीष्नही प्रसन्न कर लियाहै, है देव 
अघं रहण करिये. आपको नमस्कार है \ यह अधं संकटहर गणेराजीके लिये मेरा नहीं ह । पौर चतुर्थीकोभी 
. अघं देना चाहिये कि, हे चतुथ ! तुम तिथियोमं श्रेष्ठ हो, तथा गणपतिजीकी अयन्त पियारी हो इस कारण 
भै अपने संकटको निवत्तिके लिये आपको प्रणाम करता हुञा अर््यदान करताहूं । फिर दक्षिणासहित फल ` 
मोदकोका वएयना आचार्यक लिये देवे ओर 'विप्रवयं नमः इसको पदे, इसका अथं यह्‌ है कि, 


मन्त्रसे आचा्यको साञ्जलि प्राथना करे फि, मने जो विना जाना, या विना कहा हु किया वह या जितने 
द्रम्यकी जरूरत थी उस दरव्यसे श्ून्यजो इस ब्रतानष्ठानको किया है, उससे जो तरुदियां होगयी हो, बे सब नष्ट 
हो जौर हे ब्राह्मण आचायं रूपी गणाधीड ! आपको पासे वह सब ब्रतनृष्ठन सम्पु्ण॑ताको प्राप्त हौ 

श्रीगणपतिजी अपने मातासे कहते हं कि, हे हिमालय नन्दिनी हे देवि ¡ यथाविहितं अथवा जैसा समयपर 
तयार किया कराया हौ इस अन्नसे शान्तिपूवंक आनन्दके साथ ब्राह्मणोको भोजन करावे, त्रतकरनेवाला फल 
एवं पञ्च मोदकोका भोजन करे, त्रत करनेवाला असमं होतोदधिके साथ किसी भी एक अन्चका भोजनं 
करके अथवा एकवार भोजन करके ही व्रतानुष्ठान करे । फिर गणेशजीकी मति ओर दक्षिणा तथा वस्त्र 


मोहजन्य संकटोसे बचाओ बचा 1 तदनन्तर गच्छ गच्छ" इस मन्त्रको पठता हुआ अक्षतोको पुजा स्थानम 
गेरे भर पुजाकायंको समाप्त करे, इसका यह अथं है कि, है सुरश्रेष्ठ ! हि गणेदवर ! आप अपने स्थानम 





















कथयस्व पुरातनम्‌ ।। ११ ।। तच्छ त्वा पाव॑तीवाक्यं संकष्टतरणं व्रतम्‌ ॥। प्रीत्या 
कथितवान्‌ देवो गणेशो ज्ञानसिद्धिदः ।\\ १२ । गणेश उवाच ॥! श्रावणं बहुलं 

पक्षे चतुर्थ्या तु विधुदये ।\ गणेन्ञं पुजयित्वा तु चनद्राया््यं प्रदायेत्‌ \\ १३ ॥ 

` पार्वत्यवाच \! क्रियते केन विधिना कि कायं कि च पुजनम्‌ ।। उद्यापनं कदा काय 
मन्त्राः के स्युस्तु पूजन ।।! १४ \ कि ध्यानं श्रीगणेशस्य गणेश वद विस्तरात्‌ 
।\ गणेका उवाच ।। चतुर्थ्या प्रातरुत्थाय दन्तधावनपुवंकम्‌ ।! १५) ग्राह्यं व्रतमिदं ५ 
पुण्यं संकष्टतरणं शुभम्‌ 1 कर्तव्यमिति संकल्प्य ब्रतेऽस्मिन्‌ गणपं स्मरेत्‌ ॥ १६।। 
ह स्वीकारमन््रः-निराहारोऽस्मि देवश्च यावच्चन््रोदये भवेत्‌ ।। भोक्ष्यामि पूजयि- 
त्वाहं संकष्टात्तारयस्व माम्‌ ।। १७ 1! एवं संकल्प राजेनद्र स्नात्वा कृष्णतिलैः 
शुभैः \। आलकं तु विधायैव पड्चात्पुज्यो गणाधिपः \! १८ ।। त्रिभिमपिस्तद 
























| षस्तद- 
देन तृतीयांशेन वा पुनः \\ यथादाक्त्या तु वा हैमी प्रतिमा क्रियंते मम ।! १९ ।। 
शुभा ।। २० ।! वित्तज्ञाठयं न कर्तव्यं कृते कायं विनश्यति \! जलपुणं वस्त्रयुतं 

























यावज्जीवं तु वा वर्षाण्येकविहतिमेव वा ।। २३॥।। 
प वा ।\ उद्यापनं तु कतव्यं चतुर्थ्या 






संकष्टहरणे तिथौ ।\ गाणपत्यं तथाचायं स्वेशास्नरविशारदम्‌ \! २५।। 








कमै. £+ 


पूजयेद्‌ गोहिरण्याद्यहुत्वा 


घोडा वै स्मृताः ।। ३७ । एकदन्तः कृष्णापिद्धो भालचन्द्रो गणेदवरः !! गण- 
पर्चेकाविशदच सवं एते गणेदवराः ।\३८।। दुगोपिन्द्रश्च सद्रश्च कुलदेव्याधिकं भवेत्‌ 


नादानम्‌ ।। ४१ ।। व्रतेनानेन सा प्राप महादेवं पाति स्वकम्‌ ।! तत्कुरुष्व महाराज 
व्रतं संकष्टनाहानम्‌ ।। ४२ ।\ चतुर्थ संकटा नाम स्कन्देन कथिता ऋषीन्‌ । 


षणकामेन कृतं वायुसुतेन च ।। संकल्प दृष्टवान्सोऽयं सीतां रामभ्रियां पुरा ।\५ 


पुत्रमाप्नोति रोगी रं 


\ 




















मेही 





सुनकर ज्ञात ओर सिद्धि देनेवार गणेशजौ परमप्रसन्नताके साथ, संकष्टतरण नामके अपने व्रतको कहने खगे 
॥ १२ ॥1 श्रावण कृष्णा चौथके दिन चतुर्थीमेही चन््रोदय होनेपर गणेश्रजीका पुजन करके चन्द्रमाको अघं 








पुजन करकेही भोजन करूंगा, आप मुस्े संकटोसे पार लगा देँ ।। १७ ।। भगवान्‌ कष्ण युधिष्ठिरजोसे कहते 
आदिक कमे करके पीछे गणपतिका पुजन 


हे कि, हे राजेन्दर 1 स्नानादिसे निवृत्त हो, शुभ काल तिलोसे आ! 
करना चाहिये 1 १८ । गणेशजी पाव॑तीजीसे कहते हँ कि, तीन मासेकी, डेढ मासेकी अथवा एक मासेकौ 


















दिक महषियोसे बोले दिः, है द्विजो ! राज्यकी गिदव हनो! पानो धमति महायान वित ~~ इच्छासे महाराज युधिष्ठिरे इस ब्रतको किया 


था इसी 
वरते प्रभावसे युदधमे वैरियोको मारकर अपना राज्य पा लिया था ।। ४४ । इस कारण सबको प्रयत्न पुवेक 


इस्‌ त्रतको करना चाहिये, जिससे धर्म, अर्थ, काम ओर मोक्ष मिल जायें ।। ४५ ।। हे ब्राह्यणो ! जो सभी काम ` 
अर्थो सिद्धि देनेवाले इस ब्रतको करता है वो वांछित एलको पाकर अन्तमे गणपतिपनेको पाजाताहै ।\ ४६। 
है ब्राह्मणो { जब जब मनुष्योको बडा भारी कष्ट प्राप्त हो सबको उस समय संकटचतुर्थीका व्रत करना ` 
चाहिये ।। ४७ ॥। त्रिपुरको मारनेके लिये शिवजीने इस ब्रतको किया था तथा तीनो लोकोकं चाहने. 
तरार इन्धने इसी व्रतको किया था ।। ४८ ।! जब रावणको बाछिने बाँध लिया था, उस समय रावणने भी 


इ सौ व्रतको किया था उसने भगवान्‌ गणेशजीकी कृपासे फिर अयना राज्य पालिया था।\ ४९।। 
पत्ता पा जाऊ इस इच्छासे इस व्रतका संकल्य हनुमान्‌जीने किया था इसके ही प्रभावसे वो 


लगासके !। ५० ॥। हे ब्राह्यणो ! नलका पता पानेके च दमयन्तीने भी इसी ब्रतको किया था, उसने 7 पवित्र | 


यशवाल नषध नलको पति पाया ।\ ५१ ॥ अहल्याने भी प्राणवल्लभ गौतम प्राप्त किया था! इस ब्रतसे 


विवात्थौको निद्या, घनार्को धन तथा सुपुर्ीको पुत्र ओर रोगीको आरोग्यक प्राप्ति होती है \\ ५२॥ 
यह भरस्कन्दपुराणका संकष्टचतुर्ोका ब्रत पुरा हुआ ।! 4 | 


दुर्वागणपतिव्रतम्‌ 











उमासुताय देवाय कुमारगुरवे नमः \\ लंबोदराय वीराय स्वैविष्नौघहारिणे ॥\ 
| द्धमलसंभूतो दानवे(नां वधाय वे ।। अनुग्रहाय लोकानां स 
दीपं तुभ्यं प्रदास्यामि महादेवाय ते नमः \\ दीपमन्त्रः \। गणानात्वा ° सादनम्‌ ॥। 
 उपहारमन्त्रः ।। गणेहवर गणाध्यक्ष गोरी पुत्र गजानन ।! व्रतं संपणतां यातु 
त्वत्प्रसादादिभानन ।। प्राथनामन्त्रः ।। एवं संपुज्य विध्नेलं यथाविभवविस्तरः । 
सोपस्कारं गणाध्यक्षमाचार्याय निवेदयेत्‌ ।। गृहाण भगवन्ब्रह्मन्‌ गणराजंसदक्षि- 


र्वागणयतित्रत-श्रावणके महीनामें अथवा कातिकके महीनामे शुक्लयक्षको चतु्थकि 


हुई भी स्त्र स होजाय १ राजपुत्र अपने | 
¦ होकर सबसे अधिकं होजाय । 





हु, इसलियि आपका आवाहनं करता हुं, मेरी पुजा स्वीकार करनेके छ्य आप पधार मै उसके लिये प्राथना 
करता हुं, हे परमेहचर । आप मेरेपर प्रसन्न हों । यहं आवाहन मंत्र है) हे उमासुत । हे सवे व्याप्त रहनेवाङे ! ` 


है सनातन ! आपके लिये प्रणाम है, आप मेरे कार्योमिं जो जो विध्न उपस्थित हो, उन सब विष्नोके पुञ्जोको 


हो 


सन्त्र है । हे भगवन्‌ । आप गणोके ईहवर, विजय करनेवाके, पावतीके पुत्र ओर जगत्‌की उत्पत्ति करनेवाले 

हं, आपकी प्रसन्नताके लिये दिव्य गन्ध समपित करता हूं आप इस गन्धको स्वीकृत करे ४४ इससे गन्ध, तथा- 
विनायक, शुर, वरदेनेवाले, उमाके नन्दन, स्वामि कातिकेयके बडे राता, समस्त वि 

करनेवाले बीर लम्बोदरके लिये प्रणामहै, आप सुगन्धित पुष्य ओर दूवकि अकु रोको स्वीङृत करिये । इससे 

पुष्प तथा उमा (पावती ) के शरीरसे गिरे हुए मेलसे जिसका अवतार, लोकोके कल्याण एवं दानवोके संहारे 

व्ये हमा है बही सब जगत्‌को धारण करनेवाला देव मेरी रक्षा करें । इसे धूप, तथा हे सब प्राणियों 

देनेवाके आप, परम ज्योति स्वरूपका प्रकाश करनेवाले महादेव हँ आपके ले प्रणाम है में आपके 


परिपुणं आपके इस वचनसे यह मेरा किया हुआ दूर्वा 
हो, यह दानका मन्त्र है जथवा जिस किसी भी महीनेक -शुक्लपक्षवाली चतुर्थौ 
उसी दिन जितेद्रिय हो हर्वागणपतिके व्रतको करे, प्रकारहइस 
सोद्यापन व्रेतका करनेवाला, इस रोकमे वाञ्छितपदार्थोको तथा देहके अन्तमें शंकरे पदको पाता है, तीन 
वषंतक इस्‌ व्रतको करनेसे सब सिद्धियां मिल जाती हे । जो विना उद्यापनके इसव्रत को करना चाहे, हे षडानन! 





जञ गीर्वाणयरिपूजित ।। आवाहनम्‌ ।। स्वर्णोसिहासनं दिव्यं नानारत्नसम- 
त्वतम्‌ ।। समर्पितं मया देव तत्र त्वं समुपाविज्ञ ।। आसनम्‌ ।! देवदेवेश सवेश 


` मार्यं सफलीकुरुष्व ॥ अर्घ्यम्‌ । गङ्खदिसवेति्थेभ्य आनोतं तोयमुत्तमम्‌ ।। 
विभो । आचमनम्‌ ।! चम्पकाशोकबकुल- 


स्नानम्‌।।कामघेनुसमुद्भूतं सर्वेषां जीवनं परम्‌।।पावनं यज्हेत्व्थं पयः स्नानार्थम- 


स्नानम्‌ ।। सर्वेमाधू्यताहेतुः स्वादुः सवेभ्रियंकरः ।! पुष्टि 


गुडः ।। गृडस्नानम्‌ ।। कास्थे कास्थेन पिहितो दधिमध्वाज्यसंयुत 


नीतः पजाथे प्रतिगृह्यताम्‌ ।! मधुपकंम्‌ ॥' 
॥ सुवासितं गृहाणेदं सम्यक्स्नात सुरेश्वर 

























= पत्रं स०। इभवक्राय० शमीपत्रं स० । विकटाय रपत 
। ठ 9 (इवत्थपत्रं स० \ कपिलाय ° अकंपत्रं स ° । बटवं नमः चपकपत्रं स ० । अभयप्रदाय 
















` वक्रतुण्डाय ० । शूर्पकर्णाय ° । कुब्जाय ० विनायकाय ० । 





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ङ्ध गग्गुलं धूपं सर्वसोग्ध्यकारकम्‌ \! सर्वपापक्षयकरं 





सुपक्वेदच भजितेर्वटकयुतम्‌ ।। मोदकापुपलडडकराष्कुलं 





द्िजब्रह्योशानमह 


शानमहेन्दरक्लेषगिरिजागन्धवेसिद्धेः स्तुत ।। सर्वारिष्टनिवारणेकनिपुण 










































सब प्राणियोको जिलानेवाला तथा पचिच्र करनेवाला एवं यज्ञके योग्य है, जापको स्नान करनेके किए इसे 
लाया हं, आप अपने स्नानके लिये स्वीकार करिये । “पयसस्तु इस मन्त्रसे दधिस्नान करावे, इसका अथेयह्‌ 
है कि, हे देव ! इूधको जमाकर यह दवि तैयार किया है, इसमं त्ीतलता उत्पन्न करनेवाङे पदार्थोकिं ‹ मे मिलाया 
है, इस प्रकार बहुत उत्तम यह दधि, आयके स्नानाथं लाया हू, आप इसे स्वीकृत करं । “नवनीतम्‌” इससे 
घतस्नानकरावे, इसका अथं यह है कि; मक्नसे निकाला हुजा सबकी तुष्टिकारक एम्‌ यज्ञका साधनभूत यह्‌ 
आपके स्नान करनेके किए सर्मापित करता हूं । “धुष्पसार'' यह सधुसे स्नान करानेका मन्त्र है } इसका अथं 
यह है कि, मक्खि्योने पुष्पोसे जिस सारको निकालकर इकट्ठा किया था, जो किं सबको संतुष्ट करनेवाला 
है वह सहत आपको स्नानाथं स्मपित करता हूं" “द्षुरस"" इससे शकं रास्नान करावे, इस मन्त्रका यह्‌ अथं 
है कि, आपके मेलाको दूर करनेके लिये इस ईखके रसकौ बनी हुई शकंराको अपित्‌ करता हूं, आप ग्रहण 
। “स्वमाधु्य” इस संत्रसे गृडसे स्नान करावे, इसका अथं यह है कि, सब पदार्थोमि मधुरता उत्पन्न करने- 


ईखके रससारका बना हुआ पुष्टिकारक यह गुड आपको स्नानकराने 


































घृतसे संयुक्त, यह मधुपकं आपके परुजनके लिये लाया हूं, आप इसे स्वीकृत करे, इस सन्त्रसे मधुपकं प्राशन ` 
करावे । “सर्व॑” इस सन्त्रसे शद्ध स्नान करावे, इस मन््रका यह अथं है, कि, हे विभो ! यहं जल सब तीथेसि ` 
लाकर सुगंधित किया है-हे सुरेश्वर ! प्राना करता हं कि, आप इसे अद्धीकृत करके भलीभांति स्नान 








लाल च्दनको लगाता हूं, आप कृपाकर 
जगदीद्वर ! लाल चन्दनसे रगे हुए 





717 
( 


के लिये नमस्कार है, देवदारुके पत्त चढाता हूं \ भालचनद्रके लिये नमस्कार है, अगरूके पत्र सर्मपित करताहूं । 
हैरम्बके लिये नमस्कार है सफेद बके पत्ते चढाता हूं । शुपकणेके लिये नमस्कार है, जातीके पत्नोको समपित 


गजाननके लिये पुष्पेण करता हं \ ये इक्कीसों नाम प्रायं : वेही हः जो पत्र जामे आचुके हं पर कम भिन्न 
तथा कुछ नये नामभो हं इस कारण फिर लिखते हं । १ गजानन, २ विघ्नराज, ३ लम्बोदर, ४ शिवात्मज, 


गणेहवर, २१ गणप, ये इक्कीस गणेदाजौके नाम हे इनमेसे हरएक नामके साथ “के लिये नमस्कार" लगाकर 
पुष्पं चाने चाहिये 1 आदिमं “ओम्‌, अतम नमः” तथा नामको चतुर्थक एकवचनान्त करनेसे नासमत्र 
बनजाते हें उनसे ही समपंण करना चाहिये । ““वश्लाद्धम्‌" इससे धूप करे, इस मन्त्रका अथं थह है किं, सर्वत्र 


करके सबके पापोको क्षीण करनेवाले दशाङ्ग गूगलवाली धूपकी सुगन्ध मेने को है, आप इसे स्वीकृत 


प्त हो जायगा, इस मंत्रसे भोजनके बौचमें पानी देना चाहिये 


उत्तरापोडान करके मुख ओर हा्थोकौ 





अंकुर मेने आपके भेट किये है, इस मं्को पठकर गणाधिपाय नमः दूर्वा्ुरं समपेयामि' इत्यादि इक्कीस 
नाम ग्रन्थोको पठता हुंमा हरे या सफेद व्णेकौ पांच या तीन पत्तेको दूब इक्कीस बार ओम्‌ गणाधिपाय नमः 


विध्वंसकतं., विर्ववन्य, अमरेह, गकणं, नाग यज्ञोपवीतिन्‌, भालचन्द, विद्याधिप, विद्याप्रद, इनं 
नामोके आदिमे “ओम्‌” ओर अन्तमं “नमः तथा इहं चुर्थोके एक वचनान्त करके “दूर्वाकुरं समपेयामि" 
लगाकर गणेशजी पर दूब चढानी चाहिये । गणेन हृदये" सब संकटोके नाशं करनेवाले गणेशजीको हूदयमें 

इक्कीस प्रदक्षिणा करता हं । इससे इक्कीस परिक्रमाएुं करनी चाहिये, “ओौदुम्बरे" हे देव ! 
आपके सामने, चांदी, सोने, तांबे ओर कांसेके पात्रे कल्पित किये गये दीपक रखे हए हैं आप इन्हं 


करे, इससे विशेष दीपक समपित करनं चाहिये ! पञ्चातिक्यम्‌, ह परमेदवर ! चादकी 
वाले, पाच दीपोसे दीपित इस पंचातिक्य दीपको ग्रहण करिये, इससे पंचातिक्यका निवेदन 


















स्वेषां कार्यगौरवात्‌ ।। सेनानीस्तु तदा हर्षादुवाच च महामुनिम्‌ \! ८ !। स्कन्द 
उवाच ।। विप्रवये महायोगिन्‌ पावेत्या मुखतः श्रुतम्‌ ।। बदामि,तद्बरतं तुभ्यं शुणु सवे 





तरत्यचोदयत्‌ ।। अवददरे ततो नाम बल्लवस्त्वं विनायकः ।\ १२ ॥। पुत्र गच्छ 
` बहिर तिष्ठ तत्र दृढायुधः ।। आयास्यति कदाचिद्र पुरुषो भवनान्तरे \\ १२३ ।। 
रय निःलक यावत्स्नानं करोम्यहम्‌ \\ ममाज्ञां गृह्य पठचात्व प्रवेशयितुम- 
१४ \\ मात्राज्ञा गृह्य शिरसि अगमदृद्वारदेहलीम्‌ \। मुद्गरं तु समादाय 












स स 
व 


खं पुत्रार्थं मा कुर प्रिये ॥ अधुना तव 


३ ।। प्रियामेवं समाश्वास्य गतो द्वारं स्वयं 


योजयद्विभुः \! संजीव्य बल्लवं पुत्रं पावत्ये तं न्यवेदयत्‌ ।! ३५ ।। दृष्टवा गज?ि 
पुत्रं पावती हषनिभेरा ।! भोजयित्वा पति पुत्रं स्वणेपात्रे सुलोभन ।\ ३३ 


सृत्य ततो देवं पतिपात्र उपावहत्‌ \! बुभुजे तु ततो 
।} ३७ ।। केलासभवने रम्ये पावेत्या न्यवसदिभः ।। 


बलीयसः ।। ३८ ।। पार्वत्या सहितो 


दृष्ट्वा पारवती ह्यवदच्छिवम्‌ ।! ३९ ।। पावत्युवाच ।! देवदेवं 


।।४२।। देहं तस्य च सा स्पृश्य पाणिपदमेन 





न 





बाल उवाच ।। कथं पुन्यो गणाध्यक्षः कियत्कालं वदन्तु भो 
संभाराः कदा पुज्योगणेदवरः।\ ६० ।। नागकन्या ऊचुः ।। श्रावणे मासि संप्राते 


दये ।। तिलामल्ककल्केन स्नानं कुर्याज्जला शये ।। ६१ ।। शुक्लपक्ष 


0. 





समिसा 





कविकतिदूर्वाभिः पुष्पैरपि तथैव 
॥ ८५ मोदकास्तत्र एकविश्तिसंख्यकाः,।। दश विप्राय दत्त्वा तु 
देवे नियोजयेत्‌ ।\ ८६ ।\ अवक्ञिष्टाः स्वयं भक्ष्याः श्रुतमेवं मया विभो 


तव्‌ मागे शु सरि चरिमिते ।\ ९१ । पितुवाक्यं समाकष्यं 
चाररोह सा ।। क्षणमात्रेण सा याता 





जातो विद्रवामित्राय तत्क्षणात्‌ । गणक उवाच ।। वद राजन्किमिच्छास्ति 

ददामि तव याचितम्‌ । ११० ।। विरवासित्र उवाच । देहि देव प्रसन्नचेत्प्राग्व- 
` प्रषित्वमस्त्विति ।! प्राप्तेन विप्रषित्वेनं सर्वे प्राप्ता मनोरथाः ।! ११ 1! गणेश 
उवाच । विप्रत्वं च राजेनद्र प्राप्स्यसि ब्रह्युत्रतः ।। वसिष्ठादुबरह्मण श्रेष्ठान्मम 


च भूमिपेन च ।! पुनरन्यं वरं 








| हुए हं ।\ ५ । सुतजी बोल कि, हे मृनिवसे ! जैसे आप लोगोने मुषे परदन किया है वसे | ही ब्रह्माजीके र | 
गी सनत्कुमार मुनिने बक्ताआमे श्रेष्ठ षडाननसे प्ररन किया था 1। ६ ।। कि, हे कातिक्तेय है महाप्र राज्ञ ! 


।} ८ ॥। स्वामी कातिकं बोले कि, है विग्रवयं ! हे महायोगिन्‌ ! मेने पावंजीके मुखसे जो सुना है उसी त्रतको 
आपके लिये संक्षेपसे कहता हूं आप सुनं ।। ९ ।! रमणीय कंलासमे निवासं करनेवाले भगवान्‌ महादेवजी एक 


पिर उत्ते नोव भा करके कहा कि, हे पुत्र ! तुम यहां मेरे समीपम आज, फिर पावंतीने : 
कहा कि, आप वल्लब ओर विनायक सबको वमे करनेवाले हो ।। १२॥ हे पुत्र ! बाहर द्वारपर जाओ, बहा ` 
दृढ शस्त्रको लेकर सडे रहो जो कोई पुरुष इस भवनकेभीतर आवे 1 १३।। मे जब तक स्नान करती ह, तबतक 
तुम निःशंक होकर उसे दरवाजेपही रोको । मेरी आज्ञा केकर भौतर प्रविष्ट करना चाहिये ये ।\ १४ 1) सूतजी 


।\ १६ ५ ॥ जब वे देहलीके भोतर प्रवेश करने लगे तो बह द्वारपाल उनको रोकता हअ ।! १७ 
तुम कौन हो, सुन्दर भवनके भीतर क्यो जते हो 


बो कि, मं किसकं | तुम कौन ह्‌ । बिनाजाने क्या बक रहे हो ? ।\१९ ।\ फिर पावें 
भगवान्‌नं हाथमे डमरं लकर उस्‌ द्वारपाल श्रीबल्लबनामकं विनायकका सस्तक काट डाला ओर 


धु 














लि शोक मत करो, अभी मं भारे पुत्रको जीवित करता, केवल वह्‌ हिर नही जोदित-कलमा ॥॥ ३३ | । 
अपनी प्रिया पावतीको एसे आदवासन देकर विभु (महादेवजी ) दवारपर पहुंचे, फिर. इधर उधर दरूसरेका 
मस्तक जोडनेके लिये देखने लगे तो उन्हं वहांफर एक मृत हस्तीका शरीर दौखा \\३४। तदनन्तर उसं 


























] हे सुरेवर ! मे आपके साथ पाल्ञा गेरके खेलना चाहती हूं ।। ४० ॥ महादेवजी बोले कि, है प्रिये । 








प 


सुलना चाहता हं \ ५८ ।\ नागकन्या बोलीं कि, हे वत्स ! हम 
क्योकि, ये गणपति समस्त जगतुके नाथ ह, इनकौ प्रससलता 
५९} नालैकं बोला कि, भोः । किस प्रकार ' 


रे । दो खड ओका भाप भोग रगावे, तथा श 
लु. गणे्जौके यहां रहनेदे ।। ६४ ।। सुतजी शौनक मुनिसे कहते हं कि हे अनघ ! रोज पुजन करनेके समयमे 


दसरेसे सम्भाषण न करे, जाके मन्त्रोकाभीमनमे ही उच्चारण करे, इक्कौसदिनतकं ब्रह्मचर््यसे रहे, पूथिवोपर 
क्षयन ओर शूदर म्लेच्छ, पतित, रजस्वला आदि नीचोसे ६५ ॥ वरती पुरषको सदाही हविष 


गेजायगी + 





ता क 


॥। ८५ ।। इसमें इक्कीस मोदक बनाने चाहिये उनमेसे दश्मोदक ब्राह्मणणल्यि ओर एक गणेशषजीके भेट 
करके । ८६ ।\ अवक्िष्ट क्ञ मोदकोको आप प्रहुण करे, हे प्रभो ! मेने नागकन्याओके सुखसे गणेशजीके 
इक्कीस दिन पुजनवारे इस व्रतका विधान एेसेही सुना था मौर उसी प्रकार मेने कियाभी। हे प्रभो 
अबे आप मुक्षे जो आज्ञा करें वह्‌ करू ।\ ८७ \। सूतजौ शौनक म॒निसे बोले कि, फिर महादेवजीने भी पार्वेतीकी. 
प्रसन्नताके लिये गणेशजौका इन्कोस दिनके पुजनवाला ब्रत किया, उसके समाप्त होतेही उसी पुजाके प्रभावसे 
पार्वतीका मनमहादेवजीकी ओर चायमान हृजा ।\ ८८ \। अपने पिता हिमाल्यको प्रणाम करके बोली 
कि, ह तात ! आज मं अपने घर केलारशको जातौ हू ।\ ८९ \\ मेरा चित्त महेदवरके चरणोके देखनेके लिय 
उत्कण्ठित हो रहा है । जप मेरे लिये शौ घ्र जानेकौ अनुमति दे, अब यहां एक क्षण भी नहीं ठहर सकती \\ ९० ॥। 
यह सुन हिमालय बोला किं, तुम क्षणभर ठहरो, मं सूये सदुश दीप्यमान विमानमें बाकर तुमको मेज्‌गा, 
है शुचिस्मिते ! रस्तेमं तुम्हारो रश्नाके लिये सेना भौ देता हूं ।। ९१,।। पावतोजौ भौ पिताके उन ववर्नोको 
सुनकर तदनुसार दिव्यविभानपर चढकर क्षणमात्रमं अपने उत्तमे भवन कलास पहुच गयी ।। ९२ ।\ फिर 
महादेवजीके दहन करके हंसते हुए उन्हे प्रणाम करतीहुई प्रेमपुवंकं पुने क्गी कि, हे प्रभो } अपने क्ष्या 
किया ? यह तो समक्षम नहीं आथा पर आपने मेरा मन एकदम वहसे वीच लिया ।। ९३ ।। प्यारीके इस 


(6 हे जगत्मरभो ! गणेशजीका पुजन किस 
` करना चाहिये ? आप मुस्ने कहिये, मे स्वामिकातिकको देखनेकी इच्छासे गणपति पुजाको करूगी 


इक्कीस दुवे अंकुर एवम्‌ इवकीस ही नानाविध उत्तम पुष्पोसे ।\ ९७ 1। इस ब्रतमे गणेश्जोका पुजन किया ` 
जाता है जर वहं पुजन इक्कीस दिनपय्यन्त करना चाहिये । इक्कीस मोदकोका नेवेच बनवाके उसमसे द 


स्वामिकातिकजीको देखते ही उसी समय पावतीजीके स्तनोसे कः करना वहने लगा । अपने पुत्रका आलि- 
मृखको वारंवार चूमने खगो \ १००! है वत्स षण्मुखं ! बहुत समयसे मुद्यको छोडकर तुम दूसरी 
थे, आज म गणेशजीके त्रत प्रभावसे वुम्हारे मुखको देखसकी ।। १०१ ।! माज मे तुक्लको 























मिलगये एेसा मे मानता हं \। ११। गणेशजी बोले कि, हे राजेन्दर ! तुमको बरह्मषिपद तो विघ्रागप्रगण्य ब्रह्मपुत्र 
वसिष्ठ ऋषिसे मिलेगा, इसमे संया नहीं है यह मेरा बाक्य है \\ ११२ \। एेसा कहकर फिर ओर भी राजाके 
अन्यभी वरदान किया कि \। ११३ ।\ हे राजन्‌ ! जबजब जिन जिन ` 
मनुष्योको चाहिये क वे मेरी पजा करं \\ ११४॥। 


बेतपू्वक मुके वारंवार नमस्कार करते हुए याद करेगे, उनके सब दुःखको नष्ट करूंगा इसमें 
बरोको देकर गणेशजी वहां ही अर्न्तीहितं होगये । स्वामिकातिक सनत्कुमारसे 
| कहते ह कि, है योगीन्र ! सनत्कुमार ! मनं धार्वतीके मखारविन्दसे ।\ ११६।, चेतायुगके आरम्भमं गगेशजीके 
` इस बडे भारी व्रतको सुनाथा, हे विप्र ! हे तपोनिषे ! वह मेने तुम्हुं कहं दिथा है इसे आप करें 
सनत्कुमार बोले कि, हे प्रभो ! मे इस महान्‌ आद्यानको सुनकर तुप्त हौ गया हं इसमं सदेश नहीं 
` बोरे कि, योगौ सनत्कुमार एेसा कहकर, स्वामिकातिकजीको प्रणाम करके चले गये 1! 
भार ओर स्वामिकािकका यह संवादं भगवान्‌ वेदग्यासजी प्रसन्नतसे जंसा सुना था व॑साही आपके 
` निवेदन कर दिया है ।। ११९ ।। इस गणेशजीके इक्कीस दिनके ब्रतको जो मनुष्य करेगा उसके सब कार्यं 
| होमे !। १२० ।। हे सब मनुष्योमे श्रेष्टो ! ओ तपरूप धनसेही सम्पन्नता माननेवाले ! ओर 






















































(स कया सुनना चाहते हो यदिमेरे त नेको आप सुनना चाहेगे तो भे सब ॒कहंगाः 











ष्योत्तर पुराणान्तेत स्कन्द भौर सनत्कुमारके संवादके तृं 
पूजनके व्रतकी कथा सम्पूणं हद 1 











वंकसप्तजन्म राज्यसौभाग्या 





ता 


नूर १० ।॥\ दूर्वादिष्नेवरो यत्र 
कलयसे चला या भानुवारेण संयुता ।। ११।। तस्यां 


चतुर्यां च प्रत्येकं चैकविक्षतिः । एकभक्तं च कर्तव्यं 


।॥ गजाननं प्रस्नास्यं सिन्दूरतिलकाएडितकतम्‌ ।\ १५ ।\ 
भातमक्तामणिविभूषितम्‌ 11. चतुर्भुनमुदाराद्धं किकिणी- 



























इसके अलावा रविवार युक्ता लिस किसी महीनेकौ शुक्ला चतुरथोके दिन आरम्भकर्‌ छः महौनेतक 








रूपमे कहा है । इसे अच्छे अच्छे लोग रावण शुक्ला चतुर्थौ से ठेकर माघ शुक्ला चौथतक करते हं यह तात्पर्यं 
है । इस व्रतका संकल्प करती वार मास, पक्ष आदिका उल्केब करकं कहे कि, भेरे समस्त पायोके नाश पुरवैक ` 
सात जन्मोमे राज्य ओर सौभाग्यकौ वृद्धिके लिये तथा महागणपतिकी प्रौतिद्वारा उमामहरवरके सालोक्यके 
लिये छः मासतक दूर्वागिणपतिका व्रत में करूगा । संकल्पके बाद सोलह उपचारति गणेशजीका पुजन करना 
चाहिये ¦ जथ कथा-सिद्धोके सम्‌हसे समाकीणं, गन्धर्वं जनो सेवित तथा सब देवता जिसका निरन्तर सेवन 
करते रहते हँ एसे कैलासके रमणीक शिखरपर । १ । पावतीजीके साथ पासोपे खेलते खेलते बोरे कि, ` 
तुम जीत गई जीत गई । २ ।। पावेतजी बोलीं कि, आप जीत गये जप जीत गये, यही दोनोंका विवाद हो. 
गथा, उस समय चित्रनेमिसे पुछा तो वो शूठ बोलने लगा ।! ३ ।। उस समय पावतीजीने कोधमं आकर शाप 

दे दिया । चित्रनेमिने ख्‌ सामद की कि हे पार्वति ! मुशे शाप रहित कर दीजिये ।! ४ ।। एसा सुनकर पार्व॑तीजी ` 
गोली कि जब तुम घूमते हए रमणीक सरोवर पर आई हुई सब अप्सराओको देखोगे ।\! ५. ।। उस समय तुम 










































पटुचकर प्रणाम करके पुने लगा । 
सुन वे उससे बोलीं कि, हम 













- [ए ०११९२ 
० 























भहादेवजौके सामने इस ब्रतको कहा ओर शंभुने बडे ही कुतुहलसे !! २७ । गौरके क्रोधको शान्त करनेके 


किया श्िवजोके उपदेशते पावेतीजीने भी इस उत्तम ब्रतको किया ।। २८ ।} कातिकेयने भौ माताके 
से अपने भिक देखनेकौ इच्छासे प्रेरित होकर इस त्रतको आदर पुवेक किया कातिकेयके मुखसे सुनकर 







कया रमसे यह्‌ उत्तम त्रत लोकमें प्रचरितं होगा ।) ३० ।\ सब 
देनेवाले दूर्वागणेडाके इस उत्तम तब्रतको करके श्लोक, व्याधि, भय, उदधेग, बन्ध ओर व्यसनोसे 


१॥ 1 छटकर पुत्र पोत्र, घन, धान्य संब कुछ पाजाता है इस लोकम सुख भोगकर अन्तमं शिव लोकम 


अ) है 11 ३२ ।। इस व्रतके प्रभावसे इूरवागणेश्चजीकी प्रसस्षता होनेसे सव कुछ होजाता है ! जो नर रोज परमं 


 भवितके साथ इस्‌ व्रतको करता है जथवा जो इसे निरन्तरं सुनता है वह्‌ भी सब सिद्धिक्षो पाजतताहै 1३३१ 
। वूर्वागणपतिका तत पूराहृमा॥1 









 सिद्धिविनायकब्रतम्‌ 1 
-भाद्रपदशुक्लचतुर््यां सिद्धिविनायकत्रतं हेमा स्काम्द-तच्च मध्याह्नव्या- 
कायम्‌ ।। प्रातः शुक्लतिलेः स्नात्वा मध्याह्लं पुजयेचुष ।। इति तत्रैव 
















गणनाथस्य मातूविद्धा प्र्स्यते ।\ . सध्याह्लव्यापिनी. सा तु परतरचेत्पर 
इति क्तेः । अथ ब्रतविधिः ।। मासपक्ताद्युल्लिस्य ममेह जन्मनि 












प्राणप्रतिष्ठादिक- 






पञ्चामृतेः सह पाथिवगणयतिपूजनं करिष्ये ।। तथा मूत प्राण 
नादिकं कलशाराधनं पुरुषसुक्तन्यासांच्च करिष्ये ।} 









सुताय० स्थापनम्‌ ।। अथ प्राणप्रतिष्ठा कुर्यात्‌ 





४ 





तुभ्यं स्नानायाभीष्टदायक ॥। य्पुरुषेण० स्नानम्‌ ।। रक्तवस्त्रयुगं 
काञ्चनसंभवम्‌ ।। संप्रर गृहाणेदं लम्बोदर हरात्मज ।। तं 


0 ४; 
11 





५८१ 


सवेदेवेद्ष उमापुत्र नमोस्तु ते \! य्पुरुषम्‌० धूपम्‌ । स्न सवेलोकेशच 
गेक्यरि मङ्कलं दीपं रद्रप्रियं नमोऽस्तु ते । ब्राह्मणोऽस्य 
। नैवेद्यं गृह्यतां देव०° नानाखाद्यमयं दिव्यं नैवेद्यं ते निवेदितम्‌ । मया 
शिवापुत्र गृहाण गणनायक ।\ चन््रमामन ° नेवे्यम्‌ ।! एलोज्ौरलवङ्घा- 


रापो० म॒खभरक्षालनम्‌ ।। मल्याचलसंभूतं कर्पूरेण समन्वितम्‌ ।\ करोढ्तनकं चार 
जगतः पते ।! करोदतेनम्‌ ।। बीजपुराच्पनसखजरीकदलीफलम्‌ ।1 नारि- 

दिव्यं गृहाण गणनायक ।। इदं फलं मया० फलम्‌ \। एकविशतिसंख्याकान्‌ 
घतपाचितान्‌ ।। नैवेद्यं सफलं दद्यान्नमस्ते विष्ननारिने ।\ गणेशाय ° 
फः म्बलम्‌ ॥ हिरण्यगभेति दक्षि- 
जमाणिकयवेदरयेमुक्ताविद्रममण्डितम्‌ । पुष्परागसमायुवतं भूषण 

युग्मं गहीत्वा तु गन्धपुष्याक्षतेयुतम्‌ ।\ पूजयेत्सिदधि 
साते । ति 





युधिष्ठिर उवाच ।! निविष्नेन जयं मह्यं बद त्वौदेवकीसुत ।! कां देवतां नमस्कृत्य 
सम्यग्राज्यं लभेमहि ।॥ ७ ।\ कृष्ण उवाच ।। पूजयस्व गणाध्यक्षमुमामलसमुदधु 
वम्‌ ।\ तस्मिन्सभ्पुजिते देवे धुवं राज्यमवाप्स्यसि ।\ ८ । र उवाच । 


र ।। अथवा मृत्मयीं कु 





त्तकं कमं पूजयेदिष्टदेवताम्‌ ॥ ब्राह्मणान्भोजयेत्पश्चा डूञ्जौयाततेलर्वजितम्‌ 
धर्मराज गणनाथस्य पूजने ।\ विजयस्ते भवेचूनं सत्यं सत्य 
हन्तुकामेन पुजितः शुलपाणिना ।। शक्रेण पुनितः पुर्व 


पुरा ॥ अमृतोत्पादनार्थाय तथा देवासुरैरपि \\ ३३ । अमृतं हरता पूवं वनतेयेन 
पक्षिणा 1 ` आराधितो गणा ध्यक्षो ह्यमृतं च हतं बलात्‌ ।। ३४ ।। रुकिमिण 


हेतुकामेन पजितोऽसौ मया प्रभुः \॥ तस्य प्रसादाद्राजेन्र रुक्मिणीं प्राप्तवाहनम्‌ 

३५ 11 यदा पूर्व हि दैत्येन हतो रुविमणिनन्दनः ।। आराधितो मया तदरहूुकिमष्या 

| = ॥। कुष्ठव्याधियुतेनाथ साम्बेनाराधित मस्त 
विद्याकामो लभेषिदयां धनकामो 


च सुवासिनी 


द्यासु दीक्षासु आदो पूज्यो गणा 








जन्मातरोमे पुत्र, पौत्र, धन, 
सिद्धिविनायककौ प्रसच्नताके लिये जसा सुद्षे ज्ञान है उसके अनुसार पुरुषसूक्त ओर पुराणके कहे हुए सन्त्रोसे 
ध्यान आवाहन ओर षोडरोपचारोके | सेही मूं 
राण प्रतिष्ठा आदिके आसन आदिक कलद्ाराधन ओौ र पुरुषसूक्तका | शुद्ध. 
"जोम, हैरस्बायनमः' सृत्तिकामाहरामि, नमस्कार है, मृत्तिका लेता हूं इससे मिटटी प्रहणकर 
ओम्‌ सुमुखाय नमः सुमुखके छे नमस्कार है, इस मंत्रको बोलते हए सूति बनाना चाहिये \ ओम्‌ 
सुताय नमः" गौरो सुतको नमस्कार है इससे स्थापन करना चाहिये । इसके बाद प्राणप्रतिष्ठा होती है 


ना 


ध्री यहे लेकर पंचदशवारं प्रणवमावत्य' यहांतकं प्राणप्रतिष्ठा पष्ठ ३१ मे एकसी है इसी कारण इतनेका 


1 


यहां अथ नहीं करते हं ) भोम्‌ तच्चक्ु्देबहितं पुरास्ताच्छकं उच्चरत्‌ पश्येम शरदः शतं शणयाम शरदः 
रतम्‌ 


सूर्यकी । 


प्राथनामं इसका अथं किया है तथा विनियोग भी किया है पर यहां आज्यसे देवके तेत्र 
प्रयोग है इस कारण अथं भी एेसाही होना चाहिये किह हेतकारीआपके वे | 
भप अपने ने्ोसे देखते हे उसौ तरह हम भी सौवर्षतकं देखते रहे, तथा सुनना ओर कहना 
रह, न सौव्षतक दीन ही हों फिर भी हम सौते भी अधिक सौवषेतक ये सब भोगे, इस मंत्रको 
नेत्र खोलकर पचोपचारसे पुजन करना चाहिये । आसनविधिके बाद पुरुषसुक्तके न्यासं 


ता है-.भोम्‌ सहलरशर्षा 






















0 









आप इससे स्नान करे, “ओम्‌ यत्ुरुषेण'' इससे स्नान करावे ! “रक्तवस्त्' इसमे वस्त्र धारणं करनेकी प्रा्थेना 
करे, इसका अथं यह्‌ है कि, हे देवे ! हे लम्बोदर ! हि शिवकरुमार ! ह सवं पुरुषाथोकि देनेवारे ! ये दिव्य 
सुवर्णके तन्तुओसे बनं हुए दो वस्त्र हु, जाप इन्हुं चारण करिये, “तं यज्ञं बहिषि" इसमे एक धौत, वस्त्र दूसरा 
अंगोखा धारण करावे । “राजतं ब्रह्य' इससे इपटूष धारण करावे, इसका यहं अथं है कि, चाँदी ओौर सुवर्ेके 
सुतोकासा यह इपद्रा है है सवज्ञ ! अप इस सुन्दर वस्त्रको धारण करो ओर भक्तोको वरदान दो । “ओं 
तस्मायन्नात्‌'" इससे यज्ञोपवीत पहनावे उद्य्धुस्कर' इससे सिन्दरुर चटढावे, इसका अथं यह है करि, उदय होते 
हृए सुयेके सदृश ओर सन्ध्याके समान लालवणं, वीरताका आभूषण रूप यह्‌ सिन्दूर है हे प्रभो { इसे स्वीकृत 
कसो । नाना इससे आभूषण पहूरावे, इसका यह अथं है कि, है शकर एवं पावंतोके परम आनन्दं करनेवारे 
इन नानाविध दिव्य रत्न जडित आभूषणोको धारण करिये । कस्तुरी इससे सुगन्धित चन्दन चढानेके चवय 
प्राना करे, इसका अथं यह्‌ है कि, हे सुरश्रेष्ठ ! कस्तूरी, गोरोचन, कपुर ओर केसर इनसे मिश्रित (लाल) 
चन्दनके विलेषनको ग्रहण करो ! “तस्मा्न्ञात्सवे" इससे उस (लाल) चन्दनको विलेपन करे \ "रक्ताक्षतांर्च' 
इससे लाल रद्ध हए चावल चढावे, इसका अथं है हे देवेदवर { है हस्तौके सदु मुखवाले ! इन लाल चावलोको 
ललाटपर रहनेवाखे चन्द्रमाके ऊपर धारण करिये । माल्यादीनि इस पूर्वोक्त सन्त्रसे एवम्‌ करवीर, मालती 
चम्पा, मौलसरी, कमल ओर कल्हार कमलके फूल्गेसे गणेशजीकी पूजा होनी चाहिये । इस भंत्रसे तथा 
५ “तस्मादश्वा अजायन्त" इस म॑त्रसे फूल चढाने चाषठिये । अद्धगुजा-गणेदवरके लिये नमस्कार है चर्णोका = | | 
पूजन करता हु, विध्नराजके लिये नमस्कार है जानुओमे पूजन करता ह, मूसेका वाहन रखनेवाक्तके लिये ` ५ 4 | 
नमस्कार है ऊरूका पूजन करता हूः हेरम्बके लिये नमस्कार है कटीका पजन करता हं । कामके वैरीके सुतके ` ` 
लिये नमस्कार दहै नाभिका परुजन करता हं, लम्बोदरके लिये नमस्कार उदरका पूजन करता हं, गौरो सुतके 
लिये नमस्कार, स्तनोका पूजन करता हं, गणनायकके लिये नमस्कार हुदयका पूजन करता ह, स्थूल कान- 
वालके लिये नमस्कार है कंठका पुनन करता हू स्कन्दके बड़ भाईके ल्व नमस्कार है, स्कन्धोका पूजन करताहू। 

पाराको हाथमे रखनेवारेके लिये नमस्कार है हाथोका पुजन करता हूं । गजकेसे मुखवालके व्यि नमस्कारहै 
 मुखका पूजन करता हूं, विध्नहन्ताके लये नमस्कार है ल्लाटका पुजन करता हूं । सर्वेश्वरके लिये नमस्कारहै = ` 
 शिरका पूजन करता हूं । सणाधिपकरे लिये नमस्कार है सर्वाद्धका पुजन करता हुं ।। पत्र पूजा-पुमृखके ं 
ल्य मालतीके पत्र, गणाधिपके लिये भृङ्खराजके पत्ते, उमाके पुत्रके लिये बिल्वयत्र, गाजाननके लिये सफेद 


" 






























































































करिये, “मलयाचल” इससे करोरतैन कर इसका अथं यहं है कि, है जगत्पते ! चन्दन ओौर कपुरको धिसकर 
आपके करोटतेन करानेके छिए काया हूं, आप इस सुन्दर करोटतनको अंगीकार करो । “बौजयपुरा स्रम्‌" इससे 
तथा “इदं फलं" इस पूर्वोक्त लोकसे फल भोग लगवे, इसका यह अथं है-है गणनायक 
कटहर, खजूर, केता ओर नारियलके फलों को ग्रहण करो \ फिर इक्कोस लडइओंका फलोके साथ गणपतिके 
भोग लगावे ओर “एकविहति"' इस इलोकका उच्चारण करे । इसका अथं यह्‌ है किःघौके इक्कील लडड्ओंका 
नैवेद्य, फलोके साथ आपको चढाता हूं विष्नोको नष्ट करनेवाङे, आके किए प्रणाम है ! ओर “गणेशाय 
नमः मोदकानपर्यामि गणेशको नमस्कार है, मोदकोका अपण करता हूं इस वाक्यकाभौ उच्चारण 
करे । “पुगीफल' इससे ताम्बर ओर पुगीफर चढावे, “हिरण्यगभेगभेस्थं'' इस पूर्वोक्त मन्त्रको पठता हभ 
दक्षिणा चडवे, “वच्रमाणिक्य'' इससे रत्नाभरण चढवे ! अथं यह है कि, हीरा, माणिक्य, वैडये, मोती 
संगा, ओर पष्पराजसे जटिल आभूषणोको धारण करिए ! फिर दूबकं दो दल तथा गन्ध पुष्प ौर अक्षतोको 
लेकर पूर्वोक्त नाम मन्त्रौसे सिद्धि तथा विष्नोके पति देवगणेशजीका पीडे “ओम्‌ गणएधिपायनमः'' गणाधिपके 
लिए नमस्कार है “ओम्‌ उमापुत्राय नमः उमापुत्रके लिये नमस्कार है, “ओम्‌ अघ नारिनेनमः'' अघ- 
नाशीके लिए नमस्कार है, “म्‌ एकदन्ताय नमः” एक दांतवालेके लिये नलस्कारहै “ओम्‌ इभवक्त्राय नमः 

हाथाके मृखवालेके किए नमस्कार है, “भम्‌ मूषकवाहनायनमः' मूसक वाहन रखनेवाकेके लिए नमस्कार 
है विनायकाय नमः” विनायक के लिए नमस्कार है, “ओम्‌ ईापुत्रायनमः'' ईहाके पुत्रके लिए नमस्कार हैः 
“जोम्‌ सवसिद्धिप्रदायनमः'' स्व॑सिद्धियोको देनेवाखेके लिए नमस्कार है । इन नामोसे दूब सि प्रयत्नके साथ 
` पुननकरना चाहिए । फिर “चन्द्रादित्यौ ' इससे पहं 



















































 हिन्दीटीकासदहित 


पारस्परिक फूट पडजाय, या अपनेभे लोगोका प्रेम नरह तो उस समय क्या करना चाहिये जिससे यह्‌ सब ` 
 . रातह ।\ ३ ।। विध्ारम्भ, वाणिज्य, खेती, दूसरे राज्ययर राजाके आक्रमणके समय जय तथा सिद्धि किंस 


 उपायको करनेसे होती है 1। ४ ॥। क्तिस देवताकौ आराधनाकी जाय ? निससे कार्यसिद्ध हो, हमारे लि इन ` 
` सब प्रहनोका अच्छी तरह उत्तर दें ।\ ५।। सुतजी बके कि, है विप्रो ! जब कौरव तथा पाण्डवोकौ सेना परस्पर ` 


यद्धे किए तैयार खडी हो रही थी उस समय कुम्तीनन्दन राजा युधिष्ठिर देवकीनन्दन भगवान्‌से पुने लगे ` 
कि, है देवकीनंदन ! निर्विघ्न जयप्राप्त करनेका उपाय मेरे लिये बताये, किस देवताकी आराधनाकी जाय 


जिसे जयपुर्वक राज्य मिले उस देवताकी आराधनाक्रा उपदेश मृश्च करिए ।। ७ ।। कृष्ण बोले कि, हे राजन्‌ ! ` 
 पार्व॑तीजीके मेलसे जिन्होंने अवतार लिया है एसे गणपतिदेवका पूजन करो, क्योकि, उनका पजन करनेसे 


` आप राज्यको पाजायेगे इसमे कोई सन्देह नहीं है \। ८ ।। युधिष्ठिर बोलकर, है देवदेव ! किस विधिके अनुसार 
 गणपतिका युजन करना चाहिये मौर किस तिथिमं पूजनेसे सिद्धियां देते है आप कहौ ।\ ९ ॥। श्रीकृष्णचन्द्र ` 

बोरे कि, है राजन्‌ ! भद्रपद शुक्ला चतुर्थो या भ्रावण अथवा मागेशीषं महीनेकौ शुक्लयक्षकी चतुर्थकि दिन ` 

 भणपतिका पुजन करिये ।। १० ।\ यदि अन्य महीनोमं गणयति पूजनके लिये प्रेम ज्यादा हो तो उस महीनेकी ` 
श क्लाचौथमं ही गणपतिका पूजन करलेना चाहिये \। ११ ॥\ हे राजन्‌ प्रातःकाख सफेद तिलोमे स्नान करके ` 


मध्याह्लमे गणेशजौकः पुजन करना चाहिये । एक निष्क या आधे निष्क अथवा इससे आपेही तोलेको सुवर्णको ` 


` ॥\१२। या चान्दीको गणपति मूति अपनी सम्पतिके अनुरूपबनवाले, यदि सर्वेथा संकोच हो तो मृत्तिकाकी . ` 
 . | ही गणपति सूति बनवाखेनी चाहिये पर सम्पत्ति रहते कृपणता न करनी चाहिये । १२ ॥। एकदन्त, छाजके ` 


सदश्च कानवाले, हस्तीके समान मस्तकवाठे, चतुरभुन पाला ओर अंकुशको धारण करनेवारे सिद्धिविनायक 


 भगवानृका ध्यान करना चाहिये ।\ १४।। पीछे ओम्‌ सिद्धि विनायकाय नमः इन मन््रोसे पञ्चामृतके दुग्ध ` 


आदि पदार्थोसि पथक्‌ तथा संमिलितोसे स्नान करावे ओस्‌ गणाध्यक्षाय नमः' इस सन्त्रसे भक्तिपुवक गन्धदान ` ¢ ^! 
करना चाहिये ।! १५ ।\ ओर स्नानसे आवश्यकौय काम्‌ आवाहन, आसन, पाद्या्ध्यादिभी आ गणाध्यक्षाय ` 


४ नमः' इसी नाममन्त्रसे करने चाहिये स्नानकरानेकफे पीछे वस्त्रपहरानाजादिक भी गणाध्यक्षाय नमः" इसी 


ओर विध्नविनारिने नमः" इससे नैवे च ८ 
फिर कुछ सुवर्णकौ दक्षिणा तथा ताम्बूल ` 
समपित करके इक्कीस दबके अंकुर केकर ।! १८ ।। उनकी प्रयत्नके साथ पृथक्‌ पृथक्‌ नीचे लिखि हृएनाम 
मंत्रोसे पुजन करे । हे गणाधिप तेरे लिये नमस्कार है, हे उमासुत ! तेरे लिये नमस्कार दै, है.अघनारान तेरे ` 


छे नमस्कार है 1। १९।। है विनायक ! तेरे लिये नमस्कार है, हे ईकुत्र ! तरे लिये नमस्कार है, हे स्व, 


नमस्कार है, हे एकदन्त ! तेरे ले नमस्कार है, हे इभवकवर तेरे लिये नमस्कार है, = 
तेरे लिये नमस्कार है 11 २० ॥। तुक कुमारके गुरुके चये नमस्कार है । इसी प्रकार ष ६ 








प 



















सर्वथा सत्य है \\ २९ ।\ जब त्रिपुरासुरको मारनेके लिये नरिशूखधारौ महादेवजीने, वुत्रासुरके विनष्ट करनेके 
चयि इन्द्रने पजाकी 11 ३० \\ अपने पति गौतममूनिकी प्राप्तिके लिये अहल्याने नक्की प्राप्तिके चयि दम- 
थन्तीने ।\ ३१! सीताजीकी पुन : प्राप्तिके लिये रधुनाथजीने, सीताजीके द्ंनोके लिये हनुमानजीने \\ ३२॥ ` 
`  गद्धमजीको कानेके लिये भगीरथने, समुद्रसे अमृत निकालनेके लिये देवता तथा देत्योने भी पहिले गणपतिकीही 
` आराधना की थी ओर अपने अपने चिकीषित कार्योमं सफलताके भागी हुये थे \। ३३ \! ओर गख्डने जब - 
देहराजके हाथसे अमतकल्शको छीनकेलानेके चवे स्वगकी र धावा किया था तब उसने मौ गणाध्यक्षकौ ` 

ही अर्चना कौ थौ, गणपतिजीकी ही कृपासे वहां जाकर बलपुवेक कलहा छीन लिया ।\ ३४ । मेने भी रुकिमिणी- =. 

हरण करनेकी इच्छासे भगवान्‌ गणेरजीकी ही आराधनाकी थी उनकेही प्रसादसे मेँ रविमणीको पा गया 
 ॥३५।} जब सम्बर दानव रविमणीके पुत्र प्रदयम्नको प्रसूतिकागृहसे केगया तब जौर रुकविमिणीने गणेहजीकी ` 























| पुजाकीउसीके प्रतापसे हमको प्रद्युम्न फिर प्राप्त होगया ।। ३६ ।। जब साम्बके कुष्ठ होगया था उस समय ` । । 
उसने अपने कष्ठरोगकी निवृत्तिके लिये गणपतिकौ आराधना की थी जिससे उसे निरोगता प्रप्त हो गयी ।! । 
इसलिये ह राजन्‌ ! तुम भौ यदि अपनौ जय चाहते हौ तो शंकरनन्दन गणराजकी शीघ्र आराधना करो ३७! ` 








ं (१ । ५ ` पतिकी कामनावारी कन्या पतिका, सुवासिनी सौभाग्यसम्पत्तिका राभ लेते हँ । वैषव्यदुःखसे पीडित हरं 
1 स्त्री, यदि गणेडाजीकी पुना करे तो फिर वह्‌ जन्मजन्मान्तरमे कभी भौ वैधव्य दुःखको नहीं देखत ।! ३९ ॥ 
























ब्रतका अनुष्ठान कहा उक्त महाराजने भी भाइयोके 
 छ्त्रभोको मार बलसे राज्य प्राप्तं कर लिया 












मा 


(त 
1 

















सनत्कुमार योगीन्द्र यदीच्छेच्छभमात्मनः ।! नारी वा पुरुषो वापि यः कुर्याष्विधि- ` 
 वदुत्रतम्‌ ।\२।। मोचयत्याशचु विप्रे संकष्टादब्तिनं हि तत्‌ ।। अपवादहरं चैव सवे- ` 
घ्नप्रणाशनम्‌ ।। ३ ।। कान्तारे विषमे वापि रणे राजकुलेऽथवा ।। सर्वसिद्धिकरं 
द व्रतानास्‌त्तमं व्रतम्‌ ।\ ४ ।। गजाननग्रियं चाथ त्रिषु लोकेषु विश्रतम्‌ ।\! अतो 














वि 





न विद्यते ब्रह्मन्‌ सवेसंकष्टनाशनम्‌ ।! ५ ।। सनत्कुमार उवाच ।। केन चादौ 





पुरा चीणं मत्यलोकं कथं गतम्‌ ।! एतत्समस्तं विस्ताये ब्रूहि गाणेहवरं ब्रतम्‌ ।\ ६ \) 
नन्विकेदवरउवाच ।\ चक्रे केतं जगस्वाथो वासुदेवः प्रतापवान्‌ ।। आदिष्टं नारदेनव 


वुथालाञ्छनमुक्तयें \\! ७ ।। सनत्कुमार उवाच ।। षड्गुणश्वयसंपन्चः सृष्टिसंहार 
कारकः ।! वासुदेवो जगद्यापी प्राप्तबाल्लाञ्छनं कथम्‌ ।। ८ ।। एतदादचयमास्यानं 


ब्रहि त्वं नन्दिकेश्वर ।। चन्दिकंदवर उवाच ।। भूमिभारनिवच्यथं वसुदेवसुता- ` 
वुभौ ।\९।। रामकृष्णौ समुत्पन्नौ पदनाभफणीहवरौ । जरासन्धभयल्छृष्णो दारकं ` 
हाटकनिमिताम्‌ । 
मनोज्ञानि तेषां मध्यं 
























गृहास्तत्र षट्पंचाशच्च कोटयः ।! अन्येऽपि बहवो लोका वसन्ति वि 
२ ।। यत्किचि्चिषु लोकेषु सुन्दरं तत्र दृयते ।। सत्राजितप्रसेनास्यो 








जतोजातभयं मो याचयिष्दति सा हरिः ।। प्रसेनाय ददौ भ्रात्रे धार्योऽयं शुचिना 

त्वया ॥। २८ ।। एकदा कण्ठदेशेऽसौ क्षिप्त्वा तं मणिमुचतमम्‌ ।! मृगयाक्रीडना्थयि ` 
ययौ कृष्णेन संयतः ।! २९ ।! अह्वारूटीऽलुचिष्वासौ हतः †सिहेन तत्क्षणात्‌ ॥ 
रत्नमादाय सिंहोऽपि गच्छन्‌ जाम्ववता हतः ।\ ३० ।) नीत्वा स विवरे रत्तं ददौ 
पुत्राय जाम्बवान्‌ ।। पुरीं विवेच कृष्णोपि स्वकैः सवे समावृतः ।\ २१ ॥। प्रसेनोऽ- 


चापि नायाति हतः कृष्णेन निङ्चितम्‌ ।। मणिलोभेन हा कष्टं बान्धवः पापिना ` 
हतः । ३२ ।। द्वारकावासिनः सर्वे जना ऊचुः परस्परम्‌ ।} वृधापवादसंतप्तः 


कृष्णोऽपि निरगाच्छनैः । ३३ ।। सहैव तेभ॑तोऽरण्यं दृष्ट्वा सिंहेन पातितम्‌ ॥! 
प्रसेनं वाहनयुतं तत्पदानुचरः शनः ।\ ३४ \\ ऋक्षेण निहतं दृष्ट्वा कुष्णश्चक्षेबिलं 
1 निवारयन्‌ ददाम 








 दृष्टमानसाः ।\ सत्नालितेन ते वेरं चक्र रत्नाभिलाषिणः ।! ५२ ।। दुरात्मा शत- 
 धन्वापि गते कृष्णे च कुत्रचित्‌ ।\ र्ाजितं निहत्याशु माण जग्राह पापधी 
 ५३।। कृष्णस्य पुरतः सत्था समाचष्टे विचेष्टितम्‌ ।} अन्तहु ष्टो बहिःकोपी 
कृष्णः कपटनायकः ।। ५४ }\ बलदेवपुरो वाक्यमुवाच धरणीधरः ।) हत्वा सत्ना- 


जितं इष्टो मणिमादाय गच्छति ।! ५५ ।! निहत्य शतधन्वानं गृह्णीमो रत्न- 
मावयोः ।! मम भोग्यं च तद्रत्नं भविष्यति सुनिर्चितम्‌ ।) ५६ ।! एतच्च त्वा 


५ ' भयत्रस्तः लतधन्वापि यादवः ।। आहूयाक्ररनामानं माणिक्यं प्रददौ च सः ।। ५७ । 
आरुह्य वडवां वेगाल्चिगेतो दक्षिणां दिक्ञम्‌ ।। रथस्थावनुगच्छेतां तदा रानजना- 
।॥ ५८ ।\ शतयोजनमात्रेण ममार बडवा तदा ।! पलायमानो निहतः पदा- 


तिस्तु पदातिना \\५९।। रथस्थे बलदेवे तु हरिणा रत्नलोभतः।। न दृष्टं तत्र तद्रत्नं 









































काशीगत्वा सुखेना 













सौ यजन्यज्ञपति प्रभम्‌ ।\ ६६ ।\ तोषमृत्पादयामास तेन द्रव्येण 












न 


क 


य 





उवाच ।! गणानामाधिपत्ये च सं्रेण विहितः पुरा ।। ७७ ।। अणिमा महिमा चैव 
` लधिमा गरिमा तथा \। प्राप्तिः प्राकाम्यमीशित्वं वशित्वं चाष्टसिद्धयः ।\ ७८ ॥। 


देवेश स॒ष्टिसंहारकारक ।।! ८० । यः पूजयेक्गणाध्यक्षं मोदकाः प्रयत्नतः \\ 
तस्य प्रजायते सिदधिनिविष्नेन न संशयः ।! ८१ ।। असंपुज्य गणाध्यक्षं ये वाञ्छन्ति 
सुरासुराः ।। न तेषां जायते सिद्धिः कल्यकोटिश्ञतरपि ।\ ८२ ।\ त्व द्ूकत्य 
गणाध्यक्ष विष्णुः पालयते सदा ।! रुद्रोऽपि संहरत्याशु त्वडुक्त्थव करोम्यहम्‌ 
।। ८३ ॥ इत्थं संस्तूयमानोऽसौ देवदेवो गजाननः । उवाच परमप्रीतो बरह्माणं 


। ॥॥ ९० 1\ हाहाकारो महाञ्जातः श्रुत्वा शापं च भीषणम्‌ ।। अत्यन्तं म्लानवदन- 
` इचनद्रो जलमथाविश्चत्‌ ।। 


रीनमानसाः ।\ ९२ \ तुरासाहं प 
गणेशस्य च चेष्टितम्‌।। ९३। 





मानं गणनायकं च तुष्टाव दष्ट्वा तु कलानिधानः ।। त्वं कारणं कारणकारणानां 
वेत्तासि वेद्यं च विभो प्रसीद ।। २ \1 प्रसौद देवेश जगल्लिवास गणेश लम्बोदर 
वक्रतुण्ड ।। विरिञ्चिनारायणपूज्यमान क्षमस्व मे गवेकृतं च हास्यम्‌ ।\ ४ ॥ 
ये त्वामसंपुज्य गणेश नूनं वाच्छन्ति मूढाः स्वकृताथेसिद्धिम्‌ ।। ते देवनष्टा निभृतं 
च लोके ज्ञातो मया ते सकलः प्रभावः \। ५ ।\ ये चाप्युदासीनतरास्तु पापास्ते 


यान्ति वासं नरके सदेव \! हेरम्ब ऊम्बोदर मे क्षमस्व दुश्चेष्टितं तत्करुणासम्‌ 


॥६।। एवं संस्तयमानोऽयो चन्द्रणाह गजाननः ।। तुष्टोऽहं तव दास्यामि वरं 
ब्रूहि निश्ञाकर ।\ ८ ।\ चन्द्र उवाच ।। लोकानां दशेनीयोऽहं भवामि पुनरेव हि \\ 
क्ापोञ्धं भविष्या ८ \। गणेश उवाच ।। वरमन्यं 
















व 








4 व्रतराजं 





ुतरपौत्रान्‌ प्रदेहि मे ।। गएदच धान्यं च वासांसि दचात्सवं स्वशक्ति: ।। २७॥। 
दत्व तु ब्राह्मणे स्वं स्वयं भुञ्जीत वाग्यतः.|। मोदकापुपमधुरं क्वणश्नारर्वाज- 
तम्‌ ।। २८ ।! एवं करोति यश्चन्द्र तस्याहं सवदा जयम्‌ ।¦ सिद्ध च धनधान्ये च 
दादामि विपुलां प्रजाम्‌ ।। २९ ।। इत्युक्त्वान्तदंधे देवो विघ्नराजो विनायकः ।\ 
तद्व्रतं कुर कुष्ण त्वं ततः सिद्धिमवाप्स्यसि ।\ १३० ।। नारदनवमुक्तस्तु ब्रेतं चक्रे 
हरिः स्वयम्‌ ।। भिश्यापवादं निमृज्य ततः कृष्णोऽभवच्छुचिः ।। २१ ।। ये श्युण्वन्ति 
तवास्यानं स्यमन्तकसणीयकम्‌ ।\ चन्द्रस्य चरितं सवं तेषां दोषो न जायते \\ ३२॥ 
भाद्रशुक्ल्चतुर्थ्यां तु कवचिच्चन्द्रस्य दशेनम्‌ ।। जातं तत्परिहाराथं श्रोतव्यं सवमेव 
हि।। ३३।। यडा यदा मनःकष्टं संदेह उपजायते ।। तदा तदा च श्रोतव्यमाख्यानं 
`  कण्टनाङनम्‌ \! एवमुक्त्वा गतो देवो गणेशः कृष्णतोषितः ।! ३४ ।। यदा यदा 
परयति कार्यमुत्थितं नारी नरश्वाथ करोति तद्ब्रतम्‌ \। सिद्धयन्ति कार्याणि मने- 




















प्रसिद्ध पुत्र सत्राजित भौर प्रसेन भौ इस दारकापुरीमं निवास करते थे ॥! १४ ।१ इनमें बुद्धिमान्‌ खघ्राजित 
सु नारायण भगवान्‌का परमभक्त था । इस विये यह समुद्रके किनारेषर सुमे ही अपने मनको लगा \\! १५॥। 
घोर निरशन ब्रतरूप तपको सूर्यम दृष्टि बांधकर करने लगा सुथेनारायणडसके तपसे प्रस होकर समीप आ 
` उपस्थित हुये \\ १६ ॥! सव्राजितभी भगवान्‌ सुयंकी स्तुति करने र्गा कि, है तेजके पुञ्जरूप देघदेव ! 
आपको प्रणाम है, है देव ! आप सब जर सम्मुखसे हौ सदा प्रतीत होते हो, एेसे जपके लिये प्रणाम है ¦! १७) 
आप समस्त विहवमे व्याप्त हो, आपके विये प्रणामं है, समस्त जगत्‌ आपका स्वरूप है अतः ठेस विषवशूपके 
लि प्रणाम है, हे क्यप नन्दन ! है हरिद्दद ! (ह्रे रंगके अरव हैँ निसके) एसे जापके लिये प्रणाम है 
1 १८ ॥} हे ग्रहके अधिराज ! आपके लिये प्रणाम है आपका तेज बहुत प्रचण्ड है, अतः आपके लिये प्रणाम 
` हैओरहे प्रभो ! ऋग्‌ यजुः एवं साम ये तीनों बेद ओर समस्त देवता आपके स्वरूपे हू अतः आपके लिये 
` प्रणामहै।\। १९1) हे देवे { है दिवाकर | आय मुद्धपर प्रसच्च हो ओर वात्सल्य पूणं दृष्टिसे मेरी रक्षा करे \, 
 नस्दिकेहवरजी सनत्करुमारसे कहते हँ कि, है सनत्कुधार ! एसे जब सत्राजितने स्तुति कौ तन सूर्यनारायण 
प्रसन्न हो । २० \\ स्तेहसे पूर्णं गम्भीर मधुर ध्धनिसे सत्राणितको प्रसन्न करते हुए बोरे कि, हे महाभाग 
` सत्राजित ! तुम्हारे प्रेमे मे प्रसन्न हु, अतः तुम्हारे मनम जिस पदा्थकी इच्छा हौ उसीको मांगो, मे तुम्हारे 
लिये यथेष्ट वर दूंगा \। २१ ।। सत्राजित बोला कि, है भस्करदेव { यदि अप मुञ्षपर सन्तुष्ट हुये हे तो आप 
मृशते स्यमन्तक सणि दे दें ।\ २२ ।। सूयं देवने अपने कंठसे रत्वको उतार कर सत्राजितको दे दिया ओर बोले 
कि है सत्राजित ! यह महामणि प्रतिदिन आठभार वर्णको उगलती है \। २३ ।\ पर इसको पवित्र होकर ही 
अपने कण्ठमें धारण करना, क्योकि हे सत्राजितं ! अपवित्र अवस्थामें धारण करनेसे यह मणि धारण करने 
वालको क्षणभरमें ही भार देती है । एेसा कहकर तेजोराशि सूर्यदेव अन्तहित हो गये \\ २४ \} सत्राजित उस 
स्यमन्तकमणिको अपने कण्ठमें धारण कर चमकता हु कृष्ण भगवान्‌की द्वारिकापुरीमं शीघ्र ही प्रविष्ट 
 हृभा, उस समयमे स्यमन्तकमणिसे सूयक तरह चमकत हुए सत्रानितको देखते ही द्वारकानिवासी समस्त 
` जनोकी आंखे बन्द होगयीं ओर उसे मनम सूयनारायण-समस्च \! २५! सबने भगवान्‌ शरीङ्ष्णचन्रके समौप 
 दौडकर निवेदन किया कि, हे भगवन्‌ जनार्दन ! आपके दशन करनेको साक्षात्‌ सूयदेव आरहा है । श्रीकृष्णचन् 


फिर जब वह्‌ प्रसेन घोडेपरं चढकर 


सिको मामे ही मारकर उससे वह मणि त ग 
































व्रतराज 





सिहके पादचिन्हयंकी खोजं करते हए कुछ आगे गये तो वह सिह भी मरा हुजा मिला भौर खोज करनेसे ज्ञात 
हआ कि †सिहको मारनेवाला कोई भयंकर ऋक्च है, अतः उस ऋश्चराजकी खीज करते २ कुछ दूर गये तो एक 
अत्यन्त भयानक गृहा देखी, इसमें बहुत गाढा अन्धकार था ओर बह गुहा चारसौ कोश्च लंबी थी । अपने अनू- ` 
यायी अन्यलोगोको बाहरही ठहराकर अपने तेजसे गृहाके अन्धकारको दूर करतेहुए उसके भीतर घुस गये, ` 
एग बहुत सुदृढ महलमे परमतेजस्वी जाम्बवान्‌के श्ूलनेपर शूलते हुए कुमारको एवम्‌ उसके कषूलमें अपरिमित 
कान्तिवाी ।! २५ ।। ३६ ।। उस्र मणिको भी भगवान्‌ कृष्णने ल्टकते हुए देखा तथा वहीं रूप ओर यौवनसे 
संपन्न जाम्बवती नामकी लडकीको भी देखा 1 ३७ ।! जो डोरेको हिला रही थी उस सुन्दरी हसनेवाली 
सुन्दरीको देखकर कमलनयन कष्णजीको भी बडा विस्मय हुञा । वो स्रूलाको हिलाती हुई इसं गीतको गा 
रही थी ।! ३८ ।। कि सिहुको प्रसेनने मारा, उस सिहको जाम्बवन्तने मारदिया, ए सुकुमारक ! तु रो क्यों 
रहा हे ? यह्‌ स्यमन्तकमणितेरा हीह ।। ३९।। जाम्बवती कमलेक्षणं ष्णचन्द्रको देखके कामज्वरसे 
पीडित हयी प्ेमपर्यक बोली कि, हे सुन्दर ! आप यहांसे जाओ ।\ ४० ।1 इस रत्नको रेकर क्ञट यहांसे भागो. 
जबतक किं मेरा पिता जाम्बवान्‌ शयन कर रहा है, (तबतकही तुम्हारा यहां जीवन रह्‌ सकता है. पश्च्चात्‌ ` 
नही रहेगा । ओर मं इस तुम्हारे कोमलसुन्दर शरीरको देखके मदनात्तं हो रही हु. पर क्या करू यह बहुत 
भयंकर परक्रम हे मे यही चाहती हूं कि, तुम्हारेको इस मणिकौ यदि इच्छाहै तो इसे केकर जैसे अये हौ 
वेसेही प्राण बचानेके लिये भागो, ठरो मत) जाम्बवतीके एसे कचन सुनकर अकुतोभय प्रतापी ष्ण भग- 



























 मणिको केले, फिर बह मणि मेरे उपभोगमं रहेगी इसमें आप सन्देह न समन्ने 1 ५६ ।। जव श्रीङष्णचन््रने ` 
.  अपनासंकल्प प्रकट किया, तो शतधन्वा भयसे संत्रस्त होकर अक्र रको अयने पास बुला, स्यमन्तकमणि उसे 
देदी।। ५७ 1\ जौर जाप घोडीपर चठकर दक्षिण दिशाको जोर जोरसे भागा, बरूदेषजौ तथा भ्रकृष्णये 
। दोनों भाई स्थे बैठकर शतधन्वाके पीछे दोडे ।\ ५८ ।! (वह्‌ घोडी चारसौ कोशा ही जासकती थी, विशेष 
।  दौडनेकी उस घोडीमे साम्यं नहीं थौ) उस घोडीने चारसौ कोरतक दोडकी, फिर अपने प्राण छोड व्यिः 
।  धोडीके मरनेपर शतधन्वा अपने प्राणोकी रक्षके लिये पदाति होकर दौडा तो भगवान्‌ श्रीङृष्णने भी पदाति ` 
` होकर उसके श्िरको (सुदोनचक्रसे ) काट दिया ।। ५९ ।1 बलदेवजी उस सभय रथमेही बैठे रहै थे, पर 
 . श्रीकृष्णचन्द्रजीने रत्नके लोभसे ये सब काम किये थे, शतधन्वके पासमं खोज करनेयर भो सणि न भिलीतो 

` - बल्देवजीसे बोठे ।! ६० \! कि, मैने मणिकी खोज की पर नहीं मिली \ बल्देवजी इन वचनोंको सुनकर अत्यन्त 
नाराज होकर कहने खगे कि, हे कृष्ण ! तुम सचमुच सदासे ही कपटी, लोभी एवं पापकम्मेकारी हौ ।\ ६१ \। 
घनके लिये अपने बान्धवको भी मारनेसे पराङ्मुख नहीं होते, इसी ल्व एसा कौन बुद्धिमान्‌ बान्धव हौगा जो ` | 
आपके विवाससे सुखी रखना चाहे ओर तुम्हारा आश्नय र ? भगवान्‌ श्रीकृष्णचन््रने अयने इस लांछनारोपको ` 
भुनकर बल्देवजीको अनेक शपथे खाकर प्रसन्न किया ।\ ६२ ।। बर्देवजौ-हाय कंसी दुःखकौ वार्ता है किः 
`  बान्धवभौ धनके लोभसे अपने बान्धवकौ हत्या करनेसे पराङ्मुख नहीं होता संसार बेडा बुरा है, इस प्रकार 

` कहकर विद्भराडकौ राजधानी मिथिलाम चले गये ओर श्रीकृष्णचन्द्र अपने रथम जैठकर दारकाकीौ चकते 

आये ।\ ६३ । द्वारकानिवासी लोगोने एकाकी श्रौकृष्णचनद्रको वापिस आये हुए देखकर निन्दा करना 
आरम्भ किया कि, यह्‌ कृष्ण भला मनुष्य नहीं है, इसने रत्नके लिये अपने बली बडे भार्दकोभी द्वारकसि निकाल 
दिया ।\ ६४ ।\ जगन्नाथ श्रीकृष्णचन्द्र द्वारका निवासियोकी दोषारोपोकितिको सुन, घोर, पापिष्ठके समान = ` 









































बा बराह्मणोको त 7 संतुष्ट किया ।\! ६७ \। सूर्यकी स्यमन्तकमणिको पवित्र होकर धारण करनेवाला जहां निवासं 

करता है बहां भिक्ष, रोग, अतिवृष्टि, अनावृदिट, खेतोमे मूसोका ल्यना, टौडियोकरा उपद्रव, पक्षियोसे ` 

हानि, राजाओंका द्वेष महामारी तथा सपे आदिके उत्पात नहीं होते 1! ६८ ।। यद्यपि भगवान्‌ सब जानतेथे 
जनोकी तरह लोकाचार, माया ओर अज्ञानका आश्रयसा केकर बोले कि ।! ६९ ॥ भाइयों 


लांछन म्‌ कषे भिर गया है इसमे सबकी सब श्रूटी बाते हं मं कंसे सहं \\ ७० ।} भगवान्‌ ््‌ 1 












क 
























 सुष्टिसंहारकारक ! आपके लिये प्रणास है ।\ ८० \\ जौ मोदकादिकोसे प्रयत्नके साथ. गणपतिका पूजन 
करता है उसे निषिघ्न सिद्धि होती है इसमे सन्देह नहीं है ।\ ८१ । सुरद बा असुर हौ गणेश्नजीका विना 
पुजन किए सिद्धि चाहते हैँ बो सौ कोटि कल्पसे भौ नहीं पा सकते ।॥ ८२ \\ है गणाच्यक्ष ! आपकी भक्तिके 
ही प्रताप से विष्ण्‌ सदा षृष्टिका पालन करते हः शिव संहार. करते है, म भी आपकी भक्तिसे बलपाकर 
सुष्टिकी रचना करता हं \\ ८३ ।! इस प्रकारं ब्रह्माजी स्तुति करनेयर देव २ गजानन परम प्रसन्न होकर 

` जगत्पति प्रजापतिसे बोरे ।! ८४ ।। है ब्रह्मन्‌ ! जो तुम्हारे सनमं कामना हौ वही मांगो, सं दुगा । ब्रह्माजी 
बोले कि-हे प्रभो ! त्रिलोकीकौ रचना करनेमं किसी भी प्रकारका विघ्न न हौ, मं यही वर मागता हुं ।। ८५1} 
गणपतिजीमे कहा कि, अच्छा एेसाही ही, तुम जो त्रिखोककी रचना करते हौ उसमं किसीभौ प्रकारका 
, विघ्न न उपस्थित होगा । फिर अपने हाथमे लडड्‌ खेकर शनेः हानेः सत्यल्ेकसे नीचेकी जोर आकाश्मागंसे 
अने लगे ।\ ८६ \\ चलते चलते चन्दरमाके भुवनमें पधारे, चन्द्रमाने उनका लम्बा पेट देखकर उनसे अपनी 
सुन्दरताको उत्तममान उनकी दिल्लगी कौ ।! ८७ ।।! गणपति चमाकी ओर देख कोपसे अरण नेत्र करके 
श्याष देनेलमे कि, रे गर्व चन्द्र ! तुके यह अभिमानं है कि, सं देखमेके योग्य सुरूप हूं ।। ८८ \} अस्तु अब तुद्े 
गर्वकरनेका फल जल्दी भिकेगा, आज (भादवा सुदि चतुर्थी) के दिन तुञ्च पापात्माको कोई भौ लोग नहीं 
देखेंगे ।।! ८९ ।\ ओौर यदि कोई मनुष्य प्रमादवड तेरा देन करभी लगे बे सभी सूठे कलंकके जरूर ही भागी 

 . ` -बनेभे 11 ९० 1) जब गणपतिजीके भयंकर शापको सुनकर सब लोकोमं महान्‌ हाहाकार मच गया, चन्द्रमाभी 
` अत्यन्त मलीन मुख करके लज्जाका मारा जक्के भौतर चला गया ।\ ९१ 1! ओर जलके भीतरभी कुमुदमे 
अपना वासकरने लगा, तब सब देवता, ऋषि ओर गन्धव निराज्ञ एवम्‌ दीनमना होगएु ।। ९२ ।। पीछे इन््रको 
, अग्रणी करके ब्रह्माजीके पास गये, वहां जाकर उन्होने ब्रह्माजीको गणेशजी ओर चन्द्रमाका सब वत्तान्त 
सानुनय कहुसुनाया \\ ९३ \! कि महाराज गणेश्षजीने यह शाप चनद्रमाको दिया है, फिर भगवान्‌ ब्रह्माजी 


सोच विचारकर देवताओंसे कहने लगे कि ।} ९४ ।\ हे देवराज ! तुम गणेशजीके प्रभावको जानते ही हो 
गणेशजीके दिए शापको कैन अन्यथा कर सकता है ? न महादेवजीमें न मेरे (ब्रह्मा) में ओर न विष्णुमेही 


























































श्वाभाविक महच्वकी ओर दृष्टि देकर म॑ने जो अपने सौन्दयेके गव॑से आपका हास्य किया था उस अपराधको 
 क्षमाकरिए्‌ ।! ४ ।। मेने जान लिया है कि, जो मनुष्य आपको महिमा को न जानते हए आपकी पजान कर 


अतः आप हास्यकरनेके अपराध को क्षमा करो ।! १०६ ।! जव चंद्रमा एसे अपने अपराघकी इसप्रकार 
क्षमा मांगी; तब गणपतिजी बोले कि, हे निसाकर ¡ म॑ तुम्हारे पर प्रसन्न हु, तुमको जो वर चाहिये सो मासो 
मेँ दगा ।! १०७ ।। चनद्रसाने पिर प्राथेना कौ कि, है गणाधिराज ! आपके अनुग्रहुसे मे पहिलेके साफिक 
ददीनीय ओर आपके श्ञापसे निमुक्त होजाऊॐ, यही बर मागता हूं ।। १०९ ।। गणेशजीने कहा है 


गणेशजीने फिर कहा कि, जो लोग भाद्रपद शुक्लाचतुरथोकि दिन ही चन्द्रमाका दर्शेन करेगे तो ये | वर्वपरनत 
५ ह अवक भागी होंगे \। १११ ।। किन्तु जो शुक्लपक्षकी पहिलीतिथिमे यानौ भ्रुक्ला द्वितीयके 





प्रकार गणेशका पुजन करके विधि पूर्वक कथा सुने, तत्पश्चात्‌ इस मंत्रसे मेरी मूतिको ब्राह्मणके ल्यि दे 
दे १२५1) कि, हे देवकि देव ! हे गणेश्वर ! आप इस दानसे प्रसर हं । है देव ! मेरे सभौ कायं सदा सव 
जगह निघ्न पुणं हों, मेरा सर्वत्र आवर हय, मुने राज्यसम्पत्ति भिक, मेरे पुत्र पौत्नन सम्पत्ति बडे \ एेसा आप ५ 
मृञ्चपर अनुग्रह करे । त्रत करनेवाला अपनी धनसस्पत्तिके अनुसार गो, धान्य ओर वस्त्रोकोभी ब्राह्यणोके 
.लिये दे ॥ १२७ ॥। ब्राह्यणके दान देनेके बाद मौनी होकर मधुर सोदक ओौर परडोका भोजन करे, पर लवण 
एवं क्षारके पदार्थोका भोजन न करे ।! १२८ 11 है चन्द्र ! जो मनुष्य इस प्रकारं ब्रत करते ह, उनकी सदा 
जय होती है । मे उसके लियं अणिमा आदिक मुख्य तथा आकाश गमनादिक गोण अथवा काय्यं सिद्धि एवं 
धन धान्यकौ सस्पत्तिप्रदान करता हूं \ सन्तानसुखको बढाता हूं \! १२९ ।1 इस प्रकार पूजनविधि ओर उसका 
माहात्म्य बताकर भगवान्‌ गणपणिजी अरन्तहित होगये । हे श्रीकृष्ण ! आप भी मिथ्या अपवादको शान्तिके 
लिये गणपति ब्रतको करो, इससे वुम्हारौभी सिद्धि होगी \\ १३० ॥ नारदजोने त्रत करनेके लिये कहा तथा 
भक्तोके पाप दुलोको हरनेवाले स्वयम्‌ कृष्णचन्द्रजीने भी इस गणपतित्रतको किया वे इस व्रतके प्रभवसे ही 

मिथ्यापवादको धोकर शद्ध हो गये ।\ ३१ ।। जो लोग तुम्हारे उस स्यमन्तकमंणिवारे आख्यानको सुनेगे उन 
 लोगोकेभी भाद्रगक्ला चतु्थौमें चन््रदेन जन्यदोष स्पहं नहीं करेगा ।। १३२ ।। हे श्रीकृष्ण ! तुमने किसी 
समयमे भाद्रश॒क्ला चतुर्थीको चन्दरदेन किया था । इसीसे तुम्हारे यह दोष लगा है \ एेसेही जिनके भद्रुक्ला 

` चलु्थोके दिन चन्द्रदहोन करनेसे मिथ्या अपवाद लगे, बेभी उस दोषकी शान्तिके लिये इस समस्त चरितको सूनं 


क्रतं चरेत्‌ ।। सवसिद्धकरं नृणां सुखं चैत्र सुरेववर ॥ तद्विधिः-ति 











५) 







कारक ।। भक्त्या पाद्यं मया दत्तं गृहाण गणनायक ।! एतावानस्येति पाम्‌ । 
व्रतमुद्िश्य विघ्ने गन्धपुष्पादिसंयुतम्‌ ।। गृहाणाध्यं मया रत्तं स्वंसिदधिम्रदायक ।\ 
 त्रिषादुध्वे इत्यध्यम्‌ \\ गणाधिप नमस्तेऽस्तु गोरीसुत गजानन ।! गहाणाचमनीयं 
त्वं सवेसिि ण 
परिपुजित ।\ स्नानं पञ्चामृतं देव गृहाण गणनायक ।! आप्यायस्वेति दुग्धम्‌ \1 
दधि क्राल्णो इति दधि ।! धुतं मिमिक्ष इति घृतम्‌ ।। मधुवातेति मधु ।! स्वाद्‌ 


इति पंचामृतस्नानम्‌ ॥ गङ्घाजलं समातीतं हेमाम्भोरुह- 
वासितम्‌ ।। स्नाने स्वीकुरु विष्नेश्ञ कपदिगणनायक ।। यत्पुरषेणेति स्नानम्‌ ।। 
हरिद्स्त्रह्यं देव देवाद्धवसनोपमम्‌ ।। भक्त्या दत्तं गृहाणेश लंबोदर हरात्मज ।। 




























न 


7 


यत्युरुषमिति धूपम्‌ ।! गृहाण संगं देव .घृतर्वातिसमन्वितस्‌ ।\ दीपं ज्ञानप्रदं चार 
शदभ्रिय नमोस्तु ते ॥ बराह्मणोस्येति दीयम्‌ ।। नैवेयं गृह्यतां देव ०।। चन्दरमायनस 
इति नेवेद्यम्‌ \। आचमनीयम्‌ ।! इदं फलमितिफलम्‌ ।! पुगीफल्मिति तांबूलम्‌ ।\ 
हिरण्यगर्भेति दक्षिणाम्‌ । अग्निरज्योती रविज्योतिर्ज्योतिरग्निविभावसु 


ज्योतिस्त्वं सवदेवानां गणाधिप नमोऽस्तु ते ।॥ नीराजनम्‌ ॥। यानि कानि च० 


नास्या आसिदिति प्रदक्षिणाः ।\ नमोस्त्वनन्ताय० सप्तास्यासन्निति नमस्कारः \ 
गणाधिप नमस्तेऽस्तु नमस्तेऽतु गजानन ।\ लबोदर नमस्तेस्तु नमस्तेस्त्वम्बिका- 


सुत ।\ एकदन्तं नमस्तेस्तु नमस्तेऽस्तु भवप्रिय ।। स्कन्दाग्रज नमस्तेऽस्तु नमस्ते 





\ च 


अथ ब्रह्मचारिपजा-मकणान्मुष्टिगणितांस्तण्डुलान्सवराटकान्‌ ।। विप्राय बवे ` 
दचाद्गन्धपुष्पाचिताय च ।\ तण्डुलान्वे ततो दद्यात्पाकं चासं च शोभनान्‌ ।। 


१४. £ 

























थादविदानीं श्रूयते कथा ।\ १५।। पावेत्युवाच ।। किमर्थ तद्रतं नार्यो युष्माभिः ` 
क्रियते वने ।। फलमस्य किमस्तीति पावैती प्राह ताः प्रति ।! १६॥।। स्तरिय ऊच्‌ः ।' 
पृच्छयते ¶कि त्वया देवि नरेर्नारीभिरम्बिके ॥ अभीष्टसिद्धिरस्मात्तु लभ्यते 
भुवनत्रये ।\ १७ ।\ इति शरुत्वा वचस्तासां पावती प्राह॒ ता भुवि ।। मत्तः कुपित्वा 
भगवालिगंतस्तु महंश्वरः ।। १८ ।। तस्य सन्दशेनायेव करिष्ये व्रतम॒त्तमम्‌ ।! 
त्रतस्येतस्य कि दानं विधानं कौदृञं मम ।। १९ ।। सवं विचिन्त्य मनसा कथयन्तु 
सुराङ्धनाः ।। स्त्िय ऊचुः \\ कालो विधानं दानं च व्रतस्यास्य फलं तथा ।। २० 
तत्सवं सावधानेन वक्ष्यामः श्यणु पावंति।।पातादिदोषरहिते सचतुर्भानुवासरे।२१। 
मासे कायं व्रतं सम्यग्गणेज्ञापितमानसंः ।। तेलताम्बलभोगादीन्वजेयित्वा शिव- 
प्रिये ।। २२ ।। मन्दवारे तु भुञ्जीयादेकवारं भितं यथा ॥। प्रातःकाले शुचिर्भूत्वा 
स्नानकुर्याद्विधानतः ।। २३ ।। वापीक्‌पतडागेषु नद्यां शुक्लतिलेःसह्‌ ।। संध्या- 
दिकं यथान्यायं ववं निवेत्यं यत्नतः ।। २४।। अर्चनागारमासाद्य गोमयेनोपलिप्य 




















सुमह & 


` तन्मध्ये गणनायकम्‌ ।। पजयेत्स्वच्छकुसुम्हरिद्रामिधिताक्षतेः ।॥ २६ । गांगीं 
गे गो गज्च न्यासं कृत्वा ततः परम्‌ ।। मन्त्रेणानेन कुसुमेदेवमावाह्य निक्षिपेत्‌ ` 
२७ ।! अथवा गणनाथस्य प्रतिसामथ पूजयत्‌ ।। ततस्तद्गत? त चित्तः सन्‌ ध्यानं 






तस्य माहात्म्यं ज्ञातुं वाज्छितवान्‌ स्वयम्‌ ।\ उद्िङयागमनं विष्णोरकरोत्तद्ब्रतं 
वः ।। ४४ ।। तदानीं गरुडारूढः समागत्य तमब्रवीत्‌ \\ मदागमनिमित्त 


माधव ।! विष्णुरुवाच ।। प्रयोजनं नास्ति विधे तवागमनकारणम्‌ ।\४७।। 

व्रतं किच्न्चि्धूवत्येव न संशयः \\ इन्द्रागमनमुद्िश्य-तदानीं तेन तत्कृतम्‌ \\४८ 
आगत्य सहसा सोऽपि ममाज्ञापय विदवसृट्‌ ।। विधिस्वाच । हेरम्बव्रतमाहात्म्य 
्ष्टुमेवं कृतं मया ।\ ४९।। ममापि ज्ञापनीयं तदत्यु क्ते विधिनोदितम्‌ ।\ विक्रमा 














५ ४ 








ह-अ 
व्रतं देवि सामथ्यं नास्ति मेऽधुना ।\ ६९६ ।। देव्युवाच । विकमाकंपुरे सर्व वेदयो 

शास्यति तत्कर ।! कपर्दीशत्रतेनेव मन्वरत्वं प्राप्स्यसि ध्रुवम्‌ ।। ६७ ।। दारिद्र- 
॥ ध मोचनं सम्यग्भविष्यति न संशयः ।। सूत उवाच ॥! गृहं प्रतिसमागम्य गृहीत्वा 
 तण्डलाद्दरिजः !। ६८ ।। वेदयाद्गहीत्वा तत्सवं तदानीमकरोद्त्रतम्‌।।तस्मिन्चकं ` 
रे विप्रस्तन्मन्त्ित्वमवाप सः \। ६९ ।। आक्ञातयत्कपर्दीश ब्रतं वैश्यस्य तक्ष- 



















मः ।। ७३ ।! इत्यपुच्छन्मुनीन्सर्वान्‌ दातव्येषा ममाद्खना 
त्युक्त्वा ते तां तस्मे समर्पयन्‌ ।।! ७४ 1 समं महिष्या स्वपुरीं 


4 


ओर ओं सहस्रशोर्षा पुरुषः" इस वैदिक मन्त्रसे आवाहन करे फि, हे विनायक ! हे पावंतीके चरीरसे उत्ते 
हए मेलसे प्रगट हौनेवारू ! आपके लिये प्रणाम है, आपकी प्रीतिके लिये जो मे पुजा करता हूं उसे आप ग्रहण 


करिये अलंकार' इस पौराणिक तथा भम्‌ पुरुष एवेद ' इस वैदिकम स्त्रे आसन प्रदान करे कि,अलंकार एवं 


राज { आपके लिये भक्तिसे मेने पादय प्रदान किया है जाप इपे ग्रहण करिये श्रतमुदिश््य' इत्यादिक पौराणिक 

एवं त्रिपादध्वं इस वेविक मन्न्रसे हस्तप्र्षालनाथं अष्यं प्रदान करे । अथं यह है कि, है विघ्नेश्वर ! मेने ब्रतकी ` 
सद्गुणाके लिये गन्ध पुष्पादिसे युक्त अघ्यं प्रदान किया है, हे समस्त सिद्धियोके प्रदायक ! आप इसे ग्रहण 
करिये “ गणाधिप" इस तान्त्रिक एवम्‌ "तस्माद्विराडजायत" इस वेदिक संत्रसे अचामनीय प्रदान करे कि 








` कतनिः `  हिन्दीदीकासहित (२९५) 








कादि गणेडा १ आपके लिय मेने ये सुगन्धित ष्य समर्यण किय है आप इन गहण करिये फिर शं कदि = ` 
गणनाथाय नमः पादौ पुजयाभिः इन स॒लके के्‌ मत्मोसे गणेशजीके चरणादि अद्खोकी अलग अलग पूजा र 


करे । इन चतुर्यंन्त गणपति वाचकं पदोके आगे नमः: इस पका, द्वितीयान्त पादादि मङ्खः वाचक पदोके ` 
` आगे धूजयामि' इस क्रियापद्का प्रयोग है ! अये स्पष्ट है । कि कपदि गणनाथ आदिके ल्यि नमस्कारहै पाद 


जान्‌ ऊर आदिको पजता हं \ ये बारह नाम हे इनसे करमशः बारहो अंगोकी पुजा होती है । अथं जवरणपुना- ` 


श्ञानके ल्यि नमस्कार, अधोरके लिये नमस्कार, तत्पुरुषके लि नमस्कार, वामदेवके लिये नमस्कार, सद्यो- 


जातके लिये नमस्कार इ नसे पिरे आवरणकी पुजा करनौ चाहिये । वकुण्डके लिये नमस्कार, एक दन्तकेषि° ` 1 










महोदयके° ; गजामतके० बिकरटके ०, चिष्नराजकेऽ, धश वणेके०, विनायकंकेल्ि नसस्कार इनसे दूसरे ` 1 


 आवरणकी पुजा होती है । ब्राह्यीके ०, माहेदवरी०, कौमारी ०, वेष्णवी०, वाराही ०, इच्धाणी०, चमुण्डा° ` ~ . 
ओर महालक्ष्मौके व्विये नमस्कार इससे तीसरे जआवरणकी पूजा होती है । इन््रके लिये अग्निके लिये, यमके ` ` 







| । ` वरण लिये, वायुके, व्यि, सोमके लिये, ईशानके लि, वरुण ओर नैतिक बीचमें अनन्तके लिये इन्र भौर ्‌ 
लके बीचमं ब्रह्माके लिये नमस्कार है, इनसे चौे जावरणकी पूजा होती है । वज्र ०, शवित०, दण्ड ०, खङ्ध०, ` 





पा, अश्च, गदा०, त्रिसूख०, चऋ०, ओर कमलके लिये नमस्कार, इनसे पांचमे आवरणकी पुजा होतीहै। ` 


 दशद्धम्‌' इस तांनिक “भोयत्युरुषम्‌'' इस वैदिक मन्त्से धूप करे कि, हे पावेतीनन्दन ! चन्दन ओर अगरसे 















= कौ ौराणिक ओर “ओं ब्राह्मणोऽस्य इस वेदिकमन्त्रसे दीपक प्रज्वलित 1 
फिर हाथ धोवे । हे ंकरप्रिय ! आपके समीप यह माङ्गलिक सुन्दर घीसे परणं ओर बत्तीस युक्त प्रकाशस्वरूप ` 











सुगन्धित इस दंग गुर्गलकी धूषको ग्रहण करके घर प्रदान करो, मेरे आपको प्रणाम हे । शृहाण' इस = ` 
तं करके दीपककौ ओर अक्षत छोड, ` 





छी देती हं ।\ ४ । । मतीत एसे यनो सुनकर महादेवजौने कहा कि, हे अम्बिके ! एेसा कौन हो 
आपका सर्वथा विदवास न करे, फिर में आपका विश्वास न करू यह तो कभी हो ही नहीं सक्ता \\ ५ ॥ 


वेषयमें विचार समन्चकर महादेवजौने अपने त्रिशूकको पणके रूपमे रखा ओर सभी देवता्ओंको हारजीतके ; 
अनुसन्धानके लये साक्षिरूपसे स्थित किया ।\! ७ ।\ पावेतीजीने जूएमं बह दाव जीत च्या । एेसेही महा- 
देवजौने जो जो अपने मर आदि उपकरण दावथर धरे वे भौ सब पववेतीजीने एक एक करके जीत व्ये 





तताम 




















(२१७ 








वषट, ओम्‌ गे कवचाय ह, ओम्‌ गौं नेत्रनरथाय वौषट्‌ जोम्‌ गः अस्त्राय फट्‌, इसे अद्धन्यासं कहते ह । 
` निस मंत्रसे अंगन्यासं ओर करन्यास कहे हं ¦ इसी मंत्रसे गणेशजीका एूलोसे आवाहन करके एूलोको बिखेर 
देना चाहिये ।। २७ ।\ अथवा इसके पीछे गणेशजीकी प्रतिमाका पूजनं करना चाहिये, पीछे गणेडजीमे ही 
` चित्त लगाकर विधिपुवंक ध्यान करना चाहिये \। २८ ।\ एकदांतवाके; महानस्थूलडरीरवारे, लम्बे उदरः 
` वाले, गजमुखके सदृश मुखवाले विष्नोके नाशक ! हैरम्बदेवको प्रणाम करता हं ।\ २९ ।\ फिर प्राथेना करे 
कि, हे ईश्च { है कपदिगिणनायक ! आप यहां पधारकर इस पजनको अङ्गीकृत करिये, है कपदि गणनायक । 
आओ आओ आओ" इस प्रकार आवाहन ओर “अस्मिन्नासने सुस्थिरो भव" इस आसनपर बेव्यि इससे 
 आसनोपवेशनादि करे ।\ ३० ।1 हे पार्वति ! पौराणिक मन्त्रोसे पुजन करे । अथवा पुरषसुक्तके षोडशा मन्तरोसे 
 धोडद्ोपचार सहित पूजन करे \ या “ओम्‌ नमः कपदिविनायकाय'' इत्यादि भन्त्रसे पूजनं करना चाहिये 
1 ३१।। इसं पजनम गन्ध पुष्प एवं चावल आदि जो भी कुछ गणेशजीके भेट चढावे, वे सब अन्यत्र कहे 
हए तान्तिक गन्धादिकोके मन्त्रोसे चढाने चाहिये, गणेशजीके समीपम हौ इन्द्रादि रोकपालोका पुजन करना 
चाहिये यह्‌ अथं है, है लम्बोदर ! हे पावेतीनन्दन ! है एकदन्तं ! हे मनोरथोको पुणं करने- 














कपदिगणेशजीके पजनका विधान हमने 


एसे ५ 





पा कि, हे प्रभो ! आप मुक्षे आज्ञा दे । ब्रह्याजीने कहा, गणेश्रतके माहात्म्यकी परीक्षाके लिये मेने यहं 
किया था ओर कुकछभी प्रयोजन नहीं है ।। ४९ \! इन्द्रके पुखनेपर ब्रह्माजीने इन्रसे कहा फिर इने राजा 
विक्रमादित्यको देखनेके लिय यही त्रत किया ।! ५० \1 विक्रमादित्य इन््रके पास गया ओर पूछा कि,मे 
मनुष्य हं, आप देवताओके प्रभु ह, जप आज्ञा दं जाप मुञ्चसे क्या सहायता चाहते हं । तब इन््रनेकहा कि, ` 
` कपदि गणनाथका व्रत केसा प्रभावन्ारी है ।\ ५१ ।। इस बातकौ जांच करनेके लि ही किया था, जो चाहता 
था वह्‌ मिल गया, राजाने कहा कि, आप मुञ्चे उसका माहात्म्य ओर विधान बतायं ।। ५२ ।} राजा विक्र- 
मादित्यने बडी उत्युकताके साथ पुछा था पौ इन्द्रसे व्रत विधान सुनकर अपनी राजधानी चला जाया 1 ५३॥ ` 
पराक्रसके लगे रहनेवारे.राजाने रौटकर कपदि गणयतिके ब्रतको रानियोके सामने कहा ॥ ५४ । कि 
वैरि्ोको जीतूंगा, बड़ी भारी उच्नतिको पाऊंगा, यह्‌ सुन राजमहिषी राजासे पूछने लगी किं, उस ब्रतकरा ` 
दान क्या है ।। ५५ ।। विक्रमादित्यने उत्तर दिया कि एक कोडी दान दी जाती है, रानौ जाके मुखसे यह 
सुनकर उस व्रेतकी निन्दा करने गी ।। ५६ ॥ यही है तो आय मेरे घर इस ब्रतको न करें दुसरी किसी जगह 
कर ठेना, एसे कपदि गणनाथ मेरा क्या भला कर सकते हे ।\ ५७ । है नाथ ! जिसका नाम ही कोडी होमे 
त्रतको क्या करूगी ? एेसेही अनेक प्रकारके दूषण देनेके कारण शीघ्र ही कुष्ठिनी ओर व्याधिता होगरई ।। ५८॥\ ` 
कुष्ठ तथा अन्यान्य व्याधि्ोसे दुःखी रानीको देखकर राजाने कहा कि, आप राज्यसे निकल जायं नहीं तो 


साथ कर सब कल्याण होवे ऋषियोको 
समय दिव्य देह पार । इसी बीचमं पावेतीजीके 


देखने निकले, रास्तेके बीचमं किसी भेष्ठ ब्राह्मणक रुदन सुनकर पार्वती ।। ६४ ।\ बोखी कि ५ हे ब्राह्मण 
क्यो रोताहै?तूरोन) बो ब्राह्मण बोला कि सिवा दारिद्रके मुके कोई दुःख नहीं है 1६५)! एसा सुनकर 
वायतत बोः वे कतौ हक नकौ 


केवल तण्डुल लेकर चला 1! ६८ । अ सब कुछ लेकर उसते ब्रत किया वो विक्रमके नगरमे दौवानं बन ` 





ता 





1 















0.  दशरथललितात्रतम्‌ 1 1 
अथाश्िविनकरष्णचतुर्थ्या दक्ञरथल्लिताव्रतम्‌ 1। तच्च पौणिमान्तमाने कात्तिक 






करिष्यामि तावत्वं सन्निधौ भव \\.आवाहनम्‌ \।नीलकौशेयवसनां हेमाभां कमला- 
सनाम्‌ \। भक्तानां वरदां नित्यं ललितां चिन्तयाम्यहम्‌ ।। ध्यायामि ।। कातंस्वर- 
मये दिव्ये नानामणिसमन्विते ।\ अनेकरत्नसं 






तिगृह्यताम्‌ ।। पायम्‌ ।! दक्षस्य इहितः साध्वि रोहिणीनाम विश्रुते ॥ पुत्र- 
पत्तिकायाथ गृहाणाघ्य नमोऽस्तु ते ।। अध्यंम्‌ ।। पाटलोज्ीरकपुरसुरभि स्वादु 





भे श त्या नित्यमाराधिता मया ।। पुत्रकामनया देवी सर्वान्‌ 


कुर्वाणा गच्छ त्वं निजमन्दिरम्‌ ।। विसर्जनम्‌ ॥। सुत उवाच ।। अरण्ये 
पाण्डवा दुःखकलिताः ।। कृष्णं दृष्ट्वा महात्मानं प्रणिपत्य यथा 








नु 


वि ५ 






१८... 





न 









नारी नसे बा राजेनद्र व्रतमेतत्करोति वै ।यं यं चिन्तयते कामं व्रतस्यास्य प्रभावत- 
त्रं पौत्रं धनं धान्यं जभते नात्र संशयः ।! २१।। इति भविष्योत्तरपुराणे दशरथ) 











जानेवाषमोके हिसाबसे लिखा हुआ मानकर इसकी पणमान्त मासके साथ तुलनाकरें तो यह्‌ ब्रत कातिकं चदि 
चौथके दिन आकर पडता है इसी दिनं इस त्रतको करना भी चाहिये ¦ देशकाल कहकर अयने पुत्र पौत्रादि 
सब कामोकी सिद्धिके लिये दल्लरथ ललिता देवीकी प्रसन्नताके ल्व जो मुक्षे उपचार भिर जायं उनसे पुजन 













आवाहनं तथा नीले रेशमी वस्त्ोको पहिने हृए कमल्पर विराजमान 
उसे मे याद | 










होजा, इससे आसन तथा गंगादि सब तीर्थोकी प्रार्थना करके उनसे शीत पानी ऊ जाया हुः 

नामसे प्रसि हई दक्षकी साध्वी दुहिता ! = ` 
ससे अधे तथा पाटला, खसखस ओर ` ` 
इससे आचमनीय _ 
सहिता पंचामृतके स्नानसे परमेकवरी प्रसन्न होजय, इस मंत्रसे पंचामूत स्नान ` 
“मलयाचल इससे चन्दन तथा “हरिद्रा' इससे सोभाग्यद्रव्य तथा = ` 














= भेष 















गको एकवचनान्त करके अन्तमं 
च्िखे जा चुके हं ।\ यह्‌ पुजन फूलोसे 













लगाकर उस २ अङ्कका पूजन कर देना चाये 
छोडे जाते हे । 











































; मावे, राजाने उता तवत कवा वानो न्ट बन्न राजाने उनका स्वागत किया पीछे वो अच्छे आसनयर विराजमान होगये 1! ५।। वो मुनिष्षेष्ठ, ध 
राजाकौ स्ृतियसि परमसन्ु्ट हए, उनकी भवतिस सन्दष्ट थे हौ इस कारण बोले ।। ६ । हे रानन्र 1 सैः 
, आपपर सनतषट ह, महानाग आप अयनी कौल्य भायि साथ कहिये, ये आका बया धियकह 71 
` कारण बोले कि, यदि आप प्रसन्न ह तो है ऋषिवर ! मेरे कोई सन्तान नही है एला कोह तयं या कोई 
तरत बतादीलिवे ॥ ८ ॥। मुनि बोले कि, है राजन्‌ ! सावधान होकर सुन; म एक त्त कहता हह सा: 
पतर कामना देनेके विषयमे यह्‌ सबसे शवेष्ठ तरत है, इसे सुर असुर सबने क्रिया था ।। ९ ।। चनदरमाकौ रोहिणी, 4. 

 नामकौ परम प्यारी स्त्र है, है राजन्‌ ! उस रोहिणीको ललिता भ कहते ह ।। १० ॥ अमान्त मास आद्विन- = ` 
|  शुक्ल्यक्ष दकषमीसे लेकर आरिवन ृष्णपक्षतकः करना चाहिये, ददामीसे लेक चौयतक, दशदिन त्रत करना = ` 
चाहिये ।॥ ११।। मादिवन कृष्णयक्षको चोयके दिन तो स्नान करके सायकाल भक्तिभावसे विशेषरूपसे ` 
1 पूजन करना चाहिये ।\ १२ ॥ कूमाण्ड, मातुलुङ्ग ओर मतीरे भेट करे । सुगन्धित जुई, चमे आदिक 


। . मती आदिक पुष्य 
| वडा । फर पू दीप, करके दसा मोवकोको भोग लगावे 11 १३ ।। ष्यं ान दपा प देवको शमा ` 



























^ 

















ीकीक्षमा 
 पराचना करै कि, हमने जो पुतरसन्ततिके भवरोघक कमे किये ह उनको आप नष्ट करिये ओर एेसीहृपाकरे ` 
जिसे चिरायु पुत्र सम्पत्ति हो । फिर माङ्कलिकं बाजे बजाकर, गाने गाकर उत सन्तुष्ट करे ।। १४॥ ` (1 
शरीृष्णचन्दर कहते है कि, हे युधिष्ठिर ! चन्द्रोदय होनेपर शंखमें पुष्प, अक्षत, चन्दन एवं जल भरकर अघं 
दे पञ्चरत्न तथा ददा पुष्य भौ उसमें गेरने चाहिये, वो भूमिमे जानू ठेकके चनरमाको देना चाहिये ॥\ १६। 
भ भर्त भौ होने चाहिये तवो अवं चंदो देना चाहिये । कहे सरथल देवि ! बय 
` भिर हृं ये दका अंजलिं है ।। १७ ॥ चन्रमाके साय इस अर्थकों ्रहणकर, हे देवि ! तेरे लिये नमस्कार है 
रोन आराघना किया है ।। १८ ।। वो देवौ पु्रकामनासे सेयौ ययौ | 
दानक संवह, ण्डे पानौके साथ दा भोले वा उससे भ 
ब्ाह्मणोको देने चाहिये, इस तरह प्रय्नपु्वक दशवषतक देवीकी 
तीह वाभ्य हो जो इस वतको करता है निस लिस स्क बो 
पाता हे इसमे सदेह नहीं है ।। २१ ।\ यह भविष्योत्तर 
































































॥ 
































. हिनधीदीकासदितः (९) ध 





पायसलइङ्कः ।। अष्टोत्तरशतं वापि अष्टाविहातिमेव वा।। ११।। नुहुयाच्चन्द्र- 
मन्त्रेण गौरीमन्त्रेण चव हि ।\ एवं समाप्य होमं तु त्रताचायं प्रपूजयेत्‌ । १२।। ` 
 द्विप्रान्‌ सपत्नीकान्‌ वस्त्राद्यश्च प्रपूजयेत्‌ ।! तेभ्यश्च करकान्‌ दद्याद्गन्धोदक- 
समन्वितान्‌ ।। १३।। 'विघ्राय पीठदानं च ततः कूर्याद्विसजंनम्‌ ।। ततःपुत्राः 
प्रजायन्ते धनधान्यसमन्विताः 11 १४ ।! सौभाग्यसुखसंपत्तिर्जायते भभतां वर ।\ ` 
 अवेधव्यं च लभते नारी कामानवाप्नुयात्‌ 11 १५ ।। एतत्ते कथितं भूप किमन्य- ` 
 चछरोतुमिच्छसि ।! कृष्ण उवाच ।। कृते दश्रथेनास्मिन्‌ कोसल्याभायेया सह॒ ` 
 ॥ १६ ।\ तुष्टा दश्षरथे देवी ललिता तु सचन््रमाः । यस्माच्च कृतकृत्योऽसौ ` 
 भायेया सहं मोदते ।। १७ ।। पश्चाहश्ञरथनामलक्िता भुवि कीतिता ।! एतत 
कथितं राजन्‌ दश्षरथलकल्िताक्रतम्‌ ।। १८ ।! य इदं श्यृणुयाच्नित्यं श्रावयेदा समा- ` 
हितः ॥! अदवमेधसहस्रस्य फलं तस्य ध्‌ वं भवेत्‌ ।\१९।। इति श्नौभविष्योत्तर- 
पुराणे दशरथ कितात्रतोद्यापनं सम्पुणम्‌ । 1 
 उद्यापन-ऋष्यशरुङ्गः बोले कि, त्रतकी संपुतिके लवे उद्यान कहंगा, आ्षिनङृष्णा चौयके दिन ` 
उपवास पूर्वक यह्‌ करना चाहिये ।।! १ ।! व्रत करनेवारे मनुष्यका कत्तव्य है कि, वह्‌ पहिले स्नान करे, 
 पदचात्‌ शुद्धवस्त्र धारण करे पीछे सायंकालमे सपत्नीक दश वेववेदाद्धवेत्ता ब्राह्मणको बुलाकर प्रेमसे ` 
मण्डप बनवावे ।! २ ।\ उस मण्डपके चारों दिहाओमें चार केलेके स्तम्म खड करे, चार दरवाजे बनवावि, = ` 
उसके बौचमे पाच र्खोसे कमल बनावे । ३ ।\ उस कमलकौ कणिकापर विधिपुवंक कलसको स्थापित करे, 
बह कलह तांबे या मृत्तिकाका हो, उसके कण्ठभागमं दो वस्त्र लपेटे ।। ४ ।। फिर उस कलसपर रोहिणीकेसाथ ` 
चनद्रमाको स्थापित करे । सुवणेकी द्ाद्कल्लिता ओर चांदीका चन्रमा बनवावे । ५.।। फिर पूर्वोक्तविधिसे ` 
एकाग्रचित्त होकर पुजा करके हे राजन्‌ ! इक्कीका तिखोकि लड़ड्‌ बनवावे ।।६।। उनमसे ददा ड्ड्‌ कथा- § ` 
व्यासको दे दे । ददा लडु.अपने लिये जलग रखे, एक बचे लड्डको देवताकौ भेद चढ़ादे ! जिससे ललिता (रोहिणीः = 
देवी प्रसन्न हो \\७11 फिर व्रतपुतिके लिये सुवणं जर वाणक एकं उत्तम ब्राह्मणके लिये दे ओर कहै किःमेने 
भक्तिसे जो दशाङ्धललिताका त्रत किया है उसकौ पूतिक लिये सुवणं सहित वायन इस द्िजवर्रो देता हं 
म॑ने पुत्रकामनासे भगवती रक्िता देवौकी पुजा की, इससे वहं देवी प्रसन्च होकर मेरौ समी काः 


करे ॥। ९ ॥। इस प्रकार रोहिणीकौ परायना करना, पीछे चन्रमगके लिये एक अध्य दे \ अयनी गृहक र 
व्तविधिसे अग्निस्थापन करके फिर ।। १० । अन्वाधानकके तिलमिधित लीरसे लडडभों या तीनों एकसौ 





त स 


व = 

















































हुमा, अर्थात्‌ दशाङ्कः उलितात्रतका नाम दश्शरथललितान्रतं इस प्रकार हो गया । है राजन्‌ ! मेने आयते 


उसको एक सहर अश्वमेध करनेका फल मिखेगा इसमं संदेह नहीं है ।! १९! । भीभविष्योत्तरपुराणके 
दशरथ ( दशाद्धः }) कलितान्नतका उच्चापन पुरा हज ।) त 


^ तकववथीव्रम्‌ ^ 4 
अथ कातिकढृष्णचतुर्थ्यामथवा दक्षिणेदेशे आदविवनङृष्णचतुर्थ्या करक चतुर्थौ 





. षोडशोपचारैः पुजयेत्‌ ॥ पुजामन्त्र--नमः क्षिवाये शर्वाण्यै सौभाग्यं सन्तति 
शुभाम्‌ ।। प्रयच्छ भवितियुक्तानां नारीणां ह॒रवल्लभे ।!इत्यनेन गौर्याः, ततो नमो 


॥ १ ।। अहो किरीटिना कमं समारम्धं सुदुष्करम्‌ ।! बहवो विध्नकर्तारो मागे 
परिपन्थिनः ।! २ ।। चिन्तयित्वेति सा देवी कृष्णा कृष्णं जगदगरुम्‌ ।! भन्तं 


















यह्‌ दारथललितान्नरतकौ कथा कहूदी है \\१८।। जो समाहित होकर इस ब्रतको कंथा सुनेगा या सुनावेगा 


व्रतम्‌ ।। अत्र स्त्रीणामेवाधिकारः । तासामेव फलश्रुतेः ।। आचम्य मासपक्नाद्य- 
ल्लिस्य मम सौभाग्ययुत्रपौत्रादि सुस्थिर श्रीप्राप्तये करकचतुर्थोत्रतं करिष्ये इति 
संकत्प्य वटं विलिख्य तदधस्ताच्छिवं गणपति षण्मुखयुक्तां गौरीं च लिखित्वा 


न्तनाममन्त्रेण शिवषण्म्‌ खगणपतीनां पूजा कार्या \\ ततः सपक्वान्नाक्षत संयुक्तान्‌ ` 









तानि. : हिन्दीटीकासहित ` ८. (२२५) 







` भदतिभावतः ।। १४ ।। विलिख्य वटवृक्षं च गौरीं तस्य तके लिखन्‌ ।। शिवेन ` 


विघ्ननाथेन षण्मुखेन समन्विताम्‌ । १५ ।\! गन्धपुष्याक्षतै्गोरीं मन्त्रेणानेन ` 





 परुजयन्‌' ।\ नमः शिवायै शर्वाण्यै सौभाग्यं सन्तति शुभाम्‌ ।! १६ ॥। प्रयच्छ भव्ति- ` 
युक्तानां नारीणां हरवल्लभे ।। तस्याः पावे महादेवं विध्ननाथं षडाननम्‌ 
।  ॥ १७ ॥। पुनः पुष्पाक्षतधूपरचयरच पृथक्पृथक्‌ \। पक्वान्नाक्षतसंपन्चान्‌ सदीपान्‌ 


करकान्‌ दल्च ।॥ १८ ।\ तथा पिष्टकनैवेद्यं भोज्यं सर्वं न्येवेदथन्‌ ।! प्रतीक्षन्त्यः ` 







। स्त्रियः सव्वनदरमर््यपराः स्थिताः ।। १९।। सा बाला विकला दीना सुततुडभ्यां 





। परि 


। हस्ते चोल्कां समादाय ज्वलन्तीं स्नेहपीडितः ।। भगिन्ये दोयामास चंद्रं व्याजोदितं 
। तदा ।॥ २२।। तं दृष्ट्वा चातिमुत्सुज्य बुभुजे भावसंयुता । चन््रोदयं तमान्ञाय ` 
| अर्यं दत्त्वा विधानतः २३ ।। तदोषेण मृतस्त्वस्याः पतिधमंक्च दूषितः! पति ` 
। तथाविधं दृष्ट्वा श्िवममभ्यच्यं सा पुनः ।। २४॥ बतं निरशानं चक्रे यावत्संबत्सरो 


















परिपीडिता \। निपयात महीपृष्ठे रुरुदुरबन्धिवास्तदा ।\ २०॥ समाह्वास्य चवा ` 
तस्ता मुखमभ्युक्ष्य वारिणा ।! तदंश्राता चिन्तयित्ववमारुरोह महावटम्‌ ।२१। 


। गतः ।॥ चक्रुः संवत्सरेऽतीते व्रतं तद्श्रातृयोषितः ।! २५ ।। पूर्वेक्तिन विधानेन ` 
सापि चक्रे शुभानना ।। तदा तत्र शची देवी कन्याभिः परिवारिता ॥ २६॥ 
एतदेव व्रतं कर्तुमागता स्व्गलोकतः ।\ वीरवत्यास्तदाभ्याशमगमधाग्यतः स्वयम्‌ ` 
 ॥ २७ 11 दृष्ट्वा तां मानुषौ देवीं पप्रच्छ सकलं च सा ।! वीरावती तदा पृष्टा 


। प्रोवाच विनमान्विता ।\ २८ ।\ अहं पतिगृहं प्राप्ता मृतोऽयं मे पतिःप्रभुः। न 











जाने कमणः कस्य फलं प्राप्तं मयाधुना ।! २९}! मम भाग्यवश्षाहेवि आगतासि 
 महेहवरि ।\ अनुगृह्णीष्व मां मातजोवयाश पति मम ।।! ३० । इन्द्राण्युवाच ।॥। ` 
त्वया पितृगृहे पूर्वं कुर्वत्या करकव्रतम्‌ ।! वृथेवाघ्यस्तदा दत्तो विना चन्द्रोदयं 
 श्युभे ।\ ३१।। तेन ते ब्रतदोषेण स्वामी लोकान्तरं गतः! ! इदानीं कुर यत्नेनकरक- ` 
मम्‌ 11 ३२ ।। पति ते जीवयिष्यामि व्रतस्यास्य प्रभावतः ।। कृष्ण उवाच ।! ` 
शरुत्वा त्रतं चके विधानतः ।\ ३३ ।! प्रसन्ना साऽभवदेवी शक्रस्य ` 


पाण्डवा दुःखनाशनम्‌ \। याः करिष्यन्ति सुभगा त्रतमेतन्निश्ञागमे \। ३८ ।। तासां 
पुत्रा धनं धान्यं सौभाग्यं चातुलं यज्ञः ! करकं क्षीरसंपूणं तोयपुणेमथापि वा 


 ॥ ३९ ।\ ददामि रत्नसंयुक्तं चिरं जीवतु मे पतिः \। इति मन्त्रेण करकान्‌ प्रदद्या- ` 
 दद्विजसत्तमे ।\! ४० \! सुवासिनीभ्यो दद्याञ्च जादद्यात्ताभ्य एव च ।! एवं व्रतं ` 
 याकुरते नारी सोभाग्यकाम्यया ।।! सौभाग्यं पुत्रपौत्रादि लभकेबुस्थिरां धियम्‌ 


 ॥॥ ४१।। इति वामनपुराणे करकाभिधचतुर्थोत्रतं सस्पुणेम्‌ ।। 


अब कात्तिक वदि चतुर्थोके दिन या दक्षिगदेरमे प्रसिद्ध आदिवनङृष्णा चतुर्थौ के दिन हौनेवाले करकं | ८ |. 


चतुर्थके व्रतका निरूपण करते है-इस व्रतको करनेका केवल स्त्ियोकाही अधिकार है; क्योकि ब्रत करनेवाली 


स्त्रिथोकी ही फलश्रुति मिलती है । प्रथम आचमन करे फिर “ओम्‌ तत्सत्‌ इत्यादि रीतिसे देन काक्का स्मरण ` ४ | 


केरे, फिर “मम” इत्यादि वाक्य द्वारा संकल्प करे कि, मे अपने सौभाग्य एवं पुत्र पौत्रादि तथा निश्चल सम्पत्ति 

कौ प्राप्ति कै लिये करकचतु्थीकि त्रतको करूगा } उस प्रकार संकल्प करनेके पीछे एक बडको लिखे उस, बड्के ` 
म्‌लभागमं महादेवजी, गणेश्चजी, आर स्वामिकातिकसहित पार्वतीजीका आकार लिखे, (फिर प्राणप्रतिष्ठा 

करके) . षोडशोपचारे पुजन करे! पुजके मंत्र-श्र्वाणी शिवा के चि प्रणामहै। 


हि महेवर भगवानृकी प्यारी ! आप अपनी भक्त स्त्रियोको सौभाग्य ओर . श॒भसन्तान प्रदान करे, इस ` 


८  भन्त्रसे गोरी की परजा करके पीछे, नमः जिनके अन्तमें रहता है एसे नाम मन्न शिवजी स्वामिकातिक तथा 


चाहिए } पीडे पिष्टकका नवेद ओर भोज्य सब निवेदन कर दे । पीछे चन्द्रोदय होने पर चन््रमाको अर्घं देना 
चाहिए ।\ जथ कथामान्धाता कहने लगे कि, जब अर्जन इन््रकील पर्व॑तपर तय करने चरा गया उस समय 


भशर ब्रौपदीका चित्त करर्हिला गया ओर चिन्ता करने खगी ।\ १ ।। कि अर्जुने बडा कठिन काम करना ` 
 प्रारंभकर दियाहै, यह निचय है कि मार्गमे विध्न करनेवाले बहुतसे वैरी हे ।\ २ \। कृष्णएकौ यह इच्छा थी 


कि, पतिदेव के काममें कोई विध्न न आवे इसी चिन्ताको करके जगद्गुर श्रीकृष्ण भगवानूसे पूछा 11 ३॥ 


८  ब्रौपदी बोलो हे जगन्नाय ! आप एक अत्यन्त गोप्य व्रतको वतावे, जिसके करनेसे सब ओरके विषघ्न दर टल ( 


जाये ।। ४ \। श्रीकृष्ण बोकते कि, हे महाभागे ! जैसा आपने मुदञसे पुछा है, उसी प्रकार पा्वतीजीने महा- ` 


 . देवजीसे पुछा था उनके प्रनको सुनकर भहादेवीजीने कहा कि 1५१ हे विरारोहे! हे ` 
महेश्वरि ! तुम सुनो, में तुम्हे सब विष्नहारिणी करक चतुर्थीका त्रत कहता हूं ।\ ६ ।। पावंतीने पा ४ 


शु ग शहरपनाह है ॥। ८ ।\ 
वेदध्वनि होती रहती है 








रतानि] = हिन्दीटीकासहित {शोः 





क । ष्य अक्षतोसे ज्‌ दा जुदा प्रजन कर पीछे पक्कास्च अक्षत जौर दीपकं सहितददा करए ।} १८ \ तथा पिष्ट- 
कका नैवे एवम्‌ सव तरहका भोज्य, चन््रमाको अघं देने की प्रतीक्षां बेड हुदै सब स्त्ियोने निवेदनकर ` 
दथा ।! १९॥१ वो बालिकाथी भूख प्याससे पीडित थौ इस कारण दीन एवम्‌ विकल हौकर भूमिवर गिर 
पडी, उस समय उसके बान्धवगण रोने लगे \। २० \\ कोई उसको हवा करने लगा, कोई मुखपर पानी चिडकने ` 
` कगा, उसका भाई कुछ शोच विचारकर एक बडे भारी पेडपर चढ़ गया ।। २१ 1 बहिनक प्रेमे पीडित था 
हाथमे एक जलती हुई मसाल ठे रली थौ उस जलती मसालको हौ उसने चन्र बताकर दिला दिया ॥ २२॥ ` 
उसने उसे चाद समञ्ष, दुख छोड, विधिपूवेक अधेदेकर भावके साथ भोजनकिया ।। २३ \ इसी दोषतेउसक्ता = ` 
पति मर गया, धरम दूषित हभ! \ पतिको मरा देख शिवका पुजन किया ।। २४।। फिर उसने एक सालतक ` 
निराहार ब्रत किया, पर उसकी भाभियोने संबत्सरके बीत जानेपर वो ब्रत किया ॥। २५ ॥ पहिले कहे हए ` 
विधाने शोभन म्‌ खवाली वौराचतीने भी व्रत किया, उस समय कन्याओस धिर हयी शचौ देवी । २६॥ ` 
इसी बतको करनेके लिए स्वगं खोकते चली आई ओर वीरावतीके भाग्यसे उसके पास अपने आप पहुंच गई ` 





` ॥ २७ । क्ञची देवीने उस मानुषीको देखकर उससे सब वातं पुच्छी, एवम्‌ वीरावतीने नस्रताके साथ सब 


बरातंबतादी 1\ २८ \1 हे देवेश्वरि ! म विवाहके पौरे जब अयने पतिके धर पहुंची तभी मेरा पति मरगया, ¦ 


 ननजञाने मैने एेसा कौन उग्र पाय किया है, जिसका यह्‌ फल मिल रहा है \\ २९ ॥। पर फिर भौभाज मेरे 


किसी पृष्यका उदय हुमा है, जिससे हे महेश्वरि ! आय यहां पारी है, भाषसे यह प्राना है कि, भप 
मेरे पतिको शीघ्र जौवित करने कौ छृषा करें ।। ३० ।1 यह सुन इन्दराणौ बोली कि, है वौरावति ! तुमने 
अपने पिताके घरपर करकचतुर्थोका ब्रत किया था, पर वास्तविक चनद्रोदयके हृए बिनाही अधं देकर भोजन ` 
कर लिया था।) ३१ \ इस प्रकार अज्ञानसे ब्रत भद्ध करनेपर यत्‌ किञ्चिदपराधके कारण तुम्हारा पति 
मरगया है, इस कारण आप अपने पतिके पुनर्जौवनके किए विधिपुवेक उसी करकचतुर्थोका व्रत करिए \\३२।॥ 

मै उस ब्रते ही पुण्य प्रभावे तुम्हारे पतिको जीवित करगौ । श्रीकृष्णचन्द्र बो कि, ह ्रौपदौ ! इन्द्राणीके ` 
वचन सुनकर उस वीरावतीने विधिपुर्वक करकचतुर्थीका व्रत किया ।\ ३२ ।1 उसके ब्रतको पुराहो जानेषर ` 
८ अपनी प्रतिज्ञाके अन्‌ सार प्रसन्नता प्रकट करतीहुई एक चुल्‌ जल ठेकरवीरावतीके पतिको मरण- 4 
भूमिपर छिडककर उसफे पतिको ।\३४।। जीवीत करदिया, वो पति देवताओकि समान हौ गया ।वौरावती अपने ` 
घरपर आकर अपने पतिके साथ क्रीडा करे लगौ ।! ३५. 1 वो घन, घान्य सुन्दर पुत्र ओर दीघं आवुपा 1 
मया । इससे तुमभी अच्छी तरह इस व्रतको करो ।1 ३६ ।। सुतजी शौनकादिक मुनियोसे कहते हँ कि, इस 1 
`` प्रकार श्रीकृष्ण चन्दर भगवान्‌के वचनोको सुनकर द्रौपदीने करक चतुरथीके व्रतको किया, उसी ब्रतके प्रभावे = ` 
4 कौरवोको परालित डःलो लोको मिटनेवाली अतुल राज्य . ` 
















































५५१५ 


समाहितं कुमालक्तकाभ्यां च रक्तसुत्रः सककणः ।। रक्तयुष्येस्तथा धूपेदौं 
पबलिभिरेव च ।। गृडाद्रकाभ्यां पयसा लवणेनाथं पालकः ।। पालकेमं द्ाण्डेरिति 
हमाद्विः ।\ पज्या स्त्ियहच विविधास्तथा विप्राङ्च जोभनाः ।। सौभाग्यवद्धये 
परचाःदुोक्तव्यं बन्धुभिः सह्‌ ।। इति गौरीचतुर्थोब्रतं ब्रह्मपुराणोक्तम्‌ !\। ` 


गोरी चतुर्थोत्रत-माघसुदी चौथके दिन होता है, एेसही हेमाद्रिने ब्रह्यपुराणको केकर लिखा 
हैः माघ मासकी शुक्ला चौथके दिनं उमाने अपने ही अंगोसेअपनें ही गुणोके दारा फिर वही 
सुष्टि रचदी जो कि, पिरे योगिनियोके साथ खाली थौ । इस कारण इसचतुर्थोको सब मनुष्योकोचाहिये 
कि उसको पूजे पर स्त्रियोको तो इस व्रतको अवश्य ही करना चाहिये । भक्ति भावके साथ यत्नवु्वेक भली ` 
भांति इकट्‌ठे किये गये कुन्दके पूष्पोसे तथा कुकुम ओरं अलक्तक एवम्‌ कंकणकेसाथ रक्त सुत्रोसे लाल 
पुष्य, धूप, दीप ओर बलिसे पुजन करना चाहिये ! गुड, जदरख, दुध नमकके साथ पालको (हेमाद्रि 
मतमं मिटरीके बतेनकोपालक कहते ह ) अनेक स्त्रियोका तथा सुशील ब्राह्म्णोका पजन करना चाहिये अपने 
सौभएग्यको बढ नेके लिये, पीछे बन्धुवगेकि साथ भोजन करना चाहिये ¦ यह गौरीचतुर्थीका ब्रतपूरा हा ॥! 


वेरदचतुर्थीत्रतम्‌ 


जथ माघशुक्छचतुर््या 
चतुर्थ्या तु नक्तन्नत परायणा 




























व्रतानि]  हिन्दीटीकासहित (२२९) 





 - रत्नसिहासनस्थम्‌ ।\ दोभिः पालाकुशेष्टाभयधृतिरुचिरं चन््रमौलि त्रिनेत्रं 
` ध्यायेच्छान्त्य्थमीशषं गणपतिममलं भौसमेतं प्रसन्नम्‌ ।। लंबोदरं चतुर्बाहुं त्रिनेत्रं ` 
 रक्तवणकम्‌ \\ सर्वाभरणद्ोभाढठद्ं प्रस्नास्यं विचिन्तयेत्‌ \\ गणपतये नमः ।॥ ` 
ध्यायामि । आगच्छ विघ्नराजेन स्थाने चात्र स्थितो भव ।\ जाराधयिष्ये ` 
भक्त्याहं भवन्तं सवंसिद्धये ! सहस्रशीर्षा° गणेज्ञाय० आवा० । अभीप्सिताथे- 
(८ 4 सिद्धयथं पूजितो यं सुरासुर : ॥। सवेविध्नच्छिदे तस्म गणाधिपतये नभः |. † 
पुरुष एवेदं ० विघ्ननारिने० ।\ आसनम्‌ ।। गणाधिप नमस्तेऽस्तु सवेसिद्धिकर 
 ब्रभो \\ पाद्यं गहाण देवे सुराघुरसुपुजित ।। एतावानस्य ° लबोदराय० पाद्यम्‌ ।\ ध | 
 रक्तगन्धाक्षतोपेतं रक्तयुष्पसमन्वितम्‌ ।1 अध्य गहाण देवेश मया दत्तं हि भक्तितः! ` 
चिपादू्वं० चन्द्राधधारिणेन० । अध्येम्‌ \। सुरासुरसमाराध्य सवंसिदिप्रदायक ।॥। 
` भया दत्तं सुरश्रेष्ठ गृहाणाचमनीयकम्‌ ।\ तस्माद्विराठ० चविकवप्रियाय० आच 
` मनीयम्‌ । पयो दधि धृतं चैव शाकं रामधुसंयुतम्‌ ।\ पंचामृतेन स्नपनं करिष्ये ` 
` सर्वसिद्धिदम्‌ ॥। विष्नहर््रे° पंचामृतस्नानम्‌ \\ गंगादिसलिलं शुद्धं सुवणेकल्दे ` 
स्थितम्‌ \ सुवासितं परिमलैः स्नापयामि गणेकवर ॥। यत्पुरुषेण ° ब्रह्मचारिणेन० ` 
शुद्धोदकस्नानम्‌ ।। रक्तवणं वस्त्रयुग्मं सरवंकार्याथंसिद्धये ।\ मया क्तं गणाध्यक्ष ` 
-गृह्यतामखिलार्थंद ।\ तं यज्ञं° सवेप्रदाय० वस्त्रयुग्मम्‌ । कुंकुमाक्तं मया वत्तं 
सोर्वणमुपवीतकम्‌ \! उत्तरीयेण संयुक्तं गृहाण गणनायक ।। तस्माचज्ञात्सवहुतः ` 
।  संभृ० वक्तुण्डाय० यज्ञोपवीतम्‌ 1) चन्द्रनागुरुकपूरकरकुमादिसमन्वितम्‌ ।। गन्धं ` 
गृहाण देवेश सवेसिद्धिप्रदायक ।। तस्माद्नज्ञात्सवेहुतऋ० रु्रपत्राय० गन्धम्‌ ।॥ ` 
अक्षतांह्च सुरशरेष्ठ कुकुमाक्तान्‌ सुशोभनान्‌ ।।गुहाण विच्नराजेन्द्र मया वत्ताग्हि = 
भक्तितः 1! गजवदनाय० अक्षतान्‌ \। रक्तपुष्पाणि विघ्नेश एकविश्षतिसंख्यया ।। 
५ गृहाण सुमुखो भूत्वा मया वत्तान्युमासुत ।! तस्माद्छवा० गुणकालिने नमः ` 
५. ष्णाणिस° सुगन्धीनि च माल्यानि गृहाणगणनायक ।। विनायक नमस्तुभ्यं ध 

























लम्बोदराय० उदरंपु° । गणाध्यक्षाय० हृदयंप° । स्थूलकण्ठाय० कण्ठेयु० 
स्कन्दाग्रजाय ० स्कन्धौपु० । परशुहस्ताय० हस्तौपु° । गजवक्राय० वक्रंपु० । 
स्वेदवराय ० श्षिरः प° । संकष्टनाशिने० सर्वाद्धपु० \। अथावरणयुजा-गणाधि 
पाय० । उमापुत्रा° । अघनाशिने ० । हेरंबाय ० ! लंबोदराय ०। गजवक्राय० । 
एकदन्ताय ० । धुञ्रकेतवेन ० । भाल्चन्द्राय० । ईशपुच्रय० । इभवक्राय० । 
मूषकवाहनाय ० । कुमारगुरवे ० । संकष्टनारिने० ।। इति प्रथमावरणम्‌ । १ ।, 
विध्नगणपतये० । वीरगणयतये° । श्ुथेकणेगणयपतये० । प्रसादगणपतये० ।' 
चरदगणपतयं० । इन्द्रमणपतये० । एकदन्तगणपतये० । लंगोदरगणपतये० । 
ल्लिप्रगणपतये० । सिद्धिगणपतये० इति द्वितीयावरणम्‌ ।। २ ।। रामाय० । रमे- 
क्षाय० । वृषांकाय ० । रतिग्रियाय० । पुष्पबाणाय ०। महेश्वराय ० । वराहाय० । 
श्रीसदाशशिवाय० ।। इति तृतीयावरणम्‌ ।\ ३ ।\ आदित्याय० । चन्द्राय० । कुजाय ० 
सुधाय० । बृहुस्पतयं० । शुक्राय ० । शनंहचराय० । केतवे ० \ सिद्धे ० । समद्धचे० 
 कान्त्येन° मदनरत्यै० । मदद्राविण्ये° । वसुमत्यै ° । वैनायक्ये° ।। इति चतर्था 


 सोमाय० । 


 पाचौपत्रं । 


 इवेतदूरवाप० । लंबोदराय ० बदरीपत्रम्‌० । हरसूनवे° धत्त॒रष० । गृहा्रनाय० 
` तुलसीप० । गजकर्णाय० अपामागं० । एकदन्ताय ० बृहतीपत्रम्‌ । इभवक्राय० ` 
शमीप० । सूषकवा हनाय० । करवीरपत्रं । विनायकाय० वेणप० । ` 
अकप० । भिन्नदन्ताय० अर्जुनपत्र ° । पत्नीहिताय० विष्णुक्रान्ताप० । बटवेन 
शडिमीप० । भालचनद्राय० देवदारुप० । हेरंबाय ० मस्पत्रं° ! सिद्धिदाय ० 











मद ऋषिः ।। गणपतिर्देवता \\ अनुष्टुप्छन्दः \। रं बीजम्‌ ॥ नं शक्तिः ।। मं कील- ` 
कम्‌ । श्रीगणपतिघ्रसादसिदढचथं पूजने चि० ।1ॐ कारपुवेकाणि नामानि ।1 विना- 
यकाय विध्नराजाय० गौरीपुत्राय० गणेदवराय० स्कन्दाप्रनाय० अव्ययाय० ` ध 
पूताय दक्षाध्यक्षाय० द्िजग्रियाय० अग्निगरवेच्छिदे० इन्द्रशरीप्रदाय° बाणीबल- ` । 
प्रदाय० सर्वसिदधिप्रदाय० शावेतनयाय० शिवग्रियाय० सर्वात्मकाय० सृष्टकर््रे ` 
 देवानीकाचिताय० शिवाय० शुद्धाय० बुदिप्रियाय° शान्ताय ० ब्रह्मचारिणे गजा- (^ 
 ननाय० देमातुराय० मुनिस्तुत्याय भक्तविघ्नविनाशशनाय० एकदन्ताय० चतु- ` 
 रबाहिवि० चतुराय० शक्तिसंयुताय ° लम्बोदराय० ूर्पकर्णाय ° हेरम्बाय ब्रह्म- 
 वित्तमाय० कालाय० ग्रहुपतये० कामिने सोमसूर्याग्निलोचनाय० पाशा्करुश- ` ४९ 
 धराय० चण्डाय० गुणातीताय० निरञ्जनाय अकल्मषाय स्वयंसिद्धाय० 
 सिदर्णचितपदाम्बजाय० मीजपूरभ्रियाय० अव्यक्ताय० वरदाय० श्ष्वताय० 
इशुचापधुत० 
६ कुलाब्रिभृते 
`  नटिने० चन््रचूडाय० अमरेवराय० नागोपवीतिने° भीकण्ठाय० रामा्चितप- ` (| 
दाय० ब्रेतिने° स्थलकण्ठाय० यौकर््रे० सामघोषप्रियाय० अग्रण्याय० पुरुषो- | 
तमाय० स्थुलतुण्डाय० ग्रामण्ये° गणपाय स्थिराय० वृद्धिदाय० सुभगाय ` 
 श्लूराय० वागीज्ञाय० सिद्धिदायकाय ° दूर्वाबिल्वप्रियाय ° कान्ताय पापहारिणे° ` 
 कृतागमाथ० समाहिताय० वक्रतुण्डाय ° श्रीप्रदाय० सौम्याय ० भक्तकांक्षितदत्रे° ` ५ 
ध अच्यताय० केवलाय ० सिद्धिदाय० सच्चिदानन्दविग्रहाय० ज्ञानिने° मायायु- ` 
तयण दास्ताय ० ब्राह्मष्ठाय० भयवजिताय० प्रमत्तदैत्यभयदाय० व्यक्तमूतेयं० ` ध 
° पार्वतीशंकरोत्स द्धखेलनोत्सवलालसाय ० समस्त जगदाधराय० वर ` 


कृतिने विहस्मियाथ० वीतभयाय० गदिने० ` चक्रिणे° 
अन्जोत्पलकराय० श्रीकश्लाय० श्रीपति स्तुतिर्हाषिताय° 














र ६ र ( ध १ ) 5 ~ ट ^ ५ 
६ ^ २ ४ 1 । ‡ 
॥ 0 1 
{स 0 1 ४ < £ काक ॥ ^ ४ न 
८ # 1 
{2 ~ 4 ५ ् 4 
























तवाग्रतः । तेन मे सुफलावाप्तिर्भवेज्जन्मनिजन्मनि ।। संकटनाशिने० फलंस० ॥। 
पुगीफलं०° नाभ्याजासी० सिद्धिदाय ताम्बूल ० । पुनाफलसमुद्धिचथें तवागे 
स्व्ण॑सीश्वर ।! स्थापितं तेन मे प्रीतः पूर्णान्‌ कुर मनोरथान्‌ ।। सप्तास्यासन्‌ ० 
 विध्नेश्ाय० सुवणेयुष्पं० श्रियं जात इति नीराजनं० अथ दूर्वा युग्मापेणम्‌- 
गणाधिपाय० दूर्वायुग्मंस० । उमापुत्रय० दूर्वायुग्म ० । अघनाशनाय ० दूर्वयु° 
एकदन्ताय ० दूर्वायु ° । इभवक्राय० दुर्वायु० । विनायकाय ० दूर्वायु° ईशपुत्राय 
दुर्बयुमं । सवंसिद्धिप्रदायकाय० दूर्वायु° । कुमारगुरवे दूर्वायु । श्रीगणराजाय० ` 
 एकदूर्वक्किरं समपेयामि ।। गणाधिप नमस्तेऽस्तु उमापुत्राघनाशन ।\ एकदन्ते- 
भवक्रेति तथा सूषकवाहन ।\ विनायकेश्पुत्रेति सर्व॑सिद्धिप्र दायक ।। कुमारगुरवे 
तुभ्यं गणराज प्रयत्नतः ।। एभिर्नामपद नित्यं दृवयुग्मं समपंयेत्‌ ।! श्रीगणेलो 
वक्रतुण्ड उमापुत्रस्तथव च ।। विध्नराजःकामदङ्च गणेहवर इति स्मृतः ।। जीम्‌त- 
काव्तिरित्युक्तस्तथाञ्जनसमप्रभः । योगिध्येयो दिव्यगुणो महाकाय इतीरितः।। 
 ततदच सिद्धिदः प्रोक्तो महोदय इति स्मृता : ।। गजवक्रः क्मभीयस्ततः परदयु- ` 
धायंपि ।। करिकुम्भो विहवमूतिरुग्रतेजास्ततः परम्‌ लम्बोदरस्ततः सिद्धिगणे- 

हचेकविशति ।। नामानि रमणी यानि जपेदेभिषश्च पूजयेत्‌ ।\ गणेशात्तस्य नह्यन्ति 


संकणष्टानि महान्त्यपि ।। महासंकष्टदग्धोऽहं गणेशं शरणं गतः ।। तस्मान्मनोरथं 
पुण कुर विश्वेहवरगप्रिय ।! ततः स्वणेमयं पुष्पं विघ्नेशाय निवेयेदत्‌ ।। प्रदक्षिणा- १ 
कारान्कृत्वा देवं क्षमापयेत्‌ ।। यज्ञेनयज्ञ ° संकष्टनाशय० पुष्पाञ्जकिम्‌ ॥\ ` 








 ब्रतानि दिन्दीीकासहित | 4.6 1 । 





 मंत्रमिमं जपेत्‌ ।\ गणेशस्य प्रसादेन मम सन्तु मनोरथाः ।। तुभ्यं संप्रददे विप्र. 






प्रतिमां तु गजाननीम्‌ ।। इष्टकामार्थसिडढचर्थं पूत्रपोत्रप्रिवधिनीम्‌ ।! गणाधिराज ` 


देवेश विघ्नराज विनायक ।। तव मूपिप्रदानेन प्रसस्लो भव सव॑दा । इतिकला 
 म्रतिमादानमंत्रः ।। जथ प्रतिग्रहुमंत्रः-गगेशञः प्रतिगृणाति गणेशो वे ददाति च ।! 
गणेदस्तारकोभाभ्यां गणेशाय नमो नमः।। संसार पीडाव्यथितं सदा मां कष्टा- 






 भिभूतं सुमुख प्रसीद ।। त्वं त्राहि मां नाशप कष्टसंघाच्नमो नमः कष्टविनाष्टनाय । ` ; 
 इतिप्राथेना \। यदुद्िश्य कृतं तेऽद्य यथाशक्ति प्रपूजनम्‌ ।। संकष्टं हर मे देव उमा- ` 


` सुत नमोऽस्तु ते ।। इति नमस्कारः इतिपूजाविधिः ॥ 






वरदचतुर्थीत्रत-माध शुक्ला चोथके दिन होता है यह काञ्ञीखण्डमें कहा है । है दुढे ! माघ शुक्ला चौके ` ध 


दिन जो रातका त्रत करते हुए तेरा पूजन करेगे, देवता उनको अपना पुज्य मानेगे । एक सालतकं तीर्थयात्रा ` 
करके पीछे तापसी चौके दिन इस व्रतको करे, ब्रतको समप्तिमे सफेदतिलोके गुडके लडड्‌ बनाकर भोग 





-अदितिमाता मीठा पय पिलाती है जिनके लिये दिव अमत देताया धारण करता है, है बलवान्‌ कामनोको | 
पुरा करनेवाले मत्र, मेरे अनृष्ठानसे मेरे कल्याणके लिये मृञ्षपर देवताको प्रसस्च कर दे ! “ओम्‌ एवापिन्रे ` 
¦ विदवदेवाय वृष्णे यज्ञेविधेम नमसा हविभिः । बहस्पते सुप्रजा वीरवन्तो 


























`  धरके लाने चाहिये, तापसी माघकी चौथका नाम है । रातका ग्रहण है इससे यह बात तो स्वतः हीसिद्धहो ` 
जातौ है कि चौय प्रदोष व्यापिनी होनी चाहिये यह बरद चौथका व्रत पुरा हभ ।। संकष्ट हर गणयतिव्रत- ` 4 
भाघ कृष्ण चौथके दिनहोता है ।। अथयूजाविधि ओम्‌ येभ्यो माता मधुमत्‌ पिन्वते पयः, पीयुषं ्ौरदिति ` 
रद्रिबहीः } उक्थ शुष्मान्‌ वृष भरान्तस्वप्नस स्ताँऽभआदित्यां अनुमदा स्वस्तये" जिनके लियेसुन्दर केवाली ` 


तो वयं स्यामपतयो रयीणाम्‌ सब 
| कामनाओं देनेवाले, अन्न मेरा पालनकरने वाले सवे देवमय गणेरके लिये यहां हवि ओर नमस्कारोसे ` 
| यह सब कुछ करते हं हे वेदके स्वामिन्‌ ! हम अच्छी सन्तान वाले, वीरवारू ओर धनवाले हो जाये । इन ` 
दोनों संतरोको जपकर पीछे आगमथं तु देवानां घण्टानादं करोम्यहम्‌ \ तेन त्रस्ता यातुधाना अपसर्पन्तु ` 
करत्रचित्‌ 1!" मे देवताके आागमनके सि घंटा बजाता हुं, इससे उरते हए दैत्यादि कहीं भौ भाग जायें । इस ` 
भंत्रसे घंटा बजाकर, “अपसपेन्तु" इस मंत्रको बोलता हा छोटिका मूत्रासे भूतोको भगाकर पौरे "तीक्ष्ण ` (4 
। षट्‌ महाकाय भूतप्रेतगणाधिप । नमस्ते क्षत्रपालाप प्रसन्नो भव सर्वदा ।॥' है बडी २ डदोबाके बडेभारी . ` 
. . क्रीरवारे, भत ओर प्रेतेके रहिये ¢ हये, हे क्षेत्रपाल ! तेरे लिये प्रणाम है। ८ 






























` ध्यानके मन्न कहते ह, “ध्वेताद्धः" इसका अथं है कि, इवेत जिनके अद्ध है, इवेतही जिनके वस्त्र है, व्वेतपुष्पोसे 

तथा चन्दनसे जिनका पूजन किया जाता है क्षौर समुद्रके बीच कल्प वृक्षोसे रमणीय रत्नद्धीपमे रत्नजटिति ` 

 सिहासनपर विराजते ह, पाञ्च, अंकुक्ञ, वरदानमुद्रा, अभय तथा धयदानसुद्राको हा्ोमें धारण करते है, 

एसे चन्द्रशेखर त्रिलोचन प्रसन्नमुख निमंल सवं नियन्ता भरीगणपतिजीका समस्त भरकारकी शान्तिके च्ि ` 

` ध्यान करता है 1 “लम्बोदरं इस मन्त्रसे भी ध्यान करे । इसका यहं अथं है कि, चतुभज, चिलोचन, शोणकान्ति, ` 

समस्त आभूषणोसे शोभायमान ्रसन्नमुल लम्बोदर गणपतिजीका ध्यान करता हूं गणपतिके व्िप्रणाम है, मे 
उनका ध्यान करता हूं । “आगच्छ इस लौकिक तथा“सहस्रशौर्षा” इस वेदिक मन्त्रको पठकर “गणेशायनमः ` 


आवाहयामि" इससे आवाहन करे, पूर्वोक्त कौकिक मन्त्रका अथं है कि,है विघ्नराजोके अधीदवर! आपह = 
 पधारकर स्थित हौ, मे सब कार्योकी सिद्धिके च्य भवितसे आपकी पुजा करू्गा । फिर -“अभीन्सितार्थ" 

` इस लौकिक ओर “ओं पुरुष एवे०” इस वैदिक मन्त्रको पढकर “विध्ननाकिने नमः, आसनं समर्पयामि! ` 
इसके पठता हुआ आसन (या आसनाथं पुष्प अक्षत) समित करे । शलोकका अथं है कि, सब देवता एवं ` 
देत्यजन अपने अपने कार्यकी सिदधिके ले जिसका पुजन करते हँ, उस समस्त विषध्नोको चिन्न करनेवारे ` 
 गणपतिके लिये नमस्कार है । विध्नान्तकको प्रणाम है" मे जासन भेंट करता हूं । “गणाधिप इससे ओर ` 
"ओं एतावानस्य" इस मन्त्रको पठकर “लम्बोदराय नमः, पाद्यं ससपयामि" इसको पठकर पाय दे, लोकका ` 

अथे है कि, हे देवेहवर ! हे सुर ओर असुरोके पुज्य ! हे सब सिद्धियोके देनेवाले गणाधिरान ! आपकेल्यि ` 
प्रणाम हैः आप पादय ग्रहण करिये । ““रक्तगन्धाक्षतोयेतं” इस लोकिकं सन्त्रको तथा “ओं त्रिपादृध्वंमदे० = 

 . इस वेदिकमन्तर ओर ““चन्द्रा्घधारिणे नमः अध्वं समपयामि” इससे अध्यंदान करे । लौकिक मन््रका अथे है 
कि, है देवे ! मेने भक्तिसे यह्‌ अध्य, रक्तचन्दन, रक्ताक्षत तथा रक्तपुष्योसहितसर्मपित किया है आप इसे 
` : स्वीकार करे, चनद्रमाको लंलाटमं धारणं करनेवाठेके लिये प्रणाम है, मे अरघ्यदाप्रन करता हूं । है सुर तथा 
असुरोके आराधनीय ! हे समस्त सिद्धिरोके देनेवाले ! हे सुरश्रेष्ठ ! मे आपके चयि जाचमनीय प्रदान करता 
हू" आप इससे आचमन करे, इस मन्तसे तथा “ओं तस्माद्विराडजायत” इस वैदिकमन्तरसे “विहवप्रियाय नमः, 

` आचमनीयं समर्पयामि” विरवप्रियके लिये प्रणाम है, आचमनीय संमपेण करता हु इससे आचमनीय देना ` 
चाहिये । “पयोदधि धृतं” तथा “ओं विष्नह्जे नमः, पञ्चामृतस्नानं सभ्पयामि" इनसे पञ्चामृत स्तान 
कराना चाहिये \ इनका अथं है कि, दुध, दधि, घत, खांड जौर सहत इन पञ्चामृतमय दरव्योसे आपको स्नान ` 
. कराता हु क्योकि यह स्नान समस्तसिद्धियोका देनेवाखा है, विष्नहतकि ल्य नमस्कार है, पंचामृतका स्नान 

¦  समपेण करता हुं \ शङ्खादिती्थं °` इस लौकिकं तथा “जो यत्युरुषेण०" इस वैदिक सन्त्र ओर “ब्रह्मचारिणे 








व्रतानि] हिन्दीरीकासहित  . (२३५) 





चन्दन लगावे । अक्षतांडच' इससे तथा गजवदनाय नमः, अक्षतान्‌ समपेयामि' इससे चावल चटाने चाहिये, ` 
सका अर्थं है कि, हे विष्नराजोके ईहवर ! हे सुरवर ! आपके लिये भक्तिभावसे कुकुमसे रञ्जितपुन्दर अक्षत 


।  समप॑यामि" हे विष्नेश्ञ ! ह पारव॑तीनन्दन ! सेने इक्कीस छालयुष्य आपके लिये समर्पण किये है, आय प्रसन्न 
होकर इन्हुं स्वीकार करर, गुणशालिको नमस्कार है मे पुष्प चदढाता हु, इनसे पुष्य चढाने चाहिये । “युगन्धीनि- ` 


। स्कार है, में मालाारण कराता हं ।। फिर इक्कोस नामोसे दू्वसि अथवा फूलोसे गणेशजौका पुजन करना ` 





॥। ` एकदन्तः, ये इक्कीस नाम हुः 





नाममंबोसे पुजा पुरी हुई ।। अद्धपुजा-पुष्प तथा इूबसे कौ गई पुनाकौ तरह नाम मंत्रोसे अद्धधुना भी हीती 
है, संकष्टनारिन्‌, स्थूलजंघ, एकदन्त, आखुवाहन, हैरम्ब, लम्बोदर, गणाध्यक्ष, स्थलकठ, स्कन्दाप्रज, परशु- ` 
` हस्त, गजवक्त्र, सर्वेहवर, संकष्टनारिन्‌ इन नासोके आदिमं “ओम्‌” ओर अन्तमं “नमः तथा इन्दुं चतुर्थीका ` ५ 
| एक वचनान्त करनेसे ये नाम मंत्रके रूपमे आजाते है इसप्रकार तैयार किये गये नाम संत्रोमेसे एक एक्से 





करके प्रत्येकके साथ “पूजयामि छयाकर तथा स्वद्धिशव्द ओर एकञंगको एक वचनान्त करके उसीको 
लगाकर इन अद्धोका पुजन करना चाहिये, अथं वही है कि अमुकके लिये नमस्कार है अमुक अंगका पूजन 
करताहूं, (गणेशजीके हौ बरत प्रकरणम इस प्रकारकी अंगपुजा तथा नाम पुजा हम कई जगह कह आये हं 











नामके 





` बृहस्पति, शुकः शनेद्चर, केतु 
































, समर्पण कयि ह्‌ जपि इनको स्वीकार करे ॥ राजवेदनके लियं लश्च है भ अक्षत चदाता ह । “रक्तपष्पाणि | । | । स क 
स लौकिक संत्रसे तथा “ओतस्मादषवा अजायन्त इस लोकिक मंत्रसे तथा “गुणक्षालिने नमः, पृष्णाभणि 


 विध्नराजायः नसः भाल्यानि समर्पयामि" इनसे सुगन्धित मालये चढावें । इना अथं है कि, हे गणनायक ! = ` 
ह विनायक । है शिवनन्दन † आपको प्रणाम है, जाप सुगन्धित मालाधारण करिये, विध्नराजके च्यिचम- 


चाहिये । गजानन, विघ्नराज, लम्बोदर, शिवात्मज, ववत्रतुण्ड, शूर्वकण, कुज्ज, गणेकष, विध्नाशिन्‌, विकट, ` 
वामदेव, सर्वदेव, सर्वातिनाशिन्‌, विघ्नहर्ता, षू खर, सवेदेवाधिदेव, उमापुत्र, कष्णपिगल, भारुचन्द, गणाधिप, ` ष! ५ 
इनकेभदिमे “ओम्‌” ओर अन्मे “नमः” तथा न्ह चतुरथीकः एकवचनान्तं ` 
 करनेसे नाम मंत्र बन जाता है, एक एक नामं भ॑त्रको बोकर एक एकवार दूर्वा या फूल चडाने चाहिये,यह १५ 


पाद, जंघा, जानु, ऊरू, कटि, उदर, हृदय, कंठ, स्कन्ध, हस्त, वक, फिर इनमेसेदोकोद्वितीयाका द्विवचनान्त- ` 


इस कारण विस्तारके साथ अर्थं नहीं करते हे ) आवरण पुजा-गणयतिजोके चारो ओर क्रमशः पांच आवरणं ` 1 
` या टव्कनं मानकर उनपर जय पानेके लिये उनकी भी पुजा करनी चाहिये । गणाधिप, उमापुत्र, अघनारिन्‌' = ` 
` हिरंब छंबोदर, गजवक्र, एकदन्त, धूश्रकेतु, भालचन्, ईशपुत्र, इभवक्तरःमूषकवाहन, कुमारगुर, संकष्टनारिन्‌ = । 
र मंत्रोसे पहिरु आवरणकी परजा करनी चाहिये । विष्नपति, वीरगणपति, शूषेगणयति, प्रसाद- = ` 
गणपति, बरदगणयपति, इन्द्रगणपति, एकदन्तगणयति, कम्बोदरगण पति, क्षप्रगणपति, सिद्धिगणपति ईन ` 
 नामोके म्नोसे दूसरे आवरणकी पुजा करनी चाहिये । राम, रमेश, वृषांक, रतिग्रिय, पुष्पबाण, महेवर, = ` 
बराह , शरीसदाक्िव इन नामोके मंत्रे तीसरे आवरणकी पुजा करनी चाहिये । आदित्य, चन्र, कुज, बुध, ५ ८ 
सिद्धि, समृद्धि, कान्ति, मदनरति, सदद्राचिणी वेसुभति वैनायकी, इन नाम- ५ 









विशेष हे । सिन्धुवार निर्गुण्डीको कहते हँ । ओर सब नाम प्रसिद्ध हैँ । इस कारण उनका परिस्फट नहीं करते 
हैं । यह पननपुना समाप्त हुई ।। पुष्पपुजा-सुमुख, एकदन्त, कपिल, गजकर्णं, लम्बोदर, विकट विघ्न, विनायक, ` 
` धू सरकेतु, गणाध्यक्ष, भालचन्द्र, पत्नीहित, उमापुत्र, गजानन, दुत, सवंसिदधिभ्रद, मूषकवाहन, कुमारणुर, ` 
 दी्धुण्ड, इभवकत्र, संकष्टनाञ्न इन इवकौस नामोके मत्रोसे जाती, शतपत्र, यूथिका, चंपक, कल्हार, केतकी, ` | 
बकुल, जपा, पुन्नाग, धत्तूर, मातुिग, विष्णुकान्ता, करवीर, पारिजात, कमल, मोक णिका, मुकूद, तगर, 4 
 खगन्धिराज, जगस्ति, पाटला ये इक्कोस एूलके गाछोके नाम हँ इनमेसे हर एकके साथ “पुष्पं समर्पयामि" ` 
लगाकर उसीके फूलको गणेशजौपर चढा देना चाहिये ।। यह क्रमः इक्कीस नाम मंसे चठाने चहिये । 
इनमें शतयन्ननाम कमल्का, यूथिकानाम जर्दका, कल्हार नाम एक प्रकारके लाल एवं तीनों कामि सिल ध 
रहनवाल कमलका, बकुल नाम, मोलसरीका, जपा नाम जबाका, मातुलृङ्क नाम विजौरेका, करवीर नाम ४ 
कनरका, पारिजात नाम हार श्ङ्धारका, गोकणिका नाम मुहार (मधूलिका) सुगन्धिराज नाम गन्धराजका ` 
आर अगस्ति नाम अगस्त्यका है । बाकी सन प्रचलित नाम है इस कारण उनका अर्थं नही करते । यह इक्कीस 
 तरहके एूलोसे होनेवाली पजा समाप्त हई \। एकसौ आठ नामोसि पजा-जब एकसौ आठ नामोसे गणेशजीका ` 
 पूजाका विधान कहते हैँ, इस एकसौ आठ गणपतिजौके दिव्य नामोके स्तोत्र रूप मंत्रका गत्वमद ऋषिहै, ` 
गणपति देवता है, अनुष्टुप्‌ छन्द है, रंबीज है, नं शवित है, मं कीलक है, भ्रीगणपतिदेवकी प्रस्तके ल्ि. 
गणयतिके पजनम इसका विनियोग होता है, इस प्रकार कहकर, उस जलको भभिपर छोड दे । ये ए सौ 
आठ नाम यहां भी लिखते है, ये सब मलमे हं जो चतुर्थो विभक्तिके एक वचनान्तके रूपमे लिखे है उनके ` 
आदिमं “ओम्‌” ओर अन्तमं नमः लगाकर एक एकको बोलकर पूजन करतं जाना चाहिये \ विनायक, १ 
` विध्नराज, गौरीपुत्र, गणेश्वर, स्कन्दाग्रज, अब्यय, पत, दक्षाध्यक्ष, द्विजप्रिय अग्निगर्वच्छित्‌ इन््रभी- 
श्रद, वाणीबलप्रद, सवसिद्धिप्रद, शषवंतनय, शिवप्रिय, सर्वात्मक, सष्टिकतं देवानीकाचित, शिव, शुद्ध, बुद्धि 
` भिय, शान्त, ब्रह्मचारिन्‌, गजानन, दै मातुर, मुनिस्तुत्य, भक्तविध्नविनाशन, एकदन्त, चतुर्बाहु, चतुरं, शा कत्‌ 
संयुक्त, लम्बोदर, शूषंकणं, हेरंब, ब्रह्मवित्तम, काल, ग्रहपति, कामिन्‌, सोमसुर्याग्निखोचन, पाशाडकुशधर, 
| चण्ड, गुणातीत, निरञ्जन, अकल्मष, स्वयंसिद्ध, सिद्धाचतयदाम्बज, बीजपुरप्रिय, अव्यक्त, वरद, शादवतं 
कृतिन्‌, विद्रत्पिय, वीत भय, गदिन्‌, चक्रिन इक्षुचापधृत्‌, अन्नोत्यल्कर, श्रीज्ञ, भीपति, स्तुति हषित 
कुलाग्रिभृत्‌, जटिन्‌, चद्रचूड, अमरेश्वर, नागयज्ञोपवीतिन्‌, श्रोकंठ, रामाचितपदः, व्रतिन्‌, स्थुलकंट, 5 
सामघोषप्निय, अग्रगण्य, पुरुषोत्तम, स्थूलतुण्ड, ग्रामणी, गणप, स्थिर, वृद्धिद, सुभग, शूर, वागी, 
दुर्बाबित्वप्रिय, कान्त, पाहारिन्‌ कृतागम, समाहित, वक्ततुण्ड, श्चीपद, सौम्य, भक्तकां 
केवल, सिद्धिद, सच्चिदानन्दविग्रह, ज्ञानिन्‌, मायायत, दान्त, रहिष्ठ, भयर्वाजित, प्रमत्त 
मूति, भमूतिक, पार्वती शंकरो त्संग लेलनोत्सव लालस, समस्त जगदाधर, वर मूषकवाहन 
सन्नात्मन्‌, सवे सिद्धि प्रदायक, थे १०८ नाम है जो स्तोके रूपमे पाठ किये जाते ह , इनमं 
उनका अथं तो यहां नही दिखाते कः 






















































































। ब्रताति)  हिलदीटीकाषहित ` (२३७) 


हभ ॥) पुजन ~ वनस्पति रसाद्‌ “्यत्पुरुषम्‌” इसमंतरसे एवम्‌ ओम्‌ भवानी प्रियकर्नेनम = = ` 
` धूपमाभ्नापयामिः भवानीके भिय कायं करनेवाले लिये नमसकार है । गणेजौक वूपकौ सुगन्विसुयाताहु, 

| इते धूष देनी चाहिये \ 'ुताक्तवति' इस संतरसे तथा “ब्राह्मणोस्य ' इससे एवम्‌ शजोम्‌ सरश्रियायनमः दीपं ` 

द्यामि शिवजीके प्यारे पत्र एवम्‌ शिवजोसे अधिक प्यार रखनेवालेके लिये नमस्कार है दौपको दिलाता ` 

ह इते दीपक दिलाना चाहिये । अस्ंचतुिधम्‌' इससे तथा अनेक तरहके भक््योके साथ, तिलोकि चड्ड्‌ = ५ 
समेत घीमे पकाये हए मोदकोको, हे विष्नराजेर ! ग्रहण करिये, इससे तथा “ग्रसाम” इस संत्रसे एवम्‌ = 





द्‌भूतम्‌' इस मंत्रे तथा “तपुर 





भम्‌ विघ्नविनाशन नमः नैवेयं निवेदयामि विघ्न विनाशकके लिये नमस्कार है नेवेद्यका निवेदन करता हू 


। इससे तैवेधका निवेदन करना चाहिये । “फलानि इससे तथा ओस्‌ संकटनाशिने नमः फलं समर्पयामि. = ` 
। ` संकटनारीके लिय नमस्कार है फलका समर्पण करताहूं इससे फल चढाने चाहिये । धूगीफलम्‌' इससे तथा = ` 


|  भ्नाम्या आसी" इससे एवम्‌ ओम्‌ "सिद्धिदाय नमः ताम्बूलं समपंयामि सिदधियोम देनेवाल सिये नमस्कार 


है म्बू चदाताहू \ हे ईवर ! पुजाके फलक परप्तिके लिये भके सामने सोनेका पूत रला है, इससे = ` 


आप प्रसन्न होकर मेरे मनोरथोको पुरा करर, इससे तथा “सप्तास्यासन्‌” इससे एवम्‌ “भम्‌ विष्तशाय नम 1 

सुवर्णपुष्यं समपेयामि' विष्नेशके लिये नमस्कार है सोनेका फूल चढाताह, इससे सोनेका फूल चढाना चहिये ! ` 
{ पि ,"' "4 0 ् ४ इससे ८ न, {4 । चाहिये ८ ४ ्् 4 म ए र चटानेकी : शु | ॥ 45 ^ द । व ष 
। "धिये जातः इससे आरती करनी चाहिये \\ अब दो दो दूर्वां चढानेको विधि कहते हं गणाधिप, उमाघुन, = 








अघनाङान, एक वन्त, इभववत्र, विनायक, ईैदपुत्, स्वसिद्धिमदायक, कुमार गुरः, भौ गणराज, इन नामके ` 
मआदिमें “ओम्‌” तथा अन्तमं “नमः इन्हे चतुर्थीका एकं वचनान्त करके जैसे मूलमे हँ, वैसे नाम मंत्र बन जाते ` 





है अत्येकके साय “ूर्वाककरयुग्मं समर्ेयामि" लगाकर गणेशजौपर दो' अन्तमं एक दूर्वा चढाना चाहियेये ` 


` सब गणेश्चजीके प्रसिद्ध नाम हँ \ अब इनहीं ग्यारह नाम मनत्रोका शलोको दारा भी इनका अनुवाद करतेहे ` 
कि, हे गणाधिप ! आपके लिये नमस्कार है, हे उमा (पावेति) के नन्दन! आपके लिये नमस्कारहैषहे 

अधो (पापो, या उसके दुःखो) के नादान आपको नमस्कार है, है 'एकवन्त आपको नमस्कार है'हे हस्तिके ` 
 सदृक मुखवातते आपको नमस्कार है, हे मूषक वाहन आएको नमसकार है, है विनायकं आपको नमस्कार हः 





। हे ईश (महादेवजी) के पुत्र आपको नमस्कार है हे घमस्त सिद्धियोकि देनेवाल आपको नमस्कार हैःस्वामि- 
कातिकेयके (बडेभाई) आपको नमस्कार है, है गणराज 1 आपको नमस्कार है इन पूर्वोक्त नाम मन्ते ` 


 गणेदाजौ पर भ्रत्नके साय दो दो दूबके दल चढावे ओर “१ श्रीगणेद, २ बकत्रु्ड, ३ उमा, ४ विघ्नराज, = 
५ कामद, ६ गणेदवर, ७ जीमूत (मेधो ) शविति, ८ अञ्जनसमप्रभ, ९ योपिष्येय, (योगिजन जिनका = 
` ध्यान कर एसे) १० दिव्यगुण, ११ महाकाय, १२ सिद्धिद, १३ महोदर, १४ गजवकत्र१५, कर्मभीम, १६ ५५ 
परशुषारि, १७ करि कुम्भ, (हा्ीके समान गण्डस्यलवाले) १८ विवमूति १९ उग्रतेना, १० लम्बोः = 
दर, २१ सिद्धि गणेश" ये इषकीस सन्दर नाम है, इनको जो जयता या इनसे पूजन करता है गणेशनीके अन्‌- = ` 
रहते उसके घोरे घोरभौ जो संकट हें बे सब टलनाते हैःपीे 'भहासंकण्ट' इस इरोकको पठता हभ | 
ओर भाथा करे वि, हे विद स्वामी शीमहादेवजीन प्रिय नन्दन ! भे घोर संकटरूप दावानरसे = ` 

, अब आयक चारण पराप्त हभ हू, इस कारण आप मेरे मनोरथक धुरा करि, पे सुवणं 

ट करे \ तदनन्तर प्रदक्षिणा ओर प्रणाम करके कषमा 


























लिये अध्य दान करे । उन दो इल्मोकोका यह अथं है कि, है समस्त सिद्धियोके देनेवाले गणेश्च ! जो आपह, 
आपके लिये नमस्कार है ! हे संकटोके हरनेवाले देव ! भप अघ्यं ग्रहण करिये आपके लिये नमस्कारहै।! ` 
कृष्णपक्षकौ चतुर्थको चनदरमाके उदयम जिनका अच्छी तरह पूजन क्या है एेसे हे देवदेव ! हे ईडा ! आप 
` प्रसन्न हो, अघ्यं ग्रहण करे, आपके ल्यि नमस्कार है \ तदनतर “तिया” हे तिथि्योमे उत्तमहि देवि ! है | 


मणेदजीकपि परमप्यारी ! आपके लिये नमस्कार है, आप मेरे समस्त संकटको नष्ट करनेके लिये अध्य ग्रहण । 
कर “वतुर्ये नमः इदमर्घ्यं सम्पेयामि" चतुर्थौ तिथिक अविष्ठा्ी देवी लिये नमस्कार है. मे इस अध्यंका | 
दान करता हि इस श्रकार कहकर चौथे लिये एक अध्यंदान करे । फिर रोहिणीसहित चन्द्रमाकी पञ्चोपचारोसे | 

पूजा करके “क्षीरोवाणव” हे क्षीरससुद्रसे उत्पन्न होनेवाले ! हे लक्ष्मीकरे बान्धव ! 'हे निशाकर ! हे शशौ] ` 


आप रोहिणी सहित अघ्यं प्रहुण करै, “रोहिणीसहित चन्द्राय नमः इदमधघ्यं समपेयामि "” रोहिणी सहित ` ८ 


चन्द्रमाके लिये नमस्कार है, मे इस अध्यको समर्पित करता हं इससे अघं दान करे ! गगनाङ्कण' है मकाशरूप ` ` | 
 आंगनमें दीपककी तरहं प्काञ्ञ करनेवाखे ! है क्षीरसमुद्रके मंथनसे उत्पन्न होनेवाले ! है अपनी कान्तिसे ` 
`. दिगन्तरालमं प्रकाश करनेवारे { हे सोमराज ! आपके लिये नमस्कार है चन्द्राय नमस्कारः; चन््रमकेल्ि ` 


नमस्कार यानी इस प्रकार चन्द्रमाके लिये नमस्कार करना चाहिये । पीछे आचार्यकौ पजा करके मोदकान्‌ 


इस मंत्रसे वायना दे, हे ह्विजपनेष्ठ ! आप मेरे ब्रतकी पूर्णता करनेके ल्य फल ओर दक्षिणासमेत पञ्च मोदक 1 


ग्रहण करे \ फिर गुर आचार्यके लिये प्रतिमा दक्षिणा ओर वर्त्रसहित कलस प्रदान करे उसके पहिले, "णे ` 

. शस्थ, गणेशजीकी प्रसन्नतासे मेरे समस्त मनोरथ पणे हो, हे विप्र ! में गणपत्िकी स्वणेमतिको आपकेलिये ` 
= देता हुं । यह मूत्ति पत्र ओर पोत्रादिकोको बठानेवाली है, इस दानके करनेसे अभिरूषित कामना पुण हो, 

, इसलिये इसका दान करता हू । इस प्रकार आचायंकी प्रार्थना करके गणेशजौकी प्रा्थना क